लोक सभा के निम्नलिखित अध्यक्षों में से कौन अध्यक्ष के रूप में अपने निर्वाचन के बाद औपचारिक रूप से राजनीतिक दल से अलग हो गए थे ?
- (a)जी.वी. मावलंकर
- (b)सरदार हुकम सिंह
- (c)नीलम संजीव रेड्डी
- (d)पी.ए. संगमा
उत्तर
क्यों
सही उत्तर — C, (c) नीलम संजीव रेड्डी । लोक सभा के अध्यक्षों में वे पहले व्यक्ति थे जिन्होंने अध्यक्ष चुने जाने के बाद औपचारिक रूप से अपने राजनीतिक दल से नाता तोड़ लिया । यह 1967 में हुआ, जब वे चौथी लोक सभा के अध्यक्ष निर्वाचित हुए । उनका तर्क वही था जो इस पद की मूल धारणा है : अध्यक्ष सदन का होता है, किसी दल का नहीं । उसे विपक्ष और सत्तापक्ष दोनों को समान अवसर देना होता है, प्रश्नों और प्रस्तावों पर निर्णय देना होता है, नियमों की व्याख्या करनी होती है और अनुशासन बनाए रखना होता है — और यह सब तभी विश्वसनीय रहता है जब पद पर बैठा व्यक्ति दलगत निष्ठा से मुक्त दिखाई दे । यह परंपरा ब्रिटेन के हाउस ऑफ़ कॉमन्स से आई है, जहाँ अध्यक्ष चुने जाने पर व्यक्ति अपने दल से अलग हो जाता है और आगे के चुनाव भी प्रायः निर्दलीय रूप में लड़ता है । भारत में ऐसा करना संविधान की कोई बाध्यता नहीं है ; यहाँ अध्यक्ष अपने दल का सदस्य बना रह सकता है । इसीलिए संजीव रेड्डी का निर्णय विशेष रूप से उल्लेखनीय माना जाता है और परीक्षाओं में उसी रूप में पूछा जाता है । यह भी ध्यान देने योग्य है कि दल-बदल विरोधी क़ानून, जो संविधान की दसवीं अनुसूची के रूप में 1985 में जोड़ा गया, ऐसे निर्णय को विशेष संरक्षण देता है : यदि कोई व्यक्ति अध्यक्ष या उपाध्यक्ष चुने जाने पर अपने दल की सदस्यता छोड़ देता है तो उसे उस अनुसूची के अंतर्गत निरर्हता का सामना नहीं करना पड़ता, और पद छोड़ने पर वह अपने दल में लौट भी सकता है । संजीव रेड्डी आगे चलकर भारत के राष्ट्रपति भी बने ।
अन्य विकल्प क्यों गलत हैं
- (a)जी.वी. मावलंकर — गणेश वासुदेव मावलंकर लोक सभा के पहले अध्यक्ष थे और उन्हें लोक सभा का जनक कहा जाता है, इसलिए इस विकल्प का आकर्षण स्वाभाविक है — कोई भी पहला काम उन्हीं के नाम लगता है । पर यह विशेष निर्णय उनका नहीं था । उनका योगदान दूसरे प्रकार का और उससे कम महत्वपूर्ण नहीं है : संविधान लागू होने से पहले वे केंद्रीय विधान सभा और संविधान सभा के विधायी अधिवेशनों के अध्यक्ष रहे, और पहली लोक सभा के अध्यक्ष के रूप में उन्होंने वे कार्य-संचालन की परंपराएँ और प्रक्रियाएँ स्थापित कीं जिन पर आगे का पूरा संसदीय व्यवहार टिका है । पद पर रहते हुए ही उनका निधन हुआ । ऐसे प्रश्नों में यह सावधानी उपयोगी है कि हर पहले काम को संस्था के पहले पदाधिकारी से जोड़ने की प्रवृत्ति से बचा जाए ।
- (b)सरदार हुकम सिंह — सरदार हुकम सिंह संजीव रेड्डी से ठीक पहले, तीसरी लोक सभा के अध्यक्ष थे, इसलिए काल की दृष्टि से यह विकल्प निकट है और उतना ही भ्रामक भी । वे उससे पहले उपाध्यक्ष रह चुके थे और अध्यक्ष पद छोड़ने के बाद राज्यपाल के रूप में भी नियुक्त हुए । पर दल से औपचारिक रूप से अलग हो जाने वाला निर्णय उनके कार्यकाल का नहीं है । इस प्रश्न को हल करते समय यह याद रखना पर्याप्त है कि यह परंपरा 1967 से जुड़ी है और उस वर्ष अध्यक्ष कौन बना । लोक सभा अध्यक्षों की सूची पूरी याद रखना आवश्यक नहीं ; आरंभिक कुछ नाम, कुछ विशेष प्रसंगों से जुड़े नाम, और उनके साथ जुड़ी घटनाएँ याद रखना अधिक उपयोगी है ।
- (d)पी.ए. संगमा — पूर्णो अगितोक संगमा 1996 से 1998 तक लोक सभा के अध्यक्ष रहे और उनका कार्यकाल गठबंधन सरकारों तथा बार-बार बदलती बहुमत-स्थिति के दौर में पड़ा, जहाँ अध्यक्ष की भूमिका विशेष रूप से कठिन थी । पर यह विशेष निर्णय उनका नहीं है । वे मेघालय से आते थे और आगे चलकर उनका राजनीतिक मार्ग बदला भी । यह विकल्प केवल इसलिए रखा गया है कि सूची में एक बाद के काल का प्रसिद्ध नाम भी रहे और चुनाव केवल परिचितता से न हो सके । ऐसे प्रश्नों में काल का ध्यान रखना निर्णायक होता है : यदि आपको स्मरण है कि यह परंपरा 1960 के दशक की है, तो 1990 के दशक का कोई नाम अपने आप कट जाता है ।
अवधारणा
लोक सभा अध्यक्ष का पद संविधान के अनुच्छेद 93 से आता है, जिसके अनुसार लोक सभा यथाशीघ्र अपने दो सदस्यों को अध्यक्ष और उपाध्यक्ष चुनती है । अनुच्छेद 94 बताता है कि वे कब पद छोड़ते हैं — सदन का सदस्य न रहने पर, त्यागपत्र देने पर, अथवा तत्कालीन सब सदस्यों के बहुमत से पारित संकल्प द्वारा हटाए जाने पर ; ऐसे संकल्प के लिए चौदह दिन की पूर्व सूचना आवश्यक है और उस पर विचार के समय अध्यक्ष स्वयं पीठासीन नहीं होता, यद्यपि वह बोल सकता है और मत भी दे सकता है । अध्यक्ष का पद सदन की धुरी है : वही कार्यवाही का संचालन करता है, नियमों की व्याख्या करता है, प्रश्नों और प्रस्तावों की ग्राह्यता पर निर्णय देता है, दल-बदल से जुड़ी निरर्हता के मामलों का निर्णय करता है, और यह प्रमाणित करता है कि कोई विधेयक धन विधेयक है या नहीं । वह सामान्य मतदान में भाग नहीं लेता, पर मत बराबर होने पर निर्णायक मत देता है । दोनों सदनों की संयुक्त बैठक की अध्यक्षता भी लोक सभा अध्यक्ष ही करता है । अध्यक्ष का वेतन और भत्ते भारत की संचित निधि पर भारित होते हैं, जिससे उन पर सदन में प्रतिवर्ष मतदान नहीं होता — यह भी पद की स्वतंत्रता का एक उपाय है ।
इस प्रश्न का असली विषय अध्यक्ष की निष्पक्षता है, जो भारतीय संसदीय व्यवहार की एक स्थायी बहस भी है । ब्रिटेन में अध्यक्ष का दल से अलग हो जाना दीर्घकालीन परंपरा है ; भारत में संविधान ऐसी कोई अपेक्षा नहीं करता और अध्यक्ष प्रायः अपने दल का सदस्य बना रहता है । इसी कारण समय-समय पर यह सुझाव दिया जाता रहा है कि भारत में भी वही परंपरा अपनाई जाए, और नीलम संजीव रेड्डी का 1967 का निर्णय उस बहस में सबसे अधिक उद्धृत उदाहरण है । दसवीं अनुसूची, जो 1985 में दल-बदल रोकने के लिए जोड़ी गई, इस दिशा में एक व्यावहारिक संरक्षण देती है — अध्यक्ष या उपाध्यक्ष चुने जाने पर दल छोड़ने वाले को निरर्हता से बचाती है । अर्थात् संविधान परंपरा को अनिवार्य नहीं करता, पर उसे अपनाने वाले के मार्ग से बाधा हटा देता है ।
मुख्य तथ्य
- नीलम संजीव रेड्डी 1967 में चौथी लोक सभा के अध्यक्ष चुने गए और उन्होंने अध्यक्ष बनने के बाद औपचारिक रूप से अपने दल से नाता तोड़ लिया ।
- भारत में अध्यक्ष के लिए दल छोड़ना संविधान की कोई बाध्यता नहीं है ; यह परंपरा ब्रिटेन के हाउस ऑफ़ कॉमन्स से आई है ।
- संविधान की दसवीं अनुसूची, जो 1985 में जोड़ी गई, अध्यक्ष या उपाध्यक्ष चुने जाने पर दल छोड़ने वाले को निरर्हता से संरक्षण देती है ।
- अनुच्छेद 93 के अनुसार लोक सभा अपने दो सदस्यों को अध्यक्ष और उपाध्यक्ष चुनती है ।
- अनुच्छेद 94 के अनुसार अध्यक्ष को तत्कालीन सब सदस्यों के बहुमत से पारित संकल्प द्वारा हटाया जा सकता है, जिसके लिए चौदह दिन की पूर्व सूचना आवश्यक है ।
- अध्यक्ष सामान्य मतदान में भाग नहीं लेता, पर मत बराबर होने पर निर्णायक मत देता है ; दोनों सदनों की संयुक्त बैठक की अध्यक्षता भी वही करता है ।
- जी.वी. मावलंकर लोक सभा के पहले अध्यक्ष थे और उन्हें लोक सभा का जनक कहा जाता है ; उनका निधन पद पर रहते हुए हुआ ।
- अध्यक्ष का वेतन और भत्ते भारत की संचित निधि पर भारित होते हैं, जिससे उन पर सदन में प्रतिवर्ष मतदान नहीं होता ।
आगे की तैयारी
सामान्य भ्रम
- हर पहले काम को संस्था के पहले पदाधिकारी से जोड़ देना । यह निर्णय पहले अध्यक्ष का नहीं था ।
- यह मान लेना कि भारत में अध्यक्ष के लिए दल छोड़ना अनिवार्य है । संविधान ऐसी कोई अपेक्षा नहीं करता ।
- दसवीं अनुसूची के अपवाद को भूल जाना ; वह अध्यक्ष बनने पर दल छोड़ने वाले को संरक्षण देती है ।
- काल का ध्यान न रखना । यह प्रसंग 1960 के दशक का है, इसलिए बाद के दशकों के नाम अपने आप कट जाते हैं ।
- अध्यक्ष के निर्णायक मत को सामान्य मत समझ लेना ; वह केवल मत बराबर होने पर दिया जाता है ।
राजव्यवस्था के प्रश्न इस प्रश्नपत्र में नियमित रूप से आते हैं और उनमें संसदीय पद तथा प्रक्रिया एक स्थायी विषय है । ऐसे प्रश्न दो रूपों में आते हैं — शुद्ध संवैधानिक प्रावधान, जैसे कोई अनुच्छेद क्या कहता है ; और परंपरा तथा उदाहरण, जैसे यह प्रश्न । दूसरे प्रकार की तैयारी के लिए कुछ प्रसिद्ध प्रसंग याद रखने चाहिए, क्योंकि वे बार-बार लौटते हैं । साथ में यह भी देखिए कि जिस परंपरा की बात हो रही है वह संविधान की अपेक्षा है या केवल व्यवहार, क्योंकि प्रश्न कभी-कभी ठीक इसी अंतर पर बनते हैं । तीसरी बात, संसदीय पदों की तैयारी करते समय प्रत्येक पद के लिए तीन बातें एक साथ रखिए — संबंधित अनुच्छेद, चुने या हटाए जाने की प्रक्रिया, और उससे जुड़ा कोई विशेष प्रसंग । इससे संविधान और समसामयिकी दोनों दिशाओं से आने वाले प्रश्न एक साथ सधते हैं ।
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