निम्नलिखित में से कौन काँग्रेस पार्टी में समाजवादी गुट के सदस्य नहीं थे ?
- (a)जयप्रकाश नारायण
- (b)राजेन्द्र प्रसाद
- (c)एन.जी. रंगा
- (d)नरेन्द्र देव
उत्तर
क्यों
सही उत्तर — B, (b) राजेन्द्र प्रसाद । स्टेम में निषेध मोटे तिरछे अक्षरों में छपा है, इसलिए यहाँ वह नाम ढूँढ़ना है जो कांग्रेस के भीतर के समाजवादी गुट का सदस्य नहीं था । कांग्रेस समाजवादी दल की स्थापना 1934 में हुई । वह कांग्रेस से अलग दल नहीं था, बल्कि कांग्रेस के भीतर काम करने वाला एक वैचारिक समूह था, जिसका उद्देश्य राष्ट्रीय आंदोलन को समाजवादी दिशा देना, आर्थिक कार्यक्रम को उसके केंद्र में लाना और किसानों तथा मज़दूरों को संगठित करना था । उसके संगठन का भार आरंभ से जयप्रकाश नारायण पर था, जो उसके महामंत्री बने, और अध्यक्ष का दायित्व आचार्य नरेंद्र देव ने संभाला । इस समूह से जुड़े अन्य प्रमुख नामों में मीनू मसानी, अच्युत पटवर्धन, अशोक मेहता, यूसुफ़ मेहर अली, राममनोहर लोहिया, संपूर्णानंद, कमलादेवी चट्टोपाध्याय और एन.जी. रंगा गिनाए जाते हैं । राजेन्द्र प्रसाद इस धारा में कहीं नहीं आते । वे बिहार से आए गाँधीवादी नेता थे, चंपारण सत्याग्रह से गाँधीजी के निकट सहयोगी रहे, कांग्रेस के अध्यक्ष हुए, संविधान सभा के अध्यक्ष बने और स्वतंत्र भारत के पहले राष्ट्रपति चुने गए । कांग्रेस के भीतर उनकी पहचान गाँधीजी के दक्षिणपंथी अथवा परंपरावादी समझे जाने वाले सहयोगियों में थी, समाजवादी वामपक्ष में नहीं । वस्तुतः 1930 के दशक में जब समाजवादी युवक कांग्रेस के आर्थिक कार्यक्रम को आगे बढ़ाने पर ज़ोर दे रहे थे, तब उनका सबसे स्पष्ट प्रतिपक्ष वही वरिष्ठ गाँधीवादी नेतृत्व था जिसमें वल्लभभाई पटेल, राजगोपालाचारी और राजेन्द्र प्रसाद गिने जाते हैं । यही अंतर इस प्रश्न का आधार है ।
अन्य विकल्प क्यों गलत हैं
- (a)जयप्रकाश नारायण — जयप्रकाश नारायण तो इस गुट के सबसे प्रमुख संगठनकर्ता थे, इसलिए यह उत्तर नहीं हो सकता । अमेरिका में अध्ययन के दौरान वे मार्क्सवादी विचारों के संपर्क में आए और लौटकर कांग्रेस में सक्रिय हुए ; 1934 में कांग्रेस समाजवादी दल बना तो उसके महामंत्री का दायित्व उन्हीं पर आया । आगे चलकर 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन में भूमिगत गतिविधियों के कारण उनकी ख्याति और बढ़ी, और हज़ारीबाग़ कारागार से उनका निकल भागना उस दौर की सबसे चर्चित घटनाओं में गिना जाता है । स्वतंत्रता के बाद वे सत्ता की राजनीति से हटकर सर्वोदय और भूदान की दिशा में गए और बहुत बाद में संपूर्ण क्रांति के आह्वान से जुड़े । उनका नाम समाजवादी धारा का पर्याय है ।
- (c)एन.जी. रंगा — एन.जी. रंगा भी इसी वैचारिक धारा से जुड़े थे, इसलिए वे निषेध का उत्तर नहीं बनते । वे आंध्र क्षेत्र के किसान नेता थे और उनकी पहचान मुख्यतः किसान आंदोलन से बनी — 1936 में अखिल भारतीय किसान सभा के गठन में उनकी भूमिका रही, जिसमें स्वामी सहजानंद सरस्वती भी अग्रणी थे । कांग्रेस समाजवादी दल के आरंभिक नेताओं की सूचियों में उनका नाम नियमित रूप से आता है, क्योंकि 1930 के दशक की वामपक्षी धारा में किसान संगठन और समाजवादी विचार साथ-साथ चल रहे थे । आगे चलकर उनके राजनीतिक रास्ते बदले, पर प्रश्न 1930 के दशक के गुट की बात कर रहा है । इसीलिए ऐसे प्रश्नों में काल का ध्यान रखना आवश्यक है — नेता का बाद का मार्ग उस समय की पहचान नहीं बदलता ।
- (d)नरेन्द्र देव — आचार्य नरेंद्र देव कांग्रेस समाजवादी दल के अध्यक्ष थे, इसलिए वे उत्तर नहीं हो सकते । वे उत्तर प्रदेश से आने वाले विद्वान नेता थे, बौद्ध दर्शन और भारतीय चिंतन के गंभीर अध्येता, और उन्होंने समाजवाद को भारतीय परिस्थितियों में समझाने का प्रयास किया । जयप्रकाश नारायण के साथ उनका जोड़ा 1930 के दशक की समाजवादी धारा की पहचान बन गया — एक संगठन का चेहरा और दूसरा विचार का । शिक्षा के क्षेत्र में भी उनका योगदान रहा और वे काशी विद्यापीठ तथा लखनऊ विश्वविद्यालय से जुड़े रहे । ऐसे प्रश्नों में यही सावधानी काम आती है कि हर गुट के दो-तीन प्रतिनिधि नाम पहले से याद हों, फिर बाहरी नाम स्वयं दिख जाता है ।
अवधारणा
1930 के दशक में राष्ट्रीय आंदोलन के भीतर वामपक्षी धारा तेज़ी से उभरी और उसके तीन प्रमुख रूप थे — कांग्रेस के भीतर बना कांग्रेस समाजवादी दल, भारत की कम्युनिस्ट पार्टी, तथा किसान और मज़दूर संगठन । कांग्रेस समाजवादी दल की स्थापना 1934 में हुई और उसका उद्देश्य कांग्रेस से अलग होना नहीं, बल्कि उसे भीतर से समाजवादी दिशा देना था । उसकी माँगें थीं — प्रमुख उद्योगों का राष्ट्रीयकरण, ज़मींदारी का उन्मूलन, किसानों के ऋण से मुक्ति, मज़दूरों के अधिकार और आर्थिक कार्यक्रम को स्वाधीनता संघर्ष के केंद्र में लाना । जयप्रकाश नारायण उसके महामंत्री और आचार्य नरेंद्र देव अध्यक्ष रहे ; मीनू मसानी, अच्युत पटवर्धन, अशोक मेहता, यूसुफ़ मेहर अली, राममनोहर लोहिया, संपूर्णानंद, कमलादेवी चट्टोपाध्याय और एन.जी. रंगा जैसे नाम इस धारा से जुड़े रहे । इसी दशक में 1936 में अखिल भारतीय किसान सभा बनी और मज़दूर संगठनों का विस्तार हुआ । जवाहरलाल नेहरू और सुभाषचंद्र बोस समाजवादी विचारों के प्रति सहानुभूति रखते थे, यद्यपि वे इस दल के सदस्य नहीं थे ।
कांग्रेस के भीतर के गुटों को समझना इस प्रकार के प्रश्नों की कुंजी है, और उन गुटों का ढाँचा दशक के अनुसार बदलता रहा । बीसवीं शताब्दी के आरंभ में विभाजन नरमपंथी और गरमपंथी का था ; 1922 के बाद स्वराजवादी और अपरिवर्तनवादी का ; 1930 के दशक में समाजवादी वामपक्ष और गाँधीवादी वरिष्ठ नेतृत्व का । एक ही नेता अलग-अलग दशकों में अलग-अलग गुटों के संदर्भ में पूछा जा सकता है, इसलिए नाम के साथ काल जोड़कर याद रखना आवश्यक है । राजेन्द्र प्रसाद इसका अच्छा उदाहरण हैं : वे 1920 के दशक में अपरिवर्तनवादी गुट में गिने जाते हैं और 1930 के दशक में गाँधीवादी वरिष्ठ नेतृत्व में, पर समाजवादी गुट में किसी भी दशक में नहीं । इस पेपर में उनसे जुड़ा एक और प्रश्न भी है, जो उन्हें अपरिवर्तनवादी समूह के संदर्भ में रखता है ।
मुख्य तथ्य
- कांग्रेस समाजवादी दल की स्थापना 1934 में हुई ; यह कांग्रेस से अलग दल नहीं, उसके भीतर काम करने वाला वैचारिक समूह था ।
- जयप्रकाश नारायण इस दल के महामंत्री बने और आचार्य नरेंद्र देव इसके अध्यक्ष रहे ।
- इस धारा से जुड़े अन्य प्रमुख नाम हैं मीनू मसानी, अच्युत पटवर्धन, अशोक मेहता, यूसुफ़ मेहर अली, राममनोहर लोहिया, संपूर्णानंद और कमलादेवी चट्टोपाध्याय ।
- एन.जी. रंगा आंध्र के किसान नेता थे और 1936 में अखिल भारतीय किसान सभा के गठन से जुड़े रहे ; समाजवादी धारा की सूचियों में उनका नाम आता है ।
- राजेन्द्र प्रसाद गाँधीवादी नेता थे — चंपारण सत्याग्रह के सहयोगी, कांग्रेस अध्यक्ष, संविधान सभा के अध्यक्ष और स्वतंत्र भारत के पहले राष्ट्रपति ।
- दल की माँगों में प्रमुख उद्योगों का राष्ट्रीयकरण, ज़मींदारी का उन्मूलन, किसानों की ऋण-मुक्ति और मज़दूर अधिकार सम्मिलित थे ।
- जवाहरलाल नेहरू और सुभाषचंद्र बोस समाजवादी विचारों के प्रति सहानुभूति रखते थे, यद्यपि वे इस दल के सदस्य नहीं थे ।
- 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन में भूमिगत गतिविधियों के कारण जयप्रकाश नारायण की ख्याति और बढ़ी ।
आगे की तैयारी
सामान्य भ्रम
- नेता की बाद की राजनीति को उसकी उस समय की पहचान मान लेना । प्रश्न 1930 के दशक के गुट की बात कर रहा है ।
- जवाहरलाल नेहरू और सुभाषचंद्र बोस को कांग्रेस समाजवादी दल का सदस्य मान लेना । वे सहानुभूति रखते थे, सदस्य नहीं थे ।
- कांग्रेस समाजवादी दल को कांग्रेस से अलग हुआ दल समझ लेना । वह उसके भीतर काम करने वाला समूह था ।
- गुटों को काल से अलग करके याद करना । एक ही नेता दो दशकों में दो अलग गुटों के संदर्भ में पूछा जा सकता है ।
- निषेध चूक जाना और उस नाम पर निशान लगा देना जो सचमुच उस गुट का था ।
राष्ट्रीय आंदोलन के प्रश्नों में गुट और व्यक्ति का मिलान सबसे अधिक दोहराया जाने वाला ढाँचा है, और इस पेपर में यह दो बार आया है — एक बार समाजवादी गुट पर और एक बार अपरिवर्तनवादी समूह पर । ऐसे प्रश्नों की तैयारी सूची बनाकर होती है : हर गुट के सामने उसके तीन-चार प्रतिनिधि नाम, और हर नाम के सामने उसका काल तथा क्षेत्र । इससे यह भी दिखने लगता है कि परीक्षक बाहरी नाम कैसे चुनता है — प्रायः वह उसी काल का, उसी प्रसिद्धि का, पर दूसरी धारा का नेता होता है, ताकि केवल नाम की परिचितता से काम न चले । दूसरी उपयोगी आदत यह है कि निषेधात्मक प्रश्न पढ़ते ही मन में उसे उलट लीजिए — पहले यह तय कीजिए कि तीन नाम किस श्रेणी के हैं, फिर बचा हुआ नाम स्वयं उत्तर बन जाता है । इस पुस्तिका में निषेध मोटे तिरछे अक्षरों में छपा है, जो सहायक है, पर जल्दबाज़ी में वह भी छूट जाता है ।
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- (c) Babu Rajendra Prasad
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अभ्यास
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कांग्रेस समाजवादी दल के महामंत्री के रूप में उसके संगठन का दायित्व निम्नलिखित में से किसने संभाला था ?
- (a)आचार्य नरेंद्र देव
- (b)जयप्रकाश नारायण
- (c)राममनोहर लोहिया
- (d)अशोक मेहता
उत्तर(b) जयप्रकाश नारायण — 1934 में दल के गठन पर वे उसके महामंत्री बने ।
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अखिल भारतीय किसान सभा की स्थापना निम्नलिखित में से किस वर्ष हुई थी, जिसमें स्वामी सहजानंद सरस्वती अग्रणी रहे ?
- (a)1930
- (b)1934
- (c)1936
- (d)1942
उत्तर(c) 1936 — इसी वर्ष अखिल भारतीय किसान सभा का गठन हुआ ।