ट्रेड यूनियन अधिनियम, 1926 के उपबंध के अंतर्गत निम्नलिखित में से किस/किन विवाद/विवादों को व्यवसाय-विवाद माना जाता है ? किसी व्यक्ति का ऐसा विवाद जो निम्नलिखित से संबंधित हो : 1. नियोजन 2. अनियोजन 3. श्रम परिस्थितियाँ नीचे दिए गए कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिए :
- (a)केवल 1
- (b)केवल 2 और 3
- (c)1, 2 और 3
- (d)केवल 1 और 3
उत्तर
क्यों
सही उत्तर — C, (c) 1, 2 और 3 । ट्रेड यूनियन अधिनियम, 1926 की धारा 2(g) व्यवसाय-विवाद को परिभाषित करती है : नियोजकों और कर्मकारों के बीच, कर्मकारों और कर्मकारों के बीच, या नियोजकों और नियोजकों के बीच ऐसा कोई विवाद जो किसी व्यक्ति के नियोजन या अनियोजन से, या नियोजन के निबंधनों से, या श्रम की परिस्थितियों से संबंधित हो । परिभाषा में तीनों विषय — नियोजन, अनियोजन और श्रम परिस्थितियाँ — एक ही वाक्य में गिनाए गए हैं, इसलिए तीनों कथन सही हैं और तीनों को लेने वाला विकल्प ही उत्तर है । हर पद का अपना विस्तार है । नियोजन से जुड़े विवाद वे हैं जिनमें किसी को काम पर रखने, बहाल करने या किसी पद पर लगाने का प्रश्न हो । अनियोजन से जुड़े विवाद व्यवहार में सबसे अधिक होते हैं — सेवा से हटाया जाना, पदच्युति, छँटनी, काम पर वापस न लिया जाना । यही वह पद है जिसे अभ्यर्थी सबसे पहले छोड़ देते हैं, यह सोचकर कि जब व्यक्ति नियोजित ही नहीं है तो विवाद कैसा ; जबकि विधायिका ने इसे जानबूझकर जोड़ा है, क्योंकि सेवा-समाप्ति का विवाद ही संघों का सबसे बड़ा विषय है । श्रम परिस्थितियाँ काम के घंटे, विश्राम, सुरक्षा, स्वास्थ्य, शिफ़्ट और कार्यस्थल की दशा जैसी बातें समेटती हैं । इस परिभाषा में दो और बातें ध्यान देने योग्य हैं । पहली, विवाद के पक्ष तीन प्रकार के हो सकते हैं और उनमें कर्मकारों का आपसी विवाद भी सम्मिलित है । दूसरी, धारा 2(g) का स्पष्टीकरण कर्मकार शब्द को चौड़ा करता है — इसमें व्यापार या उद्योग में नियोजित वे सब व्यक्ति आते हैं, चाहे वे उसी नियोजक के यहाँ नियोजित हों या नहीं जिसके साथ विवाद उठा है । यह परिभाषा औद्योगिक विवाद अधिनियम, 1947 की धारा 2(k) की औद्योगिक विवाद वाली परिभाषा से लगभग शब्दशः मिलती है, और दोनों को साथ पढ़ लेना दोनों प्रश्नों का उत्तर एक साथ दे देता है ।
अन्य विकल्प क्यों गलत हैं
- (a)केवल 1 — यह विकल्प परिभाषा को उसके पहले शब्द पर काट देता है । नियोजन निश्चित रूप से व्यवसाय-विवाद का विषय है, पर धारा 2(g) वहीं नहीं रुकती — वही वाक्य आगे अनियोजन, नियोजन के निबंधन और श्रम की परिस्थितियों को भी जोड़ता है । यदि केवल नियोजन से जुड़े विवाद ही व्यवसाय-विवाद माने जाते, तो सेवा से हटाए जाने या काम की दशा सुधारने की माँग पर उठा कोई भी झगड़ा इस परिभाषा से बाहर हो जाता, और ट्रेड यूनियन को धारा 17 तथा 18 का संरक्षण उन्हीं मामलों में नहीं मिलता जिनके लिए वह संरक्षण बनाया गया था । कथन-आधारित प्रश्नों में सबसे संकीर्ण विकल्प तभी चुनिए जब आप निश्चित रूप से जानते हों कि शेष कथन ग़लत हैं, केवल इसलिए नहीं कि वह सुरक्षित दिखता है ।
- (b)केवल 2 और 3 — यह विकल्प वही एक विषय छोड़ देता है जो परिभाषा में सबसे पहले आता है । धारा 2(g) का क्रम ही नियोजन, अनियोजन, नियोजन के निबंधन और श्रम की परिस्थितियाँ है — नियोजन को बाहर करने का कोई आधार अधिनियम में नहीं है । व्यवहार में भी नियोजन से जुड़े विवाद आम हैं : किसे काम पर रखा जाए, किस श्रेणी में रखा जाए, ठेके पर रखे गए व्यक्ति को स्थायी किया जाए या नहीं, किसी को बहाल किया जाए या नहीं । ऐसा विकल्प प्रायः इसलिए बनाया जाता है कि जो अभ्यर्थी पहला कथन बहुत सीधा देखकर उसे जाल समझ बैठता है, वह उसे ही काट दे । कथन-आधारित प्रश्नों में सीधा दिखने वाला कथन प्रायः सीधा ही होता है ।
- (d)केवल 1 और 3 — यही सबसे भ्रामक विकल्प है, क्योंकि यह ठीक उस पद को छोड़ता है जिसे छोड़ना सहज लगता है — अनियोजन । तर्क यह बनता है कि जब कोई नियोजित ही नहीं है तो उसका विवाद व्यवसाय-विवाद कैसे होगा । पर धारा 2(g) में अनियोजन शब्द जानबूझकर रखा गया है और उसी ने पदच्युति, सेवा-समाप्ति, छँटनी और काम पर वापस न लिए जाने के विवादों को इस परिभाषा के भीतर लाया है । यदि अनियोजन बाहर कर दिया जाए तो सबसे आम श्रमिक विवाद ही परिभाषा से बाहर हो जाएगा । यही शब्द औद्योगिक विवाद अधिनियम, 1947 की धारा 2(k) में भी है, और वहाँ भी उसी कारण से । दोनों परिभाषाएँ साथ पढ़ लेने पर यह विकल्प तुरंत कट जाता है ।
अवधारणा
ट्रेड यूनियन अधिनियम, 1926 की धारा 2(g) व्यवसाय-विवाद को इस प्रकार परिभाषित करती है : नियोजकों और कर्मकारों के बीच, कर्मकारों और कर्मकारों के बीच, या नियोजकों और नियोजकों के बीच ऐसा कोई विवाद जो किसी व्यक्ति के नियोजन या अनियोजन से, या नियोजन के निबंधनों से, या श्रम की परिस्थितियों से संबंधित हो । इसी धारा का स्पष्टीकरण कर्मकार को परिभाषित करता है — किसी व्यापार या उद्योग में नियोजित सभी व्यक्ति, चाहे वे उस नियोजक के यहाँ नियोजित हों या न हों जिसके साथ विवाद उठा है । यह परिभाषा अधिनियम में सजावट के लिए नहीं है । धारा 17 पंजीकृत ट्रेड यूनियन के पदाधिकारियों और सदस्यों को व्यवसाय-विवाद को आगे बढ़ाने के लिए किए गए किसी करार पर आपराधिक षड्यंत्र के अभियोजन से संरक्षण देती है, और धारा 18 यूनियन तथा उसके पदाधिकारियों को उन सिविल वादों से बचाती है जो केवल इस आधार पर लाए जाएँ कि उनके कार्य से किसी के व्यापार या नियोजन में बाधा पहुँची । दोनों संरक्षण तभी चलते हैं जब मामला व्यवसाय-विवाद की परिभाषा में आता हो — इसलिए परिभाषा की चौड़ाई ही संरक्षण की चौड़ाई है । यही कारण है कि उसमें नियोजन, अनियोजन, निबंधन और श्रम परिस्थितियाँ चारों समेट लिए गए हैं ।
इस परिभाषा को औद्योगिक विवाद अधिनियम, 1947 की धारा 2(k) के साथ पढ़ना चाहिए, जो औद्योगिक विवाद को लगभग इन्हीं शब्दों में परिभाषित करती है — वही तीन प्रकार के पक्ष और वही चार विषय । अंतर प्रयोजन का है : 1926 का अधिनियम यह तय करने के लिए परिभाषा देता है कि यूनियन को संरक्षण कहाँ तक मिलेगा, और 1947 का अधिनियम यह तय करने के लिए कि सुलह और अधिकरण की मशीनरी कब चलेगी । परीक्षा में दोनों परिभाषाएँ आमने-सामने रखकर पूछी जाती हैं, और चूँकि शब्द लगभग एक हैं, इसलिए एक बार साथ याद कर लेना दोनों के लिए पर्याप्त होता है । ईपीएफओ की परीक्षा में ऐसे प्रश्न इसलिए आते हैं कि प्रवर्तन अधिकारी को यह पहचानना पड़ता है कि किसी प्रतिष्ठान का झगड़ा किस कानून के दायरे में आता है और उस पर कौन-सा प्राधिकारी काम करेगा ।
मुख्य तथ्य
- ट्रेड यूनियन अधिनियम, 1926 की धारा 2(g) : व्यवसाय-विवाद किसी व्यक्ति के नियोजन, अनियोजन, नियोजन के निबंधनों या श्रम की परिस्थितियों से जुड़ा विवाद है ।
- विवाद के पक्ष तीन प्रकार के हो सकते हैं — नियोजक और कर्मकार, कर्मकार और कर्मकार, तथा नियोजक और नियोजक ।
- धारा 2(g) का स्पष्टीकरण : कर्मकार में व्यापार या उद्योग में नियोजित वे सब व्यक्ति आते हैं, चाहे वे उसी नियोजक के यहाँ नियोजित हों या नहीं जिससे विवाद है ।
- अनियोजन शब्द ही पदच्युति, सेवा-समाप्ति, छँटनी और काम पर वापस न लिए जाने के विवादों को परिभाषा के भीतर लाता है ।
- श्रम की परिस्थितियों में काम के घंटे, विश्राम, सुरक्षा, स्वास्थ्य और कार्यस्थल की दशा जैसे विषय आते हैं ।
- धारा 17 : पंजीकृत यूनियन के पदाधिकारियों और सदस्यों को व्यवसाय-विवाद बढ़ाने के करार पर आपराधिक षड्यंत्र के अभियोजन से संरक्षण ।
- धारा 18 : यूनियन और उसके पदाधिकारियों को उन सिविल वादों से संरक्षण जो केवल व्यापार या नियोजन में बाधा के आधार पर लाए जाएँ ।
- औद्योगिक विवाद अधिनियम, 1947 की धारा 2(k) औद्योगिक विवाद को लगभग इन्हीं शब्दों में परिभाषित करती है — वही पक्ष और वही विषय ।
आगे की तैयारी
सामान्य भ्रम
- अनियोजन को परिभाषा से बाहर कर देना । पदच्युति और सेवा-समाप्ति के विवाद इसी शब्द के कारण व्यवसाय-विवाद बनते हैं ।
- यह मान लेना कि विवाद केवल नियोजक और कर्मकार के बीच हो सकता है । परिभाषा कर्मकारों के आपसी और नियोजकों के आपसी विवाद भी समेटती है ।
- कर्मकार को केवल उसी नियोजक का कर्मचारी मान लेना । स्पष्टीकरण इसे व्यापार या उद्योग में नियोजित सभी व्यक्तियों तक फैलाता है ।
- कथन-आधारित प्रश्न में सबसे संकीर्ण विकल्प को सुरक्षित मान लेना । संकीर्ण विकल्प तभी सही है जब शेष कथन वास्तव में ग़लत हों ।
- 1926 और 1947 के अधिनियमों की परिभाषाओं को एक-दूसरे का खंडन मान लेना । वे लगभग एक जैसी हैं ; अंतर प्रयोजन का है, विषय का नहीं ।
श्रम विधि के प्रश्न इस पेपर में दो रूपों में आते हैं — सीधी परिभाषा और कथन-आधारित कूट । यह प्रश्न दूसरा रूप है, और उसका अपना कौशल है । पहले स्टेम में लिखा अधिनियम देखिए, क्योंकि वही तय करता है कि किस परिभाषा से मिलान करना है । फिर हर कथन को अलग-अलग सही या ग़लत ठहराइए, और उसके बाद कूट में जाइए — कूट पहले देख लेने पर मन उसी विकल्प की ओर झुक जाता है जो पहले पढ़ा गया । जहाँ किसी परिभाषा में गिनती के विषय हों, वहाँ प्रायः सारे विषय सही निकलते हैं और सही उत्तर सबसे व्यापक विकल्प होता है, क्योंकि परिभाषाएँ जानबूझकर चौड़ी लिखी जाती हैं ; पर इसे नियम मानकर मत चलिए, हर कथन की जाँच अलग से कीजिए । अंत में यह देखिए कि जिस अधिनियम की परिभाषा पूछी गई है, किसी दूसरे अधिनियम की मिलती-जुलती परिभाषा उसमें घुल तो नहीं रही ।
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- (a) 2 members
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- (a) A-1, B-2, C-4, D-3
- (b) A-3, B-4, C-2, D-1
- (c) A-1, B-4, C-2, D-3
- (d) A-3, B-2, C-4, D-1
उत्तर(a) A-1, B-2, C-4, D-3
औद्योगिक विवाद अधिनियम, 1947 की परिभाषाओं पर बनी इसी पेपर की एकमात्र सुमेलित सूची ।
अभ्यास
- practice — not a real PYQ
ट्रेड यूनियन अधिनियम, 1926 के अंतर्गत व्यवसाय-विवाद निम्नलिखित में से किन पक्षों के बीच हो सकता है ?
- (a)केवल नियोजक और कर्मकार के बीच
- (b)केवल कर्मकार और कर्मकार के बीच
- (c)नियोजक और कर्मकार, कर्मकार और कर्मकार, तथा नियोजक और नियोजक के बीच
- (d)केवल नियोजक और सरकार के बीच
उत्तर(c) नियोजक और कर्मकार, कर्मकार और कर्मकार, तथा नियोजक और नियोजक के बीच — धारा 2(g) तीनों संयोजन गिनाती है ।
- practice — not a real PYQ
पंजीकृत ट्रेड यूनियन के पदाधिकारियों को व्यवसाय-विवाद से जुड़े करार पर आपराधिक षड्यंत्र के अभियोजन से संरक्षण किस धारा में मिलता है ?
- (a)धारा 13
- (b)धारा 15
- (c)धारा 17
- (d)धारा 22
उत्तर(c) धारा 17 — यही धारा आपराधिक षड्यंत्र के अभियोजन से संरक्षण देती है ।