लेखाकरण के संदर्भ में, पद IFRS किसका प्रतीक है?
- (a)इंटरनैशनल फाइनैंशियल रिपोर्टिंग स्टैंडर्ड्स
- (b)इंडियन फाइनैंशियल रिपोर्टिंग स्टैंडर्ड्स
- (c)इंडियन फाइनैंशियल रिपोर्टिंग सिस्टम
- (d)इंटरनैशनल फाइनैंशियल रिपोर्टिंग सिस्टम
उत्तर
क्यों
सही उत्तर — A, (a) इंटरनैशनल फाइनैंशियल रिपोर्टिंग स्टैंडर्ड्स। संक्षेपाक्षर IFRS का पूरा रूप है International Financial Reporting Standards, अर्थात् अंतर्राष्ट्रीय वित्तीय रिपोर्टिंग मानक। दो शब्द यहाँ निर्णायक हैं और चारों विकल्प उन्हीं दो पर खेले गए हैं। पहला शब्द 'इंटरनैशनल' है, 'इंडियन' नहीं — ये मानक किसी एक देश के नहीं, बल्कि अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर जारी किए जाते हैं। दूसरा शब्द 'स्टैंडर्ड्स' है, 'सिस्टम' नहीं — ये अलग-अलग मानकों का समुच्चय हैं, कोई एक प्रणाली नहीं। इन दोनों की जाँच से शेष तीनों विकल्प एक साथ बाहर हो जाते हैं। अब बात इनके स्वरूप की। ये मानक अंतर्राष्ट्रीय लेखांकन मानक बोर्ड द्वारा जारी किए जाते हैं, जो 2001 में अस्तित्व में आया और जिसने अपने पूर्ववर्ती अंतर्राष्ट्रीय लेखांकन मानक समिति का स्थान लिया; इसी कारण पुराने मानक 'अंतर्राष्ट्रीय लेखांकन मानक' कहलाते हैं और नए 'अंतर्राष्ट्रीय वित्तीय रिपोर्टिंग मानक', और दोनों आज भी साथ-साथ चलते हैं। इनका उद्देश्य यह है कि विभिन्न देशों की कंपनियों के वित्तीय विवरण एक ही भाषा में बोलें, ताकि निवेशक, ऋणदाता तथा नियामक उनकी तुलना कर सकें; पूँजी के अंतर्राष्ट्रीय प्रवाह के लिए यह तुलनीयता अत्यंत महत्त्वपूर्ण है। भारत ने इन मानकों को ज्यों का त्यों अपनाने के बजाय उनसे अभिसरण का मार्ग चुना और भारतीय लेखा मानक (Ind AS) बनाए, जिन्हें कंपनियों पर चरणबद्ध रूप से लागू किया गया। अभिसरण का अर्थ यह है कि भारतीय मानक अंतर्राष्ट्रीय मानकों के अनुरूप तो बनाए गए, पर उनमें स्थानीय विधि तथा परिस्थिति के अनुसार कुछ भिन्नताएँ रखी गईं — यह उन्हें ज्यों का त्यों अपना लेने से भिन्न है। अतः विकल्प (a) ही सही है।
अन्य विकल्प क्यों गलत हैं
- (b)इंडियन फाइनैंशियल रिपोर्टिंग स्टैंडर्ड्स — इस विकल्प में पहला शब्द बदल दिया गया है — 'इंटरनैशनल' के स्थान पर 'इंडियन'। यही इस प्रश्न की मुख्य चाल है, क्योंकि भारत के अपने मानक भी हैं और उनका नाम भी लगभग इसी ढाँचे का है, इसलिए भ्रम स्वाभाविक है। भेद इस प्रकार रखिए: अंतर्राष्ट्रीय मानक IFRS कहलाते हैं और वे अंतर्राष्ट्रीय लेखांकन मानक बोर्ड जारी करता है; भारत के अभिसरित मानक 'भारतीय लेखा मानक' अर्थात् Ind AS कहलाते हैं, और उनसे पहले प्रचलित भारतीय मानक केवल 'लेखा मानक' अर्थात् AS कहलाते थे। तीनों अलग हैं, यद्यपि उनकी विषय-वस्तु में बड़ा साम्य है। परीक्षा प्रायः इन्हीं तीन नामों को आपस में बदलकर विकल्प बनाती है, इसलिए तीनों के पूरे रूप और उनके जारीकर्ता याद रखना ही सुरक्षित है।
- (c)इंडियन फाइनैंशियल रिपोर्टिंग सिस्टम — इस विकल्प में दोनों शब्द बदले गए हैं — 'इंटरनैशनल' की जगह 'इंडियन' और 'स्टैंडर्ड्स' की जगह 'सिस्टम'। दूसरा परिवर्तन विशेष रूप से महत्त्वपूर्ण है, क्योंकि 'सिस्टम' और 'स्टैंडर्ड्स' का अर्थ ही अलग है: प्रणाली किसी काम को करने का ढाँचा या तंत्र होती है, जबकि मानक अलग-अलग विषयों पर बने ऐसे नियम होते हैं जिनका पालन अपेक्षित है। लेखांकन में ये मानक विषय-वार होते हैं — राजस्व, सूची, स्थायी परिसंपत्तियाँ, पट्टे, कर्मचारी-हितलाभ, वित्तीय उपकरण — और प्रत्येक की अपनी संख्या तथा शीर्षक होता है। इसलिए 'सिस्टम' शब्द वाला कोई भी विकल्प इस संक्षेपाक्षर का सही विस्तार नहीं हो सकता। दोहरा परिवर्तन होने के कारण यह विकल्प सबसे कमज़ोर है और उसे सबसे पहले काट देना चाहिए।
- (d)इंटरनैशनल फाइनैंशियल रिपोर्टिंग सिस्टम — इस विकल्प में पहला शब्द सही है — 'इंटरनैशनल' — पर अंतिम शब्द बदल दिया गया है, 'स्टैंडर्ड्स' की जगह 'सिस्टम'। यही इसे विकल्प (b) जितना ही ख़तरनाक बनाता है, क्योंकि आधा नाम सही होने से पूरा नाम सही लगने लगता है। ध्यान रखिए कि इस क्षेत्र की सभी प्रमुख संस्थाएँ तथा दस्तावेज़ 'मानक' शब्द का ही प्रयोग करते हैं — अंतर्राष्ट्रीय लेखांकन मानक, अंतर्राष्ट्रीय वित्तीय रिपोर्टिंग मानक, भारतीय लेखा मानक, तथा लेखा मानक — क्योंकि इनका काम व्यवहार को मानकीकृत करना है। 'प्रणाली' शब्द वहाँ आता है जहाँ किसी तंत्र या पद्धति की बात हो, जैसे लेखांकन की द्वि-प्रविष्टि प्रणाली। इस प्रश्न में चारों विकल्प दो शब्दों के चार संयोजन हैं, इसलिए दोनों शब्दों की अलग-अलग जाँच ही सही उत्तर तक पहुँचाती है।
अवधारणा
वित्तीय रिपोर्टिंग के मानकों का पूरा ढाँचा तीन स्तरों पर समझा जा सकता है। पहला स्तर अंतर्राष्ट्रीय है: अंतर्राष्ट्रीय लेखांकन मानक समिति ने 1970 के दशक से मानक जारी करने आरंभ किए, जिन्हें अंतर्राष्ट्रीय लेखांकन मानक कहा गया; 2001 में उसका पुनर्गठन हुआ और अंतर्राष्ट्रीय लेखांकन मानक बोर्ड बना, जो तब से अंतर्राष्ट्रीय वित्तीय रिपोर्टिंग मानक जारी करता है। दूसरा स्तर राष्ट्रीय है: अधिकांश देशों ने या तो इन मानकों को सीधे अपनाया या उनसे अभिसरण किया, अर्थात् अपने मानकों को उनके अनुरूप बनाया पर कुछ स्थानीय भिन्नताएँ बनाए रखीं। तीसरा स्तर प्रवर्तन का है: मानक बनाना एक बात है और उन्हें कंपनियों से मनवाना दूसरी, इसलिए हर देश में नियामक तथा लेखा-परीक्षा की व्यवस्था इससे जुड़ी होती है। इन मानकों का सामान्य झुकाव 'उचित मूल्य' पर मापन तथा विस्तृत प्रकटीकरण की ओर रहा है, जो पारंपरिक मूल लागत वाले दृष्टिकोण से भिन्न है — और यही इन्हें सीखने का सबसे बड़ा कारण भी है।
भारत ने इन मानकों को ज्यों का त्यों अपनाने के बजाय अभिसरण का मार्ग चुना, और उसी से भारतीय लेखा मानक अर्थात् Ind AS बने। इन्हें कंपनी अधिनियम के अंतर्गत बनाए गए नियमों से अधिसूचित किया गया और कंपनियों पर चरणबद्ध रूप से लागू किया गया — पहले बड़ी सूचीबद्ध तथा असूचीबद्ध कंपनियों पर, फिर क्रमशः छोटी कंपनियों पर, और बैंकों तथा बीमा कंपनियों के लिए अलग समय-सारिणी रखी गई। अभिसरण और अंगीकरण का भेद यहाँ महत्त्वपूर्ण है: अंगीकरण में देश अंतर्राष्ट्रीय मानक को ज्यों का त्यों लागू कर देता है, जबकि अभिसरण में वह अपने मानक बनाता है जो अंतर्राष्ट्रीय मानकों के अनुरूप तो हों पर जिनमें स्थानीय विधि तथा परिस्थिति के अनुसार कुछ भिन्नताएँ रखी जा सकें। भारत में लेखा मानकों के निर्माण में भारतीय सनदी लेखाकार संस्थान की भूमिका रही है और उन्हें सरकार अधिसूचित करती है। परीक्षा में यह विषय दो तरह से आता है — संक्षेपाक्षर का पूरा रूप, जैसे यहाँ, और भारत में अभिसरण की व्यवस्था।
मुख्य तथ्य
- IFRS का पूरा रूप है International Financial Reporting Standards, अर्थात् अंतर्राष्ट्रीय वित्तीय रिपोर्टिंग मानक।
- ये मानक अंतर्राष्ट्रीय लेखांकन मानक बोर्ड द्वारा जारी किए जाते हैं, जो 2001 में अस्तित्व में आया और जिसने अंतर्राष्ट्रीय लेखांकन मानक समिति का स्थान लिया।
- पुराने मानक 'अंतर्राष्ट्रीय लेखांकन मानक' कहलाते हैं और नए 'अंतर्राष्ट्रीय वित्तीय रिपोर्टिंग मानक'; दोनों आज भी साथ-साथ प्रचलित हैं।
- इनका उद्देश्य यह है कि विभिन्न देशों की कंपनियों के वित्तीय विवरण तुलनीय बनें, जिससे निवेशक तथा ऋणदाता उनकी तुलना कर सकें।
- भारत ने इन्हें ज्यों का त्यों अपनाने के बजाय अभिसरण का मार्ग चुना और भारतीय लेखा मानक अर्थात् Ind AS बनाए, जो कंपनियों पर चरणबद्ध रूप से लागू हुए।
- अंगीकरण में देश अंतर्राष्ट्रीय मानक ज्यों का त्यों लागू करता है, जबकि अभिसरण में वह अपने मानक बनाता है जिनमें स्थानीय भिन्नताएँ रखी जा सकती हैं।
- इन मानकों का सामान्य झुकाव उचित मूल्य पर मापन तथा विस्तृत प्रकटीकरण की ओर है, जो पारंपरिक मूल लागत वाले दृष्टिकोण से भिन्न है।
आगे की तैयारी
सामान्य भ्रम
- 'इंटरनैशनल' और 'इंडियन' में भ्रम करना; IFRS अंतर्राष्ट्रीय मानक हैं, जबकि भारत के अभिसरित मानक Ind AS कहलाते हैं।
- 'स्टैंडर्ड्स' और 'सिस्टम' में भ्रम करना; ये विषय-वार बने मानकों का समुच्चय हैं, कोई एक प्रणाली नहीं।
- आधा नाम सही देखकर पूरा विकल्प सही मान लेना; चारों विकल्प दो शब्दों के चार संयोजन हैं और दोनों शब्दों की अलग-अलग जाँच आवश्यक है।
- यह मान लेना कि भारत ने IFRS को ज्यों का त्यों अपना लिया; भारत ने अभिसरण का मार्ग चुना और अपने भारतीय लेखा मानक बनाए।
संक्षेपाक्षर का पूरा रूप पूछने वाले प्रश्न इस परीक्षा में नियमित रूप से आते हैं, और उनकी बनावट प्रायः वही होती है जो यहाँ है — दो शब्दों को बदलकर उनके चार संयोजन विकल्पों में रख दिए जाते हैं। ऐसे प्रश्न में अनुमान का कोई काम नहीं; उत्तर तभी निकलेगा जब पूरा नाम स्मृति में हो। पर एक पद्धतिगत सहारा है: विकल्पों को शब्द-दर-शब्द तोड़िए और हर शब्द पर अलग निर्णय लीजिए। यहाँ पहला निर्णय यह है कि मानक अंतर्राष्ट्रीय हैं या भारतीय, और दूसरा यह कि वे 'मानक' हैं या 'प्रणाली'; दोनों निर्णय मिलकर उत्तर तय कर देते हैं। तैयारी की दृष्टि से लेखाशास्त्र तथा वित्त के संक्षेपाक्षरों की एक अलग सूची बनाना उपयोगी है, जिसमें पूरा नाम, जारीकर्ता संस्था और उस संस्था का देश या स्तर लिखा हो — क्योंकि परीक्षा कभी नाम पूछती है, कभी जारीकर्ता, और कभी यह कि भारत में उसका समकक्ष क्या है।
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- (b)IFRS
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