मालिमथ समिति (2003) ने किसके सुधार के लिए तरीकों पर विचार किया ?
- (a)भारत में शिक्षा प्रणाली
- (b)भारत में दांडिक न्याय प्रणाली
- (c)भारत में प्रतिलिप्यधिकार विधि
- (d)भारत में सार्वजनिक-निजी भागीदारी
उत्तर
क्यों
सही उत्तर — B, (b) भारत में दांडिक न्याय प्रणाली — 2003 की मालिमथ समिति का पूरा नाम ही दांडिक न्याय प्रणाली में सुधार से जुड़ा है। यह समिति गृह मंत्रालय द्वारा गठित की गई थी, इसकी अध्यक्षता न्यायमूर्ति वी.एस. मालिमथ ने की, जो कर्नाटक तथा केरल उच्च न्यायालयों के मुख्य न्यायाधीश रह चुके थे, और इसने अपनी रिपोर्ट 2003 में सौंपी। समिति का मूल प्रश्न यह था कि भारत की दांडिक न्याय प्रणाली में दोषसिद्धि की दर कम क्यों है, मुक़दमे इतने लंबे क्यों चलते हैं, और पीड़ित की स्थिति इतनी कमज़ोर क्यों है। इसकी संस्तुतियाँ इन्हीं प्रश्नों से निकलीं और उनमें कई विवादास्पद भी रहीं : प्रणाली को विशुद्ध प्रतिवादात्मक रखने के बजाय उसमें अन्वेषणात्मक पद्धति के कुछ तत्त्व जोड़ना, ताकि न्यायालय सत्य तक पहुँचने में अधिक सक्रिय भूमिका निभा सके; प्रमाण के मानक पर पुनर्विचार, अर्थात् 'युक्तियुक्त संदेह से परे' के स्थान पर कुछ कम कठोर मानक का सुझाव; अभियुक्त से न्यायालय द्वारा प्रश्न पूछे जाने की व्यवस्था; पीड़ित के अधिकारों को सुदृढ़ करना, जिसमें प्रतिकर और कार्यवाही में भागीदारी सम्मिलित है; अन्वेषण को विधि-व्यवस्था के काम से अलग करना; तथा न्यायिक नियुक्तियों के लिए एक आयोग की व्यवस्था। इन संस्तुतियों पर व्यापक बहस हुई और सबको स्वीकार नहीं किया गया, पर प्रश्न यह पूछ रहा है कि समिति ने किस प्रणाली के सुधार पर विचार किया — और उसका उत्तर दांडिक न्याय प्रणाली है, इसलिए (b) सही है।
अन्य विकल्प क्यों गलत हैं
- (a)भारत में शिक्षा प्रणाली — शिक्षा प्रणाली की समीक्षा के लिए भारत में अलग आयोग और समितियाँ बनी हैं, और उनका सिलसिला लंबा है — स्वतंत्रता के बाद विश्वविद्यालय शिक्षा तथा माध्यमिक शिक्षा पर आयोग बैठे, फिर 1964 से 1966 के बीच काम करने वाले शिक्षा आयोग ने, जिसे उसके अध्यक्ष के नाम से जाना जाता है, पूरी शिक्षा-व्यवस्था की समीक्षा की और राष्ट्रीय शिक्षा नीति का आधार तैयार किया। मालिमथ समिति का इनसे कोई संबंध नहीं। यह विकल्प उस अभ्यर्थी के लिए है जिसे समिति का नाम अपरिचित लगता है और वह किसी परिचित विषय पर अनुमान लगा लेता है। ऐसे प्रश्नों में बचाव यह है कि समिति के नाम के साथ उसका मंत्रालय याद रखा जाए : यह समिति गृह मंत्रालय की थी, और गृह मंत्रालय का क्षेत्र आंतरिक सुरक्षा, पुलिस तथा दांडिक विधि है, शिक्षा नहीं।
- (c)भारत में प्रतिलिप्यधिकार विधि — प्रतिलिप्यधिकार अर्थात् कॉपीराइट का क्षेत्र बौद्धिक संपदा विधि का है और उसका प्रशासन अलग विभाग के पास है; इस क्षेत्र में सुधार विधि के संशोधन से हुए हैं, जिनमें 2012 का बड़ा संशोधन उल्लेखनीय है, जिसने डिजिटल माध्यमों, कलाकारों के अधिकारों और दिव्यांगजनों के लिए सुगम्य प्रारूपों से जुड़े उपबंध जोड़े। मालिमथ समिति का इस विषय से कोई संबंध नहीं। यह विकल्प इसलिए रखा गया लगता है कि 'विधि में सुधार' वाला वाक्यांश दांडिक विधि और प्रतिलिप्यधिकार विधि दोनों पर लागू हो सकता है, और नाम याद न होने पर अभ्यर्थी किसी भी विधिक क्षेत्र को चुन सकता है। यहाँ भी वही बचाव काम आता है : समिति किस मंत्रालय की थी और उसका प्रश्न क्या था — दोषसिद्धि की दर, मुक़दमों की अवधि और पीड़ित की स्थिति, जो स्पष्ट रूप से दांडिक न्याय के प्रश्न हैं।
- (d)भारत में सार्वजनिक-निजी भागीदारी — सार्वजनिक-निजी भागीदारी के प्रतिरूप की समीक्षा के लिए अलग समिति बनी थी, जिसने 2015 में अपनी रिपोर्ट दी और जोखिम के अधिक संतुलित बँटवारे, विवाद-समाधान की बेहतर व्यवस्था तथा अनुबंधों के पुनर्गठन जैसी संस्तुतियाँ दीं। उसका विषय अवसंरचना और अनुबंध है, दांडिक न्याय नहीं। यह विकल्प इस प्रश्नपत्र के आर्थिक खंड की शब्दावली से उठाया गया है और इसी कारण परिचित लगता है — इसी प्रश्नपत्र में सार्वजनिक उपक्रमों में विनिवेश से जुड़ी एक समिति की संस्तुतियाँ भी पूछी गई हैं। यही इस प्रकार के प्रश्नों की सबसे उपयोगी सीख है : समितियों और आयोगों को उनके विषय-क्षेत्र के अनुसार समूहों में याद कीजिए — विधि और न्याय, आर्थिक सुधार, संघीय संबंध, निर्वाचन सुधार, शिक्षा — क्योंकि परीक्षा प्रायः एक समूह की समिति का नाम दूसरे समूह के विषय से जोड़कर चारा बनाती है।
अवधारणा
समितियों और आयोगों से जुड़े प्रश्न इन परीक्षाओं में लगातार आते हैं और उन्हें याद रखने का सबसे व्यावहारिक ढंग विषय-समूह बनाना है। विधि तथा न्याय के समूह में मालिमथ समिति आती है, जिसने दांडिक न्याय प्रणाली में सुधार पर 2003 में रिपोर्ट दी, तथा विधि आयोग की वे रिपोर्टें, जो समय-समय पर दांडिक तथा दीवानी विधि के संशोधन सुझाती रही हैं। निर्वाचन सुधार के समूह में उन समितियों की रिपोर्टें आती हैं जिन्होंने चुनाव-प्रणाली की समीक्षा की। आर्थिक सुधार के समूह में विनिवेश, कर-सुधार, वित्तीय क्षेत्र और सार्वजनिक-निजी भागीदारी से जुड़ी समितियाँ आती हैं। संघीय संबंधों के समूह में केंद्र-राज्य संबंधों की समीक्षा करने वाले आयोग आते हैं, और शिक्षा के समूह में शिक्षा आयोग तथा नीतियाँ। मालिमथ समिति की संस्तुतियों को समझने के लिए यह जानना उपयोगी है कि भारत की दांडिक न्याय प्रणाली प्रतिवादात्मक है, अर्थात् अभियोजन और बचाव पक्ष अपने-अपने साक्ष्य लाते हैं और न्यायाधीश निर्णायक की भूमिका में रहता है; इसके विपरीत अन्वेषणात्मक प्रणाली में न्यायाधीश स्वयं सत्य की खोज में सक्रिय रहता है। समिति ने इन्हीं दो पद्धतियों के बीच संतुलन बदलने का सुझाव दिया था, और उसी कारण उसकी संस्तुतियाँ विवादास्पद भी रहीं।
यह सीधा तथ्य-प्रश्न है : एक समिति का नाम और वर्ष देकर उसका विषय पूछा गया है। ऐसे प्रश्न में विकल्प जानबूझकर चार अलग-अलग क्षेत्रों से लिए जाते हैं — शिक्षा, दांडिक न्याय, बौद्धिक संपदा और अवसंरचना — ताकि अनुमान लगाना कठिन हो और केवल वही अभ्यर्थी उत्तर दे सके जिसे नाम और विषय की जोड़ी याद हो। फिर भी एक सहारा है : समिति किस मंत्रालय ने बैठाई थी, यह याद हो तो विषय-क्षेत्र अपने आप निकल आता है। यह प्रश्नपत्र समितियों पर एक से अधिक प्रश्न पूछता है, जिनमें विनिवेश पर बनी समिति की संस्तुतियाँ भी सम्मिलित हैं, इसलिए इस विषय की तैयारी यहाँ सीधे अंक देती है। हिन्दी स्तंभ की बनावट पर भी ध्यान दीजिए : यहाँ स्टेम पूरा प्रश्नवाक्य है और प्रश्नचिह्न पर समाप्त होता है, जबकि अंग्रेज़ी स्तंभ का वही स्टेम 'ways to reform the' पर अधूरा छूटता है और विकल्प उसे पूरा करते हैं। हिन्दी में 'दांडिक न्याय प्रणाली' तथा 'प्रतिलिप्यधिकार' जैसे पारिभाषिक अनुवाद प्रयुक्त हुए हैं, इसलिए इन पदों के दोनों रूप जानना उपयोगी है।
मुख्य तथ्य
- मालिमथ समिति दांडिक न्याय प्रणाली में सुधार के लिए गृह मंत्रालय द्वारा गठित की गई थी, इसकी अध्यक्षता न्यायमूर्ति वी.एस. मालिमथ ने की और इसने 2003 में अपनी रिपोर्ट सौंपी।
- समिति ने प्रतिवादात्मक प्रणाली में अन्वेषणात्मक पद्धति के कुछ तत्त्व जोड़ने का सुझाव दिया, ताकि न्यायालय सत्य तक पहुँचने में अधिक सक्रिय भूमिका निभा सके।
- इसकी अन्य प्रमुख संस्तुतियों में प्रमाण के मानक पर पुनर्विचार, अभियुक्त से न्यायालय द्वारा प्रश्न पूछे जाने की व्यवस्था, और पीड़ित के अधिकारों को प्रतिकर तथा भागीदारी के रूप में सुदृढ़ करना सम्मिलित है।
- समिति ने अन्वेषण को विधि-व्यवस्था के काम से अलग करने तथा न्यायिक नियुक्तियों के लिए एक आयोग की व्यवस्था का भी सुझाव दिया; इसकी अनेक संस्तुतियाँ विवादास्पद रहीं और सब स्वीकार नहीं की गईं।
- भारत की दांडिक न्याय प्रणाली प्रतिवादात्मक है, जिसमें अभियोजन और बचाव पक्ष साक्ष्य लाते हैं और न्यायाधीश निर्णायक रहता है; अन्वेषणात्मक प्रणाली में न्यायाधीश स्वयं सत्य की खोज में सक्रिय रहता है।
आगे की तैयारी
सामान्य भ्रम
- समिति के नाम को विषय से न जोड़ पाना और किसी परिचित क्षेत्र पर अनुमान लगा लेना; यहाँ चारों विकल्प चार अलग क्षेत्रों से हैं।
- मंत्रालय की कड़ी भूल जाना — यह समिति गृह मंत्रालय की थी, इसलिए विषय आंतरिक सुरक्षा तथा दांडिक विधि का ही होगा।
- एक ही उपनाम की अलग-अलग समितियों को मिला देना; इसीलिए प्रश्न में वर्ष भी दिया गया है और वर्ष सहित याद रखना चाहिए।
- संस्तुति और स्वीकृति को एक मान लेना; समिति की अनेक संस्तुतियाँ विवादास्पद रहीं और सब लागू नहीं हुईं।
समितियों और आयोगों पर प्रश्न तीन रूपों में आते हैं। पहला यही सीधा रूप है — किस समिति ने किस विषय पर काम किया, अथवा किस समिति के अध्यक्ष कौन थे। दूसरा रूप संस्तुति का है : किसी समिति की तीन-चार संस्तुतियाँ कथन-रूप में देकर पूछा जाता है कि कौन-सी उसने की थी अथवा कौन-सी नहीं की थी; इसी प्रश्नपत्र में विनिवेश पर बनी समिति के साथ ऐसा ही किया गया है, और इस परिवार के दूसरे प्रश्नपत्रों में निर्वाचन सुधार वाली समिति के साथ भी। तीसरा रूप परिणाम का है — किस समिति की संस्तुति से कौन-सी विधि या संस्था बनी। तीनों के लिए तैयारी की इकाई एक ही है : प्रत्येक समिति के साथ चार बातें लिखिए — वर्ष, अध्यक्ष, मंत्रालय या विषय-क्षेत्र, और दो प्रमुख संस्तुतियाँ। यह चार-पंक्ति का विवरण पहले और दूसरे दोनों रूपों के लिए पर्याप्त होता है।
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EPFO_APFC_2016_Q53खोलें व हल करें →The Rangarajan Committee on disinvestment of shares in Public Sector Enterprises suggested that 1. The percentage of equity to be divested should be no more than 49% for industries explicitly reserved for the public sector and it should be either 74% or 100% for others. 2. Year-wise targets of disinvestment should be maintained. Which of the above statements is/are correct ?
- (a) 1 only
- (b) 2 only
- (c) Both 1 and 2
- (d) Neither 1 nor 2
उत्तर(a) 1 only
इसी प्रश्नपत्र का वह प्रश्न, जिसमें सार्वजनिक उपक्रमों में विनिवेश पर बनी समिति की संस्तुतियाँ कथन-रूप में परखी गई हैं — समिति-आधारित प्रश्नों का दूसरा और कठिनतर रूप।
EPFO_EOAO_2023_Q60Which one of the following was not recommended by the Dinesh Goswami Committee (1990) ?
- (a) The appointment of the Chief Election Commissioner should be made by the President of India in consultation with the Chief Justice of India and the Leader of the Opposition.
- (b) The members of the Election Commission should be appointed by the President of India on the advice of a Committee, consisting of the Prime Minister and the Leader of the Opposition.
- (c) The consultation process should have a statutory backing.
- (d) The appointment of the other Election Commissioners should be made in consultation with the Chief Election Commissioner, the Chief Justice of India and the Leader of the Opposition.
उत्तर(b) The members of the Election Commission should be appointed by the President of India on the advice of a Committee, consisting of the Prime Minister and the Leader of the Opposition.
इसी परिवार का प्रश्न, जो एक समिति की संस्तुतियों में से असत्य कथन छँटवाता है — वही तैयारी, जिसमें प्रत्येक समिति के साथ उसकी दो-तीन प्रमुख संस्तुतियाँ याद रखनी पड़ती हैं।
अभ्यास
- practice — not a real PYQ
मालिमथ समिति (2003) की संस्तुतियों में निम्नलिखित में से कौन-सी सम्मिलित थी ?
- (a)पीड़ित के अधिकारों को सुदृढ़ करना और उसे प्रतिकर तथा कार्यवाही में भागीदारी देना
- (b)सभी दांडिक मामलों में जूरी प्रणाली पुनः लागू करना
- (c)उच्च न्यायालयों की संख्या घटाना
- (d)प्रतिलिप्यधिकार विधि में डिजिटल उपबंध जोड़ना
उत्तर(a) पीड़ित के अधिकारों को सुदृढ़ करना और उसे प्रतिकर तथा कार्यवाही में भागीदारी देना — यह समिति की प्रमुख संस्तुतियों में है। जूरी प्रणाली भारत में बहुत पहले समाप्त हो चुकी थी और उसे पुनः लागू करने का सुझाव इस समिति की पहचान नहीं है; शेष दोनों विकल्प उसके विषय-क्षेत्र से ही बाहर हैं।
- practice — not a real PYQ
भारत की दांडिक न्याय प्रणाली किस पद्धति पर आधारित है ?
- (a)प्रतिवादात्मक पद्धति
- (b)अन्वेषणात्मक पद्धति
- (c)पंचाट पद्धति
- (d)प्रशासनिक पद्धति
उत्तर(a) प्रतिवादात्मक पद्धति — इसमें अभियोजन और बचाव पक्ष अपने-अपने साक्ष्य प्रस्तुत करते हैं और न्यायाधीश निर्णायक की भूमिका में रहता है। अन्वेषणात्मक पद्धति में न्यायाधीश स्वयं सत्य की खोज में सक्रिय रहता है, और मालिमथ समिति ने इसी दिशा के कुछ तत्त्व जोड़ने का सुझाव दिया था।