यदि भारत का प्रधान मंत्री राज्य सभा का सदस्य है, तो
- (a)वह केवल राज्य सभा में ही वक्तव्य दे सकता है
- (b)उसे छह महीनों के अन्दर लोक सभा का सदस्य बनना होगा
- (c)वह लोक सभा में बजट पर नहीं बोल सकेगा
- (d)अविश्वास प्रस्ताव की स्थिति में वह अपने पक्ष में मत नहीं दे पाएगा
उत्तर
क्यों
सही उत्तर — D, (d) अविश्वास प्रस्ताव की स्थिति में वह अपने पक्ष में मत नहीं दे पाएगा — यही एकमात्र सही परिणाम है, और वह दो नियमों के मेल से निकलता है। पहला नियम यह है कि अविश्वास प्रस्ताव केवल लोक सभा में लाया और मतदान के लिए रखा जाता है, राज्य सभा में नहीं; इसका आधार संविधान का वह उपबंध है जिसके अनुसार मंत्रि-परिषद् सामूहिक रूप से लोक सभा के प्रति उत्तरदायी होती है। दूसरा नियम यह है कि प्रत्येक मंत्री को दोनों सदनों की कार्यवाही में बोलने और भाग लेने का अधिकार है, चाहे वह उस सदन का सदस्य हो या न हो, पर मत देने का अधिकार केवल उसी सदन में है जिसका वह सदस्य है। इन दोनों को मिलाकर परिणाम स्पष्ट है : राज्य सभा का सदस्य प्रधान मंत्री लोक सभा में अविश्वास प्रस्ताव पर हुई चर्चा में बोल सकता है, अपनी सरकार का पक्ष रख सकता है, पर मत नहीं दे सकता — इसलिए वह अपने पक्ष में मत भी नहीं दे सकता। यह कोई काल्पनिक स्थिति नहीं है : भारत में एक से अधिक प्रधान मंत्री राज्य सभा के सदस्य रहते हुए इस पद पर रहे हैं, और उनकी सरकारों को लोक सभा में ही विश्वास सिद्ध करना पड़ा। यहाँ एक और बात स्पष्ट रखनी चाहिए, जो विकल्पों में परखी गई है : संविधान यह अपेक्षा करता है कि मंत्री छह मास के भीतर संसद् के किसी एक सदन का सदस्य हो जाए, न कि विशेष रूप से लोक सभा का — इसलिए राज्य सभा का सदस्य होना इस अपेक्षा को पहले ही पूरा कर देता है।
अन्य विकल्प क्यों गलत हैं
- (a)वह केवल राज्य सभा में ही वक्तव्य दे सकता है — यह कथन संविधान के उस उपबंध के विरुद्ध है जो प्रत्येक मंत्री को दोनों सदनों की कार्यवाही में बोलने और भाग लेने का अधिकार देता है, तथा किसी भी संयुक्त बैठक और उस समिति में भी, जिसका वह सदस्य हो। मंत्री होने के नाते वह सदन में विधेयक प्रस्तुत कर सकता है, प्रश्नों का उत्तर दे सकता है और चर्चा में भाग ले सकता है, चाहे वह उस सदन का सदस्य न हो। जो अधिकार सीमित है वह केवल मतदान का है, और यही भेद इस पूरे प्रश्न की धुरी है। इस विकल्प का आकर्षण इस सामान्य धारणा से आता है कि व्यक्ति अपने ही सदन में सक्रिय हो सकता है; पर संसदीय व्यवस्था में मंत्री का उत्तरदायित्व दोनों सदनों के प्रति होता है, इसलिए उसे बोलने का अधिकार दोनों जगह देना आवश्यक था — अन्यथा राज्य सभा से आने वाला मंत्री लोक सभा में अपने विभाग का पक्ष ही न रख पाता।
- (b)उसे छह महीनों के अन्दर लोक सभा का सदस्य बनना होगा — यह विकल्प एक वास्तविक संवैधानिक अपेक्षा को उठाकर उसमें एक शब्द बदल देता है, और इसीलिए यह सबसे प्रबल चारा है। संविधान की अपेक्षा यह है कि जो व्यक्ति मंत्री बनते समय संसद् के किसी सदन का सदस्य नहीं है, वह छह मास के भीतर किसी एक सदन का सदस्य हो जाए, अन्यथा उस अवधि के बाद वह मंत्री नहीं रहेगा। इसमें 'किसी एक सदन' कहा गया है, 'लोक सभा' नहीं। इसलिए जो प्रधान मंत्री पहले से राज्य सभा का सदस्य है, उसके लिए यह अपेक्षा पहले ही पूरी हो चुकी है और उसे लोक सभा का सदस्य बनने की कोई बाध्यता नहीं। यह प्रावधान वस्तुतः उस स्थिति के लिए है जब कोई ऐसा व्यक्ति मंत्री बनाया जाए जो उस समय किसी भी सदन का सदस्य न हो। यही कारण है कि इस विकल्प को हटाने के लिए उपबंध का ठीक-ठीक पाठ याद होना आवश्यक है, केवल 'छह मास' वाली स्मृति पर्याप्त नहीं।
- (c)वह लोक सभा में बजट पर नहीं बोल सकेगा — यह भी उसी भ्रम का दूसरा रूप है और उसी उपबंध से कट जाता है : मंत्री को दोनों सदनों में बोलने और कार्यवाही में भाग लेने का अधिकार है, इसलिए राज्य सभा का सदस्य प्रधान मंत्री लोक सभा में बजट सहित किसी भी विषय पर बोल सकता है। यहाँ बजट का उल्लेख इस विकल्प को विशेष रूप से विश्वसनीय बनाता है, क्योंकि धन विधेयक और बजट से जुड़ी अनेक शक्तियाँ सचमुच लोक सभा के पास ही हैं — धन विधेयक केवल लोक सभा में पुरःस्थापित हो सकता है और उस पर राज्य सभा की शक्ति सीमित है। किन्तु यह सदन की शक्ति का प्रश्न है, किसी मंत्री के बोलने के अधिकार का नहीं। दोनों बातों को अलग रखना चाहिए : सदन की विधायी शक्ति एक विषय है, और मंत्री का सदन में बोलने तथा मत देने का अधिकार दूसरा।
अवधारणा
इस प्रश्न के पीछे संसदीय शासन-प्रणाली के तीन उपबंध हैं। पहला, मंत्रि-परिषद् सामूहिक रूप से लोक सभा के प्रति उत्तरदायी होती है — इसी से यह निकलता है कि सरकार का विश्वास लोक सभा में ही परखा जाता है और अविश्वास प्रस्ताव केवल उसी सदन में आता है। दूसरा, प्रत्येक मंत्री को दोनों सदनों की कार्यवाही में बोलने और भाग लेने का अधिकार है, तथा संयुक्त बैठक और अपनी समिति में भी; किन्तु मत देने का अधिकार केवल उसी सदन में है जिसका वह सदस्य है। तीसरा, कोई व्यक्ति मंत्री बनते समय संसद् के किसी सदन का सदस्य न हो तो उसे छह मास के भीतर किसी एक सदन का सदस्य होना पड़ता है, अन्यथा वह मंत्री नहीं रहता। इनके साथ यह भी जान लेना चाहिए कि प्रधान मंत्री की नियुक्ति राष्ट्रपति करता है और परंपरा यह है कि वह उस व्यक्ति को नियुक्त करता है जिसे लोक सभा में बहुमत का समर्थन प्राप्त हो; संविधान यह नहीं कहता कि प्रधान मंत्री किसी विशेष सदन का सदस्य हो। यही कारण है कि राज्य सभा के सदस्य भी इस पद पर रहे हैं, और भारत में ऐसा एक से अधिक बार हुआ है।
यह अनुप्रयोग वाला प्रश्न है : स्टेम में एक परिस्थिति रखी गई है और चारों विकल्प उस परिस्थिति के संभावित परिणाम हैं। ऐसे प्रश्न में उत्तर याद से नहीं, नियमों के मेल से निकलता है, इसलिए हल-विधि यह है कि पहले उन नियमों की सूची बनाइए जो इस परिस्थिति पर लागू होते हैं, और फिर हर विकल्प को उन्हीं से मिलाइए। यहाँ दो नियम पर्याप्त हैं — अविश्वास प्रस्ताव कहाँ आता है, और मंत्री को कहाँ बोलने तथा कहाँ मत देने का अधिकार है। इन दो नियमों से तीन विकल्प कट जाते हैं और चौथा बच जाता है। एक और उपयोगी आदत यह है कि विकल्पों में जो शब्द बदला गया है उसे पहचानिए : विकल्प (b) में 'किसी एक सदन' के स्थान पर 'लोक सभा' रख दिया गया है, और वही एक शब्द उसे असत्य बनाता है। हिन्दी स्तंभ में स्टेम 'तो' पर बिना विराम-चिह्न के छूटता है और विकल्प उसे पूरा करते हैं; 'राज्य सभा' तथा 'लोक सभा' दो-दो शब्दों में छपे हैं और विकल्प (c) तथा (d) के निषेध सामान्य टाइप में हैं, मोटे नहीं।
मुख्य तथ्य
- अविश्वास प्रस्ताव केवल लोक सभा में लाया और मतदान के लिए रखा जाता है, क्योंकि मंत्रि-परिषद् सामूहिक रूप से उसी सदन के प्रति उत्तरदायी होती है।
- प्रत्येक मंत्री को दोनों सदनों की कार्यवाही में बोलने और भाग लेने का अधिकार है, तथा संयुक्त बैठक और अपनी समिति में भी; किन्तु मत देने का अधिकार केवल उसी सदन में है जिसका वह सदस्य है।
- जो व्यक्ति मंत्री बनते समय संसद् के किसी सदन का सदस्य नहीं है, उसे छह मास के भीतर किसी एक सदन का सदस्य होना पड़ता है — विशेष रूप से लोक सभा का नहीं।
- संविधान यह अपेक्षा नहीं करता कि प्रधान मंत्री किसी विशेष सदन का सदस्य हो; भारत में एक से अधिक प्रधान मंत्री राज्य सभा के सदस्य रहते हुए इस पद पर रहे हैं।
- धन विधेयक केवल लोक सभा में पुरःस्थापित हो सकता है और उस पर राज्य सभा की शक्ति सीमित है — पर यह सदन की शक्ति का प्रश्न है, किसी मंत्री के बोलने के अधिकार का नहीं।
आगे की तैयारी
सामान्य भ्रम
- 'किसी एक सदन' को 'लोक सभा' पढ़ लेना — विकल्प (b) की पूरी भूल इसी एक शब्द के परिवर्तन में है।
- मंत्री के बोलने के अधिकार को उसकी सदस्यता से जोड़ देना, जबकि बोलने का अधिकार दोनों सदनों में है और केवल मतदान सीमित है।
- सदन की विधायी शक्ति और मंत्री के अधिकार को एक कर देना; बजट पर लोक सभा की विशेष शक्ति का अर्थ यह नहीं कि कोई मंत्री वहाँ बोल नहीं सकता।
- अविश्वास प्रस्ताव को दोनों सदनों में संभव मान लेना, जबकि वह केवल लोक सभा में आता है।
राजव्यवस्था के इस भाग से प्रश्न तीन बनावटों में आते हैं। पहली, अनुप्रयोग वाली बनावट, जैसा यह प्रश्न है : कोई परिस्थिति रखकर उसके परिणाम पूछना, जहाँ उत्तर दो-तीन उपबंधों के मेल से निकलता है। दूसरी, तुलनात्मक बनावट — लोक सभा और राज्य सभा की शक्तियों में क्या अंतर है, कौन-सी शक्ति किस सदन के पास है। तीसरी, प्रक्रिया की बनावट — कौन-सा प्रस्ताव किस सदन में आता है, उसके लिए कितने सदस्यों का समर्थन चाहिए, उसका परिणाम क्या होता है। तीनों की तैयारी एक ही ढंग से होती है : उपबंधों को नियम के रूप में लिखिए, न कि अनुच्छेद-संख्या के रूप में, और फिर उन नियमों को परिस्थितियों पर लगाकर देखिए। इस प्रश्न में दो ही नियम — अविश्वास प्रस्ताव कहाँ आता है और मत देने का अधिकार किसे है — पूरे प्रश्न का उत्तर दे देते हैं, और यही दिखाता है कि नियम-आधारित तैयारी संख्या-आधारित तैयारी से अधिक फल देती है।
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EPFO_APFC_2016_Q38खोलें व हल करें →Under the Constitution of India, which of the following statements are correct ? 1. The Constitution is supreme. 2. There is a clear division of powers between the Union and the State Governments. 3. Amendments to the Constitution have to follow the prescribed procedure. 4. The Union Parliament and the State Legislatures are sovereign. 5. The Preamble to the Constitution cannot be invoked to determine the ambit of Fundamental Rights. Select the correct answer using the codes given below :
- (a) 1, 2, 3, 4 and 5
- (b) 2, 3 and 4 only
- (c) 1, 4 and 5 only
- (d) 1, 2 and 3 only
उत्तर(d) 1, 2 and 3 only
इसी प्रश्नपत्र का संविधान-संबंधी कथन-प्रश्न, जिसमें विधायिकाओं की संप्रभुता और संविधान की सर्वोच्चता परखी गई है — वही सीमाएँ, जिनके भीतर यह प्रश्न प्रधान मंत्री की स्थिति रखता है।
अभ्यास
- practice — not a real PYQ
अविश्वास प्रस्ताव संसद् के किस सदन में लाया जा सकता है ?
- (a)केवल लोक सभा में
- (b)केवल राज्य सभा में
- (c)दोनों सदनों में
- (d)दोनों सदनों की संयुक्त बैठक में
उत्तर(a) केवल लोक सभा में — क्योंकि मंत्रि-परिषद् सामूहिक रूप से लोक सभा के प्रति उत्तरदायी होती है, इसलिए सरकार का विश्वास उसी सदन में परखा जाता है। राज्य सभा सरकार को हटा नहीं सकती, यद्यपि वह चर्चा और अन्य प्रस्तावों के माध्यम से जवाबदेही सुनिश्चित करती है।
- practice — not a real PYQ
जो व्यक्ति मंत्री नियुक्त होते समय संसद् के किसी सदन का सदस्य नहीं है, उसके लिए संविधान की अपेक्षा क्या है ?
- (a)उसे तुरंत त्यागपत्र देना होगा
- (b)उसे छह मास के भीतर संसद् के किसी एक सदन का सदस्य होना होगा
- (c)उसे छह मास के भीतर विशेष रूप से लोक सभा का सदस्य होना होगा
- (d)उस पर सदस्यता की कोई शर्त लागू नहीं होती
उत्तर(b) उसे छह मास के भीतर संसद् के किसी एक सदन का सदस्य होना होगा — अन्यथा उस अवधि के बाद वह मंत्री नहीं रहेगा। यह शर्त किसी विशेष सदन की नहीं है, और यही भेद इस प्रकार के प्रश्नों में सबसे अधिक परखा जाता है।