केन्द्रीय विधान सभा में हानिरहित बम किसने फेंके ?
- (a)भगत सिंह
- (b)जतिन दास
- (c)बटुकेश्वर दत्त
- (d)उपरोक्त में से एक से अधिक
सही — (d) उपरोक्त में से एक से अधिक। 8 अप्रैल 1929 को भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त ने नई दिल्ली के काउंसिल हाउस में केन्द्रीय विधान सभा के कक्ष में दो बम फेंके; वे दर्शक-दीर्घा से आगे बढ़े, 'इंकलाब ज़िन्दाबाद' के नारे लगाए और धुएँ से भरते सभागार में पर्चे बिखेर दिए। दोनों व्यक्ति विकल्प-सूची में नामित हैं, (a) और (c) पर, और दोनों कथन एक साथ सच हैं — और ठीक यही वह कसौटी है जिस पर 'उपरोक्त में से एक से अधिक' कहने वाले विकल्प को खरा उतरना पड़ता है। नाममात्र की शिकायत सार्वजनिक सुरक्षा विधेयक और व्यापार विवाद अधिनियम को लेकर थी, जिन्हें विधान सभा ठुकरा चुकी थी और जिन्हें वायसराय अपनी विशेष शक्तियों से लागू कर रहे थे; असली उद्देश्य, जैसा कि हिन्दुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन के भीतर योजना बनी थी, यह था कि दोनों गिरफ़्तार हों ताकि मुक़दमे को मंच की तरह इस्तेमाल किया जा सके। इसीलिए उन्होंने भागने की कोई चेष्टा नहीं की। प्रश्न में लिखा 'हानिरहित' शब्द परिणाम नहीं, बनावट बताता है: बम मारने के लिए नहीं बनाए गए थे और वहाँ फेंके गए थे जहाँ कोई बैठा नहीं था, फिर भी कुछ सदस्य घायल हुए, जिनमें वायसराय की कार्यकारी परिषद के वित्त सदस्य जॉर्ज अर्नेस्ट शूस्टर भी थे। दत्त को भारतीय दंड संहिता की धारा 307 तथा विस्फोटक पदार्थ अधिनियम की धारा 4 के अन्तर्गत आजीवन कालापानी की सज़ा हुई और उन्हें अंडमान की सेल्युलर जेल भेजा गया; भगत सिंह आगे लाहौर षड्यंत्र केस और 1931 के फाँसी के तख़्ते तक गए।
- (a)भगत सिंह — सच, पर अधूरा — और जिस प्रश्न में 'उपरोक्त में से एक से अधिक' रखा हो, वहाँ अधूरा सच ग़लत उत्तर होता है। उस दिन भगत सिंह ने बम फेंका, और उनके बग़ल में खड़े बटुकेश्वर दत्त ने भी। साथ काम करने वाले दो व्यक्तियों में से अधिक प्रसिद्ध को चुन लेना ठीक वही चूक है जिसे पकड़ने के लिए यह विकल्प-समूह बनाया गया है।
- (c)बटुकेश्वर दत्त — उतना ही सच और उतना ही अधूरा। दत्त ने भगत सिंह के साथ खड़े होकर बम फेंका और उसके लिए उन्हें आजीवन कालापानी की सज़ा हुई; जो अभ्यर्थी केवल उनका नाम लेता है उसकी समस्या वही है जो केवल भगत सिंह का नाम लेने वाले की है: प्रश्न पूछता है कि बम किसने फेंके, और उन्हें दो व्यक्तियों ने फेंका। जब दो अलग-अलग विकल्प एक साथ सच हों, तब यही कहने वाला विकल्प उत्तर होता है।
- (b)जतिन दास — जतीन्द्र नाथ दास विधान सभा में थे ही नहीं। वे उसी हिन्दुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन के थे और लाहौर षड्यंत्र केस में उन पर मुक़दमा चला, पर वे कक्ष में हुई किसी घटना के लिए नहीं, जेल में हुई घटना के लिए याद किए जाते हैं: राजनीतिक बन्दियों के साथ सम्मानजनक व्यवहार की माँग को लेकर 63 दिन की भूख हड़ताल के बाद 13 सितम्बर 1929 को उनकी मृत्यु हुई, और उनकी अन्तिम यात्रा में विशाल भीड़ उमड़ी।
विधान सभा बम कांड क्रान्तिकारी राष्ट्रवाद के दूसरे चरण का है, जो पहले चरण से राजनीति में जितना अलग है उतना ही तरीक़े में भी। 1924 में बना हिन्दुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन, जिसका नाम 1928 में बदलकर हिन्दुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन हुआ, घोषित रूप से समाजवादी लक्ष्य रखता था और हिंसा जितना ही दृश्य-प्रभाव का भी उपयोग करता था — 1925 का काकोरी कांड, साइमन कमीशन के विरोध में लाला लाजपत राय पर हुए प्रहार के बदले दिसम्बर 1928 में सांडर्स की हत्या, और फिर विधान सभा के वे बम, जिनका पूरा उद्देश्य हताहत करना नहीं बल्कि प्रचार और गिरफ़्तारी था। भगत सिंह के पर्चे में वही वाक्य था जो इस कार्रवाई को समझाता है: बहरों को सुनाने के लिए ऊँची आवाज़ चाहिए। उसके बाद चला मुक़दमा ठीक वही कर गया जिसके लिए उसे साधा गया था — अभियुक्तों ने न्यायालय का अधिकार मानने से इनकार किया और कार्यवाही को मंच बना दिया, और राजनीतिक बन्दियों के साथ व्यवहार को लेकर जेल में हुई भूख हड़ताल ने, जिसमें जतिन दास की मृत्यु हुई, इस अभियान को जेलों तक फैला दिया।
इस प्रश्न को दो आदतें हल करती हैं। पहली तथ्यात्मक है: क्रान्तिकारी घटनाओं को घटना, भागीदार, तिथि और परिणाम के रूप में याद रखिए, क्योंकि विकल्प-समूह सदैव भागीदारों को एक घटना से दूसरी में सरका देते हैं — यहाँ जतिन दास को लाहौर की जेल से उठाकर दिल्ली के सभागार में बैठा दिया गया है। दूसरी प्रक्रियागत है, और वह इस पत्र के हर उस प्रश्न पर लागू होती है जिसमें 'उपरोक्त में से एक से अधिक' रखा है: यह विकल्प तभी सही होता है जब आप कम-से-कम दो अन्य विकल्प नाम से बता सकें जो प्रश्न के सन्दर्भ में एक साथ सच हों। यह सकारात्मक कसौटी है, कोई बचाव नहीं। यहाँ चलाइए तो वह साफ़ पास होती है, क्योंकि भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त ने मिलकर बम फेंके और प्रश्न यही पूछ रहा है कि किसने फेंके। उसी कसौटी को ऐसे प्रश्न पर चलाइए जहाँ केवल एक विकल्प सच हो सकता है — कोई स्थापना वर्ष, किसी पद का पहला धारक — तो वह तत्काल विफल हो जाती है। इस कसौटी को स्पष्ट रूप से लगाने की आदत डालना कितने भी याद किए हुए तथ्यों से अधिक मूल्यवान है।
- 8 अप्रैल 1929 को भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त ने नई दिल्ली के काउंसिल हाउस में केन्द्रीय विधान सभा के कक्ष में दर्शक-दीर्घा से दो बम फेंके, 'इंकलाब ज़िन्दाबाद' के नारे लगाए और पर्चे बिखेरे
- नाममात्र का विरोध सार्वजनिक सुरक्षा विधेयक और व्यापार विवाद अधिनियम के विरुद्ध था, जिन्हें विधान सभा ठुकरा चुकी थी और वायसराय विशेष शक्तियों से लागू कर रहे थे; असली मंशा गिरफ़्तार होकर मुक़दमे को मंच बनाने की थी
- बम मारने के लिए नहीं बनाए गए थे, फिर भी कुछ सदस्य घायल हुए, जिनमें वायसराय की कार्यकारी परिषद के वित्त सदस्य जॉर्ज अर्नेस्ट शूस्टर भी थे
- बटुकेश्वर दत्त को भारतीय दंड संहिता की धारा 307 तथा विस्फोटक पदार्थ अधिनियम की धारा 4 के अन्तर्गत आजीवन कारावास की सज़ा हुई और उन्हें अंडमान की सेल्युलर जेल भेजा गया
- लाहौर षड्यंत्र केस में मुक़दमे का सामना कर रहे जतीन्द्र नाथ दास की मृत्यु 13 सितम्बर 1929 को हुई, राजनीतिक बन्दियों के साथ व्यवहार को लेकर 63 दिन की भूख हड़ताल के बाद
- इस कार्रवाई की योजना हिन्दुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन के भीतर बनी थी, वही संगठन जिसका नाम 1928 में हिन्दुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन से बदला गया था
ध्यान दीजिए कि 'हानिरहित' का अर्थ क्या है: बम मारने के लिए नहीं बनाए गए थे और वहाँ फेंके गए जहाँ कोई बैठा नहीं था, फिर भी चोटें आईं — वायसराय की कार्यकारी परिषद के वित्त सदस्य जॉर्ज अर्नेस्ट शूस्टर उनमें थे। पूरा उद्देश्य गिरफ़्तारी था, हताहत करना नहीं, और इसीलिए दोनों में से किसी ने भागने की चेष्टा नहीं की।
- केवल भगत सिंह का नाम ले लेना, जबकि यह काम दो व्यक्तियों ने किया था और विकल्प-समूह दोनों के लिए स्पष्ट जगह रखता है
- जतिन दास को विधान सभा में बैठा देना; उनकी कहानी का वह हिस्सा लाहौर की जेल में घटा, और वे अपनी 63 दिन की भूख हड़ताल के लिए याद किए जाते हैं
- 'हानिरहित' का अर्थ यह मान लेना कि किसी को चोट नहीं आई — बम मारने के लिए नहीं बनाए गए थे, पर चोटें आईं
BPSC 'उपरोक्त में से एक से अधिक' वाला विकल्प बार-बार रखता है और यह अपेक्षा करता है कि आप उससे बचें नहीं, बल्कि उस पर कसौटी लगाएँ — और यही बात इस प्रश्न को इतिहास के प्रश्न जितना ही अभ्यास भी बना देती है। UPSC उसी क्रान्तिकारी दशक को सुमेलन-जोड़ियों के रूप में पूछता है — घटना के सामने नेता, घटना के सामने परिणाम — इसलिए घटनाओं को हर भागीदार के साथ याद रखना पड़ता है, केवल प्रसिद्ध भागीदार के साथ नहीं।
सूची I को सूची II से सुमेलित कीजिए और सूचियों के नीचे दिए गए कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिए : सूची I I. चटगाँव शस्त्रागार कांड II. काकोरी षड्यंत्र III. लाहौर षड्यंत्र IV. ग़दर पार्टी सूची II A) लाला हरदयाल B) जतिन दास C) सूर्य सेन D) राम प्रसाद बिस्मिल E) वासुदेव फड़के कूट :
- (a) I–C, II–D, III–A, IV–E
- (b) I–D, II–C, III–B, IV–E
- (c) I–C, II–D, III–B, IV–A
- (d) I–B, II–D, III–C, IV–A
उत्तर(c) I–C, II–D, III–B, IV–A
UPSC जतिन दास को लाहौर षड्यंत्र से जोड़ता है, जो ठीक उनकी जगह है और ठीक इसीलिए वे यहाँ ग़लत उत्तर हैं। दोनों प्रश्न उस आदत पर दंड देते हैं कि क्रान्तिकारियों को अलग-अलग घटनाओं के भागीदारों के बजाय एक ही भीड़ की तरह याद रखा जाए।
''करो या मरो'' का नारा किसने और कब दिया ?
- (a) सुभाषचंद्र बोस ने भारत छोड़ों आंदोलन के दौरान
- (b) जवाहर लाल नेहरू ने असहयोग आंदोलन के दौरान
- (c) गाँधीजी ने भारत छोड़ों आंदोलन के दौरान
- (d) उपरोक्त में एक से अधिक
उत्तर(c) गाँधीजी ने भारत छोड़ों आंदोलन के दौरान
दिसम्बर 2024 में हुए 70वीं CCE के पत्र में — जो इस पुनर्परीक्षा से अलग पत्र है — वही निकास-विकल्प रखा गया था, और वहाँ वह उत्तर नहीं है, क्योंकि दी गई जोड़ियों में से केवल एक सच है। दोनों को साथ रखकर देखने से साफ़ हो जाता है कि यह विकल्प माँगता क्या है: कम-से-कम दो ऐसे नामित विकल्प जो एक साथ ठीक बैठते हों।
- अभ्यास प्रश्न — वास्तविक PYQ नहीं
8 अप्रैल 1929 को केन्द्रीय विधान सभा में फेंके गए बमों का मुख्य उद्देश्य था
- (a)वायसराय की कार्यकारी परिषद के सदस्यों को मार डालना
- (b)फेंकने वालों की गिरफ़्तारी सुनिश्चित करना, ताकि मुक़दमे को मंच बनाया जा सके
- (c)काउंसिल हाउस की इमारत को नष्ट करना
- (d)दिल्ली में बन्द राजनीतिक क़ैदियों को छुड़ाना
उत्तर(b) फेंकने वालों की गिरफ़्तारी सुनिश्चित करना, ताकि मुक़दमे को मंच बनाया जा सके — बम मारने के लिए नहीं बनाए गए थे, और दोनों में से किसी ने भागने की चेष्टा नहीं की।
- अभ्यास प्रश्न — वास्तविक PYQ नहीं
जतीन्द्र नाथ दास की मृत्यु 1929 में किस कारण हुई ?
- (a)साइमन कमीशन के विरोध के दौरान पुलिस की गोलीबारी से
- (b)लाहौर षड्यंत्र केस के बाद फाँसी से
- (c)राजनीतिक बन्दियों के साथ व्यवहार को लेकर 63 दिन की भूख हड़ताल से
- (d)विधान सभा बम कांड में लगी चोटों से
उत्तर(c) राजनीतिक बन्दियों के साथ व्यवहार को लेकर 63 दिन की भूख हड़ताल से — उनकी मृत्यु 13 सितम्बर 1929 को हुई और उनकी अन्तिम यात्रा जन-प्रदर्शन बन गई।