कॉपर सल्फेट पेंटाहाइड्रेट के क्रिस्टल तपाए जाने पर क्या बनाते हैं ?
- (a)नीले रंग का लवण
- (b)श्वेत रंग का लवण
- (c)हरे रंग का लवण
- (d)भूरे रंग का लवण
सही उत्तर — B, (b) श्वेत रंग का लवण । कॉपर सल्फेट पेंटाहाइड्रेट का सूत्र CuSO₄·5H₂O है और नाम में आया 'पेंटा' ही उसकी पूरी कहानी है — उसके हर सूत्र-मात्रक के साथ जल के पाँच अणु क्रिस्टल की जालक-संरचना में बँधे रहते हैं । इसे क्रिस्टलन जल कहते हैं, और इसी के कारण क्रिस्टल का चटख नीला रंग है ; रंग ताँबे के आयन का अकेले का गुण नहीं, बल्कि जल के अणुओं से घिरे हुए ताँबे के आयन का गुण है । तपाने पर यही जल भाप बनकर उड़ जाता है । क्रिस्टल पहले चटकते हैं, फिर चूर्ण जैसे हो जाते हैं, और लगभग 250 °C तक पहुँचते-पहुँचते सारा क्रिस्टलन जल निकल जाने पर जो निर्जल कॉपर सल्फेट बचता है वह श्वेत होता है । यही इस प्रश्न का उत्तर है । इस परिवर्तन की एक विशेषता जान लेनी चाहिए : वह उलटा भी किया जा सकता है । उसी श्वेत चूर्ण पर जल की कुछ बूँदें डालते ही नीला रंग लौट आता है, और यही गुण प्रयोगशाला में जल की उपस्थिति की जाँच के लिए काम में लाया जाता है — किसी द्रव में जल है या नहीं, यह निर्जल कॉपर सल्फेट के नीले पड़ जाने से पहचाना जाता है । पुस्तिका हिन्दी स्तंभ में भी 'कॉपर सल्फेट पेंटाहाइड्रेट' ही छापती है, इसके प्रचलित हिन्दी नाम नीला थोथा अथवा तूतिया का प्रयोग नहीं करती ; और तपाने के लिए 'तपाया जाना' लिखती है ।
- (a)नीले रंग का लवण — नीला रंग तपाने से पहले का है, बाद का नहीं । यह विकल्प इसीलिए सबसे लुभावना है — कॉपर सल्फेट का चित्र मन में आते ही नीले क्रिस्टल आते हैं । पर नीलापन ठीक उसी क्रिस्टलन जल से आता है जिसे तपाना निकाल बाहर करता है, इसलिए तपाने के बाद वही रंग बचे रहना असंभव है । उलटा सत्य है : श्वेत निर्जल चूर्ण पर जल डालिए तो नीला रंग लौट आएगा ।
- (c)हरे रंग का लवण — हरा रंग कॉपर सल्फेट का नहीं, फेरस सल्फेट के क्रिस्टलों — FeSO₄·7H₂O, जिन्हें हरा कसीस कहते हैं — का है । पाठ्यपुस्तक में दोनों प्रयोग प्रायः एक साथ पढ़ाए जाते हैं, इसलिए रंग आपस में बदल जाना सामान्य चूक है । ध्यान रहे कि फेरस सल्फेट को तपाने पर भी पहले क्रिस्टलन जल निकलकर श्वेत चूर्ण ही बनता है ; हरा रंग वहाँ भी आरंभ का है, अंत का नहीं ।
- (d)भूरे रंग का लवण — भूरा रंग इस प्रयोग में कहीं नहीं आता । यह उस प्रयोग की स्मृति से आता है जिसमें फेरस सल्फेट के क्रिस्टलों को तीव्रता से तपाया जाता है और अंत में लाल-भूरा फेरिक ऑक्साइड बचता है । दूसरा कारण यह हो सकता है कि अभ्यर्थी ताँबे की धातु का लाल-भूरा रंग स्मरण कर ले, पर यहाँ धातु नहीं, उसका लवण तपाया जा रहा है । बहुत ऊँचे ताप पर कॉपर सल्फेट अवश्य विघटित होकर कॉपर ऑक्साइड देता है, पर वह काला होता है, भूरा नहीं ।
अनेक लवण अपने क्रिस्टल में जल के अणुओं को निश्चित अनुपात में बाँधे रखते हैं ; इसे क्रिस्टलन जल कहते हैं और ऐसे लवण जलयोजित कहलाते हैं । CuSO₄·5H₂O, FeSO₄·7H₂O, Na₂CO₃·10H₂O और CaSO₄·2H₂O इसके प्रसिद्ध उदाहरण हैं । क्रिस्टलन जल केवल नमी नहीं है — वह संरचना का अंग है, इसलिए उसके निकलने पर क्रिस्टल का आकार, रंग और गुण तीनों बदल जाते हैं । कॉपर सल्फेट में यह परिवर्तन आँख से दिखता है : जलयोजित रूप नीला, निर्जल रूप श्वेत । जल फिर मिला देने पर मूल रंग लौट आना यह बताता है कि इस विशेष दशा में परिवर्तन उत्क्रमणीय है, यद्यपि संघटन बदलने के कारण वह रासायनिक परिवर्तन ही माना जाता है ।
यह प्रश्न सामान्य विज्ञान के रसायन उपखंड का है और विद्यालय स्तर की पाठ्यपुस्तक के सबसे परिचित प्रयोगों में से एक पर टिका है । उसी अध्याय में फेरस सल्फेट के हरे क्रिस्टलों को तपाने का प्रयोग भी आता है, और यही कारण है कि विकल्पों में हरा तथा भूरा रंग रखे गए हैं — वे दूसरे प्रयोग के रंग हैं । निर्जल कॉपर सल्फेट का व्यावहारिक उपयोग जल की जाँच में है, और जलयोजित नीले रूप का उपयोग खेती में कवकनाशी बोर्डो मिश्रण बनाने तथा जल-शोधन में होता आया है । हिन्दी स्तंभ पूरी तरह अंग्रेज़ी नाम का लिप्यंतरण करता है, इसलिए दोनों स्तंभों में कोई अंतर नहीं है ; केवल यह ध्यान रखिए कि पुस्तिका 'सल्फेट' बिना नुक़्ते के छापती है ।
- कॉपर सल्फेट पेंटाहाइड्रेट CuSO₄·5H₂O है ; उसका नीला रंग क्रिस्टलन जल के कारण है ।
- तपाने पर क्रिस्टलन जल निकल जाता है और श्वेत निर्जल कॉपर सल्फेट बच जाता है ।
- श्वेत निर्जल चूर्ण पर जल डालने से नीला रंग लौट आता है ; इसी से जल की उपस्थिति की जाँच की जाती है ।
- फेरस सल्फेट FeSO₄·7H₂O हरा होता है, और तीव्र ताप पर उससे अंततः लाल-भूरा फेरिक ऑक्साइड बचता है ।
- बहुत ऊँचे ताप पर कॉपर सल्फेट विघटित होकर काला कॉपर ऑक्साइड देता है ।
- अन्य प्रसिद्ध जलयोजित लवण — धोने का सोडा Na₂CO₃·10H₂O तथा जिप्सम CaSO₄·2H₂O ।
- तपाने से पहले का नीला रंग उत्तर में लिख देना ।
- कॉपर सल्फेट और फेरस सल्फेट के प्रयोगों के रंग आपस में बदल देना ।
- यह मान लेना कि निर्जल होने पर लवण का रंग हर दशा में उड़ जाता है ; रंग का कारण प्रत्येक लवण में अलग होता है ।
इस प्रकरण पर प्रश्न प्रायः रंग-परिवर्तन के रूप में आते हैं — तपाने से पहले और बाद का रंग, अथवा जल डालने पर लौटने वाला रंग । दूसरी शैली सूत्र पूछने की है : किस लवण में क्रिस्टलन जल के कितने अणु हैं । तीसरी शैली उपयोग पूछने की है, जैसे जल की उपस्थिति की जाँच किससे की जाती है । तैयारी का सरल तरीक़ा यह है कि चार-पाँच प्रसिद्ध जलयोजित लवणों की एक छोटी सूची बना ली जाए, जिसमें हर लवण के साथ उसका सूत्र, जलयोजित रूप का रंग और निर्जल रूप का रंग लिखा हो ।
इस प्रश्न से सीधे संबंधित कोई पूर्व PYQ उपलब्ध नहीं।
- practice — not a real PYQ
निर्जल कॉपर सल्फेट पर जल की कुछ बूँदें डालने पर वह किस रंग का हो जाता है ?
- (a)श्वेत
- (b)नीला
- (c)हरा
- (d)काला
उत्तर(b) नीला — जल के अणु फिर से क्रिस्टल संरचना में बँध जाते हैं और मूल नीला रंग लौट आता है ; इसी गुण से जल की उपस्थिति की जाँच होती है ।
- practice — not a real PYQ
फेरस सल्फेट के हरे क्रिस्टलों को तीव्रता से तपाने पर अंत में कौन-सा ठोस अवशेष बचता है ?
- (a)श्वेत निर्जल फेरस सल्फेट
- (b)लाल-भूरा फेरिक ऑक्साइड
- (c)काला कॉपर ऑक्साइड
- (d)पीला गंधक
उत्तर(b) लाल-भूरा फेरिक ऑक्साइड — पहले क्रिस्टलन जल निकलकर श्वेत चूर्ण बनता है, पर तीव्र ताप पर वह आगे विघटित होकर फेरिक ऑक्साइड दे देता है ।