ठेका श्रम (विनियमन और उत्सादन) अधिनियम, 1970 के अधीन, जबकि समुचित सरकार किसी स्थापन में ठेका श्रम के नियोजन को प्रतिषिद्ध करने का विचार करती है, निम्नलिखित में से किस प्रकृति के कार्य को ध्यान में नहीं रखा जाएगा ?
- (a)प्रसंस्करण, प्रचालन या अन्य कार्य, उद्योग के लिए आनुषंगिक है या आवश्यक है
- (b)कार्य स्थायी प्रकृति का है
- (c)कार्य सामान्य तौर पर नियमित कर्मकारों द्वारा किया जाता है
- (d)कार्य आंतरायिक प्रकृति का है
सही उत्तर — D, (d) कार्य आंतरायिक प्रकृति का है । ठेका श्रम (विनियमन और उत्सादन) अधिनियम, 1970 की धारा 10(1) समुचित सरकार को यह शक्ति देती है कि वह, केंद्रीय या राज्य सलाहकार बोर्ड से परामर्श के बाद, अधिसूचना द्वारा किसी स्थापन के किसी प्रसंस्करण, प्रचालन या अन्य कार्य में ठेका श्रम का नियोजन प्रतिषिद्ध कर दे । ऐसी अधिसूचना निकालने से पहले उसे किन बातों का ध्यान रखना है, यह धारा 10(2) गिनाती है — उस स्थापन में ठेका श्रम की काम की दशाएँ और उन्हें मिलने वाली सुविधाएँ, तथा 'अन्य सुसंगत बातें, जैसे' चार कसौटियाँ : क्या वह प्रसंस्करण, प्रचालन या अन्य कार्य उस उद्योग, व्यापार, कारोबार, विनिर्माण या वृत्ति के लिए आनुषंगिक या आवश्यक है ; क्या वह बारहमासी प्रकृति का है, अर्थात् पर्याप्त अवधि का है ; क्या वह सामान्य तौर पर उसी स्थापन या वैसे ही किसी स्थापन के नियमित कर्मकारों से कराया जाता है ; और क्या वह इतना है कि उसमें काफ़ी संख्या में पूर्णकालिक कर्मकार लगाए जा सकें । 'आंतरायिक प्रकृति' इस सूची में कहीं नहीं है — वह तो बारहमासी का उल्टा है, इसलिए उसे प्रतिषेध का आधार बनाना धारा की भावना के ही विरुद्ध होगा । यह शब्द इस अधिनियम में आता ज़रूर है, पर दूसरी जगह : धारा 1(5) कहती है कि यह अधिनियम उन स्थापनों पर लागू ही नहीं होगा जिनमें केवल आंतरायिक या आकस्मिक प्रकृति का काम होता है, और उसका स्पष्टीकरण जोड़ता है कि यदि काम पिछले बारह मास में एक सौ बीस दिन से अधिक किया गया हो, या मौसमी प्रकृति का होकर वर्ष में साठ दिन से अधिक किया गया हो, तो वह आंतरायिक नहीं माना जाएगा । अर्थात् 'आंतरायिक' यह तय करता है कि अधिनियम लागू होगा या नहीं, यह नहीं कि ठेका श्रम प्रतिषिद्ध होगा या नहीं ।
- (a)प्रसंस्करण, प्रचालन या अन्य कार्य, उद्योग के लिए आनुषंगिक है या आवश्यक है — यह धारा 10(2) की पहली कसौटी है, इसलिए इसे तो अवश्य ध्यान में रखा जाएगा । पूछा यह जाता है कि जिस प्रसंस्करण, प्रचालन या अन्य कार्य पर विचार हो रहा है, वह उस उद्योग, व्यापार, कारोबार, विनिर्माण या वृत्ति के लिए आनुषंगिक है या आवश्यक । तर्क सीधा है : यदि कोई काम उद्योग के मूल कामकाज का ही हिस्सा है, तो उसे स्थायी रूप से ठेके पर रखना ठेकेदारी का दुरुपयोग बन जाता है और उसी स्थिति में प्रतिषेध की बात बनती है । ध्यान दीजिए कि पुस्तिका ने यहाँ अधिनियम की लंबी सूची में से केवल 'उद्योग' शब्द रखा है ; धारा में पाँच शब्द हैं ।
- (b)कार्य स्थायी प्रकृति का है — यह धारा 10(2) की दूसरी कसौटी है और इसे भी ध्यान में रखा जाएगा, इसलिए यह उत्तर नहीं हो सकता । यहाँ शब्दावली की एक सावधानी काम की है : अधिनियम की भाषा में शब्द 'perennial' है, जिसका अर्थ है बारहमासी अर्थात् पर्याप्त अवधि तक चलने वाला ; इस प्रश्नपत्र ने दोनों स्तंभों में उसे 'स्थायी' और 'permanent' लिखा है । अभिप्राय वही रहता है — ऐसा काम जो साल भर चलता है और मौसमी या छिटपुट नहीं है । अधिनियम इस पर एक स्पष्टीकरण भी जोड़ता है : किसी काम के बारहमासी होने या न होने का प्रश्न उठने पर समुचित सरकार का विनिश्चय अंतिम होगा ।
- (c)कार्य सामान्य तौर पर नियमित कर्मकारों द्वारा किया जाता है — यह धारा 10(2) की तीसरी कसौटी है, इसलिए इसे भी ध्यान में रखा जाता है । पूरा वाक्य यह है कि क्या वह काम उसी स्थापन में, या वैसे ही किसी स्थापन में, सामान्य तौर पर नियमित कर्मकारों द्वारा किया जाता है । यह कसौटी व्यवहार में सबसे निर्णायक सिद्ध हुई है, क्योंकि इसी से यह दिखाया जाता है कि जिस काम पर ठेका श्रम लगाया जा रहा है, वह वास्तव में नियमित नियोजन का काम है और ठेकेदारी केवल स्थायी पद देने से बचने का रास्ता है । इन तीन कसौटियों के अलावा एक चौथी भी है, जो इस प्रश्न के विकल्पों में नहीं आई — क्या उस काम में काफ़ी संख्या में पूर्णकालिक कर्मकार लगाए जा सकते हैं ।
धारा 10 इस अधिनियम की 'उत्सादन' वाली टाँग है । उपधारा (1) समुचित सरकार को सलाहकार बोर्ड से परामर्श के बाद किसी स्थापन के किसी काम में ठेका श्रम का नियोजन अधिसूचना द्वारा प्रतिषिद्ध करने की शक्ति देती है । उपधारा (2) उस विवेक पर अंकुश लगाती है : सरकार को ठेका श्रम की काम की दशाओं और सुविधाओं के साथ-साथ चार कसौटियों का ध्यान रखना होगा — काम उद्योग के लिए आनुषंगिक या आवश्यक है या नहीं ; बारहमासी प्रकृति का है या नहीं ; सामान्य तौर पर नियमित कर्मकारों से कराया जाता है या नहीं ; और उसमें काफ़ी संख्या में पूर्णकालिक कर्मकार लगाए जा सकते हैं या नहीं । स्पष्टीकरण यह जोड़ता है कि बारहमासी होने का प्रश्न उठने पर समुचित सरकार का विनिश्चय अंतिम होगा ।
'आंतरायिक' शब्द इस अधिनियम में दूसरी भूमिका निभाता है । धारा 1(5) के अनुसार यह अधिनियम उन स्थापनों पर लागू ही नहीं होता जिनमें केवल आंतरायिक या आकस्मिक प्रकृति का काम होता है ; और उसी उपधारा का स्पष्टीकरण कहता है कि पिछले बारह मास में एक सौ बीस दिन से अधिक चला काम, अथवा मौसमी प्रकृति का होकर वर्ष में साठ दिन से अधिक चला काम, आंतरायिक नहीं माना जाएगा । अर्थात् एक ही शब्द अधिनियम में दो अलग जगह काम करता है — एक जगह वह प्रयोज्यता का द्वार खोलता या बंद करता है, दूसरी जगह वह होता ही नहीं । परीक्षक ने ठीक इसी विभाजन पर प्रश्न बनाया है । यह भी याद रखिए कि धारा 10 के अधीन अधिसूचना निकालने से पहले सलाहकार बोर्ड से परामर्श अनिवार्य है ।
- धारा 10(1) — समुचित सरकार सलाहकार बोर्ड से परामर्श के बाद अधिसूचना द्वारा किसी स्थापन के किसी काम में ठेका श्रम का नियोजन प्रतिषिद्ध कर सकती है ।
- धारा 10(2) की चार कसौटियाँ — काम आनुषंगिक या आवश्यक है ; बारहमासी प्रकृति का है ; नियमित कर्मकारों द्वारा किया जाता है ; उसमें काफ़ी संख्या में पूर्णकालिक कर्मकार लगाए जा सकते हैं ।
- धारा 10(2) का स्पष्टीकरण — काम के बारहमासी होने का प्रश्न उठने पर समुचित सरकार का विनिश्चय अंतिम होगा ।
- 'आंतरायिक प्रकृति' धारा 10(2) की कसौटी नहीं है ; वह धारा 1(5) में आती है, जहाँ ऐसे काम वाले स्थापन अधिनियम से ही बाहर रह जाते हैं ।
- धारा 1(5) का स्पष्टीकरण — पिछले बारह मास में एक सौ बीस दिन से अधिक, या मौसमी होकर वर्ष में साठ दिन से अधिक चला काम आंतरायिक नहीं है ।
- अधिनियम उन स्थापनों और ठेकेदारों पर लागू होता है जिनमें बीस या अधिक कर्मकार ठेका श्रम के रूप में नियोजित हैं या पिछले बारह मास में किसी दिन नियोजित थे ।
- 'आंतरायिक' और 'बारहमासी' को आपस में उलट देना ; धारा 10(2) की कसौटी बारहमासी है ।
- प्रतिषेध की शक्ति को स्वतः प्रवर्तनीय मान लेना ; उसके लिए समुचित सरकार की अधिसूचना और बोर्ड से परामर्श चाहिए ।
- धारा 1(5) की प्रयोज्यता-शर्त और धारा 10(2) की प्रतिषेध-कसौटियों को एक ही सूची समझ लेना ।
- यह भूल जाना कि धारा 10(2) की चौथी कसौटी — काफ़ी संख्या में पूर्णकालिक कर्मकार — भी सूची का हिस्सा है, भले ही वह इस प्रश्न के विकल्पों में न हो ।
इस अधिनियम पर प्रश्न प्रायः तीन बिंदुओं पर आते हैं — प्रयोज्यता की संख्या (बीस), प्रतिषेध की कसौटियाँ (धारा 10), और कल्याण-सुविधाओं की समय-सीमाएँ । नकारात्मक रूप, जैसा इस प्रश्न में है, सबसे आम है : सूची में से तीन असली मदें और एक बाहरी मद रखकर पूछा जाता है कि कौन-सी शामिल नहीं । इसलिए धारा 10(2) की चारों कसौटियाँ जस-की-तस याद कीजिए ; तीन याद रखने से यह प्रश्न नहीं सधता, क्योंकि यहाँ पहचानना उसे है जो सूची में है ही नहीं ।
इस प्रश्न से सीधे संबंधित कोई पूर्व PYQ उपलब्ध नहीं।
- practice — not a real PYQ
ठेका श्रम (विनियमन और उत्सादन) अधिनियम, 1970 उन स्थापनों पर लागू नहीं होता जिनमें केवल किस प्रकृति का कार्य किया जाता है ?
- (a)स्थायी प्रकृति का
- (b)आंतरायिक या आकस्मिक प्रकृति का
- (c)पर्यवेक्षीय प्रकृति का
- (d)विनिर्माण प्रकृति का
उत्तर(b) आंतरायिक या आकस्मिक प्रकृति का — धारा 1(5) का यही उपबंध है, और उसका स्पष्टीकरण एक सौ बीस दिन तथा साठ दिन की कसौटियाँ जोड़ता है ।
- practice — not a real PYQ
ठेका श्रम (विनियमन और उत्सादन) अधिनियम, 1970 के अधीन किसी कार्य के बारहमासी प्रकृति का होने या न होने का प्रश्न उठने पर अंतिम विनिश्चय किसका होगा ?
- (a)प्रमाणकारी अधिकारी का
- (b)समुचित सरकार का
- (c)औद्योगिक अधिकरण का
- (d)केंद्रीय सलाहकार ठेका श्रम बोर्ड का
उत्तर(b) समुचित सरकार का — धारा 10(2) का स्पष्टीकरण यही कहता है ; बोर्ड की भूमिका केवल परामर्श देने की है ।