निम्नलिखित में से कौन-सा एक, दिनेश गोस्वामी समिति (1990) द्वारा अनुशंसित नहीं किया गया था ?
- (a)मुख्य निर्वाचन आयुक्त की नियुक्ति भारत के राष्ट्रपति के द्वारा, भारत के मुख्य न्यायमूर्ति और प्रतिपक्ष के नेता के परामर्श से की जानी चाहिए ।
- (b)निर्वाचन आयोग के सदस्यों की नियुक्ति भारत के राष्ट्रपति के द्वारा, प्रधान मंत्री और प्रतिपक्ष के नेता से मिल कर बनी समिति की सलाह से की जानी चाहिए ।
- (c)परामर्श प्रक्रिया को सांविधिक समर्थन प्राप्त रहना चाहिए ।
- (d)अन्य निर्वाचन आयुक्तों की नियुक्ति मुख्य निर्वाचन आयुक्त, भारत के मुख्य न्यायमूर्ति और प्रतिपक्ष के नेता के परामर्श से होनी चाहिए ।
सही उत्तर — B, (b) निर्वाचन आयोग के सदस्यों की नियुक्ति भारत के राष्ट्रपति के द्वारा, प्रधान मंत्री और प्रतिपक्ष के नेता से मिल कर बनी समिति की सलाह से की जानी चाहिए । स्टेम में 'नहीं' मोटे तिरछे अक्षरों में छपा है, अतः यहाँ वह विकल्प खोजना है जिसकी अनुशंसा दिनेश गोस्वामी समिति ने नहीं की थी । यह समिति 1990 में निर्वाचन सुधारों के लिए बनी थी और उसने नियुक्ति के प्रश्न पर परामर्श की पद्धति सुझाई थी, समिति या मंडल की पद्धति नहीं । उसकी अनुशंसा यह थी कि मुख्य निर्वाचन आयुक्त की नियुक्ति राष्ट्रपति भारत के मुख्य न्यायमूर्ति और प्रतिपक्ष के नेता से परामर्श करके करें ; अन्य निर्वाचन आयुक्तों की नियुक्ति मुख्य निर्वाचन आयुक्त, मुख्य न्यायमूर्ति और प्रतिपक्ष के नेता से परामर्श करके हो ; और यह पूरी परामर्श प्रक्रिया केवल परंपरा न रहकर सांविधिक आधार पर टिकी हो, ताकि उसे टाला न जा सके । विकल्प (b) में इनसे तीन अंतर हैं — वहाँ मुख्य न्यायमूर्ति कहीं नहीं हैं, प्रधानमंत्री जोड़ दिए गए हैं, और 'परामर्श' के स्थान पर 'समिति की सलाह' की व्यवस्था बना दी गई है । प्रधानमंत्री, प्रतिपक्ष के नेता और मुख्य न्यायमूर्ति वाली मंडल-पद्धति का सुझाव बहुत बाद के दस्तावेज़ों में आया — विधि आयोग की 2015 की निर्वाचन सुधारों पर आई रिपोर्ट में — और 2023 में उच्चतम न्यायालय ने भी इसी प्रकार की समिति से नियुक्ति का निर्देश तब तक के लिए दिया जब तक संसद क़ानून न बना ले ; उसके बाद संसद ने 2023 में जो अधिनियम बनाया उसमें चयन समिति में प्रधानमंत्री, एक केंद्रीय मंत्री और प्रतिपक्ष का नेता रखे गए । अतः विकल्प (b) की बात 1990 की गोस्वामी समिति की नहीं है, और यही इस प्रश्न का उत्तर है । शेष तीनों विकल्प उसी समिति की अनुशंसाएँ हैं ।
- (a)मुख्य निर्वाचन आयुक्त की नियुक्ति भारत के राष्ट्रपति के द्वारा, भारत के मुख्य न्यायमूर्ति और प्रतिपक्ष के नेता के परामर्श से की जानी चाहिए । — यह गोस्वामी समिति की सीधी अनुशंसा है, इसलिए यह उत्तर नहीं हो सकता । समिति ने मुख्य निर्वाचन आयुक्त की नियुक्ति में दो ऐसे व्यक्तियों से परामर्श सुझाया जो कार्यपालिका से स्वतंत्र हों — भारत का मुख्य न्यायमूर्ति और प्रतिपक्ष का नेता । कारण स्पष्ट है : निर्वाचन आयोग को उसी सरकार के चुनाव कराने होते हैं जिसने उसे नियुक्त किया है, इसलिए नियुक्ति में विपक्ष और न्यायपालिका की उपस्थिति उसकी निष्पक्षता की पहली सुरक्षा मानी गई । समिति ने यह भी जोड़ा था कि जहाँ मान्यताप्राप्त प्रतिपक्ष का नेता न हो, वहाँ लोक सभा में सबसे बड़े विपक्षी समूह के नेता से परामर्श किया जाए ।
- (c)परामर्श प्रक्रिया को सांविधिक समर्थन प्राप्त रहना चाहिए । — यह भी समिति की अनुशंसा है । उसने कहा था कि परामर्श की प्रक्रिया को सांविधिक समर्थन मिलना चाहिए, अर्थात् वह केवल शिष्टाचार या परंपरा पर न छोड़ी जाए, बल्कि क़ानून में लिखी जाए । यह सुझाव संविधान की एक रिक्ति को भरने के लिए था : अनुच्छेद 324(2) कहता है कि मुख्य निर्वाचन आयुक्त और अन्य निर्वाचन आयुक्तों की नियुक्ति राष्ट्रपति संसद द्वारा बनाए गए किसी क़ानून के उपबंधों के अधीन रहते हुए करेंगे — किन्तु दशकों तक ऐसा कोई क़ानून बना ही नहीं था । समिति का यही सुझाव आगे चलकर बार-बार दुहराया गया ।
- (d)अन्य निर्वाचन आयुक्तों की नियुक्ति मुख्य निर्वाचन आयुक्त, भारत के मुख्य न्यायमूर्ति और प्रतिपक्ष के नेता के परामर्श से होनी चाहिए । — यह भी समिति की अनुशंसा है और वस्तुतः विकल्प (a) का ही विस्तार है । मुख्य निर्वाचन आयुक्त के लिए मुख्य न्यायमूर्ति और प्रतिपक्ष के नेता से परामर्श, और अन्य निर्वाचन आयुक्तों के लिए इन दोनों के साथ स्वयं मुख्य निर्वाचन आयुक्त से भी परामर्श — यही समिति की योजना थी । आयोग के भीतर का यह परामर्श इसलिए जोड़ा गया कि आयोग 1993 से बहु-सदस्यीय है और वहाँ निर्णय बहुमत से होते हैं, अतः नए सदस्यों की नियुक्ति में संस्था के प्रमुख की राय का महत्त्व है । जो अभ्यर्थी (a) और (d) की समानता देखकर उलझ जाता है, उसे यह याद रखना चाहिए कि दोनों एक ही योजना के दो भाग हैं और दोनों सही हैं ।
दिनेश गोस्वामी समिति 1990 में निर्वाचन सुधारों पर विचार के लिए गठित हुई थी और उसकी रिपोर्ट भारत में निर्वाचन सुधार की चर्चा का आधार-दस्तावेज़ मानी जाती है । नियुक्ति संबंधी सुझावों के अतिरिक्त उसने कई और अनुशंसाएँ दीं — निर्वाचन का सीमित रूप में राजकीय वित्तपोषण, बूथ कब्ज़े पर कड़े उपाय, राजनीति के अपराधीकरण को रोकने के प्रावधान, दल-बदल विरोधी क़ानून के अधीन निरर्हता को सीमित दशाओं तक बाँधना, तथा एक व्यक्ति के दो से अधिक निर्वाचन क्षेत्रों से लड़ने पर रोक । इनमें से कुछ सुझाव आगे चलकर क़ानून बने और कुछ आज भी चर्चा में हैं । संविधान की दृष्टि से इस पूरे विषय का आधार अनुच्छेद 324 है, जो निर्वाचनों के अधीक्षण, निदेशन और नियंत्रण का दायित्व निर्वाचन आयोग को देता है ।
इस प्रश्न में परीक्षक ने चारों विकल्पों को एक ही विषय — नियुक्ति की प्रक्रिया — पर केंद्रित रखा है, और उनमें अंतर केवल इस बात का है कि परामर्श किससे होगा और किस रूप में होगा । इसीलिए विकल्प (b) को पहचानना कठिन लगता है : उसमें भी प्रतिपक्ष का नेता है और वह भी नियुक्ति को अधिक सहभागी बनाता प्रतीत होता है । अंतर पकड़ने का सूत्र यह है कि गोस्वामी योजना में मुख्य न्यायमूर्ति हर स्थान पर उपस्थित हैं और प्रधानमंत्री कहीं नहीं ; जबकि (b) में ठीक उलटा है । यही विषय आगे चलकर 2023 में उच्चतम न्यायालय के निर्णय और उसी वर्ष बने अधिनियम के कारण समसामयिक भी हो गया, इसलिए इस प्रश्न को ऐतिहासिक अनुशंसा और वर्तमान व्यवस्था — दोनों के साथ पढ़ना चाहिए ।
- दिनेश गोस्वामी समिति 1990 में निर्वाचन सुधारों के लिए गठित हुई थी ।
- अनुशंसा — मुख्य निर्वाचन आयुक्त की नियुक्ति राष्ट्रपति भारत के मुख्य न्यायमूर्ति और प्रतिपक्ष के नेता से परामर्श करके करें ।
- अनुशंसा — अन्य निर्वाचन आयुक्तों की नियुक्ति मुख्य निर्वाचन आयुक्त, मुख्य न्यायमूर्ति और प्रतिपक्ष के नेता से परामर्श करके हो ।
- अनुशंसा — परामर्श की प्रक्रिया को सांविधिक समर्थन प्राप्त हो, केवल परंपरा पर न छोड़ी जाए ।
- समिति के अन्य सुझाव — निर्वाचन का सीमित राजकीय वित्तपोषण, बूथ कब्ज़े पर कड़े उपाय, दल-बदल विरोधी क़ानून में संशोधन, और दो से अधिक क्षेत्रों से लड़ने पर रोक ।
- अनुच्छेद 324(2) के अनुसार नियुक्ति राष्ट्रपति संसद के क़ानून के उपबंधों के अधीन रहते हुए करते हैं ; ऐसा क़ानून दशकों तक नहीं बना था ।
- प्रधानमंत्री, प्रतिपक्ष के नेता और मुख्य न्यायमूर्ति वाली समिति का सुझाव विधि आयोग की 2015 की रिपोर्ट में आया ; 2023 में उच्चतम न्यायालय के निर्णय के बाद बने अधिनियम में चयन समिति में प्रधानमंत्री, एक केंद्रीय मंत्री और प्रतिपक्ष का नेता रखे गए ।
- नकारात्मक स्टेम में समिति की असली अनुशंसा चुन बैठना ।
- बाद की समितियों और 2023 की व्यवस्था के सुझावों को गोस्वामी समिति का मान लेना ।
- विकल्प (a) और (d) की समानता देखकर उनमें से किसी एक को ग़लत समझ लेना ; वे एक ही योजना के दो भाग हैं ।
निर्वाचन सुधारों पर प्रश्न प्रायः समिति और अनुशंसा के मिलान के रूप में आते हैं, या इसी तरह 'किसने यह अनुशंसा नहीं की' के रूप में । गोस्वामी समिति (1990) के साथ तारकुंडे समिति (1975) और इंद्रजीत गुप्त समिति (1998, चुनावों का राजकीय वित्तपोषण) प्रायः एक ही प्रश्न में आती हैं । इसलिए प्रत्येक समिति का वर्ष और उसका एक-दो निर्णायक सुझाव याद रखना पर्याप्त रहता है ; शेष विकल्प उसी से छँट जाते हैं ।
इस प्रश्न से सीधे संबंधित कोई पूर्व PYQ उपलब्ध नहीं।
- practice — not a real PYQ
चुनावों के राजकीय वित्तपोषण पर विशेष रूप से विचार करने के लिए 1998 में गठित समिति कौन-सी थी ?
- (a)तारकुंडे समिति
- (b)दिनेश गोस्वामी समिति
- (c)इंद्रजीत गुप्त समिति
- (d)सरकारिया आयोग
उत्तर(c) इंद्रजीत गुप्त समिति — उसने चुनावों के राजकीय वित्तपोषण की व्यवस्था पर रिपोर्ट दी थी ।
- practice — not a real PYQ
संविधान के किस अनुच्छेद में मुख्य निर्वाचन आयुक्त और अन्य निर्वाचन आयुक्तों की नियुक्ति का उपबंध है ?
- (a)अनुच्छेद 315
- (b)अनुच्छेद 324
- (c)अनुच्छेद 329
- (d)अनुच्छेद 338
उत्तर(b) अनुच्छेद 324 — उसी में निर्वाचनों के अधीक्षण, निदेशन और नियंत्रण का दायित्व निर्वाचन आयोग को दिया गया है ।