निम्नलिखित में से कौन, स्वतंत्रता-सेनानी कित्तूर की रानी चेन्नम्मा का/की साथी था/थी और जिसने 1824 में अंग्रेज़ों द्वारा रानी को बंदी बना लिए जाने के बाद अंग्रेज़ों के विरुद्ध लड़ाई जारी रखी ?
- (a)रायन्ना
- (b)टीपू गारो
- (c)जगबंधु
- (d)दुकरीबाला देवी
सही उत्तर — A, (a) रायन्ना । पूरा नाम संगोल्ली रायन्ना — बेलगाम (आज का बेलगावी, कर्नाटक) ज़िले के संगोल्ली गाँव का यह योद्धा कित्तूर की रानी चेन्नम्मा का सेनापति और सबसे भरोसेमंद साथी माना जाता है । कित्तूर का झगड़ा उत्तराधिकार का था : रानी के पति और पुत्र की मृत्यु के बाद उन्होंने शिवलिंगप्पा को दत्तक लेकर गद्दी सौंपनी चाही, और ईस्ट इंडिया कंपनी ने दत्तक को मान्यता देने से इनकार करते हुए कित्तूर पर अधिकार करना चाहा । यहाँ एक तिथि-संबंधी सावधानी ज़रूरी है — यह 1824 है, और डलहौज़ी का व्यपगत सिद्धांत 1848 के बाद आता है ; कंपनी की दत्तक-विरोधी नीति उससे बहुत पहले से चल रही थी, इसलिए कित्तूर को व्यपगत सिद्धांत का उदाहरण बताना कालक्रम की भूल है । अक्तूबर 1824 की पहली भिड़ंत में अंग्रेज़ हारे और धारवाड़ का कलेक्टर सेंट जॉन थैकरे मारा गया ; पर दिसंबर 1824 में कंपनी कहीं बड़ी सेना लेकर लौटी, कित्तूर का क़िला गिरा और रानी बंदी बना ली गईं । बैलहोंगल के क़िले में क़ैद रहते हुए 1829 में उनका देहांत हुआ । रानी के पकड़े जाने के बाद प्रतिरोध की डोर रायन्ना ने सँभाली — उन्होंने आसपास के देहात में छापामार लड़ाई चलाई, कंपनी के खज़ाने और कचहरियाँ निशाना बनाईं, और लक्ष्य यही रखा कि शिवलिंगप्पा को कित्तूर की गद्दी पर बैठाया जाए । अंततः धोखे से पकड़े गए और 1831 में नंदगढ़ में उन्हें फाँसी दी गई, जहाँ आज उनका स्मारक खड़ा है । प्रश्न ठीक इसी कड़ी को पकड़ता है — 'रानी के बंदी होने के बाद कौन' — और उसका एक ही उत्तर है, रायन्ना ।
- (b)टीपू गारो — यह नाम कर्नाटक का है ही नहीं, पूर्वी भारत का है । इतिहास में जिस टीपू का नाम गारो किसानों के साथ आता है, वह पागलपंथी आंदोलन का नेता टीपू है — करम शाह के बाद उसके नेतृत्व में मैमनसिंह और शेरपुर के इलाक़े (आज का बांग्लादेश) के गारो तथा हाजोंग किसानों ने ज़मींदारों की अवैध वसूली और कंपनी की राजस्व-व्यवस्था के विरुद्ध उन्नीसवीं सदी के पूर्वार्ध में लंबा प्रतिरोध खड़ा किया । वह आंदोलन बंगाल-असम की सीमा-पट्टी का है, कित्तूर से लगभग देश के दूसरे छोर पर, और चेन्नम्मा से उसका कोई संबंध नहीं । परीक्षक ने इसे यहाँ इसलिए रखा है कि जनजातीय और किसान विद्रोहों के नाम आपस में गड्डमड्ड हो जाते हैं ।
- (c)जगबंधु — बक्शी जगबंधु बिद्याधर 1817 के पाइक विद्रोह के नेता थे, जो ओडिशा के खुर्दा में हुआ — कित्तूर से सात वर्ष पहले और देश के दूसरे छोर पर । 'बक्शी' खुर्दा के राजा की सेना के सेनापति का पद था । पाइक खुर्दा के परंपरागत योद्धा-किसान थे, जिन्हें सैन्य सेवा के बदले लगान-मुक्त भूमि मिलती थी ; कंपनी ने खुर्दा हड़पने के बाद वह भूमि-व्यवस्था तोड़ दी, नमक पर एकाधिकार जमाया, नक़दी में लगान माँगा और जगबंधु की अपनी जागीर रोरंग भी छीन ली । इसी पर 1817 में पाइकों और कोंधों ने विद्रोह किया । ठीक-ठीक विद्रोह, पर ग़लत रानी और ग़लत प्रांत ।
- (d)दुकरीबाला देवी — दुकरीबाला देवी बंगाल की क्रांतिकारी थीं और उनका समय बीसवीं सदी है, उन्नीसवीं नहीं — 1824 की कित्तूर की लड़ाई उनके जन्म से भी दशकों पहले की बात है । बीरभूम ज़िले के नलहाटी की इस गृहिणी ने 1914 की रोडा कंपनी की हथियार-चोरी से निकले माउज़र पिस्तौल अपने घर में छिपाकर रखे थे ; 1917 में पकड़े जाने पर उन्हें शस्त्र अधिनियम के अधीन सश्रम कारावास की सज़ा हुई, और इसी कारण उन्हें प्रायः इस अधिनियम के अधीन दंडित होने वाली पहली भारतीय महिला कहा जाता है । ध्यान दीजिए कि प्रश्न 'साथी था/थी' लिखकर स्त्री और पुरुष दोनों की गुंजाइश जान-बूझकर खुली रखता है, इसलिए इस विकल्प को केवल स्त्री होने के कारण नहीं काटा जा सकता — उसे काटती है तिथि ।
कित्तूर का विद्रोह (1824) 1857 से पहले के उन अनेक स्थानीय प्रतिरोधों में है जिन्हें इतिहास-लेखन 'नागरिक विद्रोह' कहता है । कित्तूर आज के बेलगावी (कर्नाटक) में एक छोटी देशी रियासत थी । रानी चेन्नम्मा के पति मल्लसर्ज और पुत्र की मृत्यु के बाद उन्होंने शिवलिंगप्पा को दत्तक लिया ; कंपनी ने दत्तक को उत्तराधिकारी मानने से इनकार किया और रियासत पर क़ब्ज़े की तैयारी की । अक्तूबर 1824 की पहली लड़ाई में कंपनी हारी और धारवाड़ का कलेक्टर थैकरे मारा गया ; दिसंबर 1824 में बड़ी सेना के साथ लौटकर कंपनी ने कित्तूर ले लिया और रानी बंदी हुईं । रानी के बाद संगोल्ली रायन्ना ने छापामार लड़ाई चलाई और 1831 में फाँसी पर चढ़े । दोनों आज कर्नाटक की लोकस्मृति और लोकगीतों के प्रमुख नायक हैं ।
इस प्रश्न की असली परीक्षा नाम याद रखने की नहीं, विद्रोहों को उनके प्रांत और दशक के साथ जोड़ने की है । प्रश्नपत्र चारों विकल्पों में चार अलग-अलग क्षेत्रों और कालों के प्रतिरोध रख देता है — कर्नाटक 1824, पूर्वी बंगाल का गारो–हाजोंग किसान-प्रतिरोध, ओडिशा 1817 का पाइक विद्रोह, और बंगाल का बीसवीं सदी का क्रांतिकारी आंदोलन । जो अभ्यर्थी हर विद्रोह के साथ 'कहाँ' और 'कब' जोड़कर याद रखता है, वह ऐसे प्रश्न में तीन विकल्प पहली नज़र में काट देता है । यह भी ध्यान रहे कि 1824 का कित्तूर डलहौज़ी के व्यपगत सिद्धांत का उदाहरण नहीं है ; वह सिद्धांत 1848 के बाद का है ।
- कित्तूर आज के बेलगावी (कर्नाटक) ज़िले में था ; विवाद रानी चेन्नम्मा के दत्तक पुत्र शिवलिंगप्पा को मान्यता न देने पर उठा ।
- अक्तूबर 1824 की पहली लड़ाई में धारवाड़ का कलेक्टर सेंट जॉन थैकरे मारा गया ; दिसंबर 1824 में कित्तूर कंपनी के हाथ आया और रानी बंदी बनीं ।
- रानी चेन्नम्मा का देहांत 1829 में बैलहोंगल के क़िले में क़ैद के दौरान हुआ ।
- संगोल्ली रायन्ना रानी के सेनापति थे ; उन्होंने रानी के बंदी होने के बाद छापामार प्रतिरोध चलाया और 1831 में नंदगढ़ में फाँसी पाई ।
- 1817 का पाइक विद्रोह ओडिशा के खुर्दा में बक्शी जगबंधु बिद्याधर के नेतृत्व में हुआ था ।
- डलहौज़ी का व्यपगत सिद्धांत 1848 के बाद का है, इसलिए 1824 के कित्तूर को उसका उदाहरण बताना कालक्रम की भूल है ।
- कित्तूर को व्यपगत सिद्धांत से जोड़ देना ; 1824 में वह सिद्धांत अस्तित्व में ही नहीं था ।
- रानी चेन्नम्मा और झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई की कहानियाँ मिला देना — दत्तक-अस्वीकृति दोनों में है, पर काल, प्रांत और साथी अलग हैं ।
- स्त्री-नाम देखकर विकल्प काट देना ; यह प्रश्न 'था/थी' लिखकर दोनों की गुंजाइश खुली रखता है ।
- पाइक विद्रोह को 1857 के आसपास मान लेना ; वह 1817 का है ।
इस खंड में विद्रोहों पर प्रश्न प्रायः तीन प्रारूपों में आते हैं — नेता और विद्रोह का सुमेलन, विद्रोह और उसके प्रांत का सुमेलन, और 'अमुक के बाद नेतृत्व किसने सँभाला' । तैयारी का सबसे सस्ता तरीक़ा एक तालिका है जिसमें हर विद्रोह के सामने वर्ष, प्रांत, नेता और तात्कालिक कारण लिखा हो । नाम अकेले याद रखने से ऐसे प्रश्न नहीं सधते, क्योंकि परीक्षक चारों विकल्पों में असली नेता ही रखता है — केवल उनका प्रांत और दशक बदल देता है ।
इस प्रश्न से सीधे संबंधित कोई पूर्व PYQ उपलब्ध नहीं।
- practice — not a real PYQ
1824 में ईस्ट इंडिया कंपनी और कित्तूर के बीच टकराव का तात्कालिक कारण क्या था ?
- (a)डलहौज़ी के व्यपगत सिद्धांत के अधीन कित्तूर का विलय
- (b)रानी चेन्नम्मा के दत्तक पुत्र शिवलिंगप्पा को उत्तराधिकारी मानने से कंपनी का इनकार
- (c)कित्तूर पर सहायक संधि थोपे जाने का प्रस्ताव
- (d)नमक के व्यापार पर कंपनी का एकाधिकार
उत्तर(b) रानी चेन्नम्मा के दत्तक पुत्र शिवलिंगप्पा को उत्तराधिकारी मानने से कंपनी का इनकार — व्यपगत सिद्धांत 1848 के बाद का है, इसलिए 1824 के कित्तूर पर वह लागू ही नहीं होता ।
- practice — not a real PYQ
1817 का पाइक विद्रोह किसके नेतृत्व में हुआ था ?
- (a)संगोल्ली रायन्ना
- (b)बक्शी जगबंधु बिद्याधर
- (c)तितु मीर
- (d)बिरसा मुंडा
उत्तर(b) बक्शी जगबंधु बिद्याधर — ओडिशा के खुर्दा के राजा के सेनापति, जिनकी जागीर छिन जाने पर पाइकों ने विद्रोह किया ।