लेखा विवरणों में प्रासंगिक देयता के संबंध में टिप्पणियाँ संलग्न करने की पद्धति किसके अनुसरण में होती है ?
- (a)एकरूपता की परंपरा
- (b)मुद्रा मापन संकल्पना
- (c)रूढ़िवादिता की परंपरा
- (d)पूर्ण प्रकटन की परंपरा
सही उत्तर — D, (d) पूर्ण प्रकटन की परंपरा । प्रश्न में जिसे 'प्रासंगिक देयता' कहा गया है, वह अंग्रेज़ी पृष्ठ की contingent liability है — वही मद जिसे लेखाशास्त्र की पाठ्यपुस्तकें प्रायः आकस्मिक देयता लिखती हैं । यह वर्तमान देयता होती ही नहीं ; यह एक संभावित बाध्यता है जो किसी भविष्य की अनिश्चित घटना के घटने या न घटने पर निर्भर करती है — जैसे न्यायालय में लंबित कोई वाद, विवादित कर माँग, किसी दूसरे के ऋण पर दी गई गारंटी, या भुनाए गए विनिमय-पत्र । चूँकि बाध्यता अभी बनी ही नहीं है, इसलिए बहियों में उसकी कोई प्रविष्टि नहीं की जाती और चिट्ठे के मुख्य भाग में वह रक़म नहीं दिखती । किन्तु ऐसी संभावित बाध्यता को पूरी तरह छिपा देना पढ़ने वाले के साथ अन्याय होगा — कोई ऋणदाता या निवेशक यदि यह न जान पाए कि कंपनी पर करोड़ों का विवादित दावा लंबित है, तो वह वित्तीय स्थिति का ग़लत अनुमान लगाएगा । पूर्ण प्रकटन की परंपरा यही कहती है कि वित्तीय विवरणों में हर वह महत्त्वपूर्ण सूचना ईमानदारी से बताई जाए जो उपयोगकर्ता के निर्णय को प्रभावित कर सकती है, और जो सूचना अंकों के रूप में विवरण के भीतर नहीं समाती उसे टिप्पणियों या पाद-टिप्पणियों के रूप में संलग्न किया जाए । इसीलिए आकस्मिक देयता का ठिकाना लेखा-विवरणों के साथ लगी टिप्पणी है । यही व्यवहार लेखा मानक AS 29 (प्रावधान, आकस्मिक देयताएँ और आकस्मिक परिसंपत्तियाँ) भी निर्धारित करता है — आकस्मिक देयता को मान्यता नहीं दी जाती, केवल प्रकट किया जाता है — और कंपनी अधिनियम, 2013 की अनुसूची III कंपनियों से यही प्रकटन टिप्पणियों में माँगती है ।
- (a)एकरूपता की परंपरा — एकरूपता की परंपरा का विषय समय के साथ तुलनीयता है, प्रकटन नहीं । वह कहती है कि एक बार चुनी गई लेखांकन पद्धति वर्ष-दर-वर्ष वही रखी जाए — यदि मूल्यह्रास सीधी रेखा विधि से लगाया जा रहा है तो अगले वर्ष बिना कारण घटते शेष विधि पर न चला जाए, अन्यथा दो वर्षों के लाभ की तुलना ही निरर्थक हो जाएगी । (पद्धति बदली भी जाए तो परिवर्तन और उसका प्रभाव प्रकट करना पड़ता है, पर वह भी प्रकटन की माँग है, एकरूपता की नहीं ।) आकस्मिक देयता की टिप्पणी का इस परंपरा से कोई संबंध नहीं ।
- (b)मुद्रा मापन संकल्पना — मुद्रा मापन संकल्पना केवल यह तय करती है कि बहियों में क्या दर्ज होगा : वही लेन-देन और घटनाएँ जिन्हें मुद्रा में मापा जा सकता है । इसी कारण कर्मचारियों की निष्ठा, प्रबंधन की योग्यता या हड़ताल की आशंका जैसी बातें, जो व्यवसाय के लिए भारी महत्त्व रखती हैं, खातों में नहीं आतीं । यह संकल्पना यह नहीं बताती कि जो बात दर्ज न हो सके उसे टिप्पणी में लिखा जाए — वह निर्देश पूर्ण प्रकटन की परंपरा से आता है । आकस्मिक देयता की रक़म का अनुमान प्रायः लगाया भी जा सकता है, इसलिए यहाँ अड़चन मापन की है ही नहीं ।
- (c)रूढ़िवादिता की परंपरा — यह सबसे आकर्षक ग़लत विकल्प है, क्योंकि आकस्मिक देयता एक संभावित हानि है और रूढ़िवादिता की परंपरा का सूत्र-वाक्य है — 'संभावित लाभ मत गिनो, पर हर संभावित हानि का प्रावधान करो' । अंतर यह है कि रूढ़िवादिता लागू होने पर टिप्पणी नहीं, प्रावधान (provision) बनता है, अर्थात् लाभ-हानि खाते में प्रभार लगता है — जैसे संदिग्ध ऋणों के लिए प्रावधान, या स्टॉक का मूल्यांकन लागत तथा बाज़ार मूल्य में से जो कम हो उस पर । आकस्मिक देयता ठीक वही मद है जिसके लिए प्रावधान नहीं बनाया जाता, क्योंकि बाध्यता अभी केवल संभव है, प्रायिक (probable) नहीं ; इसीलिए उसका उपचार प्रविष्टि नहीं, प्रकटन है । जिस दिन दायित्व प्रायिक और अनुमेय हो जाए, वही मद आकस्मिक देयता नहीं रहती — वह प्रावधान बन जाती है और तब रूढ़िवादिता काम करती है ।
पूर्ण प्रकटन की परंपरा कहती है कि लेखा-विवरण हर उस महत्त्वपूर्ण सूचना को पूरी और सच्ची तरह सामने रखें जो उनके उपयोगकर्ता — मालिक, ऋणदाता, निवेशक, कर अधिकारी — के निर्णय को बदल सकती हो । जो सूचना अंकों में विवरण के भीतर नहीं समाती, वह टिप्पणियों (notes) या पाद-टिप्पणियों के रूप में जोड़ी जाती है, और वे टिप्पणियाँ लेखा-विवरणों का अभिन्न भाग मानी जाती हैं । सामान्यतः इस परंपरा के अधीन प्रकट की जाने वाली बातें हैं — आकस्मिक देयताएँ, स्टॉक के मूल्यांकन की पद्धति, मूल्यह्रास की विधि और दर, लेखांकन नीतियों में परिवर्तन, चिट्ठे की तिथि के बाद घटी महत्त्वपूर्ण घटनाएँ, तथा पूँजीगत प्रतिबद्धताएँ । इसके साथ चलने वाली सहचरी परंपरा सारता (materiality) की है, जो कहती है कि नगण्य ब्योरों से विवरण भर देना भी उपयोगकर्ता की सहायता नहीं करता ।
आकस्मिक देयता और प्रावधान का भेद इस अध्याय का केंद्र है । प्रावधान एक वर्तमान दायित्व के लिए बनाया जाता है जिसकी रक़म का केवल अनुमान लगाया जा सकता है — वह लाभ-हानि खाते में प्रभार बनता है और चिट्ठे में दिखता है । आकस्मिक देयता में दायित्व अभी है ही नहीं ; वह किसी भविष्य की अनिश्चित घटना पर टिका है, इसलिए वह बहियों से बाहर रहकर केवल टिप्पणी में जीती है । परीक्षा में इसी जोड़ी को उलट-पलटकर पूछा जाता है । पुस्तिका के हिन्दी स्तंभ ने contingent liability को 'प्रासंगिक देयता' लिखा है, जबकि लेखाशास्त्र की प्रचलित हिन्दी शब्दावली में यह 'आकस्मिक देयता' है ; अर्थ वही है, इसलिए विकल्प चुनते समय शब्द बदलने से भ्रमित नहीं होना चाहिए ।
- आकस्मिक देयता वह संभावित बाध्यता है जो किसी भविष्य की अनिश्चित घटना पर निर्भर करती है ; उसकी बहियों में कोई प्रविष्टि नहीं होती ।
- उदाहरण — लंबित वाद का संभावित दावा, विवादित कर माँग, दी गई गारंटी, भुनाए गए विनिमय-पत्र, तथा अंशों पर अदत्त माँग ।
- उसे लेखा-विवरणों के साथ टिप्पणी के रूप में प्रकट किया जाता है, और यही पूर्ण प्रकटन की परंपरा का व्यावहारिक रूप है ।
- AS 29 आकस्मिक देयता को मान्यता देने से मना करता है और केवल प्रकटन की अपेक्षा रखता है ; दायित्व प्रायिक हो जाने पर वही मद प्रावधान बन जाती है ।
- कंपनी अधिनियम, 2013 की अनुसूची III आकस्मिक देयताओं और प्रतिबद्धताओं का प्रकटन टिप्पणियों में अनिवार्य बनाती है ।
- टिप्पणियाँ और पाद-टिप्पणियाँ लेखा-विवरणों का अभिन्न भाग मानी जाती हैं, अलग परिशिष्ट नहीं ।
- आकस्मिक देयता को प्रावधान समझ लेना ; प्रावधान वर्तमान दायित्व के लिए बनता है, आकस्मिक देयता के लिए नहीं ।
- 'संभावित हानि' शब्द देखकर सीधे रूढ़िवादिता चुन लेना, जबकि प्रश्न टिप्पणी संलग्न करने की पद्धति के बारे में है ।
- यह मान लेना कि टिप्पणियाँ विवरणों से बाहर की बात हैं ; वे विवरणों का अंग हैं और उन पर लेखापरीक्षक की राय भी लागू होती है ।
परंपराओं पर प्रश्न प्रायः एक व्यवहार बताकर उसका आधार पूछते हैं । बार-बार लौटने वाली जोड़ियाँ यही हैं — आकस्मिक देयता की टिप्पणी और संदिग्ध ऋणों का प्रावधान, स्टॉक का लागत या बाज़ार मूल्य में जो कम हो उस पर मूल्यांकन, मूल्यह्रास विधि का वर्षों तक अपरिवर्तित रहना, और अत्यल्प रक़म वाली मदों का अलग से न दिखाया जाना । इन्हें क्रमशः पूर्ण प्रकटन, रूढ़िवादिता, रूढ़िवादिता, एकरूपता और सारता से जोड़कर याद रखा जाए तो इस अध्याय के अधिकांश प्रश्न बिना सोचे हल हो जाते हैं ।
इस प्रश्न से सीधे संबंधित कोई पूर्व PYQ उपलब्ध नहीं।
- practice — not a real PYQ
स्टॉक का मूल्यांकन लागत तथा बाज़ार मूल्य में से जो कम हो उस पर करने की पद्धति किस परंपरा पर आधारित है ?
- (a)पूर्ण प्रकटन की परंपरा
- (b)एकरूपता की परंपरा
- (c)रूढ़िवादिता की परंपरा
- (d)सारता की परंपरा
उत्तर(c) रूढ़िवादिता की परंपरा — संभावित लाभ को न गिनना और संभावित हानि का प्रावधान करना ही इस परंपरा का सार है ।
- practice — not a real PYQ
आकस्मिक देयता और प्रावधान के संबंध में निम्नलिखित में से कौन-सा एक कथन सही है ?
- (a)दोनों चिट्ठे में देयता पक्ष में दिखाए जाते हैं ।
- (b)प्रावधान वर्तमान दायित्व के लिए बनता है, जबकि आकस्मिक देयता केवल टिप्पणी में प्रकट होती है ।
- (c)दोनों की बहियों में कोई प्रविष्टि नहीं होती ।
- (d)आकस्मिक देयता लाभ-हानि खाते में प्रभारित की जाती है ।
उत्तर(b) प्रावधान वर्तमान दायित्व के लिए बनता है, जबकि आकस्मिक देयता केवल टिप्पणी में प्रकट होती है — दायित्व के प्रायिक हो जाने पर वही मद प्रावधान बन जाती है ।