निम्नलिखित में से कौन-सा एक कथन सही नहीं है ?
- (a)मूल्यह्रास एक ग़ैर-रोकड़ (नॉन-कैश) व्यय है ।
- (b)मूल्यह्रास परिसंपत्तियों के मूल्यांकन की प्रक्रिया है ।
- (c)मूल्यह्रास का मुख्य कारण इस्तेमाल के कारण हुई टूट-फूट है ।
- (d)मूल्यह्रास को अवश्य प्रभारित किया जाना चाहिए, ताकि किसी व्यवसाय की वास्तविक हानि या लाभ को अभिनिश्चित किया जा सके ।
सही उत्तर — B, (b) मूल्यह्रास परिसंपत्तियों के मूल्यांकन की प्रक्रिया है । स्टेम में 'नहीं' मोटे तिरछे अक्षरों में छपा है, अतः यहाँ उस कथन को खोजना है जो ग़लत हो — और चारों में केवल यही ग़लत है । मूल्यह्रास मूल्यांकन (valuation) की नहीं, आबंटन (allocation) की प्रक्रिया है । पाठ्यपुस्तक का सूत्र-वाक्य यही है : 'मूल्यह्रास आबंटन की प्रक्रिया है, मूल्यांकन की नहीं ।' इसका अर्थ यह है कि किसी स्थायी परिसंपत्ति की ह्रास-योग्य लागत — अर्थात् उसकी लागत में से अनुमानित अवशिष्ट मूल्य घटाकर बची रक़म — को उसके अनुमानित उपयोगी जीवन के वर्षों में क्रमबद्ध रूप से बाँटकर प्रत्येक वर्ष के लाभ-हानि खाते में प्रभारित किया जाता है । लेखाकार यह जानने की चेष्टा ही नहीं करता कि वर्ष के अंत में उस मशीन या कार का बाज़ार मूल्य क्या है । यही कारण है कि मूल्यह्रास काटने के बाद जो बही मूल्य (book value) बचता है, वह प्रायः परिसंपत्ति के बाज़ार मूल्य से भिन्न होता है, और यह भिन्नता कोई त्रुटि नहीं मानी जाती । यदि मूल्यह्रास सचमुच मूल्यांकन होता, तो हर वर्ष परिसंपत्ति का बाज़ार भाव पता करके बही मूल्य उसी के बराबर करना पड़ता, और सीधी रेखा तथा घटते शेष जैसी नियत विधियों का कोई अर्थ ही न रहता । मूल्यह्रास का यही आबंटन-स्वरूप मिलान संकल्पना (matching concept) से निकलता है — जिस वर्ष परिसंपत्ति से आय अर्जित हुई, उसी वर्ष उसकी लागत का उचित भाग उस आय के सामने रखा जाए । शेष तीनों कथन — ग़ैर-रोकड़ प्रकृति, टूट-फूट का मुख्य कारण होना, और सच्चे लाभ-हानि के लिए प्रभार अनिवार्य होना — सही हैं ।
- (a)मूल्यह्रास एक ग़ैर-रोकड़ (नॉन-कैश) व्यय है । — यह कथन सही है, इसलिए यह उत्तर नहीं हो सकता । मूल्यह्रास वास्तव में ग़ैर-रोकड़ व्यय है : जिस वर्ष वह प्रभारित होता है, उस वर्ष व्यवसाय से एक पैसा भी बाहर नहीं जाता । रोकड़ तो उस समय बाहर गई थी जब परिसंपत्ति ख़रीदी गई थी ; उसके बाद के वर्षों में केवल एक लेखा-प्रविष्टि होती है — मूल्यह्रास खाता डेबिट और परिसंपत्ति (या संचित मूल्यह्रास) खाता क्रेडिट । इसी कारण रोकड़ प्रवाह विवरण की अप्रत्यक्ष विधि में शुद्ध लाभ में मूल्यह्रास को वापस जोड़ दिया जाता है, क्योंकि उसे घटाने से लाभ तो कम हुआ पर रोकड़ कम नहीं हुई ।
- (c)मूल्यह्रास का मुख्य कारण इस्तेमाल के कारण हुई टूट-फूट है । — यह कथन भी सही है । निरंतर उपयोग से होने वाली टूट-फूट (wear and tear) मूल्यह्रास का मुख्य और सबसे सामान्य कारण मानी जाती है — यही कारण है जो लगभग हर मूर्त परिसंपत्ति पर लागू होता है । अन्य कारण भी गिनाए जाते हैं — समय का बीतना (जैसे पट्टे या पेटेंट की अवधि घटना), अप्रचलन अर्थात् नई तकनीक आ जाने से पुरानी मशीन का बेकार होना, खान या तेल-कूप जैसी क्षयशील परिसंपत्तियों का रिक्तीकरण, तथा दुर्घटना । इनमें से किसी को 'मुख्य' कहा जाए तो वह टूट-फूट ही है, इसलिए इस कथन में कुछ ग़लत नहीं ।
- (d)मूल्यह्रास को अवश्य प्रभारित किया जाना चाहिए, ताकि किसी व्यवसाय की वास्तविक हानि या लाभ को अभिनिश्चित किया जा सके । — यह कथन भी सही है, और वस्तुतः मूल्यह्रास प्रभारित करने का सबसे बड़ा कारण यही है । मिलान संकल्पना कहती है कि जिस अवधि की आय दिखाई जा रही है, उसी अवधि के सारे व्यय भी उसके सामने रखे जाएँ ; परिसंपत्ति वर्षों तक आय कमाती है, इसलिए उसकी लागत का उचित भाग हर वर्ष व्यय के रूप में दिखाना ही सही लाभ या हानि बताता है । मूल्यह्रास न काटा जाए तो लाभ बढ़ा-चढ़ा दिखेगा, चिट्ठे में परिसंपत्ति अपने वास्तविक उपयोग के बाद भी पूरी लागत पर खड़ी रहेगी, और उस बढ़े हुए लाभ में से लाभांश या आहरण करने पर पूँजी ही ख़र्च होने लगेगी । कंपनियों के लिए तो यह विकल्प भी नहीं है — कंपनी अधिनियम, 2013 की धारा 123 लाभांश घोषित करने से पहले मूल्यह्रास प्रभारित करना अनिवार्य बनाती है, और अनुसूची II परिसंपत्तियों के उपयोगी जीवन निर्धारित करती है ।
मूल्यह्रास किसी स्थायी परिसंपत्ति की ह्रास-योग्य लागत का उसके उपयोगी जीवन में व्यवस्थित आबंटन है । ह्रास-योग्य लागत = परिसंपत्ति की लागत − अनुमानित अवशिष्ट (स्क्रैप) मूल्य । इसे प्रभारित करने के तीन उद्देश्य बताए जाते हैं : सही लाभ-हानि दिखाना, चिट्ठे में परिसंपत्ति को उचित बही मूल्य पर दिखाना, और परिसंपत्ति के प्रतिस्थापन के लिए लाभ को वितरित होने से रोकना । दो सबसे प्रचलित विधियाँ हैं — सीधी रेखा विधि, जिसमें हर वर्ष समान रक़म कटती है, और घटते शेष (लिखित मूल्य) विधि, जिसमें हर वर्ष घटते हुए बही मूल्य पर नियत प्रतिशत लगता है । भारत में मूल्यह्रास लेखांकन अब संशोधित AS 10 (परिसंपत्ति, संयंत्र और उपकरण) का भाग है, जिसमें पुराना AS 6 समाहित कर दिया गया ।
यह प्रश्न उस एक वाक्य पर टिका है जिसे लेखाशास्त्र की हर पाठ्यपुस्तक मोटे अक्षरों में छापती है — मूल्यह्रास आबंटन की प्रक्रिया है, मूल्यांकन की नहीं । भ्रम इसलिए होता है कि मूल्यह्रास काटने से परिसंपत्ति का बही मूल्य घटता है, और घटता हुआ मूल्य देखकर लगता है मानो लेखाकार परिसंपत्ति का 'मूल्य आँक' रहा हो । वास्तव में वह लागत बाँट रहा है । इसी अंतर से यह भी समझ में आता है कि मूल्यह्रास की गणना बाज़ार भाव से नहीं, बल्कि लागत, अनुमानित अवशिष्ट मूल्य और अनुमानित उपयोगी जीवन — इन तीन आँकड़ों से होती है । नकारात्मक प्रश्नों में यह प्रश्नपत्र 'नहीं' को मोटे तिरछे अक्षरों में छापता है, जो अभ्यर्थी के पक्ष में है ; फिर भी उत्तर लिखने से पहले चारों कथनों पर सही/ग़लत का निशान लगा लेना सुरक्षित रहता है ।
- मूल्यह्रास आबंटन की प्रक्रिया है, मूल्यांकन की नहीं — बही मूल्य का बाज़ार मूल्य के बराबर होना आवश्यक नहीं ।
- ह्रास-योग्य लागत = परिसंपत्ति की लागत − अनुमानित अवशिष्ट मूल्य ; इसी को उपयोगी जीवन में बाँटा जाता है ।
- मूल्यह्रास ग़ैर-रोकड़ व्यय है, इसलिए रोकड़ प्रवाह विवरण की अप्रत्यक्ष विधि में उसे शुद्ध लाभ में वापस जोड़ा जाता है ।
- कारण : उपयोग से टूट-फूट (मुख्य), समय का बीतना, अप्रचलन, क्षयशील परिसंपत्तियों का रिक्तीकरण तथा दुर्घटना ।
- प्रमुख विधियाँ — सीधी रेखा विधि (हर वर्ष समान रक़म) और घटते शेष विधि (घटते बही मूल्य पर नियत दर) ।
- कंपनी अधिनियम, 2013 की धारा 123 के अनुसार लाभांश घोषित करने से पहले मूल्यह्रास प्रभारित करना अनिवार्य है ; अनुसूची II उपयोगी जीवन बताती है ।
- नकारात्मक स्टेम में सही कथन चुन बैठना — यहाँ खोजना ग़लत कथन है ।
- मूल्यह्रास को परिसंपत्ति के बाज़ार मूल्य से जोड़ देना ; गणना लागत, अवशिष्ट मूल्य और उपयोगी जीवन से होती है ।
- ग़ैर-रोकड़ व्यय को 'काल्पनिक व्यय' समझ लेना — वह वास्तविक व्यय है, बस उस वर्ष रोकड़ बाहर नहीं जाती ।
मूल्यह्रास पर EPFO और अन्य लेखा-परीक्षाओं में दो तरह के प्रश्न आते हैं — एक सैद्धांतिक, जैसे यह, जिसमें चार कथनों में से ग़लत या सही छाँटना होता है, और दूसरा संख्यात्मक, जिसमें किसी विधि से वार्षिक मूल्यह्रास या विक्रय पर लाभ-हानि निकलवाई जाती है । सैद्धांतिक प्रश्नों में सबसे बार-बार लौटने वाला जाल यही 'आबंटन बनाम मूल्यांकन' है ; उसके बाद 'मूल्यह्रास कोष परिसंपत्ति के प्रतिस्थापन की गारंटी देता है' जैसे अति-कथन आते हैं, जो ग़लत होते हैं ।
इस प्रश्न से सीधे संबंधित कोई पूर्व PYQ उपलब्ध नहीं।
- practice — not a real PYQ
मूल्यह्रास के संबंध में निम्नलिखित में से कौन-सा एक कथन सही है ?
- (a)यह परिसंपत्ति के बाज़ार मूल्य में हुई कमी को मापता है ।
- (b)यह ह्रास-योग्य लागत का उपयोगी जीवन में आबंटन है ।
- (c)यह प्रत्येक वर्ष रोकड़ के बहिर्वाह से जुड़ा होता है ।
- (d)यह केवल भूमि पर प्रभारित किया जाता है ।
उत्तर(b) यह ह्रास-योग्य लागत का उपयोगी जीवन में आबंटन है — मूल्यह्रास लागत बाँटता है, बाज़ार मूल्य नहीं आँकता ; और भूमि पर, जिसका उपयोगी जीवन अनंत माना जाता है, सामान्यतः मूल्यह्रास नहीं लगता ।
- practice — not a real PYQ
रोकड़ प्रवाह विवरण की अप्रत्यक्ष विधि में मूल्यह्रास को शुद्ध लाभ में वापस क्यों जोड़ा जाता है ?
- (a)क्योंकि यह एक पूँजीगत प्राप्ति है
- (b)क्योंकि यह एक ग़ैर-रोकड़ व्यय है
- (c)क्योंकि यह एक आस्थगित राजस्व व्यय है
- (d)क्योंकि यह लाभांश का भाग है
उत्तर(b) क्योंकि यह एक ग़ैर-रोकड़ व्यय है — मूल्यह्रास घटाने से लाभ कम होता है, पर उस वर्ष रोकड़ बाहर नहीं जाती, इसलिए रोकड़ निकालते समय उसे वापस जोड़ा जाता है ।