निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए : कथन I : भारत सरकार ने 100% चीनी और खाद्यान्न को विविध प्रकार के जूट के थैलों में पैकिंग करने का अधिदेश किया है । कथन II : भारत सरकार ने जूट पैकेज सामग्री (वस्तु पैकिंग अनिवार्य प्रयोग) अधिनियम, 1987 अधिनियमित किया है । उपर्युक्त कथनों के सन्दर्भ में निम्नलिखित में से कौन-सा सही है ?
- (a)कथन I और कथन II दोनों सही हैं और कथन II, कथन I की सही व्याख्या है
- (b)कथन I और कथन II दोनों सही हैं और कथन II, कथन I की सही व्याख्या नहीं है
- (c)कथन I सही है किन्तु कथन II ग़लत है
- (d)कथन I ग़लत है किन्तु कथन II सही है
सही उत्तर — D, (d) कथन I ग़लत है किन्तु कथन II सही है — दोनों कथनों को अलग-अलग तौलिए । कथन II पहले लीजिए, क्योंकि वह सीधा है : जूट पैकेजिंग सामग्री (वस्तुओं की पैकिंग में अनिवार्य प्रयोग) अधिनियम, 1987 वास्तव में बना हुआ क़ानून है और वही वह विधिक आधार है जिसके बल पर सरकार कुछ वस्तुओं की पैकिंग के लिए जूट के थैलों का प्रयोग अनिवार्य कर सकती है । इसलिए कथन II सही है । कथन I में एक ही शब्द बदला गया है और उसी से वह ग़लत हो जाता है । आरक्षण के मानदंड हर जूट वर्ष के लिए आर्थिक मामलों की मंत्रिमंडलीय समिति अनुमोदित करती है, और हाल के वर्षों में वे मानदंड रहे हैं — खाद्यान्न का शत-प्रतिशत और चीनी का बीस प्रतिशत विविध प्रकार के जूट के थैलों में पैक किया जाए । कथन I दोनों वस्तुओं पर एक ही अंक — सौ प्रतिशत — चिपका देता है, जबकि चीनी के लिए वह कभी सौ प्रतिशत नहीं रहा । यही इस प्रश्न की पूरी परीक्षा है, और यह उस सामान्य तकनीक का उदाहरण है जिसमें दो अलग-अलग संख्याओं को एक कर दिया जाता है । अतः कथन I ग़लत और कथन II सही — उत्तर विकल्प (d) । ध्यान रखिए कि यह आरक्षण केवल जूट उद्योग की सहायता का उपाय नहीं है ; उससे जूट मिलों तथा सहायक इकाइयों के लाखों श्रमिकों और जूट उगाने वाले किसान-परिवारों की आजीविका जुड़ी है, और कच्चे जूट के उत्पादन का बड़ा हिस्सा इसी माँग से खपता है ।
- (a)कथन I और कथन II दोनों सही हैं और कथन II, कथन I की सही व्याख्या है — यह विकल्प दोनों कथनों को सही मानता है और साथ ही कहता है कि 1987 का अधिनियम पहले कथन की व्याख्या है । पहली शर्त ही टूट जाती है, क्योंकि कथन I में चीनी का प्रतिशत ग़लत छपा है — वह शत-प्रतिशत नहीं, बीस प्रतिशत है । व्याख्या का संबंध भी सोचने लायक़ है : अधिनियम केवल यह शक्ति देता है कि सरकार वस्तुएँ आरक्षित कर सके ; कौन-सी वस्तु कितने प्रतिशत आरक्षित होगी, यह हर वर्ष अलग निर्णय से तय होता है । इसलिए अधिनियम का अस्तित्व किसी विशेष प्रतिशत को नहीं समझाता । दो कथनों का एक ही विषय पर होना उन्हें कारण-परिणाम नहीं बना देता ।
- (b)कथन I और कथन II दोनों सही हैं और कथन II, कथन I की सही व्याख्या नहीं है — इस विकल्प का अर्थ उसमें मोटे तिरछे अक्षरों में छपे 'नहीं' से तय होता है, पर उस तक पहुँचने से पहले दोनों कथनों का सही होना अनिवार्य है — और कथन I सही नहीं है । यहाँ यह देखना उपयोगी है कि परीक्षक ने कथन को पूरी तरह झूठा नहीं बनाया : खाद्यान्न वाला हिस्सा ठीक है और केवल चीनी वाला हिस्सा बदला गया है । ऐसे अधूरे-सही कथन सबसे ख़तरनाक होते हैं, क्योंकि पढ़ते समय जो हिस्सा पहचाना हुआ लगता है वह पूरे वाक्य को सही मनवा देता है । कथन का हर अंश अलग-अलग जाँचना ही इससे बचने का उपाय है ।
- (c)कथन I सही है किन्तु कथन II ग़लत है — यह विकल्प सत्य-मूल्यों को ठीक उलट देता है — कथन I को सही और कथन II को ग़लत ठहराकर । कथन II को ग़लत ठहराना कठिन है, क्योंकि जूट पैकेजिंग सामग्री (वस्तुओं की पैकिंग में अनिवार्य प्रयोग) अधिनियम, 1987 का अस्तित्व एक सत्यापन-योग्य तथ्य है और वही इस पूरी व्यवस्था का विधिक आधार है । जो अभ्यर्थी वर्ष को लेकर अनिश्चित होता है वह इस विकल्प पर फिसल जाता है । वर्ष याद रखने की एक सरल कड़ी यह है कि यह अधिनियम आर्थिक उदारीकरण से पहले के उस दौर का है, जब घरेलू उद्योग को सुरक्षा देने वाले क़ानून सामान्य थे ।
जूट पैकेजिंग सामग्री (वस्तुओं की पैकिंग में अनिवार्य प्रयोग) अधिनियम, 1987 का उद्देश्य जूट उद्योग को माँग की एक निश्चित मात्रा उपलब्ध कराना है । अधिनियम स्वयं कोई प्रतिशत तय नहीं करता ; वह सरकार को यह शक्ति देता है कि वह कुछ वस्तुओं को अधिसूचित करके उनकी पैकिंग में जूट का प्रयोग अनिवार्य कर सके । वास्तविक मानदंड हर जूट वर्ष के लिए, जो एक जुलाई से तीस जून तक चलता है, आर्थिक मामलों की मंत्रिमंडलीय समिति के अनुमोदन से तय होते हैं । हाल के वर्षों में वे मानदंड इस प्रकार रहे हैं — खाद्यान्न का शत-प्रतिशत और चीनी का बीस प्रतिशत विविध प्रकार के जूट के थैलों में पैक किया जाए । नीति का औचित्य तीन स्तरों पर बताया जाता है : जूट मिलों और सहायक इकाइयों के श्रमिकों की आजीविका, जूट उगाने वाले किसान-परिवारों की आय, और प्लास्टिक की तुलना में जूट का पर्यावरण-अनुकूल तथा जैव-अपघटनीय होना । कच्चे जूट के उत्पादन का बड़ा हिस्सा इसी अनिवार्य माँग से खपता है ।
यह भाग B के अंतिम खंड का चौथा और अंतिम 'कथन I / कथन II' प्रश्न है । रचना की दृष्टि से यह उस तकनीक का बहुत साफ़ उदाहरण है जिसमें एक कथन में दो अलग-अलग संख्याओं को मिलाकर एक कर दिया जाता है । खाद्यान्न के लिए शत-प्रतिशत का आँकड़ा प्रायः समाचारों में आता है और अभ्यर्थी की स्मृति में बैठा रहता है ; परीक्षक ने उसी परिचित आँकड़े को चीनी पर भी चिपका दिया, और कथन देखने में सही लगने लगा । इस प्रकार के कथन को हराने का एक ही उपाय है — हर संज्ञा के साथ उसका अपना अंक अलग-अलग याद रखना । यह विषय जूट-उत्पादक राज्यों, विशेषकर पश्चिम बंगाल, के लिए आर्थिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है और वस्त्र मंत्रालय के अधीन राष्ट्रीय जूट बोर्ड तथा भारतीय जूट निगम जैसी संस्थाओं का काम भी इसी से जुड़ा है । शब्दावली की एक बात ध्यान देने योग्य है : हिन्दी स्तंभ अधिनियम का नाम 'जूट पैकेज सामग्री (वस्तु पैकिंग अनिवार्य प्रयोग) अधिनियम, 1987' के रूप में छापता है, जो अंग्रेज़ी नाम का कसा हुआ रूपांतर है ; अधिनियम वही एक है ।
- जूट पैकेजिंग सामग्री (वस्तुओं की पैकिंग में अनिवार्य प्रयोग) अधिनियम, 1987 वह विधिक आधार है जिसके बल पर सरकार कुछ वस्तुओं की पैकिंग में जूट के थैलों का प्रयोग अनिवार्य कर सकती है ।
- आरक्षण के मानदंड हर जूट वर्ष के लिए — एक जुलाई से तीस जून — आर्थिक मामलों की मंत्रिमंडलीय समिति के अनुमोदन से तय होते हैं, न कि अधिनियम में स्थायी रूप से लिखे हैं ।
- हाल के वर्षों के मानदंड : खाद्यान्न का शत-प्रतिशत और चीनी का बीस प्रतिशत विविध प्रकार के जूट के थैलों में पैक किया जाए । दोनों अंक अलग हैं, और यही इस प्रश्न का निर्णायक बिंदु है ।
- नीति का औचित्य — जूट मिलों तथा सहायक इकाइयों के श्रमिकों की आजीविका, जूट उगाने वाले किसान-परिवारों की आय, तथा प्लास्टिक की तुलना में जूट का जैव-अपघटनीय और पर्यावरण-अनुकूल होना ।
- कच्चे जूट के उत्पादन का बड़ा हिस्सा इसी अनिवार्य आरक्षण से खपता है, इसलिए मानदंडों में कोई भी परिवर्तन जूट की क़ीमतों और किसानों की आय पर सीधा असर डालता है ।
- जूट से जुड़ी संस्थाएँ वस्त्र मंत्रालय के अधीन हैं — राष्ट्रीय जूट बोर्ड और भारतीय जूट निगम, जिनमें से दूसरा कच्चे जूट के लिए मूल्य-समर्थन का काम देखता है ।
- दो अलग-अलग वस्तुओं के लिए एक ही प्रतिशत मान लेना । खाद्यान्न के लिए शत-प्रतिशत और चीनी के लिए बीस प्रतिशत — यही भेद इस प्रश्न को तय करता है ।
- अधूरे-सही कथन को पूरा सही मान लेना । कथन का जो हिस्सा पहचाना हुआ लगे, वह पूरे वाक्य की गारंटी नहीं है ; हर अंश अलग-अलग जाँचिए ।
- अधिनियम में प्रतिशत खोजना । अधिनियम शक्ति देता है, प्रतिशत नहीं ; वे हर जूट वर्ष के लिए मंत्रिमंडलीय समिति के निर्णय से तय होते हैं ।
- एक ही विषय पर होने के कारण दो कथनों को कारण-परिणाम मान लेना । अधिनियम का अस्तित्व किसी विशेष प्रतिशत की व्याख्या नहीं करता ।
इस प्रकरण पर प्रश्न प्रायः तीन रूपों में आते हैं । पहला — आँकड़े पर, जिसमें खाद्यान्न और चीनी के आरक्षण-प्रतिशत पूछे जाते हैं और विकल्पों में उन्हें आपस में बदलकर या बराबर करके रखा जाता है । दूसरा — क़ानून पर, जिसमें अधिनियम का नाम या वर्ष पूछा जाता है, अथवा यह पूछा जाता है कि आरक्षण का निर्णय कौन लेता है । तीसरा — प्रभाव पर, जिसमें जूट किसानों, मिल श्रमिकों अथवा पर्यावरण से जुड़ा कोई कथन परखा जाता है । 'कथन I / कथन II' के रूप में यह विषय इसलिए उपयुक्त बैठता है कि एक कथन में आँकड़ा बदलकर और दूसरे में क़ानून का सही नाम रखकर चारों विकल्प सार्थक बना दिए जाते हैं । उत्तर देने की विधि वही तीन चरणों वाली है : पहले कथन I का सत्य, फिर कथन II का सत्य, और तभी व्याख्या का संबंध । और यह याद रखिए कि इस प्रश्नपत्र के चारों ऐसे प्रश्नों में 'दोनों कथन ग़लत' वाला विकल्प है ही नहीं ।
इस प्रश्न से सीधे संबंधित कोई पूर्व PYQ उपलब्ध नहीं।
- practice — not a real PYQ
वस्तुओं की पैकिंग में जूट के थैलों का अनिवार्य प्रयोग किस अधिनियम के अधीन किया जाता है ?
- (a)जूट पैकेजिंग सामग्री अधिनियम, 1977
- (b)जूट पैकेजिंग सामग्री (वस्तुओं की पैकिंग में अनिवार्य प्रयोग) अधिनियम, 1987
- (c)राष्ट्रीय जूट बोर्ड अधिनियम, 1997
- (d)जूट उद्योग संवर्धन अधिनियम, 2007
उत्तर(b) जूट पैकेजिंग सामग्री (वस्तुओं की पैकिंग में अनिवार्य प्रयोग) अधिनियम, 1987 — यही वह क़ानून है जिसके अधीन सरकार वस्तुओं को अधिसूचित करके उनकी पैकिंग में जूट का प्रयोग अनिवार्य कर सकती है ।
- practice — not a real PYQ
हाल के जूट वर्षों में मंत्रिमंडलीय समिति द्वारा अनुमोदित आरक्षण मानदंडों के अनुसार खाद्यान्न और चीनी की पैकिंग में जूट के थैलों का अनिवार्य प्रयोग कितना है ?
- (a)दोनों के लिए शत-प्रतिशत
- (b)खाद्यान्न के लिए शत-प्रतिशत और चीनी के लिए बीस प्रतिशत
- (c)खाद्यान्न के लिए बीस प्रतिशत और चीनी के लिए शत-प्रतिशत
- (d)दोनों के लिए पचास प्रतिशत
उत्तर(b) खाद्यान्न के लिए शत-प्रतिशत और चीनी के लिए बीस प्रतिशत — दोनों अंक अलग हैं, और इन्हें बराबर मान लेना इस प्रकरण की सबसे आम भूल है ।