निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए : कथन I : बहुत मजबूत अमरीकी डॉलर वैश्विक उधार को अधिसंकुचित करता है । कथन II : अमेरिका से बाहर के अनेक देश और कंपनियाँ डॉलर में उधार लेती हैं । उपर्युक्त कथनों के सन्दर्भ में निम्नलिखित में से कौन-सा सही है ?
- (a)कथन I और कथन II दोनों सही हैं और कथन II, कथन I की सही व्याख्या है
- (b)कथन I और कथन II दोनों सही हैं और कथन II, कथन I की सही व्याख्या नहीं है
- (c)कथन I सही है किन्तु कथन II ग़लत है
- (d)कथन I ग़लत है किन्तु कथन II सही है
सही उत्तर — A, (a) कथन I और कथन II दोनों सही हैं और कथन II, कथन I की सही व्याख्या है — यहाँ तीन चरणों में सोचना पड़ता है, क्योंकि यह उन दो विकल्पों में से एक है जिनमें व्याख्या का संबंध भी परखा जाता है । पहला चरण : क्या कथन I सही है ? हाँ । जब अमरीकी डॉलर बहुत मज़बूत होता है तो विश्व भर में ऋण की उपलब्धता सिकुड़ जाती है और वित्तीय परिस्थितियाँ कस जाती हैं । दूसरा चरण : क्या कथन II सही है ? यह भी हाँ । अमेरिका से बाहर के अनेक देश, बैंक और कंपनियाँ अपना उधार डॉलर में लेती हैं, क्योंकि डॉलर ही अंतर्राष्ट्रीय व्यापार की प्रमुख चालान-मुद्रा है, सीमा-पार बैंक ऋणों और अंतर्राष्ट्रीय ऋण-प्रतिभूतियों की सबसे बड़ी मुद्रा है, और विदेशी मुद्रा भंडार का सबसे बड़ा हिस्सा भी उसी में रखा जाता है । तीसरा चरण, जो निर्णायक है : क्या दूसरा कथन पहले का कारण बताता है ? हाँ, और वही इस प्रश्न की आत्मा है । जिस उधार लेने वाले की आय अपनी घरेलू मुद्रा में हो और देनदारी डॉलर में, उसके लिए डॉलर के मज़बूत होते ही वही ऋण घरेलू मुद्रा में कहीं बड़ा हो जाता है । उसका तुलन-पत्र कमज़ोर पड़ता है, उसकी साख घटती है, और ऋण देने वाले बैंक जोखिम देखकर नया डॉलर-ऋण देने में हाथ खींच लेते हैं । इसी शृंखला से वैश्विक उधार सिकुड़ता है । यदि उधार डॉलर में न लिया गया होता तो डॉलर के मज़बूत होने का यह असर होता ही नहीं — इसलिए कथन II केवल एक अलग सच्चाई नहीं, कथन I का कारण है ।
- (b)कथन I और कथन II दोनों सही हैं और कथन II, कथन I की सही व्याख्या नहीं है — इस विकल्प का पूरा अर्थ उसमें छपे 'नहीं' पर टिका है, जिसे पुस्तिका ने मोटे तिरछे अक्षरों में छापा है — कथन II, कथन I की सही व्याख्या 'नहीं' है । दोनों कथनों के सही होने तक यह विकल्प (a) से अलग नहीं पड़ता ; अंतर केवल व्याख्या के संबंध पर आता है । और यहाँ संबंध स्पष्ट रूप से मौजूद है : डॉलर के मज़बूत होने से वैश्विक उधार सिकुड़ता ही इसलिए है कि उधार डॉलर में लिया गया है । यदि दुनिया अपना उधार अपनी-अपनी मुद्राओं में लेती तो डॉलर की चाल से उसके ऋण-भार पर कोई सीधा असर न पड़ता । इसलिए दूसरा कथन पहले की व्याख्या है, और यह विकल्प उसी संबंध को अस्वीकार करके ग़लत हो जाता है ।
- (c)कथन I सही है किन्तु कथन II ग़लत है — यह विकल्प कथन II को ग़लत ठहराता है, जबकि वह इस पूरे विषय का सबसे स्थापित तथ्य है । डॉलर अंतर्राष्ट्रीय वित्त की प्रमुख मुद्रा है : सीमा-पार बैंक ऋण और अंतर्राष्ट्रीय बॉन्ड बड़े पैमाने पर डॉलर में जारी होते हैं, कच्चा तेल और अनेक जिंस डॉलर में मूल्यांकित होते हैं, और उभरती अर्थव्यवस्थाओं की कंपनियाँ प्रायः बाह्य वाणिज्यिक उधार डॉलर में ही लेती हैं । कथन II इसी सामान्य सच्चाई को कहता है । जो अभ्यर्थी इसे ग़लत मान लेता है वह प्रायः यह सोचता है कि हर देश अपनी मुद्रा में ही उधार लेता होगा — पर तब यह प्रश्न ही निरर्थक हो जाता, क्योंकि तब डॉलर की चाल का कोई वैश्विक ऋण-प्रभाव बचता ही नहीं ।
- (d)कथन I ग़लत है किन्तु कथन II सही है — यह विकल्प कथन I को ग़लत ठहराता है, जबकि वह सही है । मज़बूत डॉलर वैश्विक वित्तीय परिस्थितियों को कसता है, और यह कई रास्तों से होता है । डॉलर-ऋण का घरेलू मुद्रा में भार बढ़ता है, उधार लेने वालों की साख घटती है और बैंक नया ऋण देने में सतर्क हो जाते हैं ; साथ ही डॉलर प्रायः तब मज़बूत होता है जब अमेरिका में ब्याज दरें ऊँची हों, जिससे पूँजी उभरते बाज़ारों से निकलकर अमेरिका लौटती है और वहाँ उधार और महँगा हो जाता है । भ्रम इसलिए होता है कि निर्यातक देश के लिए अपनी मुद्रा का सस्ता होना लाभकारी भी लगता है — पर वह व्यापार का पक्ष है, और कथन I वित्त के पक्ष की बात कर रहा है ।
विनिमय दर का प्रभाव दो अलग-अलग रास्तों से पड़ता है, और उन्हें अलग-अलग समझना ज़रूरी है । पहला व्यापार का रास्ता है : किसी देश की मुद्रा सस्ती हो जाए तो उसके निर्यात विदेशी ख़रीदार के लिए सस्ते और उसके आयात महँगे हो जाते हैं । दूसरा वित्त का रास्ता है, जो इस प्रश्न का विषय है : यदि किसी देश की कंपनियों और बैंकों ने विदेशी मुद्रा में उधार ले रखा हो तो उस मुद्रा के मज़बूत होते ही वही देनदारी घरेलू मुद्रा में बढ़ जाती है, यद्यपि उधार की राशि वही रही । इससे तुलन-पत्र कमज़ोर होते हैं, जोखिम बढ़ा हुआ दिखता है, और ऋणदाता नया ऋण देने में संकोच करते हैं ; परिणाम यह होता है कि पूरी दुनिया में डॉलर-ऋण की उपलब्धता घट जाती है । डॉलर की यह विशेष भूमिका उसकी प्रमुख मुद्रा वाली स्थिति से आती है — वह अंतर्राष्ट्रीय व्यापार की प्रमुख चालान-मुद्रा है, सीमा-पार बैंक ऋणों और अंतर्राष्ट्रीय ऋण-प्रतिभूतियों की सबसे बड़ी मुद्रा है, और विदेशी मुद्रा भंडार का सबसे बड़ा हिस्सा भी डॉलर में रखा जाता है ।
यह भाग B के अंतिम खंड का तीसरा 'कथन I / कथन II' प्रश्न है और चारों में यह अकेला ऐसा है जिसमें दोनों कथन सही निकलते हैं तथा व्याख्या का संबंध भी बनता है — इसीलिए यह उस तीसरे चरण का सबसे अच्छा उदाहरण है जिसे अभ्यर्थी प्रायः छोड़ देते हैं । भारत के सन्दर्भ में यह विषय सीधा है : रुपये के कमज़ोर होने पर कच्चे तेल का आयात बिल बढ़ता है, आयातित मुद्रास्फीति का दबाव पड़ता है, और डॉलर में बाह्य वाणिज्यिक उधार लेने वाली कंपनियों की चुकौती महँगी हो जाती है । छपाई और शब्दावली की दो बातें ध्यान देने योग्य हैं । पहली, यह प्रश्न 'मजबूत' शब्द को नुक़्ते के बिना छापता है, जबकि इसी प्रश्नपत्र का प्रश्न 110 'मज़बूत' नुक़्ते के साथ छापता है — एक ही पुस्तिका के भीतर की असंगति, जो अर्थ नहीं बदलती । दूसरी, squeezes के लिए हिन्दी में 'अधिसंकुचित करता है' रखा गया है, जो कम प्रचलित गढ़ा हुआ पद है ; सामान्य हिन्दी में यही बात 'सिकोड़ देता है' या 'कस देता है' कही जाती । अर्थ वही है — उपलब्धता का घट जाना । तीसरी बात वर्तनी की है : कथन I में देश का नाम 'अमरीकी' के रूप में आया है और कथन II में 'अमेरिका' के रूप में — एक ही प्रश्न के भीतर दो रूप, जो जैसे मुद्रित हैं वैसे ही रखे गए हैं ।
- अमरीकी डॉलर अंतर्राष्ट्रीय वित्त की प्रमुख मुद्रा है — व्यापार की प्रमुख चालान-मुद्रा, सीमा-पार बैंक ऋणों और अंतर्राष्ट्रीय ऋण-प्रतिभूतियों की सबसे बड़ी मुद्रा, तथा विदेशी मुद्रा भंडार का सबसे बड़ा हिस्सा ।
- मुद्रा-असंगति की समस्या : जिसकी आय घरेलू मुद्रा में और देनदारी डॉलर में हो, उसके लिए डॉलर के मज़बूत होते ही वही ऋण घरेलू मुद्रा में बड़ा हो जाता है, यद्यपि उधार की राशि नहीं बदली ।
- इसी से शृंखला चलती है — तुलन-पत्र कमज़ोर, साख घटी, ऋणदाता सतर्क, नया डॉलर-ऋण महँगा और कम । यही 'वैश्विक उधार का सिकुड़ना' है ।
- डॉलर प्रायः तब मज़बूत होता है जब अमेरिका में ब्याज दरें ऊँची हों ; तब पूँजी उभरते बाज़ारों से निकलकर अमेरिका लौटती है और वहाँ भी वित्तीय परिस्थितियाँ कस जाती हैं ।
- व्यापार का रास्ता वित्त के रास्ते से अलग है : मुद्रा सस्ती होने पर निर्यात सस्ते और आयात महँगे होते हैं ; कथन I व्यापार की नहीं, वित्त की बात कर रहा है ।
- भारत पर असर — रुपये के कमज़ोर होने से कच्चे तेल का आयात बिल बढ़ता है, आयातित मुद्रास्फीति का दबाव पड़ता है, और डॉलर में बाह्य वाणिज्यिक उधार लेने वाली कंपनियों की चुकौती महँगी हो जाती है ।
- व्यापार और वित्त के मार्गों को मिला देना । मुद्रा सस्ती होने से निर्यात को लाभ हो सकता है, पर डॉलर-ऋण का भार उसी समय बढ़ता है ।
- 'कथन I / कथन II' प्रश्न में तीसरा चरण छोड़ देना । दोनों कथन सही होने पर भी यह देखना बाक़ी रहता है कि दूसरा पहले का कारण बताता है या केवल एक अलग सच्चाई है ।
- विकल्प (b) का 'नहीं' छूट जाना । वह मोटे तिरछे अक्षरों में छपा है और वही (a) तथा (b) को अलग करता है ।
- यह मान लेना कि हर देश अपनी ही मुद्रा में उधार लेता है । वैश्विक उधार का बड़ा हिस्सा डॉलर में है, और यही इस प्रश्न का पूरा आधार है ।
अंतर्राष्ट्रीय अर्थशास्त्र के इस प्रकरण पर प्रश्न प्रायः तीन रूपों में आते हैं । पहला — कारण-परिणाम की शृंखला, जैसा यहाँ है, जिसमें डॉलर की चाल और वैश्विक वित्तीय परिस्थितियों का संबंध पूछा जाता है । दूसरा — प्रभाव-आधारित, जिसमें रुपये के अवमूल्यन या मूल्यवृद्धि के परिणाम पूछे जाते हैं और विकल्पों में निर्यात, आयात, ऋण-भार तथा मुद्रास्फीति को मिलाकर रखा जाता है । तीसरा — संस्थागत, जिसमें विदेशी मुद्रा भंडार, चालू खाता घाटा या बाह्य ऋण के आँकड़े पूछे जाते हैं । उत्तर देने की सुरक्षित विधि यह है कि हर बार पूछा जाए — यह प्रभाव व्यापार के रास्ते से आ रहा है या वित्त के रास्ते से । और 'कथन I / कथन II' के रूप में यह ध्यान रखिए कि इस प्रश्नपत्र के चारों ऐसे प्रश्नों में 'दोनों कथन ग़लत' वाला विकल्प है ही नहीं, इसलिए कम से कम एक कथन सही अवश्य निकलेगा ; यदि आपका विश्लेषण दोनों को ग़लत ठहरा रहा हो तो विश्लेषण दोबारा देखिए ।
इस प्रश्न से सीधे संबंधित कोई पूर्व PYQ उपलब्ध नहीं।
- practice — not a real PYQ
अमरीकी डॉलर के बहुत मज़बूत हो जाने पर उस विकासशील देश पर सामान्यतः क्या प्रभाव पड़ता है जिसकी कंपनियों ने डॉलर में उधार ले रखा हो ?
- (a)उनके ऋण का चुकौती-भार घरेलू मुद्रा में घट जाता है
- (b)उनके ऋण का चुकौती-भार घरेलू मुद्रा में बढ़ जाता है
- (c)उनके ऋण का चुकौती-भार अपरिवर्तित रहता है
- (d)उनका ऋण स्वतः घरेलू मुद्रा में परिवर्तित हो जाता है
उत्तर(b) उनके ऋण का चुकौती-भार घरेलू मुद्रा में बढ़ जाता है — देनदारी डॉलर में है और आय घरेलू मुद्रा में, इसलिए डॉलर महँगा होते ही उतने ही डॉलर चुकाने के लिए अधिक घरेलू मुद्रा चाहिए ; यही मुद्रा-असंगति है ।
- practice — not a real PYQ
किसी देश की मुद्रा के अवमूल्यन का उसके विदेशी व्यापार पर सामान्यतः क्या तात्कालिक प्रभाव पड़ता है ?
- (a)निर्यात महँगे और आयात सस्ते हो जाते हैं
- (b)निर्यात सस्ते और आयात महँगे हो जाते हैं
- (c)निर्यात और आयात दोनों सस्ते हो जाते हैं
- (d)निर्यात और आयात दोनों महँगे हो जाते हैं
उत्तर(b) निर्यात सस्ते और आयात महँगे हो जाते हैं — विदेशी ख़रीदार को उसी वस्तु के लिए कम विदेशी मुद्रा देनी पड़ती है, जबकि आयात के लिए घरेलू मुद्रा अधिक चुकानी पड़ती है ।