औद्योगिक विवाद अधिनियम, 1947 के प्रावधानों के अधीन, किसी श्रम न्यायालय या औद्योगिक अधिकरण या राष्ट्रीय औद्योगिक अधिकरण के समक्ष विधिक अभ्यावेदन करने का अधिकार/के अधिकार को :
- (a)सांविधिक अधिकार है
- (b)बिलकुल अनुमति नहीं दी जा सकती
- (c)यदि अन्य पक्ष आपत्ति नहीं करता या सहमति देता है, तो फोरम द्वारा अनुमति दी जा सकती है
- (d)यदि राज्य/संघ राज्यक्षेत्र के उच्च न्यायालय द्वारा ऐसी मंजूरी दी गई है, तो अनुमति दी जा सकती है
सही उत्तर — C, (c) यदि अन्य पक्ष आपत्ति नहीं करता या सहमति देता है, तो फोरम द्वारा अनुमति दी जा सकती है । यह प्रश्न औद्योगिक विवाद अधिनियम, 1947 की धारा 36 से बना है, और उसकी उपधारा (4) ठीक यही कहती है : किसी श्रम न्यायालय, अधिकरण अथवा राष्ट्रीय अधिकरण के समक्ष किसी कार्यवाही में विवाद का कोई पक्षकार किसी विधि व्यवसायी द्वारा तभी प्रतिनिधित्व करा सकता है जब कार्यवाही के अन्य पक्षकारों की सहमति हो और उस श्रम न्यायालय, अधिकरण या राष्ट्रीय अधिकरण की इजाज़त भी हो । अर्थात् दो शर्तें हैं और दोनों साथ-साथ पूरी होनी चाहिए — दूसरे पक्ष की सहमति, और फ़ोरम की अनुमति । यही इस विकल्प में कहा गया है । इस उपबंध के पीछे का उद्देश्य समझ लेने पर उत्तर स्वयं स्पष्ट हो जाता है : यह अधिनियम श्रमिक और नियोजक के बीच के विवाद को शीघ्र और सरल ढंग से निपटाने के लिए बना है, जहाँ कर्मकार का पक्ष प्रायः उसकी यूनियन का कोई पदाधिकारी रखता है । यदि एक ओर वेतन देकर लाया गया अधिवक्ता खड़ा हो और दूसरी ओर यूनियन का पदाधिकारी, तो दोनों पक्षों की स्थिति असमान हो जाएगी । इसीलिए विधायिका ने विधि व्यवसायी को न पूरी तरह वर्जित किया और न अधिकार के रूप में दिया ; उसे शर्तों के अधीन रख दिया, ताकि जब दोनों पक्ष सहमत हों और फ़ोरम उचित समझे तभी वह आ सके । हिन्दी माध्यम के अभ्यर्थी के लिए एक चेतावनी आवश्यक है : पुस्तिका 'legal representation' के लिए 'विधिक अभ्यावेदन' छापती है, जबकि साधारण हिन्दी में 'अभ्यावेदन' का अर्थ किसी प्राधिकारी को दिया गया प्रार्थनापत्र होता है । यहाँ अर्थ वह नहीं, अधिवक्ता के द्वारा पैरवी, अर्थात् प्रतिनिधित्व है । स्टेम में 'का अधिकार/के अधिकार को' के रूप में जो दुहरा और अधूरा वाक्यांश छपा है वह भी अंग्रेज़ी स्तंभ के सीधे वाक्य का असावधान अनुवाद है ; अर्थ विकल्पों से पूरा होता है ।
- (a)सांविधिक अधिकार है — विधि व्यवसायी द्वारा प्रतिनिधित्व इस अधिनियम के अधीन सांविधिक अधिकार नहीं है । अधिकार उसे कहते हैं जिसका उपयोग किसी दूसरे की अनुमति के बिना किया जा सके, और यहाँ दो अनुमतियाँ आवश्यक हैं । तुलना के लिए उसी धारा 36 की पहली दो उपधाराएँ देखिए : वहाँ कर्मकार को यह अधिकार दिया गया है कि उसकी रजिस्ट्रीकृत ट्रेड यूनियन का कोई पदाधिकारी उसका प्रतिनिधित्व करे, और नियोजक को यह अधिकार है कि नियोजकों के संगम का कोई पदाधिकारी उसका । वे प्रावधान 'हकदार होगा' के शब्दों में लिखे गए हैं । विधि व्यवसायी वाला प्रावधान उन शब्दों में नहीं लिखा गया, और यही अंतर इस प्रश्न की धुरी है ।
- (b)बिलकुल अनुमति नहीं दी जा सकती — 'बिलकुल अनुमति नहीं दी जा सकती' इस प्रश्न का सबसे चतुर विकल्प है, क्योंकि यह इसी धारा का एक सच्चा नियम है — पर दूसरे मंच के बारे में । धारा 36 की उपधारा (3) कहती है कि इस अधिनियम के अधीन किसी सुलह कार्यवाही में अथवा किसी जाँच न्यायालय के समक्ष कोई पक्षकार विधि व्यवसायी द्वारा प्रतिनिधित्व कराने का हकदार नहीं होगा । वहाँ प्रतिषेध पूर्ण है । पर स्टेम श्रम न्यायालय, औद्योगिक अधिकरण और राष्ट्रीय औद्योगिक अधिकरण की बात कर रहा है, जिनके लिए अगली उपधारा अलग व्यवस्था करती है । नियम सही है, मंच गलत ।
- (d)यदि राज्य/संघ राज्यक्षेत्र के उच्च न्यायालय द्वारा ऐसी मंजूरी दी गई है, तो अनुमति दी जा सकती है — उच्च न्यायालय की मंज़ूरी वाली कोई शर्त इस धारा में कहीं नहीं है । अनुमति उसी फ़ोरम को देनी होती है जिसके समक्ष कार्यवाही चल रही है — श्रम न्यायालय, अधिकरण अथवा राष्ट्रीय अधिकरण — और उससे पहले अन्य पक्षकारों की सहमति चाहिए । यह विकल्प इस सामान्य धारणा से बनता है कि अधिवक्ता से जुड़ा कोई भी प्रश्न अंततः उच्च न्यायालय के पास जाता होगा । उच्च न्यायालय की भूमिका इन अधिकरणों के आदेशों के विरुद्ध रिट अधिकारिता में अवश्य है, पर किसी पक्षकार को अधिवक्ता रखने की अनुमति देने में नहीं ।
औद्योगिक विवाद अधिनियम, 1947 विवाद निपटाने के लिए कई मंच बनाता है — सुलह अधिकारी और सुलह बोर्ड, जाँच न्यायालय, तथा न्यायनिर्णयन के लिए श्रम न्यायालय, औद्योगिक अधिकरण और राष्ट्रीय औद्योगिक अधिकरण । धारा 36 यह तय करती है कि इन मंचों पर कौन किसका प्रतिनिधित्व कर सकता है, और उसका ढाँचा तीन स्तरों का है । पहला — कर्मकार अपनी रजिस्ट्रीकृत ट्रेड यूनियन के पदाधिकारी द्वारा, और नियोजक नियोजकों के संगम के पदाधिकारी द्वारा, प्रतिनिधित्व कराने का हकदार है । दूसरा — सुलह कार्यवाहियों में तथा जाँच न्यायालय के समक्ष विधि व्यवसायी पूर्णतः वर्जित है । तीसरा — श्रम न्यायालय, अधिकरण और राष्ट्रीय अधिकरण के समक्ष वह अन्य पक्षकारों की सहमति और फ़ोरम की इजाज़त से ही आ सकता है ।
यह प्रश्न प्रश्नपत्र के श्रम विधि खंड का अंतिम प्रश्न है और उस विषय पर है जो व्यावहारिक दृष्टि से बहुत काम आता है, क्योंकि प्रवर्तन अधिकारी को इन्हीं मंचों पर विभाग का पक्ष रखना होता है । विकल्पों की बनावट ध्यान देने योग्य है : दो विकल्प निषेध पर टिके हैं और दोनों में 'नहीं' आता है — एक में 'अनुमति नहीं दी जा सकती' और दूसरे में 'आपत्ति नहीं करता' — पर दोनों का अर्थ ठीक उलटा है । इसीलिए यहाँ पूरा विकल्प अंत तक पढ़ना आवश्यक है । हिन्दी स्तंभ में दो बातें खटकती हैं : 'अभ्यावेदन' शब्द, जो प्रतिनिधित्व के अर्थ में आया है, और स्टेम का 'का अधिकार/के अधिकार को' वाला दुहरा रूप, जो व्याकरण की दृष्टि से अधूरा है । अंग्रेज़ी स्तंभ में वही वाक्य सीधा है ।
- धारा 36(4) — श्रम न्यायालय, अधिकरण अथवा राष्ट्रीय अधिकरण के समक्ष विधि व्यवसायी द्वारा प्रतिनिधित्व अन्य पक्षकारों की सहमति और फ़ोरम की इजाज़त से ही संभव है ।
- धारा 36(3) — सुलह कार्यवाहियों में तथा जाँच न्यायालय के समक्ष विधि व्यवसायी द्वारा प्रतिनिधित्व पूर्णतः वर्जित है ।
- धारा 36(1) — कर्मकार अपनी रजिस्ट्रीकृत ट्रेड यूनियन के पदाधिकारी द्वारा प्रतिनिधित्व कराने का हकदार है ।
- धारा 36(2) — नियोजक नियोजकों के संगम के पदाधिकारी द्वारा प्रतिनिधित्व कराने का हकदार है ।
- इस अधिनियम में 'न्यायालय' का अर्थ जाँच न्यायालय है, जो अधिनिर्णय नहीं करता बल्कि तथ्यों की जाँच कर प्रतिवेदन देता है ।
- इस व्यवस्था का उद्देश्य दोनों पक्षों को समान धरातल पर रखना और कार्यवाही को शीघ्र तथा सरल बनाए रखना है ।
- सुलह कार्यवाही वाले पूर्ण प्रतिषेध को अधिकरणों पर भी लागू कर देना ।
- 'अभ्यावेदन' को प्रार्थनापत्र के अर्थ में पढ़ जाना ; यहाँ वह प्रतिनिधित्व के अर्थ में है ।
- दो शर्तों में से केवल एक याद रखना ; सहमति और इजाज़त दोनों आवश्यक हैं ।
इस धारा पर प्रश्न प्रायः मंच बदलकर पूछे जाते हैं — वही प्रश्न सुलह कार्यवाही के लिए पूछा जाए तो उत्तर 'अनुज्ञेय नहीं' होगा और अधिकरण के लिए पूछा जाए तो 'शर्तों के अधीन अनुज्ञेय' । दूसरी शैली यह है कि कर्मकार या नियोजक का प्रतिनिधित्व कौन कर सकता है, यह पूछ लिया जाए । तीसरी शैली कथन-आधारित होती है, जिसमें दो कथन देकर सही संयोजन पूछा जाता है । उत्तर देने से पहले सदैव यह देख लेना चाहिए कि स्टेम किस मंच की बात कर रहा है, क्योंकि इस धारा में नियम मंच के साथ बदलता है ।
इस प्रश्न से सीधे संबंधित कोई पूर्व PYQ उपलब्ध नहीं।
- practice — not a real PYQ
औद्योगिक विवाद अधिनियम, 1947 के अधीन सुलह कार्यवाहियों में किसी पक्षकार का विधि व्यवसायी द्वारा प्रतिनिधित्व :
- (a)अधिकार के रूप में अनुज्ञेय है
- (b)अनुज्ञेय नहीं है
- (c)केवल श्रम न्यायालय की अनुमति से अनुज्ञेय है
- (d)केवल उच्च न्यायालय की अनुमति से अनुज्ञेय है
उत्तर(b) अनुज्ञेय नहीं है — धारा 36(3) सुलह कार्यवाहियों तथा जाँच न्यायालय के समक्ष विधि व्यवसायी द्वारा प्रतिनिधित्व पूर्णतः वर्जित करती है ।
- practice — not a real PYQ
औद्योगिक विवाद अधिनियम, 1947 के अधीन किसी कर्मकार का प्रतिनिधित्व निम्नलिखित में से कौन अधिकार के रूप में कर सकता है ?
- (a)उस रजिस्ट्रीकृत ट्रेड यूनियन का कोई पदाधिकारी जिसका वह सदस्य है
- (b)कोई भी विधि व्यवसायी, बिना किसी शर्त के
- (c)केवल समुचित सरकार का कोई अधिकारी
- (d)केवल संबंधित उच्च न्यायालय द्वारा नामित कोई व्यक्ति
उत्तर(a) उस रजिस्ट्रीकृत ट्रेड यूनियन का कोई पदाधिकारी जिसका वह सदस्य है — धारा 36(1) यह अधिकार स्पष्ट शब्दों में देती है ।