औद्योगिक विवाद अधिनियम, 1947 के अधीन सुलह कार्यवाही की समाप्ति के संबंध में, निम्नलिखित में से कौन-सा एक कथन सही नहीं है?
- (a)यह उस तिथि को समाप्त होता है, जिस दिन पक्षकारों द्वारा समझौता ज्ञापन पर हस्ताक्षर किए जाते हैं।
- (b)यह उस तिथि को समाप्त होता है, जिस दिन यह विफल हो जाता है, परिणामस्वरूप पक्षकारों के बीच किसी समझौता ज्ञापन पर हस्ताक्षर नहीं किए जाते।
- (c)यह उस तिथि को समाप्त होता है, जिस दिन, कोई समझौता नहीं हो पाने की स्थिति में, सुलह अधिकारी की रिपोर्ट समुचित सरकार को प्राप्त हो जाती है।
- (d)यह उस तिथि को समाप्त होता है, जिस दिन, सुलह कार्यवाहियों के लंबित रहने के दौरान, इस अधिनियम की धारा 10 के अधीन कोई निर्देश समुचित सरकार द्वारा श्रम न्यायालय/औद्योगिक अधिकरण को किया जाता है।
सही उत्तर — B, (b) यह उस तिथि को समाप्त होता है, जिस दिन यह विफल हो जाता है, परिणामस्वरूप पक्षकारों के बीच किसी समझौता ज्ञापन पर हस्ताक्षर नहीं किए जाते — यही अकेला कथन है जो अधिनियम के पाठ के अनुरूप नहीं है। पहले पूछ को ठीक से पढ़िए। प्रश्न नकारात्मक है — पुस्तिका में ‘नहीं’ मोटे अक्षरों में छपा है — इसलिए खोजना उस अकेले कथन को है जो सही नहीं है, न कि उन तीन को जो सही हैं। पहला क़दम — मूल उपबंध सामने रखिए। औद्योगिक विवाद अधिनियम, 1947 की धारा 20 कार्यवाहियों के आरंभ और समाप्ति के बारे में है। उपधारा (1) आरंभ बताती है : सुलह कार्यवाही उस दिन आरंभ हुई मानी जाती है जिस दिन धारा 22 के अधीन हड़ताल या तालाबंदी की सूचना सुलह अधिकारी को प्राप्त होती है, अथवा जिस दिन विवाद को बोर्ड के पास भेजने का आदेश किया जाता है। उपधारा (2) समाप्ति के ठीक तीन आधार गिनाती है, और वे तीनों इस प्रश्न के तीन विकल्पों में ज्यों के त्यों बैठे हैं : समझौता होने पर उस दिन जब पक्षकार समझौता ज्ञापन पर हस्ताक्षर करें; समझौता न होने पर उस दिन जब सुलह अधिकारी की रिपोर्ट समुचित सरकार को प्राप्त हो जाए, अथवा बोर्ड की रिपोर्ट धारा 17 के अधीन प्रकाशित हो जाए; और उस दिन जब कार्यवाही के लंबित रहते धारा 10 के अधीन विवाद न्यायालय, श्रम न्यायालय, अधिकरण या राष्ट्रीय अधिकरण को निर्देशित कर दिया जाए। दूसरा क़दम — विकल्प (b) को इस सूची से मिलाइए। वह कहता है कि कार्यवाही उसी दिन समाप्त हो जाती है जिस दिन वह विफल हो जाती है और समझौता ज्ञापन पर हस्ताक्षर नहीं होते। अधिनियम में समाप्ति का यह आधार है ही नहीं। विफलता अपने आप कार्यवाही समाप्त नहीं करती; समझौता न होने की स्थिति में समाप्ति की घटना कुछ और है — सुलह अधिकारी की रिपोर्ट का समुचित सरकार तक पहुँच जाना। अर्थात् इस विकल्प ने उपधारा (2) के दूसरे खंड को आधा उठाया है, उसकी शर्त रख ली है और उसका वास्तविक ट्रिगर हटा दिया है। यही चूक इसे असत्य बनाती है और यही नकारात्मक पूछ का उत्तर है। तीसरा क़दम — यह समझिए कि तिथि इतनी महत्वपूर्ण क्यों है, क्योंकि इसी से यह उपबंध याद रह जाता है। सुलह कार्यवाही के लंबित रहते और उसकी समाप्ति के बाद कुछ दिनों तक हड़ताल तथा तालाबंदी पर रोक रहती है, और लंबित रहते ही धारा 33 के अधीन नियोजक कर्मकारों की सेवा-शर्तें एकतरफ़ा नहीं बदल सकता। यदि समाप्ति की तिथि ‘जिस दिन बातचीत टूट गई’ मान ली जाए तो वह तिथि अनिश्चित और विवादास्पद हो जाएगी, क्योंकि उसका कोई अभिलेख नहीं होता। इसीलिए विधायिका ने हर आधार के साथ एक ऐसी घटना बाँधी है जिसका दस्तावेज़ बनता है — हस्ताक्षर, रिपोर्ट की प्राप्ति, प्रकाशन, या निर्देश का आदेश।
- (a)यह उस तिथि को समाप्त होता है, जिस दिन पक्षकारों द्वारा समझौता ज्ञापन पर हस्ताक्षर किए जाते हैं। — यह कथन सही है, इसलिए नकारात्मक पूछ का उत्तर नहीं हो सकता। धारा 20 की उपधारा (2) का पहला खंड ठीक यही कहता है : जहाँ समझौता हो जाए, वहाँ सुलह कार्यवाही उस तिथि को समाप्त हुई मानी जाएगी जिस दिन पक्षकार समझौता ज्ञापन पर हस्ताक्षर करें। ध्यान देने योग्य बात यह है कि यहाँ निर्णायक घटना हस्ताक्षर है, समझौते पर मौखिक सहमति नहीं — अर्थात् इस खंड में भी वही तर्क काम कर रहा है जो पूरे उपबंध में है : समाप्ति की तिथि किसी ऐसी घटना से बँधी है जिसका लिखित प्रमाण मौजूद रहता है। यही समझौता ज्ञापन आगे धारा 18 के अधीन पक्षकारों पर बाध्यकारी होता है और धारा 19 उसके प्रवर्तन की अवधि तय करती है, इसलिए हस्ताक्षर की तिथि आगे की कई गणनाओं का आरंभ-बिंदु भी बनती है।
- (c)यह उस तिथि को समाप्त होता है, जिस दिन, कोई समझौता नहीं हो पाने की स्थिति में, सुलह अधिकारी की रिपोर्ट समुचित सरकार को प्राप्त हो जाती है। — यह कथन भी सही है और उपधारा (2) के दूसरे खंड को ठीक-ठीक दोहराता है : जहाँ कोई समझौता न हो पाए, वहाँ कार्यवाही उस तिथि को समाप्त मानी जाती है जिस दिन सुलह अधिकारी की रिपोर्ट समुचित सरकार को प्राप्त हो जाए। यही वह खंड है जिसे विकल्प (b) आधा उठाकर बिगाड़ देता है, इसलिए दोनों को साथ रखकर पढ़ना इस प्रश्न का सबसे सीधा रास्ता है : शर्त दोनों में एक जैसी है — समझौता नहीं हुआ — पर घटना अलग है, और अधिनियम घटना को रिपोर्ट की प्राप्ति पर रखता है। दो बारीकियाँ और ध्यान देने योग्य हैं। पहली, निर्णायक घटना रिपोर्ट का भेजा जाना नहीं, उसका प्राप्त होना है। दूसरी, यदि मामला बोर्ड के सामने हो तो समाप्ति की घटना बोर्ड की रिपोर्ट का धारा 17 के अधीन प्रकाशन है — इसलिए विकल्प का यह पाठ सुलह अधिकारी वाली स्थिति का वर्णन कर रहा है, जो अपने आप में पूरा और सही है।
- (d)यह उस तिथि को समाप्त होता है, जिस दिन, सुलह कार्यवाहियों के लंबित रहने के दौरान, इस अधिनियम की धारा 10 के अधीन कोई निर्देश समुचित सरकार द्वारा श्रम न्यायालय/औद्योगिक अधिकरण को किया जाता है। — यह कथन भी सही है और उपधारा (2) के तीसरे खंड का वर्णन करता है : यदि सुलह कार्यवाही के लंबित रहते समुचित सरकार धारा 10 के अधीन विवाद को न्यायालय, श्रम न्यायालय, अधिकरण या राष्ट्रीय अधिकरण को निर्देशित कर दे, तो कार्यवाही उसी तिथि को समाप्त हो जाती है। इसका तर्क सीधा है : सुलह और न्यायनिर्णयन एक ही विवाद पर साथ-साथ नहीं चल सकते, इसलिए जैसे ही विवाद निर्णय के लिए भेजा जाता है, समझौता कराने का चरण अपने आप बंद हो जाता है। यह विकल्प इसलिए संदेहास्पद लग सकता है कि उसमें ‘लंबित रहने के दौरान’ जैसा खंड है, जो पढ़ने में असामान्य लगता है; पर वही खंड इसकी सटीकता है, क्योंकि निर्देश यदि कार्यवाही समाप्त होने के बाद किया जाए तो यह उपबंध लागू ही नहीं होता। ऐसे प्रश्नों में विकल्प का असामान्य दिखना उसके ग़लत होने का प्रमाण नहीं है; प्रमाण केवल मूल पाठ से मिलान है।
औद्योगिक विवाद अधिनियम, 1947 विवादों को निपटाने के लिए एक क्रमिक तंत्र देता है : पहले सुलह, फिर स्वैच्छिक मध्यस्थता, और फिर न्यायनिर्णयन। सुलह अधिकारी की नियुक्ति धारा 4 के अधीन होती है और उसका काम धारा 12 में बताया गया है — वह विवाद की जाँच करता है, पक्षकारों को उचित समझौते तक पहुँचाने के लिए प्रयत्न करता है, और यदि समझौता हो जाए तो उसका ज्ञापन तैयार कराकर पक्षकारों के हस्ताक्षर लेता है तथा समुचित सरकार को रिपोर्ट भेजता है; यदि समझौता न हो तो वह विफलता की रिपोर्ट भेजता है जिसमें कार्यवाही का विवरण और समझौता न हो पाने के कारण होते हैं। यह रिपोर्ट सामान्यतः कार्यवाही आरंभ होने से चौदह दिन के भीतर देनी होती है। धारा 20 आरंभ और समाप्ति की तिथियाँ तय करती है, और वे तिथियाँ केवल अभिलेख के लिए नहीं हैं : उन्हीं पर हड़ताल तथा तालाबंदी की वैधता टिकती है, क्योंकि धारा 22 और धारा 23 कार्यवाही के लंबित रहते और उसकी समाप्ति के बाद एक निश्चित अवधि तक इन पर रोक लगाती हैं; और उन्हीं पर धारा 33 की वह सुरक्षा टिकती है जो कार्यवाही के लंबित रहते कर्मकारों की सेवा-शर्तों में एकतरफ़ा परिवर्तन तथा उनके विरुद्ध कार्रवाई को रोकती है। समझौता होने पर बना ज्ञापन धारा 18 के अधीन बाध्यकारी होता है और धारा 19 उसके प्रवर्तन की अवधि बताती है। इसीलिए अधिनियम ने समाप्ति के हर आधार को ऐसी घटना से बाँधा है जिसका दस्तावेज़ बनता है, और किसी को भी ‘बातचीत टूट गई’ जैसी अनिश्चित घटना पर नहीं छोड़ा।
इस प्रश्न की बनावट श्रम विधि के प्रश्नों की सबसे आम बनावट है : तीन विकल्प मूल पाठ के तीन खंडों की ठीक-ठीक नक़ल हैं और चौथा उन्हीं में से एक खंड को थोड़ा-सा बदलकर बनाया गया है। बदलाव भी ऐसा है कि पढ़ने में स्वाभाविक लगे — शर्त वही रखी गई है, केवल वह घटना हटा दी गई है जो कार्यवाही को औपचारिक रूप से समाप्त करती है। इसलिए हल करने की विधि यह नहीं है कि विकल्प ‘तर्कसंगत लगते हैं या नहीं’ यह देखा जाए, बल्कि यह है कि हर विकल्प को उपधारा (2) के तीन खंडों से मिलाया जाए और देखा जाए कि कौन-सा किसी खंड पर नहीं बैठता। दूसरी बात, इस उपबंध में जो शब्द बार-बार परखे जाते हैं वे ‘प्राप्त होना’ और ‘प्रकाशित होना’ हैं — रिपोर्ट भेजना समाप्ति नहीं है, उसका पहुँचना है; और बोर्ड के मामले में प्रकाशन। तीसरी बात, तिथि का व्यावहारिक महत्व याद रखिए, क्योंकि यही इस उपबंध को रटने के बजाय समझने लायक बनाता है : हड़ताल की वैधता, तालाबंदी की वैधता और कर्मकारों की सांविधिक सुरक्षा — तीनों इसी तिथि से गिनी जाती हैं, इसलिए विधायिका उसे अनिश्चित नहीं छोड़ सकती थी।
- औद्योगिक विवाद अधिनियम, 1947 की धारा 20 कार्यवाहियों के आरंभ और समाप्ति की तिथियाँ तय करती है।
- उपधारा (1) के अनुसार सुलह कार्यवाही उस दिन आरंभ हुई मानी जाती है जिस दिन धारा 22 के अधीन हड़ताल या तालाबंदी की सूचना सुलह अधिकारी को प्राप्त हो, अथवा जिस दिन विवाद बोर्ड को निर्देशित करने का आदेश किया जाए।
- उपधारा (2) समाप्ति के तीन आधार देती है : समझौता होने पर समझौता ज्ञापन पर पक्षकारों के हस्ताक्षर की तिथि; समझौता न होने पर सुलह अधिकारी की रिपोर्ट के समुचित सरकार को प्राप्त होने की तिथि, अथवा बोर्ड की रिपोर्ट के धारा 17 के अधीन प्रकाशन की तिथि; और लंबित कार्यवाही के दौरान धारा 10 के अधीन निर्देश किए जाने की तिथि।
- केवल सुलह का विफल हो जाना कार्यवाही की समाप्ति का सांविधिक आधार नहीं है — विफलता की स्थिति में निर्णायक घटना रिपोर्ट का समुचित सरकार तक पहुँचना है।
- धारा 12 के अनुसार सुलह अधिकारी को अपनी रिपोर्ट सामान्यतः कार्यवाही आरंभ होने से चौदह दिन के भीतर प्रस्तुत करनी होती है।
- समाप्ति की तिथि व्यावहारिक रूप से निर्णायक है, क्योंकि धारा 22 तथा धारा 23 कार्यवाही के लंबित रहते और उसके बाद एक निश्चित अवधि तक हड़ताल एवं तालाबंदी पर रोक लगाती हैं, और धारा 33 लंबित अवधि में सेवा-शर्तों के एकतरफ़ा परिवर्तन को रोकती है।
- समझौता होने पर बना ज्ञापन धारा 18 के अधीन बाध्यकारी होता है और धारा 19 उसके प्रवर्तन की अवधि निर्धारित करती है।
- ‘सुलह विफल हो गई’ को समाप्ति का आधार मान लेना; अधिनियम विफलता की स्थिति में रिपोर्ट के प्राप्त होने को समाप्ति मानता है।
- रिपोर्ट भेजने और रिपोर्ट प्राप्त होने में भेद न करना; उपबंध प्राप्ति की तिथि पर टिका है।
- सुलह अधिकारी और बोर्ड की स्थितियों को एक मान लेना; बोर्ड के मामले में समाप्ति की घटना रिपोर्ट का धारा 17 के अधीन प्रकाशन है।
- धारा 10 के अधीन निर्देश वाले खंड में ‘लंबित रहने के दौरान’ छोड़ देना; कार्यवाही समाप्त होने के बाद किया गया निर्देश इस खंड में नहीं आता।
- नकारात्मक पूछ में उस विकल्प को चुन लेना जो सबसे लंबा या सबसे तकनीकी दिखता है; यहाँ असत्य विकल्प सबसे सरल भाषा में लिखा गया है।
औद्योगिक विवाद अधिनियम इस प्रश्नपत्र की श्रम विधि सामग्री का सबसे बड़ा हिस्सा है और उससे प्रश्न तीन रूपों में आते हैं। पहला रूप यही है — किसी उपबंध के खंडों को विकल्पों में बिखेरकर यह पूछना कि कौन-सा कथन सही नहीं है, जहाँ असत्य विकल्प किसी सही खंड को थोड़ा-सा बदलकर बनाया जाता है। दूसरा रूप सीधा तथ्यात्मक है : कौन-सी धारा किस विषय पर है, कितने दिनों की सीमा है, कौन-सा प्राधिकारी क्या करता है। तीसरा रूप परिभाषाओं का है — ‘उद्योग’, ‘औद्योगिक विवाद’, ‘कर्मकार’ और ‘छँटनी’ की परिभाषाएँ, जिन पर न्यायिक व्याख्या भी पूछी जाती है। तीनों के लिए एक ही तैयारी काम आती है : प्रमुख धाराओं की एक सूची बनाइए जिसमें धारा-संख्या के सामने उसका एक-पंक्ति विषय और उसमें आई कोई संख्या लिखी हो, और जिन उपबंधों के खंड गिने-चुने हों — जैसे यहाँ समाप्ति के तीन आधार — उन्हें बिंदुवार अलग से उतार लीजिए, क्योंकि प्रश्न ठीक उन्हीं बिंदुओं से बनाए जाते हैं।
इस प्रश्न से सीधे संबंधित कोई पूर्व PYQ उपलब्ध नहीं।
- practice — not a real PYQ
औद्योगिक विवाद अधिनियम, 1947 की धारा 12 के अनुसार सुलह अधिकारी को अपनी रिपोर्ट सामान्यतः सुलह कार्यवाही आरंभ होने से कितने दिनों के भीतर प्रस्तुत करनी होती है?
- (a)सात दिन
- (b)चौदह दिन
- (c)तीस दिन
- (d)पैंतालीस दिन
उत्तर(b) चौदह दिन — यही सामान्य सीमा है, यद्यपि समुचित सरकार उससे कम अवधि भी नियत कर सकती है।
- practice — not a real PYQ
औद्योगिक विवाद अधिनियम, 1947 के अनुसार सुलह कार्यवाही कब आरंभ हुई मानी जाती है?
- (a)जिस दिन पक्षकारों के बीच विवाद उत्पन्न होता है
- (b)जिस दिन धारा 22 के अधीन हड़ताल या तालाबंदी की सूचना सुलह अधिकारी को प्राप्त होती है, अथवा जिस दिन विवाद बोर्ड को निर्देशित करने का आदेश किया जाता है
- (c)जिस दिन नियोजक कर्मकारों को अपने निर्णय की सूचना देता है
- (d)जिस दिन समुचित सरकार राजपत्र में अधिसूचना प्रकाशित करती है
उत्तर(b) जिस दिन धारा 22 के अधीन हड़ताल या तालाबंदी की सूचना सुलह अधिकारी को प्राप्त होती है, अथवा जिस दिन विवाद बोर्ड को निर्देशित करने का आदेश किया जाता है — धारा 20 की पहली उपधारा यही दो आरंभ-बिंदु देती है, और यहाँ भी निर्णायक घटना वही है जिसका अभिलेख बनता है।