किसी स्थापन में कार्यरत कोई कामगार न्यूनतम मजदूरी अधिनियम, 1948 के अधीन नियत मासिक मजदूरी ₹ 9,000 पाता है और बोनस भुगतान अधिनियम, 1965 के अधीन लेखाकरण वर्ष 2021–22 के लिए बोनस पाने के लिए अर्ह है। देय बोनस 10% की दर से है। यदि उस कामगार ने उक्त पूरे लेखाकरण वर्ष में लगातार काम किया है, तो उस कामगार को कितनी बोनस राशि का भुगतान किया जाएगा?
- (a)₹ 7,000
- (b)₹ 8,400
- (c)₹ 10,000
- (d)₹ 10,800
सही उत्तर — D, (d) ₹ 10,800 — बोनस भुगतान अधिनियम, 1965 की धारा 12 के अनुसार गणना ₹ 7,000 और अनुसूचित नियोजन की न्यूनतम मजदूरी में से जो अधिक हो उस पर होती है, इसलिए यहाँ आधार ₹ 9,000 है और 12 महीनों पर 10 प्रतिशत निकालने पर ₹ 10,800 आते हैं। पहला क़दम — सही धारा पहचानिए। जब कर्मचारी की मजदूरी एक निर्धारित सीमा से ऊपर हो तो बोनस पूरी मजदूरी पर नहीं, एक कल्पित मजदूरी पर निकाला जाता है, और यह काम धारा 12 करती है। 2015 के संशोधन के बाद उसका पाठ यह कहता है कि जहाँ कर्मचारी की मजदूरी ₹ 7,000 प्रति मास से, अथवा समुचित सरकार द्वारा नियत उस अनुसूचित नियोजन की न्यूनतम मजदूरी से — जो भी अधिक हो — ऊपर हो, वहाँ बोनस की गणना ऐसे की जाएगी मानो उसकी मजदूरी वही अधिक वाली राशि हो। दूसरा क़दम — दोनों राशियों की तुलना कीजिए। प्रश्न स्पष्ट कहता है कि ₹ 9,000 की मासिक मजदूरी न्यूनतम मजदूरी अधिनियम, 1948 के अधीन नियत है, अर्थात् वही उस नियोजन की न्यूनतम मजदूरी है। अब धारा 12 की दोनों राशियाँ सामने रखिए — ₹ 7,000 और ₹ 9,000 — और जो अधिक है उसे चुनिए, अर्थात् ₹ 9,000। यही इस प्रश्न का पूरा निर्णायक बिंदु है, और यहीं सबसे अधिक अभ्यर्थी चूकते हैं, क्योंकि ‘सात हज़ार’ की सीमा याद रह जाती है और उसके साथ जुड़ा ‘जो भी अधिक हो’ छूट जाता है। तीसरा क़दम — गणना कीजिए। कर्मचारी ने पूरे लेखाकरण वर्ष लगातार काम किया है, इसलिए बारह महीनों की मजदूरी ली जाएगी : 9,000 × 12 = ₹ 1,08,000। बोनस की दर प्रश्न में 10 प्रतिशत दी गई है, इसलिए देय बोनस 1,08,000 का दस प्रतिशत, अर्थात् ₹ 10,800। चौथा क़दम — दर की सीमाएँ भी जाँच लीजिए, ताकि उत्तर पर भरोसा हो। धारा 10 के अनुसार न्यूनतम बोनस 8·33 प्रतिशत है और वह आबंटनीय अधिशेष हो या न हो, देना पड़ता है; धारा 11 के अनुसार अधिकतम बोनस 20 प्रतिशत है। यहाँ दी गई दर 10 प्रतिशत इन्हीं दोनों के बीच है, इसलिए प्रश्न भीतर से संगत है और कोई और समायोजन नहीं करना है। साथ में दो और संख्याएँ याद रखिए, क्योंकि वे इसी अधिनियम से अलग पूछी जाती हैं : धारा 2(13) के अनुसार बोनस के लिए ‘कर्मचारी’ वही है जिसकी मासिक मजदूरी ₹ 21,000 से अधिक न हो, और धारा 8 के अनुसार उस लेखाकरण वर्ष में कम से कम तीस कार्य-दिवस काम करना आवश्यक है।
- (a)₹ 7,000 — ₹ 7,000 इस प्रश्न में कहीं से भी बोनस की राशि नहीं है — वह धारा 12 में दी गई गणना की सीमा है, और वह भी मासिक। इस विकल्प तक वह अभ्यर्थी पहुँचता है जो अधिनियम की परिचित संख्या देखकर उसे उत्तर मान लेता है, बिना यह देखे कि प्रश्न क्या पूछ रहा है। दो जाँचें इसे तुरंत बाहर कर देती हैं। पहली, इकाई की जाँच : बोनस पूरे लेखाकरण वर्ष का देय है, इसलिए उत्तर वार्षिक राशि होगा, जबकि ₹ 7,000 मासिक मजदूरी की सीमा है। दूसरी, तर्क की जाँच : 10 प्रतिशत की दर पर बोनस किसी भी हाल में उस आधार-राशि से बहुत छोटा होगा जिस पर वह निकाला जा रहा है, और यहाँ आधार वार्षिक ₹ 1,08,000 है। संख्याओं वाले विधिक प्रश्नों में यह आदत बहुत बचाती है — पहले यह तय कीजिए कि उत्तर मासिक होगा या वार्षिक, दर होगी या राशि, तभी विकल्पों को देखिए।
- (b)₹ 8,400 — ₹ 8,400 इस प्रश्न का सबसे सिखाने वाला असत्य विकल्प है, क्योंकि यह ठीक उसी अभ्यर्थी को मिलता है जिसने धारा 12 पढ़ी तो है पर आधी। ₹ 7,000 को ही आधार मानकर गणना कीजिए : 7,000 × 12 = ₹ 84,000, और उसका दस प्रतिशत ₹ 8,400। सारी गणना निर्दोष है; चूक केवल यह है कि धारा 12 की सीमा ₹ 7,000 पर समाप्त नहीं होती — उसका पाठ ‘₹ 7,000 अथवा उस अनुसूचित नियोजन की न्यूनतम मजदूरी, जो भी अधिक हो’ कहता है। यह ‘जो भी अधिक हो’ वाला खंड 2015 के संशोधन से आया, जिसने गणना की सीमा ₹ 3,500 से बढ़ाकर ₹ 7,000 की और साथ ही न्यूनतम मजदूरी वाली तुलना जोड़ी, ताकि जहाँ राज्य ने ऊँची न्यूनतम मजदूरी नियत की हो वहाँ बोनस उसी ऊँचे आधार पर बने। यहाँ न्यूनतम मजदूरी ₹ 9,000 है, इसलिए आधार ₹ 9,000 ही होगा और ₹ 8,400 वाली गणना अधूरी रह जाती है।
- (c)₹ 10,000 — ₹ 10,000 सही उत्तर के बहुत पास है और गोल संख्या होने के कारण भरोसेमंद भी लगता है, पर उस तक पहुँचने का कोई विधिक रास्ता नहीं है — न 10 प्रतिशत की दर से, न 8·33 प्रतिशत की न्यूनतम दर से, जो ₹ 1,08,000 पर लगभग नौ हज़ार देती। इसकी असली जड़ कहीं और है : 2015 के संशोधन से पहले धारा 2(13) में बोनस के लिए ‘कर्मचारी’ की पात्रता-सीमा ₹ 10,000 मासिक थी, और उसी संशोधन ने उसे बढ़ाकर ₹ 21,000 किया। अर्थात् यह विकल्प भी विकल्प (a) की तरह अधिनियम की एक पुरानी सीमा-संख्या है, जिसे बोनस की राशि के रूप में परोस दिया गया है। इससे इस अधिनियम की तैयारी का एक नियम निकलता है : ₹ 21,000 की पात्रता-सीमा, ₹ 7,000 की गणना-सीमा, 8·33 प्रतिशत की न्यूनतम दर और 20 प्रतिशत की अधिकतम दर — इन चारों को एक साथ, अपने-अपने नाम के साथ याद कीजिए, अन्यथा वे आपस में बदलकर विकल्पों में लौटती रहेंगी।
बोनस भुगतान अधिनियम, 1965 का ढाँचा कुछ ही धाराओं पर टिका है और उन्हें क्रम से देख लेना पूरे अध्याय को खोल देता है। धारा 2(13) यह बताती है कि बोनस के प्रयोजन के लिए ‘कर्मचारी’ कौन है — वह व्यक्ति जिसकी मासिक मजदूरी ₹ 21,000 से अधिक न हो; यह सीमा 2015 के संशोधन से पहले ₹ 10,000 थी। धारा 8 पात्रता की शर्त रखती है : उस लेखाकरण वर्ष में कम से कम तीस कार्य-दिवस काम किया हो। धारा 9 अपात्रता बताती है — कपट, परिसर में हिंसक या उपद्रवी आचरण, तथा चोरी, दुर्विनियोग या तोड़-फोड़ के कारण सेवा से हटाया गया कर्मचारी बोनस का अधिकारी नहीं रहता। धारा 10 न्यूनतम बोनस 8·33 प्रतिशत नियत करती है, और वह नियोजक को तब भी देना पड़ता है जब उसे कोई लाभ न हुआ हो; धारा 11 अधिकतम बोनस 20 प्रतिशत तक सीमित करती है, जो आबंटनीय अधिशेष के अनुसार बनता है। धारा 12 वह गणना-नियम देती है जिस पर यह प्रश्न टिका है : जहाँ मजदूरी ₹ 7,000 अथवा अनुसूचित नियोजन की न्यूनतम मजदूरी — जो भी अधिक हो — से ऊपर हो, वहाँ बोनस उसी अधिक वाली कल्पित मजदूरी पर निकाला जाएगा। धारा 19 भुगतान की समय-सीमा तय करती है, जो सामान्यतः लेखाकरण वर्ष समाप्त होने से आठ महीने के भीतर है। इसके साथ यह भी समझना चाहिए कि न्यूनतम मजदूरी अधिनियम, 1948 अलग विधि है : वह यह तय करती है कि किसी अनुसूचित नियोजन में मजदूरी की तल-सीमा क्या होगी, और यहाँ उसी तल-सीमा को बोनस की गणना का आधार बना दिया गया है।
श्रम विधियों के संख्यात्मक प्रश्न इस प्रश्नपत्र में नियमित हैं और वे प्रायः इसी बनावट के होते हैं : एक छोटी-सी कहानी, दो-तीन संख्याएँ, और वह एक शर्त जिसे पढ़ने से चूकना ही परीक्षा का उद्देश्य है। यहाँ वह शर्त ‘जो भी अधिक हो’ है, और उसे छोड़ देने पर एक पूरा-का-पूरा तैयार विकल्प — ₹ 8,400 — सामने रखा हुआ मिलता है। इसलिए ऐसे प्रश्नों में सबसे उपयोगी आदत यह है कि गणना शुरू करने से पहले धारा का पाठ मन में पूरा दोहराया जाए, विशेषकर उसके ‘अथवा’ और ‘जो भी अधिक हो’ जैसे जोड़ने वाले शब्द। दूसरी आदत इकाई की जाँच है : उत्तर मासिक होगा या वार्षिक, दर होगी या राशि। यहाँ दो विकल्प — ₹ 7,000 और ₹ 10,000 — अधिनियम की मासिक सीमाएँ हैं, राशियाँ नहीं, और यह जाँच उन्हें बिना किसी गणना के बाहर कर देती है। तीसरी बात, इस अधिनियम की चार संख्याएँ एक साथ याद रखनी चाहिए, क्योंकि परीक्षा उन्हें आपस में बदलकर पूछती है : पात्रता की सीमा ₹ 21,000, गणना की सीमा ₹ 7,000, न्यूनतम दर 8·33 प्रतिशत और अधिकतम दर 20 प्रतिशत। इनमें से पहली दो संख्याएँ 2015 के संशोधन से बदली थीं, इसलिए पुरानी पुस्तकों की संख्याएँ — ₹ 10,000 और ₹ 3,500 — विकल्पों में लौटती रहती हैं।
- धारा 12 के अनुसार जहाँ कर्मचारी की मजदूरी ₹ 7,000 प्रति मास अथवा उस अनुसूचित नियोजन की न्यूनतम मजदूरी — जो भी अधिक हो — से ऊपर हो, वहाँ बोनस उसी अधिक वाली कल्पित मजदूरी पर निकाला जाता है।
- इस प्रश्न में न्यूनतम मजदूरी ₹ 9,000 है, जो ₹ 7,000 से अधिक है, इसलिए आधार ₹ 9,000 बनता है; बारह महीनों की मजदूरी ₹ 1,08,000 और उस पर 10 प्रतिशत बोनस ₹ 10,800।
- ‘जो भी अधिक हो’ वाला खंड 2015 के संशोधन से आया, जिसने गणना की सीमा ₹ 3,500 से बढ़ाकर ₹ 7,000 की और न्यूनतम मजदूरी से तुलना जोड़ी।
- धारा 2(13) के अनुसार बोनस के प्रयोजन से ‘कर्मचारी’ वही है जिसकी मासिक मजदूरी ₹ 21,000 से अधिक न हो; यह सीमा 2015 से पहले ₹ 10,000 थी।
- धारा 8 के अनुसार बोनस पाने के लिए उस लेखाकरण वर्ष में कम से कम तीस कार्य-दिवस काम करना आवश्यक है; धारा 9 कपट, परिसर में हिंसक आचरण तथा चोरी या तोड़-फोड़ के आधार पर अपात्र ठहराती है।
- धारा 10 के अनुसार न्यूनतम बोनस 8·33 प्रतिशत है और वह लाभ न होने पर भी देय है; धारा 11 के अनुसार अधिकतम बोनस 20 प्रतिशत तक हो सकता है।
- धारा 19 के अनुसार बोनस सामान्यतः लेखाकरण वर्ष समाप्त होने से आठ महीने के भीतर चुकाया जाना चाहिए।
- धारा 12 को केवल ‘₹ 7,000 की सीमा’ के रूप में याद रखना और ‘अथवा न्यूनतम मजदूरी, जो भी अधिक हो’ वाला खंड छोड़ देना; यही चूक तैयार रखे गए असत्य विकल्प तक ले जाती है।
- अधिनियम की मासिक सीमा-संख्या को बोनस की राशि मान लेना; ₹ 7,000 और ₹ 10,000 दोनों सीमाएँ हैं, राशियाँ नहीं।
- बारह से गुणा करना भूल जाना; बोनस पूरे लेखाकरण वर्ष का देय है, इसलिए आधार वार्षिक मजदूरी होती है।
- 2015 के संशोधन से पहले की संख्याएँ लगा देना; गणना-सीमा ₹ 3,500 और पात्रता-सीमा ₹ 10,000 अब पुरानी हो चुकी हैं।
- न्यूनतम बोनस की दर 8·33 प्रतिशत और प्रश्न में दी गई दर को आपस में मिला देना; प्रश्न स्वयं दर बता दे तो वही लगती है, बशर्ते वह 8·33 और 20 प्रतिशत के बीच हो।
बोनस भुगतान अधिनियम इस प्रश्नपत्र की श्रम विधि सामग्री का स्थायी हिस्सा है और उससे प्रश्न तीन रूपों में आते हैं। पहला रूप यही संख्यात्मक है : मजदूरी और दर देकर देय बोनस पूछना, जहाँ पूरा उत्तर धारा 12 के पाठ पर टिकता है। दूसरा रूप सीधी सीमा-संख्याओं का है — पात्रता की सीमा कितनी है, न्यूनतम और अधिकतम बोनस कितना है, कितने दिन काम करना आवश्यक है, भुगतान कब तक करना है। तीसरा रूप कथन-आधारित या अपवाद वाला है : कौन बोनस का अधिकारी नहीं है, किस स्थापन पर अधिनियम लागू होता है, नए स्थापन के लिए क्या छूट है। तीनों की तैयारी के लिए एक पन्ना पर्याप्त है जिसमें धारा-संख्या के सामने उसका एक-पंक्ति सार और उसकी संख्या लिखी हो। इसी प्रश्नपत्र में मजदूरी से जुड़े और भी प्रश्न हैं — मजदूरी संदाय अधिनियम के अभिलेख और संविधान के अनुच्छेद 43 की निर्वाह मजदूरी — इसलिए मजदूरी की चारों विधियों को एक साथ पढ़ना अधिक लाभ देता है।
इस प्रश्न से सीधे संबंधित कोई पूर्व PYQ उपलब्ध नहीं।
- practice — not a real PYQ
बोनस भुगतान अधिनियम, 1965 की धारा 10 के अधीन न्यूनतम बोनस की दर क्या है?
- (a)4 प्रतिशत
- (b)8·33 प्रतिशत
- (c)10 प्रतिशत
- (d)20 प्रतिशत
उत्तर(b) 8·33 प्रतिशत — यही न्यूनतम बोनस है और वह नियोजक को तब भी देना पड़ता है जब उस वर्ष कोई आबंटनीय अधिशेष न बना हो; 20 प्रतिशत धारा 11 के अधीन अधिकतम सीमा है।
- practice — not a real PYQ
बोनस भुगतान अधिनियम, 1965 के अधीन किसी लेखाकरण वर्ष का बोनस पाने के लिए कर्मचारी को उस वर्ष में कम से कम कितने कार्य-दिवस काम करना आवश्यक है?
- (a)15 कार्य-दिवस
- (b)30 कार्य-दिवस
- (c)60 कार्य-दिवस
- (d)90 कार्य-दिवस
उत्तर(b) 30 कार्य-दिवस — धारा 8 यही शर्त रखती है, और वह उस लेखाकरण वर्ष के भीतर पूरी होनी चाहिए।