CAMPA निधि, निम्नलिखित में से किस मंत्रालय द्वारा विनियमित होती है?
- (a)गृह मंत्रालय
- (b)कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय
- (c)पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय
- (d)रक्षा मंत्रालय
सही उत्तर — C, (c) पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय — प्रतिपूरक वनरोपण निधि इसी मंत्रालय के अधीन गठित प्राधिकरण द्वारा विनियमित होती है, क्योंकि वन इसी मंत्रालय का विषय हैं। पहला क़दम — निधि आती कहाँ से है, यह देखिए, क्योंकि उसी से नियामक का पता चल जाता है। वन (संरक्षण) अधिनियम, 1980 के अनुसार किसी वन भूमि को ग़ैर-वानिकी प्रयोजन के लिए — सड़क, खान, बाँध, संयंत्र या किसी परियोजना के लिए — तभी परिवर्तित किया जा सकता है जब केंद्र सरकार की अनुमति मिले। ऐसी अनुमति के साथ उपयोगकर्ता संस्था पर दो शर्तें लगती हैं : उतनी ही भूमि पर, या निर्धारित नियमों के अनुसार, प्रतिपूरक वनरोपण कराने की लागत देना; और खोए हुए वन की पारिस्थितिक सेवाओं के बदले शुद्ध वर्तमान मूल्य चुकाना। यही धनराशि जमा होकर यह निधि बनाती है। अर्थात् निधि का जन्म ही वन-भूमि के परिवर्तन से हुआ है, और वन-भूमि का परिवर्तन पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय के दायरे में आता है। दूसरा क़दम — विधिक ढाँचा याद रखिए। लंबे समय तक यह धन बिना क़ानूनी ढाँचे के पड़ा रहा और उच्चतम न्यायालय के निर्देश पर एक तदर्थ प्राधिकरण उसे सँभालता रहा। स्थायी व्यवस्था प्रतिपूरक वनरोपण निधि अधिनियम, 2016 से बनी, जिसे 2018 के नियमों के साथ लागू किया गया। इस अधिनियम ने दो निधियाँ बनाईं — भारत के लोक लेखा में राष्ट्रीय प्रतिपूरक वनरोपण निधि और प्रत्येक राज्य तथा संघ राज्यक्षेत्र के लोक लेखा में राज्य निधि — और दोनों स्तरों पर प्राधिकरण गठित किए। जमा होने वाली राशि का 90 प्रतिशत राज्यों को जाता है और 10 प्रतिशत राष्ट्रीय निधि में रहता है। तीसरा क़दम — प्रशासनिक सिरा देखिए। राष्ट्रीय प्राधिकरण का शासी निकाय केंद्रीय पर्यावरण मंत्री की अध्यक्षता में काम करता है, और पूरा तंत्र पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय के अधीन है। धन का उपयोग वनरोपण, वनों के पुनर्जनन, वन्य जीव प्रबंधन, वन सुरक्षा, अवसंरचना तथा जल संरक्षण जैसे कार्यों में होता है, और उसका खर्च कार्य-योजना के अनुसार ही किया जा सकता है। चौथा क़दम — छाँटने का सामान्य नियम याद रखिए, जो ऐसे हर प्रश्न में काम आता है : पूछिए कि जिस विषय की बात हो रही है वह किस मंत्रालय की कार्य-सूची में है। यहाँ विषय वन है, इसलिए उत्तर वही मंत्रालय है जिसके नाम में वन शब्द आता है। यह जाँच सीधी लगती है, पर तीन विकल्प इसीलिए रखे गए हैं कि उपयोगकर्ता संस्थाओं और नियामक के बीच का भेद धुँधला किया जा सके।
- (a)गृह मंत्रालय — गृह मंत्रालय का दायरा पूरी तरह अलग है : आंतरिक सुरक्षा, केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बल, केंद्र-राज्य संबंध, संघ राज्यक्षेत्रों का प्रशासन, जनगणना तथा राजभाषा जैसे विषय उसके पास हैं, और आपदा प्रबंधन का प्रशासनिक ठिकाना भी वही है। वन, वन भूमि का परिवर्तन या वनरोपण उसकी कार्य-सूची में कहीं नहीं आते। यह विकल्प इस प्रश्न में केवल संख्या पूरी करने के लिए है, और उसे पहचान लेना अपने आप में उपयोगी है : ऐसे प्रश्नों में प्रायः एक विकल्प इतना दूर का रखा जाता है कि वह पहले ही पढ़ने पर बाहर हो जाए, जिससे शेष तीन पर ध्यान केंद्रित हो सके। यहाँ ध्यान देने योग्य बात केवल यह है कि आपदा प्रबंधन गृह मंत्रालय के पास होने से कुछ अभ्यर्थी उसे पर्यावरण से जोड़ लेते हैं; आपदा और पर्यावरण पड़ोसी विषय अवश्य हैं, पर उनके मंत्रालय अलग हैं।
- (b)कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय — कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय का काम फसलें, बीज, उर्वरक, न्यूनतम समर्थन मूल्य, कृषि ऋण, फसल बीमा तथा किसानों से जुड़ी योजनाएँ हैं। यह विकल्प इसलिए ललचाता है कि कृषि और वानिकी दोनों भूमि-उपयोग के विषय हैं और दोनों में पेड़ लगाने की बात आती है, इसलिए ‘वनरोपण’ शब्द सुनकर मन कृषि की ओर चला जाता है। पर विधिक दृष्टि से भेद बिलकुल साफ़ है : वन भूमि का परिवर्तन वन (संरक्षण) अधिनियम, 1980 से नियंत्रित होता है, प्रतिपूरक वनरोपण उसी अनुमति की शर्त है, और यह पूरा विषय पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय के पास है। कृषि वानिकी जैसे कार्यक्रम अवश्य दोनों मंत्रालयों के साझा सरोकार में आते हैं, पर वे इस निधि से अलग हैं और उनका पैसा भी अलग रास्ते से आता है।
- (d)रक्षा मंत्रालय — यह इस प्रश्न का सबसे सोच-समझकर रखा गया विकल्प है, क्योंकि रक्षा मंत्रालय का इस निधि से एक वास्तविक संबंध है — पर वह संबंध देने वाले का है, लेने या नियंत्रित करने वाले का नहीं। सीमावर्ती सड़कें, छावनियाँ, फ़ायरिंग रेंज और अन्य रक्षा परियोजनाएँ प्रायः वन भूमि पर पड़ती हैं, इसलिए उनके लिए वन (संरक्षण) अधिनियम, 1980 के अधीन अनुमति लेनी पड़ती है और उपयोगकर्ता संस्था के रूप में रक्षा मंत्रालय को प्रतिपूरक वनरोपण तथा शुद्ध वर्तमान मूल्य की राशि इसी निधि में जमा करनी पड़ती है। जो मंत्रालय किसी निधि में पैसा जमा करता है वह उस निधि का नियामक नहीं बन जाता; नियामक वही होता है जिसके अधीन वह अधिनियम और वह प्राधिकरण है जिसने निधि बनाई। यह भेद — भुगतानकर्ता बनाम नियामक — इस परिवार के प्रश्नों में बार-बार काम आता है।
प्रतिपूरक वनरोपण का पूरा विचार एक सरल सिद्धांत पर टिका है : यदि विकास के लिए वन काटना अनिवार्य हो, तो उसकी क़ीमत परियोजना को चुकानी चाहिए, समाज को नहीं। वन (संरक्षण) अधिनियम, 1980 के अनुसार कोई भी राज्य केंद्र सरकार की पूर्व अनुमति के बिना वन भूमि को ग़ैर-वानिकी प्रयोजन के लिए नहीं दे सकता, और ऐसी अनुमति दो शर्तों के साथ आती है — प्रतिपूरक वनरोपण की लागत, और खोए हुए वन की पारिस्थितिक सेवाओं के बदले शुद्ध वर्तमान मूल्य। लंबे समय तक यह धन बिना ढाँचे के जमा होता रहा और उच्चतम न्यायालय के निर्देश पर एक तदर्थ प्राधिकरण उसे सँभालता रहा, क्योंकि राज्यों के पास उसे खर्च करने की व्यवस्थित योजना नहीं थी। प्रतिपूरक वनरोपण निधि अधिनियम, 2016 ने इसे स्थायी विधिक रूप दिया और 2018 के नियमों के साथ वह लागू हुआ। अधिनियम भारत के लोक लेखा में राष्ट्रीय निधि और हर राज्य तथा संघ राज्यक्षेत्र के लोक लेखा में राज्य निधि बनाता है, और दोनों स्तरों पर प्राधिकरण गठित करता है; जमा राशि का 90 प्रतिशत राज्यों को जाता है और 10 प्रतिशत केंद्र के पास रहता है। राष्ट्रीय प्राधिकरण का शासी निकाय केंद्रीय पर्यावरण मंत्री की अध्यक्षता में काम करता है। धन का उपयोग वनरोपण, प्राकृतिक पुनर्जनन, वन्य जीव संरक्षण, वन सुरक्षा, अवसंरचना तथा जल संरक्षण जैसे निर्धारित कार्यों में ही किया जा सकता है, और वह भी स्वीकृत वार्षिक कार्य-योजना के अनुसार।
‘कौन-सी संस्था किस मंत्रालय के अधीन है’ इस प्रश्नपत्र का नियमित प्रकार है, और उसे हल करने का सबसे भरोसेमंद तरीक़ा नाम पर नहीं, विषय पर जाना है : पूछिए कि यह विषय किस अधिनियम से चलता है और वह अधिनियम किस मंत्रालय के पास है। यहाँ विषय वन भूमि का परिवर्तन है, अधिनियम वन (संरक्षण) अधिनियम, 1980 है, और वह पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय के पास है — इसलिए निधि भी वहीं जाएगी। दूसरी बात, इस प्रश्न में एक विशेष जाल है जिसे पहचान लेना चाहिए : रक्षा मंत्रालय इस निधि में पैसा जमा करने वाली संस्थाओं में है, इसलिए उसका नाम विकल्पों में देखकर संबंध तो दिखता है, पर वह संबंध उलटी दिशा का है। किसी निधि में योगदान करना और उसे विनियमित करना दो अलग भूमिकाएँ हैं, और परीक्षा इसी भेद पर प्रश्न बनाती है। तीसरी बात, पर्यावरण से जुड़ी संस्थाओं की एक छोटी सूची बना लेना उपयोगी है — केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड, राष्ट्रीय हरित अधिकरण, राष्ट्रीय जैव विविधता प्राधिकरण, राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण और यह प्राधिकरण — क्योंकि इनमें से कुछ मंत्रालय के अधीन हैं, कुछ विधि द्वारा स्थापित स्वतंत्र निकाय हैं, और यही भेद प्रश्न का आधार बनता है।
- प्रतिपूरक वनरोपण निधि पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय के अधीन गठित प्राधिकरण द्वारा विनियमित होती है; राष्ट्रीय प्राधिकरण का शासी निकाय केंद्रीय पर्यावरण मंत्री की अध्यक्षता में काम करता है।
- निधि का स्रोत वन (संरक्षण) अधिनियम, 1980 है : वन भूमि को ग़ैर-वानिकी प्रयोजन के लिए परिवर्तित करने की अनुमति के साथ उपयोगकर्ता संस्था को प्रतिपूरक वनरोपण की लागत तथा वन की पारिस्थितिक सेवाओं का शुद्ध वर्तमान मूल्य चुकाना पड़ता है।
- स्थायी विधिक ढाँचा प्रतिपूरक वनरोपण निधि अधिनियम, 2016 से बना, जो 2018 के नियमों के साथ लागू हुआ; उससे पहले यह धन उच्चतम न्यायालय के निर्देश पर बने तदर्थ प्राधिकरण के पास रहता था।
- अधिनियम ने भारत के लोक लेखा में राष्ट्रीय निधि और प्रत्येक राज्य तथा संघ राज्यक्षेत्र के लोक लेखा में राज्य निधि स्थापित की, और दोनों स्तरों पर प्राधिकरण गठित किए।
- जमा राशि का 90 प्रतिशत राज्यों को जाता है और 10 प्रतिशत राष्ट्रीय निधि में रहता है।
- धन का उपयोग वनरोपण, प्राकृतिक पुनर्जनन, वन्य जीव संरक्षण, वन सुरक्षा, अवसंरचना तथा जल संरक्षण जैसे निर्धारित कार्यों में स्वीकृत कार्य-योजना के अनुसार ही किया जा सकता है।
- रक्षा मंत्रालय जैसी उपयोगकर्ता संस्थाएँ इस निधि में धन जमा करती हैं, पर किसी निधि में योगदान करना उसे विनियमित करने के बराबर नहीं है।
- ‘वनरोपण’ शब्द सुनकर विषय को कृषि मंत्रालय से जोड़ लेना; वन भूमि का परिवर्तन और प्रतिपूरक वनरोपण वन (संरक्षण) अधिनियम, 1980 के अधीन आते हैं।
- निधि में योगदान करने वाले मंत्रालय को उसका नियामक मान लेना; रक्षा मंत्रालय उपयोगकर्ता संस्था है, प्राधिकरण नहीं।
- अधिनियम का वर्ष भूल जाना; निधि अधिनियम 2016 का है और नियम 2018 के, जबकि मूल वन संरक्षण अधिनियम 1980 का है।
- 90 और 10 प्रतिशत का बँटवारा उलट देना; बड़ा हिस्सा राज्यों को जाता है, केंद्र के पास दसवाँ भाग रहता है।
- निधियों की जगह भूल जाना; ये लोक लेखा में रखी गई हैं, संचित निधि में नहीं।
पर्यावरण से जुड़े संस्थागत प्रश्न इस प्रश्नपत्र में नियमित हैं और तीन रूप लेते हैं। पहला रूप यही है — किसी निधि, प्राधिकरण या कार्यक्रम का नाम देकर उसका मंत्रालय पूछना। दूसरा रूप विधिक है : कोई संस्था किस अधिनियम से बनी है, वह वैधानिक है या कार्यकारी, और उसके अधिकार क्या हैं। तीसरा रूप संख्यात्मक या प्रक्रियात्मक है — किस अनुपात में धन बँटता है, निधि कहाँ रखी जाती है, अनुमति कौन देता है। तीनों की तैयारी के लिए एक तालिका बना लीजिए जिसमें संस्था का नाम, उसका अधिनियम और वर्ष, उसका मंत्रालय, और एक विशिष्ट तथ्य लिखा हो — जैसे यहाँ 90 और 10 का बँटवारा। यही तालिका इसी प्रश्नपत्र के प्रदूषण, वन तथा जलवायु से जुड़े दूसरे प्रश्नों में भी काम आती है, इसलिए उस पर लगाया गया समय एक अंक से अधिक लौटाता है।
इस प्रश्न से सीधे संबंधित कोई पूर्व PYQ उपलब्ध नहीं।
- practice — not a real PYQ
प्रतिपूरक वनरोपण निधि अधिनियम, 2016 के अनुसार निधि में जमा राशि का कितना भाग राज्यों को दिया जाता है?
- (a)50 प्रतिशत
- (b)60 प्रतिशत
- (c)75 प्रतिशत
- (d)90 प्रतिशत
उत्तर(d) 90 प्रतिशत — शेष 10 प्रतिशत राष्ट्रीय निधि में रहता है, जो भारत के लोक लेखा में रखी जाती है, जबकि राज्यों का हिस्सा उनके अपने लोक लेखा की निधियों में जाता है।
- practice — not a real PYQ
किसी वन भूमि को ग़ैर-वानिकी प्रयोजन के लिए परिवर्तित करने हेतु केंद्र सरकार की पूर्व अनुमति किस अधिनियम के अधीन आवश्यक है?
- (a)वन्य जीव (संरक्षण) अधिनियम, 1972
- (b)वन (संरक्षण) अधिनियम, 1980
- (c)पर्यावरण (संरक्षण) अधिनियम, 1986
- (d)जैव विविधता अधिनियम, 2002
उत्तर(b) वन (संरक्षण) अधिनियम, 1980 — यही अधिनियम राज्यों को केंद्र की पूर्व अनुमति के बिना वन भूमि का परिवर्तन करने से रोकता है, और उसी अनुमति की शर्त के रूप में प्रतिपूरक वनरोपण तथा शुद्ध वर्तमान मूल्य की राशि ली जाती है।