राज्य वित्त आयोग के कार्यों के बारे में, निम्नलिखित में से कौन-सा/से कथन सही है/हैं? 1. यह आयोग राज्य में मौजूद स्थानीय शासन संस्थाओं की आर्थिक स्थिति की समीक्षा करता है। 2. यह आयोग ग्रामीण और शहरी स्थानीय शासन संस्थाओं के बीच राजस्व के बँटवारे का पुनरावलोकन करता है। नीचे दिए गए कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिए।
- (a)केवल 1
- (b)केवल 2
- (c)1 और 2 दोनों
- (d)न तो 1 और न ही 2
सही उत्तर — C, (c) 1 और 2 दोनों — राज्य वित्त आयोग स्थानीय निकायों की वित्तीय स्थिति की समीक्षा भी करता है और यह भी तय करता है कि राज्य से मिलने वाला हिस्सा ग्रामीण तथा शहरी निकायों के बीच किस अनुपात में बँटे। पहला क़दम — सांविधानिक आधार देखिए। अनुच्छेद 243-I राज्यपाल पर यह दायित्व डालता है कि वह हर पाँचवें वर्ष एक वित्त आयोग गठित करे, जो पंचायतों की वित्तीय स्थिति की समीक्षा करे और राज्यपाल को इन बातों पर सिफ़ारिश दे — राज्य द्वारा उगाहे जाने वाले करों, शुल्कों, पथकरों तथा फ़ीसों की शुद्ध आय का राज्य और पंचायतों के बीच बँटवारा तथा उस हिस्से का सभी स्तरों की पंचायतों के बीच आवंटन; कौन-से कर पंचायतों को सौंपे जाएँ; राज्य की संचित निधि से सहायता-अनुदान; और पंचायतों की वित्तीय स्थिति सुधारने के उपाय। इसी के साथ अनुच्छेद 243-Y यह कहता है कि 243-I के अधीन गठित वही आयोग नगरपालिकाओं की वित्तीय स्थिति की भी समीक्षा करेगा और उन्हीं शीर्षकों पर सिफ़ारिश देगा। कथन 1 — वित्तीय स्थिति की समीक्षा। यह आयोग का पहला और सबसे स्पष्ट रूप से लिखा हुआ काम है, और वह दोनों प्रकार के निकायों पर लागू होता है — ग्रामीण पर 243-I से और शहरी पर 243-Y से। इसलिए यह कथन सही है। कथन 2 — ग्रामीण तथा शहरी निकायों के बीच राजस्व का बँटवारा। यह भी सही है, और उसका कारण उन्हीं दोनों अनुच्छेदों के जुड़ाव में है। संविधान एक ही आयोग को दोनों काम सौंपता है : पंचायतों की समीक्षा 243-I के अधीन और नगरपालिकाओं की 243-Y के अधीन। इसका सीधा परिणाम यह है कि राज्य के जिस विभाज्य कोष की सिफ़ारिश वह करता है, उसे उसी को ग्रामीण और शहरी निकायों के बीच बाँटना पड़ता है — कोई दूसरी संस्था यह बँटवारा करती ही नहीं। इसीलिए हर राज्य वित्त आयोग के प्रतिवेदन में यह अनुपात स्पष्ट रूप से दिया जाता है, और उसके विचारार्थ विषयों में यह काम नियमित रूप से लिखा जाता है। दोनों कथन सही होने से उत्तर विकल्प (c) है। दो बातें साथ में याद रखने योग्य हैं। पहली, आयोग की सिफ़ारिशें सलाहकारी होती हैं; राज्यपाल उन्हें कृत कार्रवाई के ज्ञापन के साथ राज्य विधान-मंडल के समक्ष रखवाते हैं। दूसरी, इसी आयोग की सिफ़ारिशों के आधार पर केंद्रीय वित्त आयोग यह सुझाता है कि पंचायतों तथा नगरपालिकाओं के संसाधन बढ़ाने के लिए राज्य की संचित निधि को कैसे पूरित किया जाए — यही वह कड़ी है जो राज्य वित्त आयोग को केंद्रीय वित्त आयोग से जोड़ती है।
- (a)केवल 1 — यह विकल्प कथन 1 को स्वीकार करके कथन 2 को छोड़ देता है, और यह इस प्रश्न की सबसे समझ में आने वाली चूक है। कारण यह है कि अनुच्छेद 243-I का पाठ ‘राज्य और पंचायतों के बीच’ बँटवारे की बात करता है, ‘ग्रामीण और शहरी निकायों के बीच’ की नहीं, इसलिए केवल उसी अनुच्छेद को पढ़ने वाले को लगता है कि आयोग का काम वहीं समाप्त हो जाता है। पर तस्वीर का दूसरा आधा 243-Y में है, जो उसी आयोग को नगरपालिकाओं की समीक्षा भी सौंपता है। जब एक ही आयोग दोनों प्रकार के निकायों के लिए सिफ़ारिश कर रहा है, तो राज्य से निकलने वाले कोष को दोनों के बीच बाँटना उसका अपरिहार्य काम बन जाता है, और व्यवहार में हर आयोग यह अनुपात देता भी है। इसलिए यहाँ भूल जानकारी की नहीं, अधूरा पढ़ने की है : 243-I और 243-Y को साथ रखकर पढ़िए, तभी आयोग का पूरा दायरा दिखता है।
- (b)केवल 2 — यह विकल्प कथन 1 को अस्वीकार करता है, जो सबसे कठिन बचाव है, क्योंकि वित्तीय स्थिति की समीक्षा ही वह काम है जिसे संविधान सबसे पहले और सबसे स्पष्ट शब्दों में लिखता है — अनुच्छेद 243-I का पाठ ही आयोग को ‘पंचायतों की वित्तीय स्थिति का पुनर्विलोकन’ करने को कहता है, और 243-Y वही बात नगरपालिकाओं के लिए दोहराता है। समीक्षा के बिना बँटवारा संभव भी नहीं है : आयोग को पहले यह देखना पड़ता है कि निकायों की अपनी आय क्या है, उनके दायित्व क्या हैं और कितनी कमी बची है, तभी वह हिस्सा और अनुदान सुझा सकता है। इसलिए यह विकल्प आयोग की कार्य-पद्धति के क्रम को ही उलट देता है। ऐसे कथन-आधारित प्रश्नों में यह जाँच उपयोगी होती है कि क्या कोई कथन दूसरे कथन की पूर्वशर्त है; यदि हो, तो उसे अस्वीकार करके दूसरे को स्वीकार करना तर्क से ही नहीं बनता।
- (d)न तो 1 और न ही 2 — यह विकल्प दोनों कथनों को नकारता है और प्रायः उस अभ्यर्थी की ओर से आता है जो राज्य वित्त आयोग को किसी दूसरी संस्था से मिला बैठता है। दो भ्रम सबसे आम हैं। पहला, इसे केंद्रीय वित्त आयोग समझ लेना, जो अनुच्छेद 280 के अधीन राष्ट्रपति द्वारा गठित होता है और संघ तथा राज्यों के बीच बँटवारे की सिफ़ारिश करता है; राज्य वित्त आयोग उससे अलग है और राज्यपाल द्वारा गठित होता है। दूसरा, इसे राज्य निर्वाचन आयोग समझ लेना, जो अनुच्छेद 243-K तथा 243-ZA के अधीन आता है और जिसका काम स्थानीय निकायों के चुनाव कराना है, वित्त से उसका कोई संबंध नहीं। नामों की यह समानता ही इस अध्याय का सबसे बड़ा जाल है, इसलिए तीनों संस्थाओं को उनके अनुच्छेद, गठनकर्ता और काम के साथ अलग-अलग लिख लेना चाहिए।
73वें तथा 74वें संविधान संशोधनों ने पंचायतों और नगरपालिकाओं को सांविधानिक दर्जा तो दे दिया, पर दर्जे के साथ पैसा अपने आप नहीं आता; इसीलिए उन्हीं संशोधनों ने हर राज्य में एक स्थायी वित्तीय व्यवस्था भी खड़ी की। अनुच्छेद 243-I के अनुसार राज्यपाल हर पाँचवें वर्ष एक वित्त आयोग गठित करेंगे, जो पंचायतों की वित्तीय स्थिति का पुनर्विलोकन करेगा और चार बातों पर सिफ़ारिश देगा : राज्य के करों, शुल्कों, पथकरों तथा फ़ीसों की शुद्ध आय का राज्य और पंचायतों के बीच बँटवारा तथा उसका सभी स्तरों की पंचायतों में आवंटन; कौन-से कर, शुल्क और फ़ीसें पंचायतों को सौंपी जाएँ या उनके द्वारा विनियोजित हों; राज्य की संचित निधि से पंचायतों को सहायता-अनुदान; और पंचायतों की वित्तीय स्थिति सुधारने के उपाय। अनुच्छेद 243-Y यही दायित्व नगरपालिकाओं के लिए उसी आयोग पर डालता है, इसलिए एक ही आयोग ग्रामीण तथा शहरी दोनों निकायों को देखता है और दोनों के बीच का अनुपात भी वही तय करता है। आयोग की संरचना, सदस्यों की अर्हताएँ तथा उनके चयन का ढंग राज्य विधान-मंडल विधि द्वारा तय कर सकता है। सिफ़ारिशें सलाहकारी होती हैं और राज्यपाल उन्हें कृत कार्रवाई के ज्ञापन के साथ विधान-मंडल के समक्ष रखवाते हैं। इसकी एक कड़ी केंद्र तक भी जाती है : अनुच्छेद 280 में जोड़े गए खंडों के अनुसार केंद्रीय वित्त आयोग राज्य वित्त आयोग की सिफ़ारिशों के आधार पर यह सुझाता है कि राज्य की संचित निधि को कैसे पूरित किया जाए ताकि स्थानीय निकायों के संसाधन बढ़ें।
इस प्रश्न में असली परीक्षा यह है कि अभ्यर्थी ने 243-I और 243-Y को साथ पढ़ा है या केवल पहले को। अकेले 243-I पढ़ने पर आयोग का काम राज्य और पंचायतों के बीच के बँटवारे तक सीमित दिखता है, और ग्रामीण-शहरी अनुपात वाला कथन बाहरी लगने लगता है; दोनों अनुच्छेद साथ पढ़ते ही वह अनुपात अपरिहार्य हो जाता है, क्योंकि दोनों प्रकार के निकायों के लिए सिफ़ारिश करने वाली संस्था एक ही है। सांविधानिक विषयों में यह एक सामान्य सबक़ है : किसी संस्था का दायरा प्रायः एक अनुच्छेद में पूरा नहीं लिखा होता, वह दो-तीन अनुच्छेदों के जुड़ाव से बनता है। दूसरी बात, इस अध्याय में नामों की समानता का जाल बहुत गहरा है — केंद्रीय वित्त आयोग, राज्य वित्त आयोग और राज्य निर्वाचन आयोग — इसलिए तीनों को उनके अनुच्छेद, गठनकर्ता और काम के साथ अलग-अलग लिख लेना चाहिए। तीसरी बात, व्यवहार का पक्ष भी उत्तर लिखने में काम आता है : अनेक राज्यों में आयोग समय पर गठित नहीं होते, उनके प्रतिवेदन देर से आते हैं और सिफ़ारिशें आंशिक रूप से ही मानी जाती हैं — यही कारण है कि केंद्रीय वित्त आयोग बार-बार राज्यों से समय पर आयोग गठित करने और प्रतिवेदन पर कार्रवाई करने का आग्रह करते रहे हैं।
- अनुच्छेद 243-I के अनुसार राज्यपाल हर पाँचवें वर्ष एक वित्त आयोग गठित करते हैं, जो पंचायतों की वित्तीय स्थिति का पुनर्विलोकन करता है और राज्यपाल को सिफ़ारिश देता है।
- आयोग की सिफ़ारिशों के चार शीर्षक हैं : राज्य और पंचायतों के बीच करों की शुद्ध आय का बँटवारा तथा सभी स्तरों की पंचायतों में उसका आवंटन; पंचायतों को सौंपे जाने वाले कर, शुल्क और फ़ीसें; राज्य की संचित निधि से सहायता-अनुदान; और वित्तीय स्थिति सुधारने के उपाय।
- अनुच्छेद 243-Y यही दायित्व नगरपालिकाओं के लिए उसी आयोग पर डालता है, इसलिए एक ही आयोग ग्रामीण तथा शहरी दोनों निकायों को देखता है और उनके बीच का अनुपात भी वही तय करता है।
- आयोग की संरचना, सदस्यों की अर्हताएँ तथा उनके चयन का ढंग राज्य विधान-मंडल विधि द्वारा निर्धारित कर सकता है।
- सिफ़ारिशें सलाहकारी होती हैं; राज्यपाल उन्हें कृत कार्रवाई के ज्ञापन के साथ राज्य विधान-मंडल के समक्ष रखवाते हैं।
- अनुच्छेद 280 में 73वें तथा 74वें संशोधनों के बाद जोड़े गए खंडों के अनुसार केंद्रीय वित्त आयोग राज्य वित्त आयोग की सिफ़ारिशों के आधार पर राज्य की संचित निधि को पूरित करने के उपाय सुझाता है।
- इससे मिलते-जुलते नाम वाली दो अन्य संस्थाएँ अलग हैं : केंद्रीय वित्त आयोग अनुच्छेद 280 के अधीन राष्ट्रपति द्वारा गठित होता है, और राज्य निर्वाचन आयोग अनुच्छेद 243-K तथा 243-ZA के अधीन स्थानीय निकायों के चुनाव कराता है।
- केवल अनुच्छेद 243-I पढ़कर आयोग का दायरा तय कर लेना; नगरपालिकाओं वाला आधा हिस्सा 243-Y में है और दोनों साथ पढ़ने पर ही पूरा चित्र बनता है।
- राज्य वित्त आयोग को केंद्रीय वित्त आयोग समझ लेना; पहला राज्यपाल गठित करते हैं और दूसरा राष्ट्रपति।
- राज्य वित्त आयोग को राज्य निर्वाचन आयोग से मिला देना; दूसरा चुनाव कराता है और उसका वित्त से कोई संबंध नहीं।
- आयोग की सिफ़ारिशों को बाध्यकारी मान लेना; वे सलाहकारी हैं और उन पर कार्रवाई का ज्ञापन विधान-मंडल के समक्ष रखा जाता है।
- कथन-आधारित प्रश्न में उस कथन को अस्वीकार कर देना जो दूसरे कथन की पूर्वशर्त है; समीक्षा किए बिना बँटवारे की सिफ़ारिश संभव ही नहीं।
स्थानीय शासन का वित्त इस प्रश्नपत्र में लगातार आता है और उससे प्रश्न तीन रूप लेते हैं। पहला रूप यही कथन-आधारित है : किसी संस्था के कार्यों पर दो-तीन कथन रखकर कूट माँगना, जहाँ एक कथन संविधान के पाठ से थोड़ा आगे जाता दिखता है और यही तय करना होता है कि वह उसके दायरे में आता है या नहीं। दूसरा रूप सीधा तथ्यात्मक है — कौन-सा अनुच्छेद, कौन गठित करता है, कितने वर्ष पर, सिफ़ारिश किसे दी जाती है। तीसरा रूप तुलना का है, जिसमें केंद्रीय वित्त आयोग और राज्य वित्त आयोग के बीच, या राज्य वित्त आयोग और राज्य निर्वाचन आयोग के बीच अंतर पूछा जाता है। तीनों की तैयारी के लिए एक छोटी तालिका पर्याप्त है जिसमें संस्था का नाम, उसका अनुच्छेद, गठनकर्ता, कार्यकाल और मुख्य काम लिखे हों; और उसके नीचे 243-I तथा 243-Y के चार-चार शीर्षक बिंदुवार उतार लेने चाहिए, क्योंकि प्रश्न प्रायः उन्हीं शीर्षकों में से किसी एक को उठाकर बनाया जाता है।
इस प्रश्न से सीधे संबंधित कोई पूर्व PYQ उपलब्ध नहीं।
- practice — not a real PYQ
राज्य वित्त आयोग का गठन किसके द्वारा किया जाता है?
- (a)मुख्यमंत्री द्वारा
- (b)राज्यपाल द्वारा
- (c)राष्ट्रपति द्वारा
- (d)केंद्रीय वित्त आयोग द्वारा
उत्तर(b) राज्यपाल द्वारा — अनुच्छेद 243-I राज्यपाल पर यह दायित्व डालता है कि वे हर पाँचवें वर्ष वित्त आयोग गठित करें; केंद्रीय वित्त आयोग अनुच्छेद 280 के अधीन राष्ट्रपति गठित करते हैं।
- practice — not a real PYQ
भारत के संविधान का कौन-सा अनुच्छेद यह उपबंध करता है कि अनुच्छेद 243-I के अधीन गठित वित्त आयोग नगरपालिकाओं की वित्तीय स्थिति की भी समीक्षा करेगा?
- (a)अनुच्छेद 243-K
- (b)अनुच्छेद 243-W
- (c)अनुच्छेद 243-Y
- (d)अनुच्छेद 243-ZD
उत्तर(c) अनुच्छेद 243-Y — यही उपबंध उसी आयोग को नगरपालिकाओं की समीक्षा भी सौंपता है, जिससे ग्रामीण तथा शहरी निकायों के बीच का बँटवारा भी उसी के दायरे में आ जाता है। 243-K राज्य निर्वाचन आयोग से, 243-W नगरपालिकाओं की शक्तियों से और 243-ZD ज़िला योजना समिति से संबंधित है।