भारत में ‘स्थानीय शासन’ के बारे में, थुंगन समिति ने निम्नलिखित में से कौन-सी संस्तुति/संस्तुतियाँ की थी/थीं? 1. सांविधानिक दर्जा 2. तीन वर्षों का कार्यकाल नीचे दिए गए कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिए।
- (a)केवल 1
- (b)केवल 2
- (c)1 और 2 दोनों
- (d)न तो 1 और न ही 2
सही उत्तर — A, (a) केवल 1 — थुंगन समिति ने स्थानीय निकायों को सांविधानिक दर्जा देने की संस्तुति अवश्य की थी, पर कार्यकाल तीन वर्ष का नहीं, पाँच वर्ष का सुझाया था। पहले समिति को उसकी जगह पर रखिए। पी० के० थुंगन की अध्यक्षता में यह उपसमिति 1988 में संसद की परामर्शदात्री समिति के अधीन बनी थी, और उसे यह देखने को कहा गया था कि ज़िला स्तर पर राजनीतिक तथा प्रशासनिक ढाँचा कैसा हो ताकि ज़िला योजना ठीक से बन सके। उस समय तक पंचायती राज संस्थाओं की सबसे बड़ी शिकायत यह थी कि वे राज्य सरकार की मर्ज़ी पर टिकी हैं — जब चाहे भंग कर दी जाएँ, जब चाहे चुनाव टाल दिए जाएँ — और इसी शिकायत का उत्तर समिति ने सांविधानिक दर्जे के रूप में दिया। कथन 1 — सांविधानिक दर्जा। यह ठीक है। समिति ने स्पष्ट संस्तुति की कि पंचायती राज संस्थाओं को संविधान में मान्यता दी जाए, ताकि उनका अस्तित्व और उनके नियमित चुनाव राज्य सरकार की इच्छा पर निर्भर न रहें। ध्यान रहे कि यही बात 1986 की एल० एम० सिंघवी समिति भी कह चुकी थी, इसलिए सांविधानिक दर्जे की संस्तुति किसी एक समिति की अनन्य पहचान नहीं है; परीक्षा में यह मान लेना कि ‘सांविधानिक दर्जा तो सिंघवी ने कहा था, इसलिए थुंगन ने नहीं कहा होगा’ सबसे आम भूल है। कथन 2 — तीन वर्षों का कार्यकाल। यह ठीक नहीं है। समिति ने पंचायती राज निकायों के लिए निश्चित कार्यकाल की संस्तुति तो की, पर वह पाँच वर्ष का था, तीन का नहीं। यही पाँच वर्ष आगे चलकर 73वें संविधान संशोधन, 1992 में अनुच्छेद 243-E के रूप में दर्ज हुआ, जो हर पंचायत का कार्यकाल पाँच वर्ष तय करता है, कार्यकाल पूरा होने से पहले चुनाव कराना अनिवार्य बनाता है, और भंग होने की स्थिति में छह महीने के भीतर चुनाव माँगता है। अर्थात् यह संख्या इस पूरी सुधार-कथा में एक ही रही है, और ‘तीन वर्ष’ कहीं से नहीं आती। इसलिए केवल कथन 1 सही है और उत्तर विकल्प (a) है। समिति की अन्य प्रमुख संस्तुतियाँ भी इसी के साथ याद रखने योग्य हैं : गाँव, प्रखंड और ज़िला — तीनों स्तरों वाली एकसमान व्यवस्था; ज़िला परिषद को पूरे ढाँचे की धुरी तथा ज़िले की योजना और विकास की संस्था बनाना; अनुसूचित जातियों, अनुसूचित जनजातियों तथा महिलाओं के लिए आरक्षण; धन के बँटवारे के लिए राज्य वित्त आयोग; और ज़िला परिषद के मुख्य कार्यपालक अधिकारी के रूप में ज़िलाधीश।
- (b)केवल 2 — यह विकल्प दो बार चूकता है। पहली चूक यह है कि यह कथन 1 को अस्वीकार करता है, जबकि सांविधानिक दर्जे की संस्तुति थुंगन समिति की सबसे प्रसिद्ध संस्तुति ही है और वही आगे चलकर 73वें संशोधन का आधार बनी। दूसरी चूक यह है कि यह कथन 2 को स्वीकार करता है, जबकि समिति ने तीन वर्ष का नहीं, पाँच वर्ष का कार्यकाल सुझाया था। इस विकल्प तक वह अभ्यर्थी पहुँचता है जो सांविधानिक दर्जे को केवल सिंघवी समिति से जोड़कर याद रखता है और इसलिए मान लेता है कि थुंगन ने वह बात कही ही नहीं होगी। इस भ्रम से बचने का तरीक़ा यह है कि इन समितियों को ‘किसने क्या अकेले कहा’ की तरह नहीं, ‘किस-किस ने यही बात दोहराई’ की तरह पढ़ा जाए — सांविधानिक दर्जे की माँग एक से अधिक समितियों ने की थी, और इसी बार-बार दोहराए जाने से वह संशोधन तक पहुँची।
- (c)1 और 2 दोनों — यह इस प्रश्न का सबसे ललचाने वाला विकल्प है, क्योंकि इसका आधा हिस्सा ठीक है : कथन 1 सचमुच सही है। इसे चुनने वाला अभ्यर्थी यह याद रखता है कि समिति ने निश्चित कार्यकाल की संस्तुति की थी, पर वर्षों की संख्या उसके ध्यान में नहीं रहती और वह मान लेता है कि जो लिखा है वही होगा। संख्या पाँच है, तीन नहीं, और यही संख्या पूरे सुधार-क्रम में लगातार चलती है — समिति की संस्तुति में भी, और 73वें संशोधन के अनुच्छेद 243-E में भी। कथन-आधारित प्रश्नों की यह बनावट बहुत आम है : पहला कथन सही रखकर दूसरे में केवल एक संख्या या एक तिथि बदल दी जाती है, ताकि आधी जानकारी वाला अभ्यर्थी ‘दोनों सही’ चुन ले। बचाव का एक ही उपाय है — हर कथन को अलग-अलग तौलिए, और जिस कथन में कोई संख्या हो उसे विशेष सावधानी से पढ़िए।
- (d)न तो 1 और न ही 2 — यह विकल्प दोनों कथनों को नकारता है, इसलिए कथन 2 पर तो ठीक बैठता है पर कथन 1 पर बुरी तरह चूक जाता है। सांविधानिक दर्जे की संस्तुति इस समिति की पहचान है, और उसे नकारना पूरी सुधार-कथा को नकारने जैसा है : 1988 में थुंगन तथा गाडगिल दोनों समितियों की संस्तुतियों ने मिलकर 64वें संविधान संशोधन विधेयक की ज़मीन तैयार की, जो लोक सभा में पारित होकर राज्य सभा में गिर गया, और उसी विचार ने आगे चलकर 1992 के 73वें संशोधन का रूप लिया। ‘न तो 1 और न ही 2’ वाला विकल्प प्रायः उस अभ्यर्थी को खींचता है जिसे समिति का नाम ही अपरिचित लगता है और जो सुरक्षित लगने वाला सबसे नकारात्मक उत्तर चुन लेता है। ऐसे प्रश्नों में यह याद रखना उपयोगी है कि जिन समितियों के नाम पूछे जाते हैं वे प्रायः इसीलिए पूछी जाती हैं कि उनकी कोई एक संस्तुति आगे चलकर क़ानून बन गई।
पंचायती राज को संविधान में जगह दिलाने की कथा लगभग चार दशक लंबी है और उसमें कई समितियाँ एक के बाद एक वही माँग दोहराती हैं। बलवंत राय मेहता समिति (1957) ने त्रि-स्तरीय व्यवस्था और ‘लोकतांत्रिक विकेंद्रीकरण’ की नींव रखी। अशोक मेहता समिति (1977) ने द्वि-स्तरीय ढाँचे — ज़िला परिषद और मंडल पंचायत — की संस्तुति की और साथ ही सांविधानिक संरक्षण की माँग उठाई। जी० वी० के० राव समिति (1985) ने पाया कि विकास का प्रशासन पंचायतों से कटकर नौकरशाही में चला गया है और ज़िले को विकास का केंद्र बनाने को कहा। एल० एम० सिंघवी समिति (1986) ने पंचायती राज को संविधान में मान्यता देने, ग्राम सभा को लोकतंत्र का आधार मानने और न्याय पंचायतों की स्थापना की संस्तुति की। थुंगन समिति (1988) ने सांविधानिक दर्जा, एकसमान त्रि-स्तरीय ढाँचा, ज़िला परिषद को धुरी बनाना, पाँच वर्ष का निश्चित कार्यकाल, आरक्षण और राज्य वित्त आयोग की बात कही। उसी वर्ष की गाडगिल समिति ने भी सांविधानिक दर्जा और पाँच वर्ष का कार्यकाल सुझाया, और उसकी संस्तुतियों से 64वाँ संविधान संशोधन विधेयक तैयार हुआ, जो लोक सभा में पारित होने के बाद राज्य सभा में गिर गया। अंततः 73वाँ संविधान संशोधन अधिनियम, 1992 पारित हुआ और 24 अप्रैल 1993 से लागू हुआ, जिसने भाग IX तथा ग्यारहवीं अनुसूची जोड़कर इन सारी माँगों को क़ानूनी रूप दे दिया।
इस अध्याय में परीक्षा दो ही तरह से चूक कराती है, और दोनों इसी प्रश्न में मौजूद हैं। पहली, वह किसी संस्तुति को ग़लत समिति से जोड़ देती है; दूसरी, वह संस्तुति सही रखकर उसकी संख्या बदल देती है। पहली चूक से बचने का तरीक़ा यह है कि हर समिति के साथ एक ‘पहचान वाली संस्तुति’ याद रखी जाए — बलवंत राय मेहता के साथ त्रि-स्तरीय ढाँचा, अशोक मेहता के साथ द्वि-स्तरीय ढाँचा और मंडल पंचायत, जी० वी० के० राव के साथ ज़िला-केंद्रित विकास प्रशासन, सिंघवी के साथ ग्राम सभा तथा न्याय पंचायत, थुंगन के साथ ज़िला परिषद को धुरी बनाना — और साथ ही यह भी याद रखा जाए कि सांविधानिक दर्जे की माँग अनेक समितियों में साझी है। दूसरी चूक से बचने का तरीक़ा यह है कि कुछ संख्याएँ अलग से याद कर ली जाएँ : कार्यकाल पाँच वर्ष, भंग होने पर छह महीने के भीतर चुनाव, राज्य वित्त आयोग हर पाँच वर्ष पर, ग्यारहवीं अनुसूची में 29 विषय और बारहवीं में 18। इस प्रश्नपत्र में स्थानीय शासन और वित्त आयोग से जुड़े प्रश्न लगातार आते हैं, इसलिए ये संख्याएँ बार-बार काम आती हैं। एक व्यावहारिक सुझाव : समितियों को उनके वर्ष के क्रम में एक पंक्ति में लिख लीजिए, क्योंकि प्रश्न प्रायः यह भी पूछते हैं कि कौन-सी समिति पहले आई।
- थुंगन समिति 1988 में पी० के० थुंगन की अध्यक्षता में संसद की परामर्शदात्री समिति की उपसमिति के रूप में बनी और उसे ज़िला स्तर के राजनीतिक तथा प्रशासनिक ढाँचे की जाँच सौंपी गई थी।
- समिति ने पंचायती राज संस्थाओं को सांविधानिक दर्जा देने की संस्तुति की — यही कथन 1 है और यही सही है।
- समिति ने निश्चित कार्यकाल की संस्तुति पाँच वर्ष की की थी, तीन वर्ष की नहीं; इसलिए कथन 2 ग़लत है।
- समिति की अन्य संस्तुतियाँ : गाँव, प्रखंड और ज़िला — तीनों स्तरों वाली एकसमान व्यवस्था; ज़िला परिषद को पूरे ढाँचे की धुरी तथा ज़िले की योजना और विकास की संस्था बनाना; अनुसूचित जातियों, अनुसूचित जनजातियों तथा महिलाओं के लिए आरक्षण; राज्य वित्त आयोग; और ज़िला परिषद का मुख्य कार्यपालक अधिकारी ज़िलाधीश।
- पाँच वर्ष का कार्यकाल आगे चलकर 73वें संविधान संशोधन, 1992 के अनुच्छेद 243-E में दर्ज हुआ, जो कार्यकाल पूरा होने से पहले चुनाव और भंग होने पर छह महीने के भीतर चुनाव अनिवार्य बनाता है।
- सांविधानिक दर्जे की माँग थुंगन समिति से पहले 1986 की एल० एम० सिंघवी समिति भी कर चुकी थी, इसलिए वह किसी एक समिति की अनन्य पहचान नहीं है।
- 1988 की गाडगिल समिति की संस्तुतियों से 64वाँ संविधान संशोधन विधेयक बना, जो लोक सभा में पारित होकर राज्य सभा में गिर गया; अंततः 73वाँ संशोधन 1992 में पारित हुआ और 24 अप्रैल 1993 से लागू हुआ।
- सांविधानिक दर्जे की संस्तुति को केवल एक ही समिति से जोड़ लेना; सिंघवी और थुंगन दोनों ने यह माँग की थी।
- कार्यकाल की संख्या बदल देना; इस पूरे सुधार-क्रम में संख्या पाँच है, और वही अनुच्छेद 243-E में दर्ज है।
- थुंगन समिति को अशोक मेहता समिति से मिला देना; अशोक मेहता ने द्वि-स्तरीय ढाँचा सुझाया था, जबकि थुंगन ने त्रि-स्तरीय।
- कथन-आधारित प्रश्न में एक कथन सही देखकर ‘दोनों सही’ चुन लेना; ऐसी बनावट में दूसरा कथन प्रायः केवल एक संख्या बदलकर ग़लत किया जाता है।
- 64वें संशोधन विधेयक और 73वें संशोधन अधिनियम को एक मान लेना; पहला राज्य सभा में गिर गया था, दूसरा पारित होकर लागू हुआ।
स्थानीय शासन इस प्रश्नपत्र के राजव्यवस्था खंड का नियमित विषय है और उससे प्रश्न तीन रूपों में आते हैं। पहला रूप यही कथन-आधारित है : किसी समिति या किसी संशोधन के बारे में दो-तीन कथन देकर कूट से उत्तर पूछना, जहाँ एक कथन प्रायः संख्या बदलकर ग़लत किया जाता है। दूसरा रूप सुमेलन का है — समिति और उसकी संस्तुति, या अनुच्छेद और उसका विषय, दो सूचियों में मिलाना। तीसरा रूप सीधा तथ्यात्मक है : कौन-सा अनुच्छेद कार्यकाल तय करता है, ग्यारहवीं अनुसूची में कितने विषय हैं, राज्य वित्त आयोग कितने वर्ष पर गठित होता है। तीनों की तैयारी के लिए दो पन्ने पर्याप्त हैं — एक पर समितियाँ वर्ष के क्रम में अपनी पहचान वाली संस्तुति के साथ, और दूसरे पर भाग IX के अनुच्छेद अपने विषय के साथ। इसी प्रश्नपत्र में राज्य वित्त आयोग तथा ज़िला योजना समिति पर भी प्रश्न हैं, इसलिए यह तैयारी एक से अधिक अंक देती है।
इस प्रश्न से सीधे संबंधित कोई पूर्व PYQ उपलब्ध नहीं।
- practice — not a real PYQ
भारत के संविधान के किस अनुच्छेद में प्रत्येक पंचायत का कार्यकाल पाँच वर्ष निर्धारित किया गया है?
- (a)अनुच्छेद 243-B
- (b)अनुच्छेद 243-D
- (c)अनुच्छेद 243-E
- (d)अनुच्छेद 243-G
उत्तर(c) अनुच्छेद 243-E — यही पंचायतों की अवधि से संबंधित है और वह कार्यकाल पूरा होने से पहले चुनाव तथा भंग होने की स्थिति में छह महीने के भीतर चुनाव अनिवार्य बनाता है। अनुच्छेद 243-B पंचायतों के गठन से, 243-D स्थानों के आरक्षण से और 243-G उनकी शक्तियों तथा उत्तरदायित्वों से संबंधित है।
- practice — not a real PYQ
निम्नलिखित में से किस समिति ने द्वि-स्तरीय पंचायती राज व्यवस्था — ज़िला परिषद तथा मंडल पंचायत — की सिफारिश की थी?
- (a)बलवंत राय मेहता समिति
- (b)अशोक मेहता समिति
- (c)थुंगन समिति
- (d)एल० एम० सिंघवी समिति
उत्तर(b) अशोक मेहता समिति — 1977 की इस समिति ने त्रि-स्तरीय के स्थान पर द्वि-स्तरीय ढाँचे की संस्तुति की, जिसमें ज़िला परिषद और उसके नीचे मंडल पंचायत रखी गई। बलवंत राय मेहता समिति ने त्रि-स्तरीय व्यवस्था सुझाई थी, और थुंगन समिति ने भी एकसमान त्रि-स्तरीय ढाँचे की बात कही।