बरगद के वृक्ष में उसकी वायव (एरियल) शाखाओं से ऊर्ध्वाधर नीचे की ओर लटकी स्तंभ-जैसी संरचनाओं को क्या कहते हैं?
- (a)मूसला जड़ (टैप रूट)
- (b)आरोही मूल (क्लाइंबिंग रूट)
- (c)झकड़ा जड़ (फाइब्रस रूट)
- (d)अवस्तंभ मूल (प्रॉप रूट)
सही उत्तर — D, (d) अवस्तंभ मूल (प्रॉप रूट) — बरगद की क्षैतिज वायव शाखाओं से लटकने वाली ये संरचनाएँ अपस्थानिक जड़ें हैं, जो भूमि तक पहुँचकर मोटी और काष्ठीय होकर स्तंभ का काम करने लगती हैं। पहला क़दम — बनने की प्रक्रिया देखिए, क्योंकि उसी से नाम निकलता है। बरगद की शाखाएँ बहुत दूर तक क्षैतिज फैलती हैं और उनका भार बढ़ता जाता है। उन्हीं शाखाओं से पतली, रस्सी जैसी जड़ें निकलकर सीधे नीचे लटकने लगती हैं और कुछ समय हवा में ही झूलती रहती हैं। जो जड़ें भूमि तक पहुँच जाती हैं वे उसमें धँसकर जल तथा खनिज खींचने लगती हैं और साथ ही मोटी होकर काष्ठीय स्तंभ का रूप ले लेती हैं। इसके बाद उनका मुख्य काम पोषण से अधिक यांत्रिक सहारा देना हो जाता है — वे ऊपर फैली भारी शाखा को नीचे से थाम लेती हैं। सहारा देने वाली इसी अपस्थानिक जड़ को अवस्तंभ मूल कहते हैं। दूसरा क़दम — ‘अपस्थानिक’ शब्द को पकड़िए, क्योंकि यही चारों विकल्पों को अलग करता है। साधारण जड़ भ्रूण के मूलांकुर से निकलती है और आरंभ से ही भूमि में रहती है। अपस्थानिक जड़ मूलांकुर से नहीं, पौधे के किसी दूसरे भाग से निकलती है — तने से, पर्व से, शाखा से या पत्ती से। शाखा से निकलना ही यह बता देता है कि यह जड़ अपस्थानिक होगी, इसलिए वे सारे विकल्प तुरंत बाहर हो जाते हैं जो साधारण जड़-तंत्रों के नाम हैं। तीसरा क़दम — इसी प्रकार की दूसरी सहारा देने वाली जड़ से भेद कर लीजिए, क्योंकि परीक्षा दोनों को आपस में बदलकर पूछती है। मक्का और गन्ने में भी सहारा देने वाली जड़ें होती हैं, पर वे तने के निचले पर्वों से निकलकर तिरछी भूमि में धँसती हैं और अवरंभ मूल कहलाती हैं। भेद निकलने के स्थान का है : बरगद में जड़ें ऊपर वायव शाखाओं से निकलकर लंबवत् नीचे उतरती हैं, मक्का में तने के नीचे के भाग से निकलकर तिरछी जाती हैं। चौथा क़दम — परिणाम देखिए, क्योंकि वह अपने आप में पूछा जाता है। अवस्तंभ मूलों के कारण एक ही बरगद का वृक्ष लगातार फैलता जा सकता है और दूर से देखने पर वह अनेक वृक्षों का झुरमुट जान पड़ता है, जबकि वह एक ही पौधा होता है। हावड़ा के आचार्य जगदीश चंद्र बोस भारतीय वनस्पति उद्यान का विशाल बरगद इसी का सबसे प्रसिद्ध उदाहरण है। बरगद भारत का राष्ट्रीय वृक्ष भी है, और उसका वानस्पतिक नाम फ़ाइकस बेंघालेंसिस है।
- (a)मूसला जड़ (टैप रूट) — मूसला जड़ भ्रूण के मूलांकुर से सीधे बनती है, आरंभ से ही भूमि में लंबवत् नीचे बढ़ती है, और उससे पार्श्व में द्वितीयक तथा तृतीयक जड़ें निकलती हैं। यह द्विबीजपत्री पौधों की विशेषता है — सरसों, चना, गाजर, मूली, शलजम — और इनमें से कई में तो वह भोजन संचित करके फूल भी जाती है। यह विकल्प इसलिए ग़लत है कि मूसला जड़ पौधे के किसी वायव भाग से निकल ही नहीं सकती : उसका जन्मस्थान बीज का मूलांकुर है, और वह अंकुरण के समय ही नीचे की दिशा में निकलती है। बरगद के पौधे में अपने आरंभिक जीवन में मूसला जड़ अवश्य होती है, पर प्रश्न उन संरचनाओं के बारे में है जो ऊपर की शाखाओं से लटककर नीचे आती हैं, और वे मूसला जड़ हो ही नहीं सकतीं। यही ‘जड़ निकली कहाँ से’ वाला प्रश्न इस पूरे अध्याय की सबसे उपयोगी छँटनी है।
- (b)आरोही मूल (क्लाइंबिंग रूट) — आरोही मूल भी अपस्थानिक जड़ें ही हैं और इसीलिए यह विकल्प पहली दृष्टि में ठीक लग सकता है, पर उनका काम और उनकी बनावट दोनों अलग हैं। ये जड़ें आरोही पौधों में तने के पर्वों से निकलती हैं और किसी सहारे को — दीवार, वृक्ष के तने या खंभे को — जकड़ लेती हैं, ताकि दुर्बल तना ऊपर चढ़ सके; मनीप्लांट तथा पान इसके परिचित उदाहरण हैं। ध्यान दीजिए कि वे पकड़ती हैं, थामती नहीं : वे पौधे को ऊपर की ओर चिपकाए रखती हैं, नीचे से उसका भार नहीं उठातीं, और वे कभी मोटी होकर काष्ठीय स्तंभ नहीं बनतीं। बरगद की जड़ें इसके ठीक उलट काम करती हैं — वे किसी सहारे को नहीं पकड़तीं, स्वयं सहारा बन जाती हैं। इसलिए दिशा और प्रयोजन दोनों यहाँ मेल नहीं खाते।
- (c)झकड़ा जड़ (फाइब्रस रूट) — झकड़ा जड़ें एकबीजपत्री पौधों की पहचान हैं — गेहूँ, धान, घास, मक्का। इनमें अंकुरण के समय निकली मूल जड़ अल्पजीवी होती है और उसके स्थान पर तने के आधार से पतली, लगभग बराबर मोटाई वाली अनेक जड़ों का गुच्छा निकल आता है, जो मिट्टी की ऊपरी परत में फैलकर उसे बाँधे रखता है। ये जड़ें अपस्थानिक तो होती हैं, पर उनका काम अवशोषण और मिट्टी को थामना है, सहारा देना नहीं, और वे न मोटी होती हैं न काष्ठीय। बरगद की लटकती संरचनाएँ इसके ठीक विपरीत हैं : वे थोड़ी-सी होती हैं, ऊपर से नीचे आती हैं, और समय के साथ इतनी मोटी हो जाती हैं कि उन्हें अलग से तना समझ लिया जाता है। इस विकल्प की उपयोगिता यह है कि यह जड़-तंत्र के प्रकार और जड़ के रूपांतरण के बीच का भेद याद दिला देता है — पहला यह बताता है कि जड़ें कैसे व्यवस्थित हैं, दूसरा यह कि कोई जड़ किसी विशेष काम के लिए किस रूप में ढल गई है।
जड़-तंत्र दो प्रकार का होता है। मूसला जड़-तंत्र भ्रूण के मूलांकुर से बनता है, जिसमें एक प्रमुख जड़ नीचे जाती है और उससे पार्श्व शाखाएँ निकलती हैं; यह द्विबीजपत्री पौधों की विशेषता है। झकड़ा जड़-तंत्र में मूल जड़ अल्पजीवी होती है और तने के आधार से पतली जड़ों का गुच्छा निकल आता है; यह एकबीजपत्री पौधों की विशेषता है। जो जड़ें मूलांकुर के अतिरिक्त किसी अन्य भाग से निकलती हैं वे अपस्थानिक कहलाती हैं, और जड़ों के अधिकांश रूपांतरण इन्हीं में मिलते हैं। सहारा देने वाले रूपांतरण दो हैं : अवस्तंभ मूल, जो बरगद जैसी वायव शाखाओं से लटककर भूमि में धँसती और मोटी होकर स्तंभ बन जाती हैं; और अवरंभ मूल, जो मक्का तथा गन्ने में तने के निचले पर्वों से निकलकर तिरछी भूमि में जाती हैं। श्वसन के लिए रूपांतरण न्यूमैटोफ़ोर है, जो राइज़ोफ़ोरा जैसे लवणमृदोद्भिद पौधों में दलदली भूमि से ऊपर की ओर निकलकर वायु से ऑक्सीजन लेती हैं। भोजन संचय के लिए मूसला जड़ें ही फूलकर तर्कुरूप (मूली), कुंभीरूप (शलजम) या शंकुरूप (गाजर) हो जाती हैं, जबकि शकरकंद में अपस्थानिक जड़ें ही कंदिल हो जाती हैं। इनके अतिरिक्त फलीदार पौधों की ग्रंथिमय जड़ें नाइट्रोजन स्थिरीकरण करती हैं, अमरबेल जैसी परजीवी लताओं की चूषकांग जड़ें पोषक पौधे से रस खींचती हैं, और वांडा जैसे अधिपादपों की जड़ें वायु से नमी सोखती हैं।
यह प्रश्न इस बात की अच्छी मिसाल है कि रूपांतरण वाले अध्याय में नाम अकेले काम नहीं आते — काम और स्थान दोनों याद रखने पड़ते हैं। चारों विकल्प जड़ों के ही नाम हैं, इसलिए ‘यह जड़ है’ जानना कुछ नहीं बताता; छाँटने के लिए स्टेम के दो संकेत पढ़ने पड़ते हैं : संरचनाएँ ‘वायव शाखाओं से’ निकल रही हैं, और वे ‘स्तंभ-जैसी’ हैं। पहला संकेत यह तय कर देता है कि जड़ अपस्थानिक है, इसलिए मूसला और झकड़ा दोनों बाहर हो जाते हैं; दूसरा संकेत सहारा देने वाले काम की ओर इशारा करता है, इसलिए पकड़ने वाली आरोही मूल भी बाहर हो जाती है। तैयारी के लिए सबसे कारगर तरीक़ा एक तीन-स्तंभी तालिका है : बाएँ रूपांतरण का नाम, बीच में उसका काम, और दाएँ दो-दो उदाहरण। उसी तालिका में यह भी लिख लीजिए कि जड़ निकलती कहाँ से है, क्योंकि अवस्तंभ और अवरंभ मूल का भेद केवल इसी पर टिकता है और परीक्षा उन्हीं दोनों को आपस में बदलकर पूछती रही है। एक अंतिम सावधानी : जड़-तंत्र के प्रकार और जड़ के रूपांतरण को एक ही सूची में मत मिलाइए — पहला यह बताता है कि पौधे की जड़ें कैसे व्यवस्थित हैं, दूसरा यह कि कोई जड़ किस विशेष काम के लिए ढल गई है, और इस प्रश्न के विकल्पों में दोनों प्रकार जान-बूझकर साथ रखे गए हैं।
- बरगद की वायव शाखाओं से लटककर भूमि तक पहुँचने वाली और वहाँ मोटी तथा काष्ठीय होकर सहारा देने वाली अपस्थानिक जड़ें अवस्तंभ मूल कहलाती हैं।
- अपस्थानिक जड़ वह है जो भ्रूण के मूलांकुर से नहीं, बल्कि पौधे के किसी अन्य भाग — तने, पर्व, शाखा या पत्ती — से निकलती है; जड़ों के अधिकांश रूपांतरण इन्हीं में मिलते हैं।
- मक्का तथा गन्ने में सहारा देने वाली जड़ें तने के निचले पर्वों से निकलकर तिरछी भूमि में धँसती हैं और अवरंभ मूल कहलाती हैं; भेद निकलने के स्थान और दिशा का है।
- अवस्तंभ मूलों के कारण एक ही बरगद बहुत बड़े क्षेत्र में फैल जाता है और वृक्षों के झुरमुट जैसा दिखता है, जबकि वह एक ही पौधा होता है; हावड़ा के आचार्य जगदीश चंद्र बोस भारतीय वनस्पति उद्यान का बरगद इसका प्रसिद्ध उदाहरण है।
- बरगद भारत का राष्ट्रीय वृक्ष है और उसका वानस्पतिक नाम फ़ाइकस बेंघालेंसिस है।
- मूसला जड़-तंत्र मूलांकुर से बनता है और द्विबीजपत्री पौधों की विशेषता है; झकड़ा जड़-तंत्र में मूल जड़ अल्पजीवी होकर तने के आधार से निकले पतली जड़ों के गुच्छे से बदल जाती है और वह एकबीजपत्री पौधों की विशेषता है।
- अन्य प्रमुख रूपांतरण : राइज़ोफ़ोरा में श्वसन के लिए न्यूमैटोफ़ोर, मनीप्लांट तथा पान में पकड़ने के लिए आरोही मूल, फलीदार पौधों में नाइट्रोजन स्थिरीकरण के लिए ग्रंथिमय जड़ें, और अमरबेल में पोषक पौधे से रस खींचने के लिए चूषकांग।
- अवस्तंभ मूल और अवरंभ मूल को एक मान लेना; पहली वायव शाखाओं से लंबवत् उतरती है और दूसरी तने के निचले पर्वों से तिरछी निकलती है।
- आरोही मूल को सहारा देने वाली जड़ मान लेना; वह किसी आधार को पकड़ती है, पौधे का भार नीचे से नहीं उठाती और कभी काष्ठीय स्तंभ नहीं बनती।
- जड़-तंत्र के प्रकार और जड़ के रूपांतरण को एक ही सूची मान लेना; इस प्रश्न के विकल्पों में दोनों प्रकार जान-बूझकर साथ रखे गए हैं।
- यह भूल जाना कि कोई भी जड़ जो शाखा से निकली है वह अपस्थानिक ही होगी; यही एक जाँच दो विकल्पों को तुरंत बाहर कर देती है।
- बरगद के विशाल फैलाव को अनेक वृक्षों का समूह समझ लेना; वह एक ही पौधा होता है, जिसे उसकी अवस्तंभ मूलें फैलने देती हैं।
जड़, तना और पत्ती के रूपांतरण इस प्रश्नपत्र के जीव विज्ञान खंड की सबसे नियमित सामग्री हैं और वे तीन रूपों में पूछे जाते हैं। पहला रूप यही है — किसी संरचना का वर्णन देकर उसका नाम पूछना, जहाँ स्टेम में दो संकेत छिपे रहते हैं : संरचना निकलती कहाँ से है और करती क्या है। दूसरा रूप उदाहरण का है : किसी पौधे का नाम देकर पूछना कि उसमें कौन-सा रूपांतरण मिलता है, या उलटकर रूपांतरण देकर पौधा पूछना — बरगद, मक्का, राइज़ोफ़ोरा, मनीप्लांट और अमरबेल इस सूची के स्थायी नाम हैं। तीसरा रूप सुमेलन का है, जिसमें रूपांतरण और उदाहरण की दो सूचियाँ मिलानी होती हैं। तीनों के लिए एक ही तैयारी काम आती है : रूपांतरण, उसका काम और दो-दो उदाहरण एक तालिका में लिख लेना, और उसके साथ यह भी दर्ज कर लेना कि जड़ पौधे के किस भाग से निकल रही है।
इस प्रश्न से सीधे संबंधित कोई पूर्व PYQ उपलब्ध नहीं।
- practice — not a real PYQ
मक्का तथा गन्ने में तने के निचले पर्वों से निकलकर तिरछी भूमि में धँसने वाली, सहारा देने वाली जड़ों को क्या कहते हैं?
- (a)अवस्तंभ मूल
- (b)अवरंभ मूल
- (c)श्वसन मूल
- (d)आरोही मूल
उत्तर(b) अवरंभ मूल — इनका काम भी सहारा देना ही है, पर वे तने के निचले पर्वों से निकलकर तिरछी भूमि में जाती हैं, जबकि बरगद की अवस्तंभ मूल ऊपर की वायव शाखाओं से लंबवत् नीचे उतरती है।
- practice — not a real PYQ
राइज़ोफ़ोरा जैसे लवणमृदोद्भिद पौधों में दलदली भूमि से ऊपर की ओर निकलने वाली, श्वसन में सहायक जड़ें क्या कहलाती हैं?
- (a)अवस्तंभ मूल
- (b)न्यूमैटोफ़ोर (श्वसन मूल)
- (c)मूसला जड़
- (d)झकड़ा जड़
उत्तर(b) न्यूमैटोफ़ोर (श्वसन मूल) — दलदली मिट्टी में ऑक्सीजन की कमी होती है, इसलिए ये जड़ें भूमि से ऊपर निकल आती हैं और अपने सूक्ष्म छिद्रों से वायु लेती हैं।