मनुष्य का अक्षि-गोलक तीन परतों का बना है। बाहर से भीतर की ओर परतों का सही अनुक्रम क्या है?
- (a)श्वेतपटल → रक्तक पटल → दृष्टिपटल
- (b)स्वच्छमंडल → रक्तक पटल → दृष्टिपटल
- (c)स्वच्छमंडल → श्वेतपटल → रक्तक पटल
- (d)श्वेतपटल → स्वच्छमंडल → रक्तक पटल
सही उत्तर — A, (a) श्वेतपटल → रक्तक पटल → दृष्टिपटल — नेत्र-गोलक की दीवार बाहर से भीतर की ओर इसी क्रम में तीन परतों की बनी है : तंतुमय परत, संवहनी परत और तंत्रिकीय परत। पहला क़दम — तीनों परतों को उनके काम से पहचानिए, नाम से नहीं। सबसे बाहर तंतुमय परत है, जिसका बड़ा और अपारदर्शी हिस्सा श्वेतपटल (sclera) कहलाता है — सघन संयोजी ऊतक का सफ़ेद आवरण, जो नेत्र-गोलक को आकार देता है, भीतरी कोमल भागों की रक्षा करता है और नेत्र की पेशियों को जुड़ने की जगह देता है। बीच में संवहनी परत है, जिसका पिछला भाग रक्तक पटल (choroid) है — पतली, वर्णक-युक्त और रक्त-वाहिनियों से भरी परत, जो दृष्टिपटल को पोषण देती है और भीतर भटकते हुए प्रकाश को सोखकर प्रतिबिंब धुँधला होने से बचाती है। सबसे भीतर तंत्रिकीय परत है, दृष्टिपटल (retina), जिस पर प्रकाश-ग्राही कोशिकाएँ — शलाका और शंकु — बैठी हैं और जहाँ प्रतिबिंब बनता है। दूसरा क़दम — स्वच्छमंडल वाला जाल पहचानिए, क्योंकि इसी पर तीन असत्य विकल्प खड़े हैं। स्वच्छमंडल (cornea) नेत्र की चौथी परत नहीं है और न कोई अलग परत है : वह उसी बाहरी तंतुमय परत का अगला, पारदर्शी लगभग छठा भाग है और श्वेतपटल से लगातार जुड़ा हुआ है। दोनों एक ही परत के दो हिस्से हैं — आगे का पारदर्शी और पीछे का अपारदर्शी। इसलिए किसी भी ऐसे अनुक्रम में जो नेत्र की तीन परतें गिनाता हो, स्वच्छमंडल और श्वेतपटल दोनों अलग-अलग नामों से नहीं आ सकते, और स्वच्छमंडल अकेले किसी परत का नाम भी नहीं हो सकता। तीसरा क़दम — एक छोटी जाँच से दो विकल्प एक साथ हटा दीजिए। नेत्र का पूरा प्रयोजन ही प्रतिबिंब बनाना है, और वह दृष्टिपटल पर बनता है; इसलिए तीन परतों की कोई भी सूची दृष्टिपटल के बिना पूरी नहीं हो सकती। विकल्प (c) और (d) में दृष्टिपटल है ही नहीं, इसलिए वे पढ़ते ही बाहर हो जाते हैं। शेष दो में भेद केवल पहले नाम का है — श्वेतपटल या स्वच्छमंडल — और ऊपर वाला तर्क वहीं निर्णय कर देता है। चौथा क़दम — संवहनी परत का आगे का हिस्सा भी देख लीजिए, क्योंकि वह अलग से पूछा जाता है। रक्तक पटल आगे बढ़कर पक्ष्माभ काय (ciliary body) बनता है, जो नेत्र-लेंस को निलंबन स्नायुओं से थामे रहता है और उसकी वक्रता बदलकर समंजन करता है, और उससे भी आगे परितारिका (iris) बनता है, जिसके बीच का छिद्र पुतली है और जो भीतर जाने वाले प्रकाश की मात्रा नियंत्रित करती है। इस तरह मध्य परत ही नेत्र का पोषण, प्रकाश-नियंत्रण और समंजन — तीनों काम सँभालती है।
- (b)स्वच्छमंडल → रक्तक पटल → दृष्टिपटल — यह इस प्रश्न का सबसे चतुर विकल्प है, क्योंकि इसमें दूसरा और तीसरा नाम बिलकुल ठीक हैं और भूल केवल पहले नाम की है। सामने से देखने पर सचमुच सबसे पहले स्वच्छमंडल ही मिलता है, इसलिए ‘बाहर से भीतर’ पढ़ते ही उसका नाम सबसे पहले सूझता है। किंतु प्रश्न नेत्र-गोलक की परतों का क्रम पूछ रहा है, और स्वच्छमंडल कोई परत नहीं, बाहरी तंतुमय परत का अगला पारदर्शी भाग है — वही परत जिसका शेष भाग श्वेतपटल कहलाता है, और दोनों एक-दूसरे से लगातार जुड़े हैं। इसके अलावा यह अनुक्रम शरीर-रचना की दृष्टि से भी नहीं बनता : स्वच्छमंडल के ठीक पीछे रक्तक पटल नहीं आता, बल्कि जलीय द्रव, परितारिका और नेत्र-लेंस आते हैं। रक्तक पटल तो नेत्र-गोलक के पिछले भाग में श्वेतपटल के भीतर बैठा है। इसलिए यह विकल्प एक सही चित्र नहीं, दो अलग-अलग रास्तों को जोड़कर बनाया गया चित्र है।
- (c)स्वच्छमंडल → श्वेतपटल → रक्तक पटल — इस विकल्प में दो भूलें एक साथ हैं। पहली, यह स्वच्छमंडल और श्वेतपटल को दो अलग-अलग परतों की तरह एक के बाद एक रख देता है, जबकि वे एक ही बाहरी तंतुमय परत के दो हिस्से हैं — आगे का पारदर्शी और पीछे का अपारदर्शी — और दोनों के बीच कोई भीतर-बाहर का संबंध है ही नहीं; वे एक ही तल में एक-दूसरे से जुड़े हैं। दूसरी और बड़ी भूल यह है कि इसमें दृष्टिपटल आता ही नहीं। दृष्टिपटल के बिना नेत्र की तीन परतों की कोई सूची पूरी नहीं हो सकती, क्योंकि प्रकाश-ग्राही कोशिकाएँ वहीं हैं और प्रतिबिंब भी वहीं बनता है। यही ‘दृष्टिपटल है या नहीं’ वाली एक-पंक्ति जाँच इस विकल्प को और अगले विकल्प को कुछ ही क्षणों में बाहर कर देती है, इसलिए ऐसे अनुक्रम-प्रश्नों में सबसे पहले यही देखना चाहिए कि सूची में सबसे ज़रूरी नाम मौजूद है या नहीं।
- (d)श्वेतपटल → स्वच्छमंडल → रक्तक पटल — यह विकल्प पहला नाम ठीक रखता है — श्वेतपटल — और इसीलिए एक क्षण के लिए भरोसेमंद लगता है, पर उसके तुरंत बाद स्वच्छमंडल को श्वेतपटल के भीतर बैठा देता है, जो शरीर-रचना की दृष्टि से संभव ही नहीं है। स्वच्छमंडल श्वेतपटल के भीतर नहीं, उसके आगे है, और दोनों एक ही परत के हिस्से हैं जो सीमांत (limbus) पर मिलते हैं। इसके साथ यहाँ भी वही दूसरी भूल है जो पिछले विकल्प में थी — दृष्टिपटल का पूरी तरह गायब हो जाना — इसलिए यह अनुक्रम नेत्र की तीन परतों का वर्णन कर ही नहीं सकता। इस विकल्प की उपयोगिता यह है कि यह एक सामान्य आदत की ओर ध्यान खींचता है : अनुक्रम वाले प्रश्नों में पहला नाम मिल जाने पर आगे पढ़ना छोड़ देना। यहाँ पहला नाम सही है और शेष दोनों ग़लत, इसलिए पूरा अनुक्रम पढ़े बिना निर्णय नहीं करना चाहिए।
मनुष्य का नेत्र-गोलक लगभग गोल है और उसकी दीवार तीन संकेंद्री परतों से बनी है। सबसे बाहर तंतुमय परत है : पीछे का बड़ा, अपारदर्शी और सफ़ेद भाग श्वेतपटल कहलाता है और आगे का पारदर्शी लगभग छठा भाग स्वच्छमंडल; दोनों एक ही परत के हिस्से हैं और सीमांत पर मिलते हैं। प्रकाश का सबसे अधिक अपवर्तन इसी स्वच्छमंडल पर होता है, नेत्र-लेंस पर नहीं — लेंस का काम मुख्यतः बारीक समंजन का है। बीच की परत संवहनी है : पीछे रक्तक पटल, जो पोषण देता है और भटकते प्रकाश को सोखता है, और आगे बढ़कर वही परत पक्ष्माभ काय तथा परितारिका बन जाती है। पक्ष्माभ काय नेत्र-लेंस को थामे रहता है और उसकी वक्रता बदलकर पास तथा दूर की वस्तुओं पर फ़ोकस बिठाता है, जिसे समंजन कहते हैं; परितारिका के बीच का छिद्र पुतली है, जो कम प्रकाश में फैलती और तेज़ प्रकाश में सिकुड़ती है। सबसे भीतर दृष्टिपटल है, जिस पर दो प्रकार की प्रकाश-ग्राही कोशिकाएँ हैं — शलाका, जो मंद प्रकाश में देखने का काम करती हैं, और शंकु, जो तेज़ प्रकाश तथा रंग के लिए हैं। दृष्टिपटल पर जहाँ दृक् तंत्रिका बाहर निकलती है वहाँ कोई प्रकाश-ग्राही कोशिका नहीं होती, इसलिए वह अंध बिंदु कहलाता है; और उसके पास पीत बिंदु है, जिसके बीच के गड्ढे में शंकुओं का घनत्व सबसे अधिक होता है और वहीं दृष्टि सबसे तीक्ष्ण होती है। नेत्र-गोलक के भीतर के खोखले भाग जलीय द्रव तथा काचाभ द्रव से भरे रहते हैं, जो आकार बनाए रखते हैं और प्रकाश को आगे बढ़ाते हैं।
इस प्रश्न का पूरा भार एक ही भेद पर है — परत और परत के हिस्से का भेद — इसलिए नाम रटने से यह हल नहीं होता। स्वच्छमंडल हर विकल्प में इसीलिए घुसाया गया है कि वह नेत्र का सबसे परिचित और सबसे आगे दिखाई देने वाला भाग है, और परीक्षार्थी ‘बाहर से भीतर’ पढ़ते ही उसी से शुरू कर देता है। सही चित्र यह है कि आगे से भीतर जाने का रास्ता और गोलक की दीवार की परतें दो अलग-अलग बातें हैं : आगे से भीतर जाइए तो स्वच्छमंडल, जलीय द्रव, पुतली, नेत्र-लेंस, काचाभ द्रव और फिर दृष्टिपटल मिलते हैं; पर दीवार की परतें गिनिए तो केवल तीन हैं — तंतुमय, संवहनी और तंत्रिकीय। एक शब्दावली की टिप्पणी भी उपयोगी है, क्योंकि हिन्दी के ये नाम अपने शाब्दिक अर्थ से भ्रम पैदा कर सकते हैं : ‘स्वच्छमंडल’ का अर्थ ‘पारदर्शी मंडल’ है, इसलिए कई अभ्यर्थी उसे नेत्र-लेंस समझ बैठते हैं, जबकि लेंस अलग संरचना है और परितारिका के पीछे बैठा है; ‘रक्तक पटल’ का अर्थ ‘रक्त वाली परत’ है, जो उसके संवहनी होने की ओर संकेत करता है; और ‘दृष्टिपटल’ का अर्थ ‘देखने का पर्दा’ है, जो ठीक-ठीक उसका काम बताता है। इन तीनों को अंग्रेज़ी नामों के साथ जोड़कर याद कर लेना चाहिए, क्योंकि प्रश्न दोनों भाषाओं में लौटते हैं।
- नेत्र-गोलक की दीवार बाहर से भीतर की ओर तीन परतों की है : तंतुमय परत (श्वेतपटल), संवहनी परत (रक्तक पटल) और तंत्रिकीय परत (दृष्टिपटल)।
- स्वच्छमंडल कोई चौथी परत नहीं है — वह बाहरी तंतुमय परत का अगला पारदर्शी लगभग छठा भाग है और श्वेतपटल से लगातार जुड़ा है; दोनों सीमांत पर मिलते हैं।
- रक्तक पटल दृष्टिपटल को पोषण देता है और भीतर भटकते प्रकाश को सोखता है; आगे बढ़कर वही परत पक्ष्माभ काय तथा परितारिका बन जाती है।
- पक्ष्माभ काय नेत्र-लेंस को निलंबन स्नायुओं से थामे रहता है और उसकी वक्रता बदलकर समंजन करता है; परितारिका के बीच का छिद्र पुतली है, जो प्रकाश की मात्रा नियंत्रित करती है।
- दृष्टिपटल पर शलाका कोशिकाएँ मंद प्रकाश में देखने का और शंकु कोशिकाएँ तेज़ प्रकाश तथा रंग-दृष्टि का काम करती हैं; प्रतिबिंब इसी परत पर बनता है।
- दृक् तंत्रिका के निकलने के स्थान पर कोई प्रकाश-ग्राही कोशिका न होने से वह अंध बिंदु कहलाता है, जबकि पीत बिंदु के बीच के गड्ढे में शंकुओं का घनत्व सर्वाधिक होने से वहीं दृष्टि सबसे तीक्ष्ण होती है।
- प्रकाश का सबसे अधिक अपवर्तन स्वच्छमंडल पर होता है; नेत्र-लेंस का मुख्य काम बारीक समंजन का है, कुल अपवर्तन का नहीं।
- स्वच्छमंडल को नेत्र-गोलक की एक अलग परत मान लेना; वह बाहरी तंतुमय परत का ही अगला पारदर्शी भाग है।
- ‘बाहर से भीतर’ को ‘सामने से पीछे’ पढ़ लेना; दीवार की परतें गिनना और आगे से भीतर जाने का रास्ता गिनना दो अलग बातें हैं।
- ऐसा अनुक्रम चुन लेना जिसमें दृष्टिपटल है ही नहीं; प्रतिबिंब वहीं बनता है, इसलिए तीन परतों की कोई सूची उसके बिना पूरी नहीं हो सकती।
- अनुक्रम वाले प्रश्न में पहला नाम मिलते ही आगे पढ़ना छोड़ देना; यहाँ एक विकल्प का पहला नाम सही है और शेष दोनों ग़लत।
- स्वच्छमंडल को नेत्र-लेंस समझ लेना; शाब्दिक अर्थ ‘पारदर्शी मंडल’ भ्रम पैदा करता है, पर लेंस परितारिका के पीछे की अलग संरचना है।
मानव नेत्र इस प्रश्नपत्र के जीव विज्ञान तथा भौतिकी दोनों खंडों की साझा सामग्री है और तीन रूपों में पूछा जाता है। पहला रूप संरचना का है — परतों का क्रम, किसी भाग का काम, या यह कि कोई संरचना किस परत से बनती है। दूसरा रूप प्रकाशिकी का है : प्रतिबिंब कहाँ और कैसा बनता है, समंजन क्या है, किस दोष में कौन-सा लेंस लगता है और उसकी क्षमता का चिह्न धनात्मक होगा या ऋणात्मक। तीसरा रूप कोशिकीय है — शलाका और शंकु का भेद, वर्णांधता, रतौंधी और विटामिन A। तीनों की तैयारी के लिए नेत्र का एक नामांकित चित्र सामने रखकर उस पर तीन परतें अलग रंग से चिह्नित कर लेना सबसे कारगर है, और चित्र के किनारे यह लिख लेना कि आगे से भीतर जाते हुए कौन-कौन सी संरचनाएँ क्रम से मिलती हैं — क्योंकि परीक्षा इन्हीं दो क्रमों को आपस में उलझाकर पूछती है।
इस प्रश्न से सीधे संबंधित कोई पूर्व PYQ उपलब्ध नहीं।
- practice — not a real PYQ
मनुष्य के नेत्र में किसी वस्तु का प्रतिबिंब किस पर बनता है?
- (a)स्वच्छमंडल पर
- (b)परितारिका पर
- (c)दृष्टिपटल पर
- (d)रक्तक पटल पर
उत्तर(c) दृष्टिपटल पर — यही नेत्र-गोलक की सबसे भीतरी तंत्रिकीय परत है और इसी पर शलाका तथा शंकु कोशिकाएँ बैठी हैं, जो प्रकाश को तंत्रिका संकेत में बदलती हैं।
- practice — not a real PYQ
नेत्र-गोलक की मध्य संवहनी परत आगे की ओर बढ़कर निम्नलिखित में से किन संरचनाओं का रूप ले लेती है?
- (a)श्वेतपटल तथा स्वच्छमंडल
- (b)पक्ष्माभ काय तथा परितारिका
- (c)दृष्टिपटल तथा पीत बिंदु
- (d)नेत्र-लेंस तथा निलंबन स्नायु
उत्तर(b) पक्ष्माभ काय तथा परितारिका — मध्य परत का पिछला भाग रक्तक पटल है और वही आगे बढ़कर पहले पक्ष्माभ काय और फिर परितारिका बनता है; श्वेतपटल तथा स्वच्छमंडल बाहरी परत के हिस्से हैं और दृष्टिपटल सबसे भीतरी परत है।