नीचे एक फर्म के 31-12-2022 को यथास्थिति का शेष-परीक्षण दिखाया गया है : [तालिका — दो राशि-स्तंभ, दोनों का शीर्ष ₹] व्यापार प्राप्य | 25,00,000 | — संदिग्ध ऋणों के लिए प्रावधान | — | 1,40,000 अशोध्य ऋण | 40,000 | — वर्ष के दौरान अतिरिक्त अशोध्य ऋण ₹ 2,00,000 है। इस फर्म की नीति, व्यापार प्राप्य शेष के 10% के बराबर संदिग्ध ऋण के लिए प्रावधान करने की है। लाभ और हानि लेखा (31-12-2022 को समाप्त वर्ष के लिए) में अपलिखित अशोध्य ऋण एवं किए गए प्रावधान के लिए प्रभारित की जाने वाली कुल राशि कितनी होगी?
- (a)₹ 2,50,000
- (b)₹ 1,30,000
- (c)₹ 90,000
- (d)₹ 3,30,000
सही उत्तर — D, (d) ₹ 3,30,000। यह प्रश्न एक ही सूत्र पर टिका है : लाभ और हानि लेखा पर प्रभार = वर्ष के कुल अशोध्य ऋण + नया प्रावधान − पुराना प्रावधान। चार क़दमों में हल कीजिए। पहला, अतिरिक्त अशोध्य ऋण को व्यापार प्राप्य में से घटाइए। शेष-परीक्षण में व्यापार प्राप्य ₹ 25,00,000 हैं और वर्ष के दौरान ₹ 2,00,000 के अतिरिक्त अशोध्य ऋण सामने आए हैं, इसलिए बचे हुए व्यापार प्राप्य 25,00,000 − 2,00,000 = ₹ 23,00,000 हुए। यही वह शेष है जिस पर प्रावधान बनेगा, क्योंकि जो राशि वसूली से बाहर हो चुकी है उस पर संदिग्ध होने का प्रावधान करने का कोई अर्थ नहीं। दूसरा, नया प्रावधान निकालिए। फर्म की नीति व्यापार प्राप्य शेष के 10 प्रतिशत के बराबर प्रावधान रखने की है, अतः नया प्रावधान 23,00,000 का 10 प्रतिशत, अर्थात् ₹ 2,30,000। तीसरा, वर्ष के कुल अशोध्य ऋण जोड़िए। शेष-परीक्षण में ₹ 40,000 पहले से अपलिखित दिखाए गए हैं और ₹ 2,00,000 अतिरिक्त हैं, इसलिए कुल ₹ 2,40,000। ध्यान दीजिए कि दोनों राशियाँ प्रभार में आएँगी — शेष-परीक्षण वाली भी और समायोजन वाली भी। चौथा, पुराना प्रावधान घटाइए। शेष-परीक्षण में संदिग्ध ऋणों के लिए प्रावधान ₹ 1,40,000 जमा पक्ष में है, अर्थात् पिछले वर्ष का प्रावधान अभी शेष है और उतना नए प्रावधान की पूर्ति में काम आ जाएगा। अब जोड़िए : 2,40,000 + 2,30,000 − 1,40,000 = ₹ 3,30,000। यही विकल्प (d) है। इसे लेखा-प्रारूप में लिखना और भी सुरक्षित रहता है — अशोध्य ऋण 2,40,000, जोड़िए नया प्रावधान 2,30,000, घटाइए पुराना प्रावधान 1,40,000 — क्योंकि इस क्रम में कोई मद छूटती नहीं। छपाई की एक बात दर्ज कर लीजिए : पुस्तिका में trial balance के लिए 'शेष-परीक्षण' शब्द प्रयुक्त है, जिसे पाठ्यपुस्तकों में प्रायः तलपट कहा जाता है; तालिका के दोनों राशि-स्तंभों पर केवल ₹ का चिह्न छपा है और उन्हें नाम नहीं दिया गया, यद्यपि वे नामे और जमा के स्तंभ हैं।
- (a)₹ 2,50,000 — यह वह राशि है जो 25,00,000 का 10 प्रतिशत लेने पर मिलती है, अर्थात् वह अभ्यर्थी इस पर पहुँचता है जो अतिरिक्त अशोध्य ऋण घटाए बिना सीधे शेष-परीक्षण वाले व्यापार प्राप्य पर प्रावधान बना देता है — और फिर उसी को उत्तर मान लेता है। इसमें दो भूलें एक साथ हैं। पहली, प्रावधान सदैव उस शेष पर बनता है जो अतिरिक्त अशोध्य ऋण घटाने के बाद बचता है, क्योंकि जो वसूली से बाहर हो चुका है वह अब संदिग्ध नहीं, निश्चित हानि है। दूसरी, प्रश्न प्रावधान की राशि नहीं, बल्कि लाभ और हानि लेखा पर पड़ने वाला कुल प्रभार पूछ रहा है, जिसमें अशोध्य ऋण भी जुड़ते हैं और पुराना प्रावधान घटता है। इस विकल्प में इनमें से कुछ भी नहीं हुआ।
- (b)₹ 1,30,000 — यह राशि तब निकलती है जब अतिरिक्त अशोध्य ऋण को व्यापार प्राप्य में से घटा तो दिया जाए, पर उसे प्रभार में जोड़ना भूल जाया जाए : 40,000 + 2,30,000 − 1,40,000 = 1,30,000। यही इस प्रश्न की सबसे आम भूल है, क्योंकि समायोजन वाली राशि दो जगह काम करती है और अभ्यर्थी उसे केवल एक जगह लगाता है। याद रखिए कि अतिरिक्त अशोध्य ऋण का दोहरा प्रभाव होता है — वे व्यापार प्राप्य को घटाते हैं और साथ ही वर्ष के व्यय में जुड़ते हैं। शेष-परीक्षण में पहले से दिखाए गए अशोध्य ऋण का प्रभाव इसके विपरीत एकल होता है : वे केवल प्रभार में जाते हैं, क्योंकि उन्हें व्यापार प्राप्य में से पहले ही घटाया जा चुका होता है।
- (c)₹ 90,000 — यह केवल प्रावधान में हुई वृद्धि है : नया प्रावधान 2,30,000 में से पुराना प्रावधान 1,40,000 घटाने पर 90,000 बचता है। अर्थात् इस उत्तर में अशोध्य ऋण पूरी तरह छूट गए हैं — न शेष-परीक्षण वाले ₹ 40,000 और न अतिरिक्त ₹ 2,00,000। यह चूक तब होती है जब अभ्यर्थी प्रश्न का केवल अंतिम भाग पढ़ता है और यह मान लेता है कि पूछ प्रावधान से जुड़े समायोजन की है। पूछ के शब्द स्पष्ट हैं : 'अपलिखित अशोध्य ऋण एवं किए गए प्रावधान के लिए प्रभारित की जाने वाली कुल राशि', अर्थात् दोनों मदें सम्मिलित हैं। यह विकल्प इसलिए ख़तरनाक है कि इस तक पहुँचने वाली गणना अपने आप में सही है — केवल अधूरी है।
संदिग्ध ऋणों के लिए प्रावधान विवेक के सिद्धांत का सीधा प्रयोग है : संभावित हानि उसी वर्ष में दर्ज कर ली जाती है जिसमें उसका आभास हो, यद्यपि वह अभी निश्चित नहीं हुई। इसका व्यवहार तीन मदों के आपसी संबंध से समझा जाता है। पहली मद अशोध्य ऋण हैं, जो वसूली से बाहर हो चुकी निश्चित हानि हैं और सीधे व्यय में जाते हैं। दूसरी मद संदिग्ध ऋणों का प्रावधान है, जो बचे हुए व्यापार प्राप्य के एक प्रतिशत के रूप में रखा जाता है। तीसरी मद पिछले वर्ष का प्रावधान है, जो चालू वर्ष के आरंभ में शेष रहता है और नए प्रावधान की पूर्ति में काम आता है। इन्हीं से वह मानक सूत्र बनता है : प्रभार = कुल अशोध्य ऋण + नया प्रावधान − पुराना प्रावधान। यदि पुराना प्रावधान नए से बड़ा हो और अशोध्य ऋण कम हों, तो यह राशि ऋणात्मक भी हो सकती है और तब लाभ और हानि लेखा में उसे आय पक्ष में दिखाया जाता है। यही सूत्र प्रावधान से जुड़े लगभग हर प्रश्न का उत्तर देता है।
इस प्रश्न में एक तालिका छपी है, जिसमें शेष-परीक्षण की तीन पंक्तियाँ दी गई हैं और दोनों राशि-स्तंभों पर केवल ₹ का चिह्न है — नामे और जमा के शीर्षक छपे ही नहीं हैं। इससे घबराने की आवश्यकता नहीं, क्योंकि मदों की प्रकृति स्वयं बता देती है कि कौन-सी राशि किस पक्ष में है : व्यापार प्राप्य और अशोध्य ऋण नामे शेष हैं, और संदिग्ध ऋणों का प्रावधान जमा शेष। यही पहचान इस प्रश्न को हल करने के लिए पर्याप्त है। दूसरी बात क्रम की है : अतिरिक्त अशोध्य ऋण को पहले घटाइए, फिर प्रावधान बनाइए — उलटा करने पर उत्तर सीधे ग़लत विकल्प पर चला जाता है, जो समुच्चय में रखा भी गया है। तीसरी बात पूछ की है : प्रश्न प्रावधान की राशि नहीं, बल्कि लाभ और हानि लेखा पर पड़ने वाला कुल प्रभार पूछता है, इसलिए उत्तर में तीनों मदें आनी चाहिए।
- लाभ और हानि लेखा पर प्रभार = वर्ष के कुल अशोध्य ऋण + नया प्रावधान − पुराना प्रावधान; यही सूत्र इस प्रकार के सभी प्रश्नों की जड़ है।
- यहाँ अतिरिक्त अशोध्य ऋण घटाने के बाद व्यापार प्राप्य 25,00,000 − 2,00,000 = ₹ 23,00,000 बचते हैं, और उसी पर 10 प्रतिशत की दर से नया प्रावधान ₹ 2,30,000 बनता है।
- वर्ष के कुल अशोध्य ऋण ₹ 2,40,000 हैं — शेष-परीक्षण वाले ₹ 40,000 और अतिरिक्त ₹ 2,00,000 — और पुराना प्रावधान ₹ 1,40,000 घटाया जाता है, जिससे प्रभार ₹ 3,30,000 आता है।
- अतिरिक्त अशोध्य ऋण का दोहरा प्रभाव होता है : वे व्यापार प्राप्य घटाते हैं और वर्ष के व्यय में भी जुड़ते हैं; शेष-परीक्षण में दिखाए गए अशोध्य ऋण केवल व्यय में जाते हैं।
- प्रावधान सदैव अतिरिक्त अशोध्य ऋण घटाने के बाद बचे व्यापार प्राप्य पर बनाया जाता है, क्योंकि वसूली से बाहर हो चुकी राशि अब संदिग्ध नहीं, निश्चित हानि है।
- पुस्तिका में trial balance के लिए 'शेष-परीक्षण' शब्द प्रयुक्त है, जिसे पाठ्यपुस्तकों में प्रायः तलपट कहा जाता है; तालिका के दोनों राशि-स्तंभों पर केवल ₹ का चिह्न छपा है और उनके नाम नहीं दिए गए।
- अतिरिक्त अशोध्य ऋण घटाए बिना शेष-परीक्षण वाले व्यापार प्राप्य पर प्रावधान बना देना; प्रावधान बचे हुए शेष पर बनता है।
- अतिरिक्त अशोध्य ऋण को केवल व्यापार प्राप्य में से घटाना और प्रभार में जोड़ना भूल जाना; उसका प्रभाव दोहरा होता है।
- केवल प्रावधान की वृद्धि को उत्तर मान लेना; पूछ अशोध्य ऋण और प्रावधान दोनों के कुल प्रभार की है।
- पुराना प्रावधान घटाना भूल जाना; जमा पक्ष में शेष पुराना प्रावधान नए प्रावधान की पूर्ति में काम आता है।
लेखाशास्त्र के खंड में संख्यात्मक प्रश्न प्रायः इसी साँचे में आते हैं : शेष-परीक्षण की दो-तीन पंक्तियाँ, एक या दो समायोजन, और कोई एक राशि पूछ ली जाती है। ऐसे प्रश्नों में गणना कभी कठिन नहीं होती — प्रतिशत निकालना और जोड़-घटाव — पर विकल्प इस तरह बनाए जाते हैं कि हर आंशिक भूल का अपना एक विकल्प मौजूद रहे। इस प्रश्न में तीनों असत्य विकल्प ठीक इसी तरह बने हैं : एक प्रावधान की ग़लत गणना है, एक अधूरा प्रभार, और एक केवल प्रावधान की वृद्धि। इसलिए तैयारी का सबसे उपयोगी तरीक़ा यह है कि हर समायोजन के दोनों प्रभाव एक साथ लिखने की आदत डाली जाए, और उत्तर लिखने से पहले पूछ के शब्द दोबारा पढ़े जाएँ। इसी प्रश्नपत्र में प्रावधान से जुड़ा एक और प्रश्न निवेश के मूल्य में उतार-चढ़ाव के संदर्भ में है, इसलिए प्रावधान की अवधारणा दोनों जगह काम आती है।
इस प्रश्न से सीधे संबंधित कोई पूर्व PYQ उपलब्ध नहीं।
- practice — not a real PYQ
किसी फर्म के शेष-परीक्षण में व्यापार प्राप्य ₹ 4,20,000, संदिग्ध ऋणों के लिए प्रावधान ₹ 30,000 तथा अशोध्य ऋण ₹ 10,000 हैं। वर्ष के दौरान अतिरिक्त अशोध्य ऋण ₹ 20,000 हैं और फर्म व्यापार प्राप्य शेष के 5% के बराबर प्रावधान रखती है। लाभ और हानि लेखा पर कुल प्रभार कितना होगा?
- (a)₹ 20,000
- (b)₹ 30,000
- (c)₹ 50,000
- (d)₹ 10,000
उत्तर(a) ₹ 20,000 — अतिरिक्त अशोध्य ऋण घटाने पर व्यापार प्राप्य ₹ 4,00,000 बचते हैं और उन पर 5% प्रावधान ₹ 20,000 बनता है; कुल अशोध्य ऋण ₹ 30,000 हैं, इसलिए प्रभार = 30,000 + 20,000 − 30,000 = ₹ 20,000।
- practice — not a real PYQ
जिस फर्म में संदिग्ध ऋणों का प्रावधान व्यापार प्राप्य के प्रतिशत के रूप में रखा जाता है, वहाँ प्रावधान की गणना किस राशि पर की जाती है?
- (a)अतिरिक्त अशोध्य ऋण घटाने के बाद बचे व्यापार प्राप्य पर
- (b)शेष-परीक्षण में दिखाए गए व्यापार प्राप्य पर
- (c)वर्ष के कुल विक्रय पर
- (d)वर्ष के कुल उधार विक्रय पर
उत्तर(a) अतिरिक्त अशोध्य ऋण घटाने के बाद बचे व्यापार प्राप्य पर — जो राशि वसूली से बाहर हो चुकी है वह अब संदिग्ध नहीं, निश्चित हानि है, इसलिए उसे पहले घटाया जाता है और शेष पर प्रावधान बनाया जाता है।