निम्नलिखित में से कौन-सा, लेखाकरण नीतियों के चयन और अनुप्रयोग में प्रमुख विचार-बिंदु नहीं है?
- (a)विवेक
- (b)समनुरूपता
- (c)प्ररूप के बजाय सार
- (d)सारता
सही उत्तर — B, (b) समनुरूपता। पुस्तिका में 'नहीं' मोटे अक्षरों में छपा है, इसलिए पूछ उलटी है : तीन विकल्प प्रमुख विचार-बिंदु हैं और जो एक नहीं है, वही उत्तर है। लेखांकन मानक-1 दो अलग-अलग सूचियाँ देता है और इस प्रश्न की पूरी कठिनाई उन्हें अलग रखने में है। पहली सूची मूलभूत लेखांकन पूर्वधारणाओं की है — सतत व्यापार, समनुरूपता और उपचय। ये वे मान्यताएँ हैं जिनका पालन मान लिया जाता है, इसलिए इन्हें वित्तीय विवरणों में अलग से बताना आवश्यक नहीं होता; किन्तु यदि किसी का पालन न किया गया हो तो उस तथ्य का प्रकटन करना पड़ता है। दूसरी सूची लेखांकन नीतियों के चयन और अनुप्रयोग के प्रमुख विचार-बिंदुओं की है, और उसमें तीन ही आते हैं — विवेक, प्ररूप के बजाय सार, तथा सारता। ये वे कसौटियाँ हैं जिनके आधार पर उद्यम यह तय करता है कि उपलब्ध विकल्पों में से कौन-सी नीति अपनाई जाए। समनुरूपता पहली सूची में आती है, दूसरी में नहीं — और यही प्रश्न का उत्तर है। इसका कारण भी समझने योग्य है : समनुरूपता यह नहीं बताती कि कौन-सी नीति चुनी जाए, वह केवल यह अपेक्षा करती है कि जो नीति एक बार चुन ली गई है वह वर्ष-दर-वर्ष एक-सी रहे, ताकि विभिन्न अवधियों के विवरण तुलनीय बने रहें। अर्थात् वह चयन के बाद की शर्त है, चयन की कसौटी नहीं। नीति बदलनी हो तो परिवर्तन और उसके प्रभाव का प्रकटन आवश्यक होता है। एक भाषिक सावधानी भी दर्ज कर लीजिए, क्योंकि हिन्दी माध्यम में यही सबसे बड़ा जाल है : विकल्प (c) में 'सार' आता है और विकल्प (d) में 'सारता'। दोनों शब्द देखने में लगभग एक जैसे हैं, पर पहला substance है और दूसरा materiality — और दोनों ही प्रमुख विचार-बिंदु हैं, इसलिए जल्दबाज़ी में इन्हें एक मानकर किसी एक को काट देना सीधे ग़लत उत्तर तक ले जाता है।
- (a)विवेक — विवेक लेखांकन नीतियों के चयन के तीन प्रमुख विचार-बिंदुओं में से एक है, इसलिए नकारात्मक पूछ में इसे चुनना भूल होगी। इसका अर्थ यह है कि भविष्य की घटनाओं से जुड़ी अनिश्चितता को देखते हुए लाभ का पूर्वानुमान नहीं किया जाता — लाभ तभी दर्ज होता है जब वह वास्तव में अर्जित हो जाए — जबकि ज्ञात देयताओं और हानियों के लिए प्रावधान कर लिया जाता है, भले ही उनकी राशि निश्चित रूप से न आँकी जा सके। इसी सिद्धांत से संदिग्ध ऋणों का प्रावधान, मालसूची का लागत अथवा शुद्ध प्राप्य मूल्य में से जो कम हो उस पर मूल्यांकन, और आकस्मिक देयताओं का प्रकटन निकलते हैं। इसी प्रश्नपत्र में संदिग्ध ऋणों के प्रावधान पर संख्यात्मक प्रश्न भी है, जो विवेक का सीधा प्रयोग है।
- (c)प्ररूप के बजाय सार — यह भी तीन प्रमुख विचार-बिंदुओं में से एक है और इसलिए उत्तर नहीं हो सकता। इसका अर्थ है कि व्यवहारों का लेखांकन और प्रस्तुतीकरण उनके आर्थिक सार तथा वास्तविकता के अनुसार होना चाहिए, न कि केवल उनके विधिक रूप के अनुसार। सबसे प्रसिद्ध उदाहरण किराया-क्रय का है : वहाँ परिसंपत्ति का विधिक स्वामित्व अंतिम किस्त तक विक्रेता के पास रहता है, फिर भी क्रेता उसे अपनी पुस्तकों में परिसंपत्ति के रूप में दर्ज करता है और उस पर मूल्यह्रास लगाता है, क्योंकि उपयोग और जोखिम उसी के पास हैं। हिन्दी में यह विकल्प 'सार' शब्द से बनता है और अगला विकल्प 'सारता' से — दोनों को एक मान लेना इस प्रश्न की सबसे आम चूक है।
- (d)सारता — सारता भी उन्हीं तीन प्रमुख विचार-बिंदुओं में से एक है। इसका अर्थ है कि वित्तीय विवरणों में उन सभी मदों का प्रकटन होना चाहिए जो इतनी महत्त्वपूर्ण हों कि विवरण पढ़ने वाले के निर्णय को प्रभावित कर सकें; और उलटे, नगण्य मदों पर वही कठोरता लागू करना विवरणों को अनावश्यक रूप से भारी बना देता है। ध्यान दीजिए कि सारता कोई निश्चित सीमा-मान नहीं देती — वह मद के परिमाण और प्रकृति दोनों को देखकर तय होती है, इसलिए किसी छोटे उद्यम के लिए जो राशि सारवान है वह किसी बड़े उद्यम के लिए नगण्य हो सकती है। हिन्दी में यह शब्द 'सार' से मिलता-जुलता है, पर उसका अर्थ substance नहीं, materiality है।
लेखांकन मानक-1 का विषय लेखांकन नीतियों का प्रकटन है और उसकी तीन सूचियाँ अलग-अलग याद रखनी चाहिए। पहली, मूलभूत लेखांकन पूर्वधारणाएँ — सतत व्यापार, समनुरूपता और उपचय — जिनका पालन मान लिया जाता है। दूसरी, नीतियों के चयन और अनुप्रयोग के प्रमुख विचार-बिंदु — विवेक, प्ररूप के बजाय सार, और सारता। तीसरी, वे क्षेत्र जहाँ भिन्न-भिन्न नीतियाँ संभव हैं और इसलिए प्रकटन आवश्यक होता है, जैसे मूल्यह्रास की रीति, मालसूची का मूल्यांकन, विदेशी मुद्रा का रूपांतरण, स्थायी परिसंपत्तियों का मूल्यांकन, निवेश का मूल्यांकन, आस्थगित व्यय का व्यवहार, तथा आकस्मिक देयताएँ। मानक यह भी कहता है कि अपनाई गई महत्त्वपूर्ण नीतियों का प्रकटन एक ही स्थान पर किया जाए, और नीति में परिवर्तन होने पर उसका तथा उसके प्रभाव का प्रकटन किया जाए। इन तीनों सूचियों को अलग रखने भर से इस मानक के अधिकांश प्रश्न हल हो जाते हैं।
नकारात्मक पूछ वाले प्रश्न में सबसे सुरक्षित रीति यह है कि पूछ पढ़ते ही हाशिये पर लिख लिया जाए कि जो सूची में नहीं है वही उत्तर है, और फिर प्रत्येक विकल्प के आगे सही या ग़लत का निशान लगाया जाए। इस प्रश्न में यह रीति तुरंत काम करती है, क्योंकि तीन विकल्प एक ही सूची के हैं और चौथा दूसरी सूची का। कठिनाई केवल तब होती है जब अभ्यर्थी दोनों सूचियों को एक मानकर पढ़ चुका हो — और यही सबसे आम तैयारी-दोष है, क्योंकि समनुरूपता, विवेक और सारता तीनों को पाठ्यपुस्तकें प्रायः एक ही अध्याय में साथ-साथ गिनाती हैं। हिन्दी माध्यम के अभ्यर्थी के लिए एक अतिरिक्त सावधानी है : 'सार' और 'सारता' एक ही अक्षर-समूह से बने दो अलग पारिभाषिक शब्द हैं, पहला substance और दूसरा materiality, और दोनों इस प्रश्न में अलग-अलग विकल्प हैं।
- लेखांकन मानक-1 के अनुसार नीतियों के चयन और अनुप्रयोग के तीन प्रमुख विचार-बिंदु हैं — विवेक, प्ररूप के बजाय सार, और सारता।
- समनुरूपता इस सूची में नहीं आती; वह मूलभूत लेखांकन पूर्वधारणाओं में गिनी जाती है, जिनमें सतत व्यापार और उपचय भी सम्मिलित हैं।
- समनुरूपता यह अपेक्षा करती है कि अपनाई गई नीति वर्ष-दर-वर्ष एक-सी रहे ताकि विवरण तुलनीय बने रहें; वह यह नहीं बताती कि कौन-सी नीति चुनी जाए।
- विवेक का अर्थ है कि लाभ का पूर्वानुमान न किया जाए किन्तु ज्ञात देयताओं और हानियों के लिए प्रावधान कर लिया जाए, भले ही राशि निश्चित रूप से न आँकी जा सके।
- प्ररूप के बजाय सार का अर्थ है कि व्यवहार का लेखांकन उसके आर्थिक सार के अनुसार हो, न कि केवल विधिक रूप के अनुसार — किराया-क्रय इसका प्रसिद्ध उदाहरण है।
- सारता का अर्थ है कि विवरणों में उन सभी मदों का प्रकटन हो जो पाठक के निर्णय को प्रभावित कर सकें; हिन्दी में यह शब्द 'सार' से मिलता-जुलता है पर उसका अर्थ भिन्न है।
- नकारात्मक पूछ को सीधा पढ़ लेना; पुस्तिका में 'नहीं' मोटे अक्षरों में छपा है और उत्तर वही है जो सूची में नहीं आता।
- मूलभूत पूर्वधारणाओं और चयन के विचार-बिंदुओं की दोनों सूचियों को एक मान लेना; समनुरूपता पहली में है, दूसरी में नहीं।
- 'सार' और 'सारता' को एक शब्द मान लेना; पहला substance है और दूसरा materiality, और दोनों अलग-अलग विचार-बिंदु हैं।
- समनुरूपता को चयन की कसौटी समझ लेना; वह चयन के बाद की शर्त है, जो नीति की स्थिरता और तुलनीयता सुनिश्चित करती है।
लेखांकन मानक-1 इस प्रश्नपत्र के लेखा-खंड का सबसे नियमित विषय है, क्योंकि उसकी सूचियाँ छोटी हैं और उनसे विकल्प बनाना सरल। प्रश्न का रूप तीन में से कोई एक होता है : सूची का सीधा प्रश्न, जैसे मूलभूत पूर्वधारणाएँ कौन-सी हैं; परिस्थिति-आधारित प्रश्न, जिसमें कोई व्यावहारिक रीति देकर उसका आधार पूछा जाता है; और नकारात्मक प्रश्न, जैसा यहाँ है, जिसमें एक सूची में तीन सही मदें रखकर चौथी दूसरी सूची से ले ली जाती है। इसी प्रश्नपत्र में पहला और दूसरा रूप भी उपस्थित है, इसलिए यह मानक एक बार ठीक से पढ़ लेने पर कई प्रश्नों का लाभ देता है। तैयारी के लिए दोनों सूचियाँ अलग-अलग लिखकर याद कीजिए — तीन पूर्वधारणाएँ और तीन विचार-बिंदु — और प्रत्येक के सामने एक व्यावहारिक उदाहरण रख लीजिए, क्योंकि परिस्थिति-आधारित प्रश्न उसी उदाहरण से हल होते हैं।
इस प्रश्न से सीधे संबंधित कोई पूर्व PYQ उपलब्ध नहीं।
- practice — not a real PYQ
लेखांकन मानक-1 के अनुसार लेखांकन नीतियों के चयन और अनुप्रयोग के प्रमुख विचार-बिंदु कौन-से हैं?
- (a)विवेक, प्ररूप के बजाय सार और सारता
- (b)सतत व्यापार, समनुरूपता और उपचय
- (c)मुद्रा-मापन, लागत और द्वैत पक्ष
- (d)उपचय, सारता और तुलनीयता
उत्तर(a) विवेक, प्ररूप के बजाय सार और सारता — यही तीन प्रमुख विचार-बिंदु हैं। सतत व्यापार, समनुरूपता और उपचय मूलभूत लेखांकन पूर्वधारणाएँ हैं, विचार-बिंदु नहीं।
- practice — not a real PYQ
किराया-क्रय में क्रेता परिसंपत्ति को अपनी पुस्तकों में दर्ज करता है, यद्यपि विधिक स्वामित्व अंतिम किस्त चुकाने तक विक्रेता के पास रहता है। यह किस विचार-बिंदु का उदाहरण है?
- (a)प्ररूप के बजाय सार
- (b)विवेक
- (c)सारता
- (d)समनुरूपता
उत्तर(a) प्ररूप के बजाय सार — व्यवहार का लेखांकन उसके आर्थिक सार के अनुसार होता है, इसलिए उपयोग और जोखिम रखने वाला क्रेता ही परिसंपत्ति दर्ज करता है, यद्यपि विधिक रूप कुछ और कहता है।