किसी व्यावसायिक प्रतिष्ठान में, व्यवसाय की परिसंपत्तियों का मूल्य उनके प्राप्य मूल्य के बजाय उनके यथार्थ मूल्य से लगाया जाता है। यह लेखाकरण किस पर आधारित है?
- (a)मुद्रा-मापन संकल्पना
- (b)सुमेलन संकल्पना
- (c)सतत व्यापार पूर्वधारणा
- (d)समनुरूपता सिद्धांत
सही उत्तर — C, (c) सतत व्यापार पूर्वधारणा। प्रश्न यह बता रहा है कि परिसंपत्तियों का मूल्य उनके प्राप्य मूल्य से नहीं, बल्कि व्यवसाय में उनके बने रहने के आधार पर लगाया जाता है, और लेखांकन में इसका एकमात्र कारण यही पूर्वधारणा है। सतत व्यापार की पूर्वधारणा कहती है कि उद्यम को सामान्यतः चलते हुए व्यवसाय के रूप में देखा जाता है, अर्थात् यह मानकर चला जाता है कि वह निकट भविष्य में अपना कार्य जारी रखेगा और उसका न तो समापन करने का इरादा है और न ही उसकी आवश्यकता, और न ही वह अपने कार्यों के परिमाण में कोई सारवान कटौती करने जा रहा है। इस एक मान्यता से लेखांकन की कई व्यावहारिक रीतियाँ निकलती हैं। स्थायी परिसंपत्तियाँ उनकी लागत में से मूल्यह्रास घटाकर दिखाई जाती हैं, क्योंकि उन्हें बेचा नहीं जाना है, उपयोग किया जाना है; मूल्यह्रास परिसंपत्ति के उपयोगी जीवन में फैलाया जाता है; पूर्वदत्त व्यय और आस्थगित व्यय अगले वर्षों में ले जाए जाते हैं; और दीर्घकालिक देयताएँ अपनी नियत तिथियों के अनुसार वर्गीकृत होती हैं। इनमें से कोई भी रीति उस उद्यम पर लागू नहीं होगी जिसका बंद होना तय हो। यही बात उलटी दिशा से देखिए तो प्रश्न और साफ़ हो जाता है। यदि सतत व्यापार की मान्यता समाप्त हो जाए — जैसे उद्यम के समापन का निर्णय हो चुका हो — तो परिसंपत्तियों को उनके शुद्ध प्राप्य मूल्य पर, अर्थात् बेचने पर जो मिल सकता है उस पर, दिखाना पड़ता है। अर्थात् प्राप्य मूल्य पर मूल्यांकन समापन की स्थिति की रीति है, और उससे भिन्न आधार पर मूल्यांकन इसी बात का प्रमाण है कि उद्यम को चलता हुआ माना जा रहा है। हिन्दी शब्दावली पर एक सावधानी : यहाँ 'सतत व्यापार पूर्वधारणा' वही है जिसे पाठ्यपुस्तकों में प्रायः चालू व्यवसाय की मान्यता कहा जाता है, और 'यथार्थ मूल्य' तथा 'प्राप्य मूल्य' क्रमशः intrinsic value और realizable value के लिए प्रयुक्त हुए हैं।
- (a)मुद्रा-मापन संकल्पना — यह संकल्पना इस प्रश्न से अलग बात कहती है : लेखा-पुस्तकों में केवल वे ही व्यवहार और घटनाएँ दर्ज होती हैं जिन्हें मुद्रा में मापा जा सके। इसी कारण कर्मचारियों की कुशलता, प्रबंधन की योग्यता, ग्राहकों का विश्वास अथवा किसी विवाद का नैतिक पक्ष लेखा-पुस्तकों में नहीं आते, यद्यपि व्यवसाय के लिए वे महत्त्वपूर्ण होते हैं। ध्यान दीजिए कि यह संकल्पना बताती है कि क्या दर्ज होगा, न कि किस मूल्य पर दर्ज होगा। प्रश्न मूल्यांकन के आधार का है — यथार्थ मूल्य या प्राप्य मूल्य — और उस पर मुद्रा-मापन संकल्पना कुछ नहीं कहती। यह विकल्प उस अभ्यर्थी को पकड़ता है जो 'मूल्य' शब्द देखकर उसी संकल्पना की ओर चला जाता है जिसके नाम में मापन आता है।
- (b)सुमेलन संकल्पना — सुमेलन संकल्पना यह कहती है कि किसी लेखा-अवधि की आय के साथ उसी अवधि के उन व्ययों का मिलान किया जाए जो उस आय को अर्जित करने में लगे। इसी से पूर्वदत्त व्यय, अदत्त व्यय, उपार्जित आय और मूल्यह्रास के वार्षिक प्रभार जैसी समायोजन-प्रविष्टियाँ निकलती हैं। अर्थात् यह संकल्पना समय के आबंटन की बात करती है — कौन-सा व्यय किस वर्ष में जाएगा — न कि परिसंपत्ति के मूल्यांकन के आधार की। यहीं इसका सतत व्यापार से संबंध भी है, पर वह संबंध गौण है : मूल्यह्रास को वर्षों में फैलाना तभी सार्थक है जब उद्यम चलता रहने वाला माना जाए। इसलिए मूल आधार सतत व्यापार है और सुमेलन उसका परिणाम, न कि इसके उलटा।
- (d)समनुरूपता सिद्धांत — समनुरूपता का सिद्धांत यह अपेक्षा करता है कि उद्यम एक अवधि से दूसरी अवधि तक एक ही लेखांकन नीति अपनाए, ताकि विभिन्न वर्षों के वित्तीय विवरण तुलनीय रहें; नीति बदलनी हो तो परिवर्तन और उसके प्रभाव का प्रकटन किया जाता है। ध्यान दीजिए कि यह सिद्धांत यह नहीं बताता कि कौन-सी रीति अपनाई जाए, केवल यह कहता है कि जो अपनाई गई है वह वर्ष-दर-वर्ष एक-सी रहे। प्रश्न इसके ठीक विपरीत बात पूछता है — मूल्यांकन का आधार क्या हो — और उसका उत्तर समनुरूपता से नहीं मिलता। संयोग से समनुरूपता भी सतत व्यापार की तरह लेखांकन मानक-1 की मूलभूत पूर्वधारणाओं में गिनी जाती है, और यही निकटता इस विकल्प को आकर्षक बनाती है।
लेखांकन मानक-1 तीन मूलभूत लेखांकन पूर्वधारणाओं को मान्यता देता है : सतत व्यापार, समनुरूपता और उपचय। इनकी विशेषता यह है कि इन्हें वित्तीय विवरणों में अलग से बताना आवश्यक नहीं होता, क्योंकि इनका पालन मान लिया जाता है; किन्तु यदि इनमें से किसी का पालन न किया गया हो, तो उस तथ्य का प्रकटन करना पड़ता है। सतत व्यापार का अर्थ है कि उद्यम निकट भविष्य में चलता रहेगा और उसका समापन करने का न इरादा है न आवश्यकता। उपचय का अर्थ है कि आय और व्यय उस अवधि में दर्ज होंगे जिससे वे संबंधित हैं, न कि नक़दी मिलने या दिए जाने की तिथि पर। और समनुरूपता का अर्थ है नीतियों का वर्ष-दर-वर्ष एक-सा रहना। इनके साथ लेखांकन की कुछ संकल्पनाएँ भी पढ़ी जाती हैं — मुद्रा-मापन, व्यावसायिक इकाई, लागत, द्वैत पक्ष, सुमेलन और लेखांकन अवधि — पर वे मानक की भाषा में 'मूलभूत पूर्वधारणा' नहीं कहलातीं। यही भेद इस प्रश्न और इसी प्रश्नपत्र के अन्य लेखा-प्रश्नों की जड़ में है।
सतत व्यापार की पूर्वधारणा इसलिए महत्त्वपूर्ण है कि वह लेखांकन के लगभग हर व्यावहारिक निर्णय को आधार देती है। यदि यह मान्यता न हो तो मूल्यह्रास लगाने का कोई अर्थ नहीं रहता, पूर्वदत्त व्यय आगे ले जाने का कोई औचित्य नहीं बचता, और परिसंपत्तियों तथा देयताओं का चालू और अचालू में वर्गीकरण निरर्थक हो जाता है। इसीलिए जब लेखापरीक्षक को यह संदेह हो कि उद्यम चलता रह पाएगा या नहीं, तो वह इसे विशेष रूप से दर्ज करता है — यह प्रश्न केवल एक तकनीकी विवरण नहीं, बल्कि पूरे विवरण-समुच्चय की विश्वसनीयता का प्रश्न बन जाता है। परीक्षा की दृष्टि से इस विषय के प्रश्न प्रायः दो रूपों में आते हैं : या तो कोई व्यावहारिक रीति देकर उसका आधार पूछा जाता है, जैसा यहाँ है, या मूलभूत पूर्वधारणाओं की सूची पूछी जाती है। दोनों की तैयारी एक साथ हो जाती है यदि प्रत्येक पूर्वधारणा के साथ उसका एक व्यावहारिक परिणाम भी याद रखा जाए।
- सतत व्यापार की पूर्वधारणा यह मानती है कि उद्यम निकट भविष्य में अपना कार्य जारी रखेगा और उसका न तो समापन करने का इरादा है और न आवश्यकता, और न ही कार्यों के परिमाण में सारवान कटौती की जा रही है।
- इसी पूर्वधारणा के कारण स्थायी परिसंपत्तियाँ लागत में से मूल्यह्रास घटाकर दिखाई जाती हैं और उनका मूल्यांकन बेचने पर मिलने वाले मूल्य के आधार पर नहीं किया जाता।
- यदि सतत व्यापार की मान्यता समाप्त हो जाए, तो परिसंपत्तियों को उनके शुद्ध प्राप्य मूल्य पर दिखाना पड़ता है — अर्थात् प्राप्य मूल्य समापन की स्थिति का आधार है।
- लेखांकन मानक-1 तीन मूलभूत लेखांकन पूर्वधारणाएँ मानता है — सतत व्यापार, समनुरूपता और उपचय; इनका पालन मान लिया जाता है और पालन न होने पर प्रकटन आवश्यक होता है।
- मुद्रा-मापन संकल्पना यह तय करती है कि केवल मुद्रा में मापे जा सकने वाले व्यवहार ही दर्ज होंगे, और सुमेलन संकल्पना यह कि आय के साथ उसी अवधि के व्यय का मिलान होगा — दोनों मूल्यांकन के आधार पर कुछ नहीं कहतीं।
- पुस्तिका की हिन्दी में going concern के लिए 'सतत व्यापार पूर्वधारणा', intrinsic value के लिए 'यथार्थ मूल्य' और realizable value के लिए 'प्राप्य मूल्य' प्रयुक्त हुए हैं।
- 'मूल्य' शब्द देखकर मुद्रा-मापन संकल्पना चुन लेना; वह यह बताती है कि क्या दर्ज होगा, किस मूल्य पर नहीं।
- सुमेलन संकल्पना को मूल्यांकन का आधार मान लेना; वह समय के आबंटन का सिद्धांत है और मूल्यह्रास को वर्षों में फैलाने का औचित्य स्वयं सतत व्यापार से आता है।
- समनुरूपता और सतत व्यापार को एक-दूसरे के स्थान पर रख देना; दोनों मूलभूत पूर्वधारणाएँ हैं, पर पहली नीति की स्थिरता की बात करती है और दूसरी उद्यम के चलते रहने की।
- प्राप्य मूल्य को सामान्य स्थिति का आधार मान लेना; वह तब लागू होता है जब सतत व्यापार की मान्यता ही समाप्त हो चुकी हो।
लेखाशास्त्र इस प्रश्नपत्र का एक स्थिर खंड है और उसमें मूल संकल्पनाओं तथा लेखांकन मानकों से हर वर्ष कुछ प्रश्न आते हैं। उनका सबसे आम रूप यही है : कोई व्यावहारिक रीति या स्थिति बताकर पूछना कि वह किस संकल्पना अथवा पूर्वधारणा पर आधारित है। दूसरा आम रूप सूची का है — मूलभूत पूर्वधारणाएँ कौन-सी हैं, अथवा नीतियों के चयन के प्रमुख विचार-बिंदु कौन-से — और इसी प्रश्नपत्र में दोनों रूप मिलते हैं। तीसरा रूप नकारात्मक होता है, जिसमें यह पूछा जाता है कि कौन-सी बात उस सूची में नहीं आती। तैयारी का सबसे किफ़ायती तरीक़ा यह है कि प्रत्येक संकल्पना के सामने उसका एक व्यावहारिक परिणाम लिख लिया जाए — जैसे सतत व्यापार के सामने मूल्यह्रास और लागत पर मूल्यांकन, सुमेलन के सामने समायोजन-प्रविष्टियाँ, और मुद्रा-मापन के सामने वह जो लेखा-पुस्तकों में दर्ज नहीं होता। इससे परिस्थिति-आधारित प्रश्न सीधे हल हो जाते हैं।
इस प्रश्न से सीधे संबंधित कोई पूर्व PYQ उपलब्ध नहीं।
- practice — not a real PYQ
लेखांकन मानक-1 के अनुसार मूलभूत लेखांकन पूर्वधारणाएँ कौन-सी हैं?
- (a)सतत व्यापार, समनुरूपता और उपचय
- (b)विवेक, सारता और प्ररूप के बजाय सार
- (c)मुद्रा-मापन, सुमेलन और द्वैत पक्ष
- (d)उपचय, विवेक और पूर्ण प्रकटन
उत्तर(a) सतत व्यापार, समनुरूपता और उपचय — यही तीन मूलभूत लेखांकन पूर्वधारणाएँ हैं, जिनका पालन मान लिया जाता है और पालन न होने पर प्रकटन आवश्यक होता है। विवेक, सारता तथा प्ररूप के बजाय सार नीतियों के चयन के प्रमुख विचार-बिंदु हैं, पूर्वधारणाएँ नहीं।
- practice — not a real PYQ
यदि किसी उद्यम पर सतत व्यापार की पूर्वधारणा लागू न रह जाए, तो उसकी परिसंपत्तियों का मूल्यांकन किस आधार पर किया जाता है?
- (a)शुद्ध प्राप्य मूल्य पर
- (b)ऐतिहासिक लागत पर
- (c)लागत में से मूल्यह्रास घटाकर
- (d)प्रतिस्थापन लागत पर
उत्तर(a) शुद्ध प्राप्य मूल्य पर — समापन की स्थिति में परिसंपत्तियों को उस मूल्य पर दिखाया जाता है जो उन्हें बेचने पर मिल सकता है, क्योंकि उनका आगे उपयोग होना ही नहीं है।