मान लीजिए कि x और y भिन्न चर हैं, जो {1, 2, 3, 4, 5, 6} से मान प्राप्त करते हैं। व्यंजक xy + x + y के मान के सम होने की प्रायिकता क्या है?
- (a)1/2
- (b)1/3
- (c)1/4
- (d)1/5
सही उत्तर — D, (d) 1/5। चारों विकल्प पुस्तिका में ऊपर-नीचे लिखी भिन्नों के रूप में छपे हैं, जिन्हें यहाँ तिरछी रेखा के साथ एक पंक्ति में लिखा गया है। सबसे साफ़ रास्ता व्यंजक को गुणनखंड में बदलना है। xy + x + y में दोनों ओर 1 जोड़िए : xy + x + y + 1 = (x + 1)(y + 1)। अर्थात् दिया गया व्यंजक (x + 1)(y + 1) − 1 के बराबर है। अब यह व्यंजक तभी सम होगा जब (x + 1)(y + 1) विषम हो, और दो संख्याओं का गुणनफल विषम तभी होता है जब दोनों विषम हों। अतः x + 1 और y + 1 दोनों विषम चाहिए, अर्थात् x और y दोनों सम होने चाहिए। यही निष्कर्ष सीधे सम-विषम की जाँच से भी निकलता है, और यह रीति उन्हें अधिक सहज लगेगी जिन्हें गुणनखंड नहीं सूझता। तीन ही दशाएँ बनती हैं। यदि दोनों विषम हों तो xy विषम और x + y सम होगा, इसलिए योग विषम आएगा। यदि एक विषम और एक सम हो तो xy सम और x + y विषम होगा, इसलिए योग फिर विषम आएगा। और यदि दोनों सम हों तो xy सम तथा x + y भी सम, इसलिए योग सम आएगा। अर्थात् तीन में से केवल एक दशा काम करती है — दोनों सम। अब गिनती कीजिए। समुच्चय {1, 2, 3, 4, 5, 6} में सम संख्याएँ तीन हैं : 2, 4 और 6। x तथा y भिन्न होने चाहिए, इसलिए कुल क्रमित युग्म 6 × 5 = 30 बनते हैं और अनुकूल युग्म 3 × 2 = 6। प्रायिकता 6/30 = 1/5 हुई। अनुक्रम को महत्त्व न देने पर भी उत्तर वही रहता है : कुल युग्म C(6, 2) = 15 और अनुकूल C(3, 2) = 3, अर्थात् 3/15 = 1/5। दोनों गणनाओं का एक ही उत्तर देना अपने आप में एक जाँच है, क्योंकि क्रम को गिनने या न गिनने से अनुपात नहीं बदलता — बशर्ते दोनों जगह एक ही रीति अपनाई जाए। ध्यान दीजिए कि 'भिन्न चर' वाली शर्त यहाँ केवल शब्दालंकार नहीं है; वही इस प्रश्न का उत्तर 1/4 से बदलकर 1/5 करती है।
- (a)1/2 — यह उत्तर तब चुना जाता है जब कोई जाँच किए बिना यह मान लिया जाए कि कोई भी व्यंजक आधी बार सम और आधी बार विषम होगा। सम-विषम की समरूपता कुछ व्यंजकों में सचमुच होती है — जैसे केवल x + y के लिए इस समुच्चय में प्रायिकता 2/5 आती है, और किसी एक चर के सम होने की प्रायिकता 1/2 — पर वह हर व्यंजक का गुण नहीं है। यहाँ तीनों पारिता-दशाओं में से केवल एक ही व्यंजक को सम बनाती है, इसलिए उत्तर आधे से बहुत कम आता है। ऐसे प्रश्नों में पहला क़दम सदैव यह होना चाहिए कि व्यंजक की पारिता का विश्लेषण किया जाए, और उसके बाद ही गिनती। बिना विश्लेषण के 1/2 चुनना अनुमान है, गणना नहीं।
- (b)1/3 — यह उत्तर एक बहुत ही स्वाभाविक भूल से आता है : अभ्यर्थी पारिता की तीन दशाएँ ठीक-ठीक पहचान लेता है — दोनों विषम, दोनों सम, और एक-एक — देखता है कि उनमें से केवल एक अनुकूल है, और सीधे 1/3 लिख देता है। भूल यह है कि ये तीनों दशाएँ समसंभाव्य नहीं हैं। 'एक विषम और एक सम' वाली दशा में युग्मों की संख्या सबसे अधिक है, क्योंकि विषम तीन प्रकार से और सम तीन प्रकार से चुना जा सकता है; जबकि 'दोनों सम' वाली दशा में केवल तीन युग्म बनते हैं। प्रायिकता दशाओं की गिनती से नहीं, प्रत्येक दशा में आने वाले परिणामों की गिनती से निकलती है। यही इस प्रश्न की सबसे उपयोगी सीख है : समान संभावना केवल तब मानी जा सकती है जब परिणाम स्वयं समान रूप से संभव हों।
- (c)1/4 — यह इस समुच्चय का सबसे कुशल जाल है, क्योंकि इसका तर्क लगभग सही है। यदि x और y स्वतंत्र रूप से चुने जाते और उनका भिन्न होना आवश्यक न होता, तो प्रत्येक के सम होने की प्रायिकता 1/2 होती और दोनों के सम होने की प्रायिकता 1/2 × 1/2 = 1/4 आती। पर प्रश्न स्पष्ट रूप से कहता है कि x और y भिन्न चर हैं, अर्थात् एक ही मान दोनों को नहीं दिया जा सकता। इस शर्त के साथ दूसरा चयन पहले पर निर्भर हो जाता है : पहला सम चुनने की प्रायिकता 3/6 है और उसके बाद दूसरा सम चुनने की प्रायिकता 2/5, जिनका गुणनफल 1/5 है। अर्थात् भिन्नता की शर्त उत्तर को 1/4 से घटाकर 1/5 कर देती है। ऐसे प्रश्नों में सबसे पहले यही देखिए कि चयन प्रतिस्थापन के साथ है या बिना प्रतिस्थापन के।
पारिता अर्थात् सम-विषम का विश्लेषण संख्यात्मक अभियोग्यता के सबसे उपयोगी औज़ारों में है, क्योंकि वह बड़ी गणना को कुछ ही दशाओं में समेट देता है। तीन नियम पर्याप्त हैं : दो संख्याओं का गुणनफल विषम तभी होता है जब दोनों विषम हों; योग सम तभी होता है जब दोनों की पारिता समान हो; और किसी व्यंजक में जोड़ा गया अचर पूरे व्यंजक की पारिता उलट देता है यदि वह विषम हो। इनके साथ एक बीजीय चाल जोड़ लीजिए, जो इस प्रश्न में निर्णायक है : xy + x + y जैसे व्यंजक में 1 जोड़ने पर वह (x + 1)(y + 1) के रूप में गुणनखंडित हो जाता है, जिससे पारिता की जाँच गुणनफल के नियम पर आ जाती है। प्रायिकता की ओर से भी दो ही बातें चाहिए — अनुकूल परिणामों की गिनती और कुल परिणामों की गिनती, तथा यह स्पष्टता कि चयन प्रतिस्थापन के साथ हो रहा है या बिना प्रतिस्थापन के। यही अंतिम बात इस प्रश्न में उत्तर तय करती है।
प्रश्न में 'भिन्न चर' शब्द जान-बूझकर रखे गए हैं और वे पूरे उत्तर को बदल देते हैं। बिना उस शर्त के उत्तर 1/4 होता, जो विकल्पों में उपस्थित भी है — अर्थात् विकल्प-समुच्चय ठीक उसी अभ्यर्थी के लिए बनाया गया है जो शर्त पढ़कर भी उसका प्रयोग नहीं करता। यह इस खंड की एक सामान्य प्रवृत्ति है : गणना छोटी रखी जाती है और परीक्षा शब्दों के ध्यान की होती है। दूसरी उपयोगी आदत यह है कि उत्तर निकालने के बाद उसे किसी दूसरी रीति से जाँच लिया जाए। यहाँ क्रमित युग्मों से गिनने पर 6/30 मिलता है और अक्रमित युग्मों से 3/15 — दोनों 1/5 पर आते हैं, और यह मिलान बताता है कि गिनती में कहीं क्रम की चूक नहीं हुई। तीसरी बात छपाई की : चारों विकल्प ऊपर-नीचे लिखी भिन्नों के रूप में छपे हैं और दो-दो करके एक पंक्ति में रखे गए हैं, तथा x और y तिरछे अक्षरों में हैं।
- xy + x + y + 1 = (x + 1)(y + 1), इसलिए xy + x + y सम तभी होगा जब (x + 1)(y + 1) विषम हो, अर्थात् जब x और y दोनों सम हों।
- पारिता की तीनों दशाएँ जाँचने पर भी यही निकलता है : दोनों विषम होने पर योग विषम, एक-एक होने पर विषम, और दोनों सम होने पर ही सम।
- समुच्चय {1, 2, 3, 4, 5, 6} में सम संख्याएँ तीन हैं — 2, 4 और 6 — इसलिए अनुकूल क्रमित युग्म 3 × 2 = 6 हैं और कुल क्रमित युग्म 6 × 5 = 30।
- प्रायिकता 6/30 = 1/5 आती है; अक्रमित युग्मों से गिनने पर C(3, 2)/C(6, 2) = 3/15 = 1/5, अर्थात् दोनों रीतियाँ एक ही उत्तर देती हैं।
- 'भिन्न चर' की शर्त निर्णायक है : प्रतिस्थापन के साथ चयन मानने पर उत्तर 1/2 × 1/2 = 1/4 आता, जो विकल्पों में जान-बूझकर रखा गया है।
- पारिता की तीन दशाएँ समसंभाव्य नहीं होतीं — 'एक विषम और एक सम' वाली दशा में सबसे अधिक युग्म बनते हैं — इसलिए दशाओं की गिनती से प्रायिकता नहीं निकाली जा सकती।
- 'भिन्न चर' वाली शर्त की उपेक्षा कर देना; प्रतिस्थापन के साथ गणना करने पर उत्तर 1/4 आता है, जो विकल्पों में मौजूद है।
- पारिता की तीन दशाओं को समसंभाव्य मान लेना और सीधे 1/3 लिख देना; दशाओं में युग्मों की संख्या समान नहीं होती।
- बिना विश्लेषण के यह मान लेना कि व्यंजक आधी बार सम होगा; यहाँ केवल एक ही पारिता-दशा अनुकूल है।
- क्रमित और अक्रमित गिनती को आपस में मिला देना; अंश और हर दोनों में एक ही रीति रखनी चाहिए, अन्यथा अनुपात बिगड़ जाता है।
इस प्रश्नपत्र के संख्यात्मक खंड में प्रायिकता और गणना से जुड़ा एक प्रश्न प्रायः रहता है, और उसका स्वरूप लगभग सदैव छोटा-सा समुच्चय लेकर उस पर कोई शर्त लगाने का होता है — पारिता, विभाज्यता, योग या गुणनफल की कोई शर्त। ऐसे प्रश्नों में गणना कभी भारी नहीं होती; कठिनाई शर्त को ठीक-ठीक पढ़ने और चयन की रीति पहचानने में होती है। तैयारी के लिए तीन आदतें सबसे अधिक काम आती हैं। पहली, व्यंजक को गुणनखंड में बदलने का प्रयास, क्योंकि उससे पारिता की जाँच सरल हो जाती है। दूसरी, अनुकूल और कुल परिणामों की गिनती एक ही रीति से करना — या तो दोनों क्रमित या दोनों अक्रमित। तीसरी, उत्तर को दूसरी रीति से जाँचना, क्योंकि दो स्वतंत्र गणनाओं का मिलान गिनती की चूक तुरंत पकड़ लेता है।
इस प्रश्न से सीधे संबंधित कोई पूर्व PYQ उपलब्ध नहीं।
- practice — not a real PYQ
समुच्चय {1, 2, 3, 4, 5, 6} से दो भिन्न मान x और y चुने जाते हैं। गुणनफल xy के सम होने की प्रायिकता क्या है?
- (a)4/5
- (b)1/5
- (c)1/2
- (d)3/5
उत्तर(a) 4/5 — गुणनफल विषम तभी होगा जब दोनों विषम हों, जिसकी प्रायिकता C(3, 2)/C(6, 2) = 3/15 = 1/5 है; इसलिए सम होने की प्रायिकता 1 − 1/5 = 4/5।
- practice — not a real PYQ
समुच्चय {1, 2, 3, 4, 5, 6} से दो भिन्न मान x और y चुने जाते हैं। योग x + y के सम होने की प्रायिकता क्या है?
- (a)2/5
- (b)1/2
- (c)1/5
- (d)3/5
उत्तर(a) 2/5 — योग सम तभी होगा जब दोनों विषम हों या दोनों सम, अर्थात् C(3, 2) + C(3, 2) = 6 अनुकूल युग्म, और कुल C(6, 2) = 15; इसलिए प्रायिकता 6/15 = 2/5।