मजदूरी संदाय अधिनियम, 1936 के उपबंधों के अधीन किसी स्थापन का प्रत्येक नियोजक भुगतान की गई मजदूरियों और मजदूरियों में से की गई कटौतियों, यदि कोई हो, के रजिस्टर और अभिलेख रखेगा, तथा इन्हें अंतिम प्रविष्टि की तारीख से कितनी अवधि तक के लिए परिरक्षित करेगा?
- (a)पाँच वर्ष
- (b)सात वर्ष
- (c)दो वर्ष
- (d)तीन वर्ष
सही उत्तर — D, (d) तीन वर्ष। मजदूरी संदाय अधिनियम, 1936 की धारा 13क अभिलेख रखने का उपबंध करती है और वहीं यह अवधि दी गई है। धारा 13क का पहला भाग यह कहता है कि प्रत्येक नियोजक ऐसे रजिस्टर और अभिलेख रखेगा जिनमें नियोजित व्यक्तियों का विवरण, उनके द्वारा किया गया काम, उन्हें दी गई मजदूरी, मजदूरी में से की गई कटौतियाँ, उनसे ली गई रसीदें तथा विहित प्रारूप में अन्य विवरण दर्ज हों। दूसरा भाग परिरक्षण की अवधि तय करता है : इस धारा के अधीन रखा जाने वाला प्रत्येक रजिस्टर और अभिलेख उसमें की गई अंतिम प्रविष्टि की तारीख़ के बाद तीन वर्ष तक परिरक्षित रखा जाएगा। दो शब्दों पर ध्यान दीजिए, क्योंकि प्रश्न उन्हीं को दोहराता है। पहला, गणना 'अंतिम प्रविष्टि की तारीख़' से होती है, न कि वित्तीय वर्ष की समाप्ति से और न कर्मचारी के सेवा छोड़ने से — इसलिए जब तक रजिस्टर में नई प्रविष्टि होती रहती है, अवधि आगे खिसकती रहती है। दूसरा, यह अवधि परिरक्षण की है, अर्थात् अभिलेख नष्ट न करने की; रजिस्टर रखने का दायित्व स्वयं निरंतर चलता रहता है। तीन वर्ष की यह अवधि अधिनियम के शेष ढाँचे से संगत है। इसी अधिनियम की धारा 15 के अधीन अवैध कटौती अथवा मजदूरी के विलंबित भुगतान के विरुद्ध आवेदन सामान्यतः बारह मास के भीतर किया जाना चाहिए। यदि अभिलेख केवल दो वर्ष रखे जाते तो दावे की अवधि, सुनवाई और अपील की प्रक्रिया पूरी होने से पहले ही प्रमाण नष्ट हो सकते थे; और पाँच या सात वर्ष रखना छोटे स्थापनों पर अनावश्यक भार डालता। इसलिए विधायिका ने दावे की अवधि से पर्याप्त अधिक, पर व्यावहारिक अवधि चुनी। यही तर्क परीक्षा में भी काम आता है : जब कोई अभिलेख-अवधि पूछी जाए, तो उसे उसी अधिनियम की दावा-अवधि के साथ मिलाकर देखिए, क्योंकि दोनों एक ही प्रयोजन की सेवा करते हैं।
- (a)पाँच वर्ष — धारा 13क में पाँच वर्ष की कोई अवधि नहीं है। यह विकल्प इसलिए विश्वसनीय लगता है कि पाँच वर्ष अभिलेख रखने की एक परिचित वाणिज्यिक अवधि है और कई प्रशासनिक निर्देशों में मिलती है। पर यहाँ अवधि विधायिका ने स्वयं तय की है और वह तीन वर्ष है। ध्यान रखिए कि विभिन्न विधियों में अभिलेख-अवधियाँ भिन्न-भिन्न हैं — उदाहरण के लिए कंपनी अधिनियम, 2013 के अधीन कंपनी की लेखा-पुस्तकें कम-से-कम आठ वित्तीय वर्ष तक रखनी होती हैं — इसलिए किसी एक क्षेत्र की परिचित अवधि दूसरे अधिनियम पर लागू नहीं की जा सकती। श्रम विधि के प्रश्नों में यही सबसे आम भूल है : संख्या याद रहती है, पर वह किस अधिनियम की है यह नहीं।
- (b)सात वर्ष — सात वर्ष इस समुच्चय का सबसे लंबा विकल्प है और वही इसे संदिग्ध भी बनाता है। इतनी लंबी अवधि तभी रखी जाती है जब दावे या जाँच की संभावना बहुत आगे तक बनी रहे; मजदूरी से जुड़े विवादों में ऐसा नहीं है, क्योंकि इसी अधिनियम की धारा 15 के अधीन आवेदन सामान्यतः बारह मास के भीतर करना होता है। छोटे स्थापनों पर सात वर्ष तक कागज़ रखने का भार डालना अधिनियम के उस उद्देश्य के भी विरुद्ध होता जो सरल और शीघ्र प्रक्रिया का है। इसलिए तर्क और उपबंध दोनों इसे काट देते हैं। परीक्षा की दृष्टि से इस विकल्प का काम केवल विकल्पों का फैलाव बढ़ाना है, ताकि अनुमान लगाने वाले अभ्यर्थी के पास दो-दो लंबी अवधियाँ हों।
- (c)दो वर्ष — दो वर्ष सही उत्तर के सबसे निकट है और इसीलिए सबसे ख़तरनाक विकल्प है — जिस अभ्यर्थी को यह याद हो कि अवधि छोटी है पर ठीक संख्या याद न हो, वह यहीं फिसलता है। उपबंध की भाषा स्पष्ट रूप से तीन वर्ष कहती है, और उसका कारण भी समझ में आता है : धारा 15 के अधीन दावा बारह मास तक किया जा सकता है, और उसके बाद सुनवाई तथा अपील में समय लगता है, इसलिए अभिलेख का जीवन दावे की अवधि से पर्याप्त अधिक रखा गया। दो वर्ष की अवधि उस संतुलन को तोड़ देती, क्योंकि प्रक्रिया समाप्त होने से पहले ही प्रमाण नष्ट किए जा सकते। इसलिए इस विकल्प को केवल स्मरण से नहीं, अधिनियम के भीतरी तर्क से भी काटा जा सकता है।
मजदूरी संदाय अधिनियम, 1936 का उद्देश्य मजदूरी का समय पर और बिना अनधिकृत कटौती के भुगतान सुनिश्चित करना है, और उसका ढाँचा कुछ ही धाराओं में समझ में आ जाता है। धारा 3 भुगतान का दायित्व तय करती है। धारा 4 मजदूरी-अवधि नियत करती है, जो एक मास से अधिक नहीं हो सकती। धारा 5 भुगतान का समय बताती है — जिस स्थापन में एक हज़ार से कम व्यक्ति कार्यरत हों वहाँ मजदूरी-अवधि की समाप्ति के बाद सातवें दिन की समाप्ति से पहले, और अन्यत्र दसवें दिन की समाप्ति से पहले; सेवा समाप्त होने पर भुगतान दूसरे कार्य-दिवस की समाप्ति से पहले। धारा 6 भुगतान का रूप बताती है और धारा 7 उन कटौतियों की सूची देती है जो अनुज्ञेय हैं, साथ ही कुल कटौती की अधिकतम सीमा भी। धारा 8 जुर्माने से जुड़े कड़े नियंत्रण रखती है। धारा 13क अभिलेख रखने और उन्हें तीन वर्ष तक परिरक्षित करने का उपबंध करती है, और धारा 15 दावों की सुनवाई करने वाले प्राधिकारी तथा आवेदन की अवधि का।
अभिलेख-संबंधी उपबंध श्रम विधि में केवल कागज़ी औपचारिकता नहीं हैं; वे प्रवर्तन का आधार हैं। कर्मकार के पास प्रायः अपने भुगतान का कोई स्वतंत्र प्रमाण नहीं होता, इसलिए विवाद उठने पर नियोजक के रजिस्टर ही मुख्य साक्ष्य बनते हैं। यही कारण है कि लगभग हर श्रम अधिनियम में रजिस्टर रखने का दायित्व, उसका प्रारूप और उसे रखने की अवधि विधि में ही लिख दी जाती है, और निरीक्षक को उन्हें देखने की शक्ति दी जाती है। परीक्षा की दृष्टि से इसका अर्थ यह है कि 'कितनी अवधि तक' वाला प्रश्न किसी भी अधिनियम से आ सकता है, और उत्तर तभी सुरक्षित रहता है जब अवधि अधिनियम के नाम के साथ याद हो। इस प्रश्न में हिन्दी और अंग्रेज़ी स्तंभों की वाक्य-रचना भिन्न है — हिन्दी में पूरा प्रश्नवाचक वाक्य है, अंग्रेज़ी में अधूरा वाक्य जिसे विकल्प पूरा करते हैं — पर पूछ और अर्थ दोनों में एक ही हैं।
- मजदूरी संदाय अधिनियम, 1936 की धारा 13क के अधीन रजिस्टर और अभिलेख अंतिम प्रविष्टि की तारीख़ से तीन वर्ष तक परिरक्षित रखे जाते हैं।
- इन अभिलेखों में नियोजित व्यक्तियों का विवरण, किया गया काम, दी गई मजदूरी, की गई कटौतियाँ और ली गई रसीदें विहित प्रारूप में दर्ज होती हैं।
- धारा 4 के अधीन मजदूरी-अवधि एक मास से अधिक नहीं हो सकती; धारा 5 के अधीन भुगतान सातवें दिन की समाप्ति से पहले होता है जहाँ एक हज़ार से कम व्यक्ति कार्यरत हों, और अन्यत्र दसवें दिन की समाप्ति से पहले।
- धारा 15 के अधीन अवैध कटौती अथवा विलंबित भुगतान का आवेदन सामान्यतः बारह मास के भीतर किया जाना चाहिए — अभिलेख की तीन वर्ष की अवधि इसी दावा-अवधि से संगत रखी गई है।
- धारा 7 उन कटौतियों की सूची देती है जो अनुज्ञेय हैं तथा कुल कटौती की अधिकतम सीमा भी नियत करती है, और धारा 8 जुर्माने पर कड़े नियंत्रण रखती है।
- अन्य विधियों में अभिलेख की अवधियाँ भिन्न हैं — कंपनी अधिनियम, 2013 के अधीन लेखा-पुस्तकें कम-से-कम आठ वित्तीय वर्ष तक रखनी होती हैं — इसलिए अवधि सदैव अधिनियम के नाम के साथ याद रखनी चाहिए।
- अवधि की गणना वित्तीय वर्ष की समाप्ति से करना; उपबंध स्पष्ट रूप से अंतिम प्रविष्टि की तारीख़ से तीन वर्ष कहता है।
- दो वर्ष चुन लेना, जो सही उत्तर के सबसे निकट है; अभिलेख की अवधि दावे की बारह मास वाली अवधि से पर्याप्त अधिक रखी गई है।
- किसी दूसरी विधि की परिचित अभिलेख-अवधि को यहाँ लागू कर देना; प्रत्येक अधिनियम अपनी अवधि स्वयं तय करता है।
- अभिलेख रखने के दायित्व और उसे परिरक्षित रखने की अवधि को एक मान लेना; रजिस्टर रखना निरंतर दायित्व है, तीन वर्ष केवल परिरक्षण की अवधि है।
मजदूरी संदाय अधिनियम से प्रश्न लगभग सदैव संख्याओं पर बनते हैं : भुगतान का दिन, मजदूरी-अवधि की अधिकतम सीमा, कटौती की अधिकतम प्रतिशत सीमा, जुर्माने की सीमा, दावे की अवधि और अभिलेख परिरक्षण की अवधि। यही कारण है कि इस अधिनियम की तैयारी सूची बनाकर ही सबसे अच्छी होती है — एक ओर धारा, दूसरी ओर संख्या। इस सूची के साथ दो और बातें जोड़ लीजिए। पहली, प्रत्येक संख्या का प्रयोजन, क्योंकि प्रयोजन याद हो तो अनुमान भी सही दिशा में जाता है — जैसे अभिलेख की अवधि दावे की अवधि से अधिक ही होगी। दूसरी, मजदूरी संहिता, 2019 में हुए परिवर्तन, क्योंकि प्रश्नपत्र कभी पुराने अधिनियम के नाम से और कभी संहिता के नाम से पूछ सकता है। इसी प्रश्नपत्र में न्यूनतम मजदूरी से जुड़ा प्रश्न अलग से भी है, इसलिए मजदूरी वाला यह पूरा समूह एक साथ पढ़ना लाभदायक रहता है।
इस प्रश्न से सीधे संबंधित कोई पूर्व PYQ उपलब्ध नहीं।
- practice — not a real PYQ
मजदूरी संदाय अधिनियम, 1936 के अधीन मजदूरी-अवधि अधिकतम कितनी हो सकती है?
- (a)एक मास
- (b)दो मास
- (c)तीन मास
- (d)छह मास
उत्तर(a) एक मास — धारा 4 के अधीन कोई भी मजदूरी-अवधि एक मास से अधिक नहीं हो सकती, इसलिए मजदूरी का भुगतान कम-से-कम मासिक रूप से करना होता है।
- practice — not a real PYQ
मजदूरी संदाय अधिनियम, 1936 की धारा 15 के अधीन अवैध कटौती या विलंबित भुगतान का आवेदन सामान्यतः कितनी अवधि के भीतर किया जाना चाहिए?
- (a)बारह मास
- (b)छह मास
- (c)तीन मास
- (d)तीन वर्ष
उत्तर(a) बारह मास — सामान्यतः इतनी ही अवधि है, यद्यपि पर्याप्त कारण दिखाए जाने पर प्राधिकारी विलंब से किया गया आवेदन भी ग्रहण कर सकता है। तीन वर्ष अभिलेख परिरक्षण की अवधि है, दावे की नहीं।