पूर्वी चालुक्यों की राजधानी ‘वेंगी’ को निम्नलिखित में से किस एक स्थान से पहचाना जाता है?
- (a)पेड्डावेगी
- (b)एरुमैयूर
- (c)सालिहुन्डम
- (d)भट्टीप्रोलू
सही उत्तर — A, (a) पेड्डावेगी। पूर्वी चालुक्यों की राजधानी वेंगी की पहचान आधुनिक पेड्डावेगी से की जाती है, जो आंध्र प्रदेश में एलुरु के पास पश्चिमी गोदावरी क्षेत्र में स्थित है। नाम में ही सुराग़ है — 'वेगी' प्राचीन 'वेंगी' का ही चला आया रूप है, और 'पेड्डा' तेलुगु में बड़े के लिए आता है। पेड्डावेगी की पहचान केवल नाम-साम्य पर नहीं टिकती। वहाँ हुए उत्खननों से एक विस्तृत प्राचीन बस्ती के अवशेष मिले हैं — ईंटों के ढाँचे, स्तूप और विहार के अवशेष, तथा मृद्भांड और सिक्के — जिनसे पता चलता है कि यह स्थल पूर्वी चालुक्यों से पहले भी एक बड़ा नगर था। वेंगी शालंकायन और विष्णुकुंडिन काल में भी सत्ता का केंद्र रह चुका था, और इसी परंपरा को पूर्वी चालुक्यों ने आगे बढ़ाया। पूर्वी चालुक्य वंश की नींव 624 ईस्वी के आसपास कुब्ज विष्णुवर्धन ने रखी, जो बादामी के चालुक्य नरेश पुलकेशिन द्वितीय के भाई थे। पुलकेशिन द्वितीय ने आंध्र के इस भाग को जीतकर अपने भाई को वहाँ का शासन सौंपा और कुछ ही समय में यह शाखा स्वतंत्र हो गई। वेंगी के नाम पर ही यह वंश 'वेंगी के चालुक्य' कहलाया और लगभग पाँच सौ वर्ष तक तटीय आंध्र पर टिका रहा; बाद में सत्ता का केंद्र राजमहेंद्रवरम अर्थात् आज के राजमुंदरी की ओर भी खिसका। प्रश्न इसी वंश और इसी स्थान-नाम की पहचान माँगता है, इसलिए उत्तर पेड्डावेगी है — और यही एकमात्र विकल्प है जिसका संबंध राजधानी से है, शेष तीन में से दो बौद्ध पुरास्थल हैं और एक का कोई संबंध ज्ञात नहीं है।
- (b)एरुमैयूर — इस नाम का पूर्वी चालुक्यों की राजधानी से कोई ज्ञात संबंध नहीं है, और यही इस विकल्प की पूरी कहानी है। ऐसे प्रश्नों में विकल्प-समुच्चय प्रायः इस तरह बनाया जाता है कि तीन नाम उसी क्षेत्र के परिचित पुरास्थल हों और एक नाम केवल भरने के लिए रखा जाए, ताकि जिस अभ्यर्थी ने कोई नाम कहीं पढ़ा हो वह अनुमान लगाने लगे। सुरक्षित रास्ता यह है कि पहले उस स्थान को पकड़ा जाए जिसका संबंध पूछ से सीधा जुड़ता हो — यहाँ 'वेंगी' और 'वेगी' का नाम-साम्य पेड्डावेगी तक ले जाता है — और फिर शेष नामों को उनके अपने संदर्भ से मिलाकर देखा जाए। जिस नाम का कोई संदर्भ न बने, उसे छोड़ देना ही ठीक है; अनुमान लगाकर उसे राजधानी मान लेना ग़लती के अलावा कुछ नहीं देता।
- (c)सालिहुन्डम — सालिहुन्डम एक वास्तविक और प्रसिद्ध पुरास्थल है, पर उसका संबंध बौद्ध धर्म से है, किसी राजधानी से नहीं। यह आंध्र प्रदेश के श्रीकाकुलम क्षेत्र में वंशधारा नदी के तट पर एक पहाड़ी पर स्थित है, और वहाँ स्तूपों, चैत्यों तथा विहारों के अवशेष मिले हैं जो कई शताब्दियों तक चली बौद्ध गतिविधि के साक्ष्य हैं। तटीय आंध्र बौद्ध स्थलों की दृष्टि से बहुत समृद्ध है — अमरावती, नागार्जुनकोंडा, भट्टीप्रोलू, गुंटुपल्ली और सालिहुन्डम सब इसी पट्टी में हैं — और विकल्प बनाने वाले इसी समृद्धि का लाभ उठाते हैं। इसलिए यह याद रखना उपयोगी है कि तटीय आंध्र का हर प्रसिद्ध पुरास्थल राजनीतिक राजधानी नहीं था; वेंगी राजधानी थी, सालिहुन्डम धार्मिक केंद्र।
- (d)भट्टीप्रोलू — भट्टीप्रोलू भी वास्तविक स्थल है और उसकी प्रसिद्धि का कारण बिलकुल अलग है। यह कृष्णा नदी के डेल्टा क्षेत्र में गुंटूर के पास है और वहाँ के स्तूप से मिली अस्थि-मंजूषाओं पर उत्कीर्ण अभिलेख भारतीय पुरालेखशास्त्र में विशेष स्थान रखते हैं — ये अभिलेख ब्राह्मी लिपि के एक विशिष्ट प्रकार में हैं, जिसे इसी स्थल के नाम पर भट्टीप्रोलू लिपि कहा जाता है, और उनका काल ईसा पूर्व की शताब्दियों तक जाता है। अर्थात् यह स्थल पूर्वी चालुक्यों से लगभग एक सहस्राब्दी पहले का है और उनकी राजधानी होने का प्रश्न ही नहीं उठता। इस विकल्प का काम यही है कि प्रसिद्ध नाम देखकर अभ्यर्थी उसे किसी भी आंध्र-संबंधी प्रश्न का उत्तर मान ले।
पूर्वी चालुक्य, जिन्हें वेंगी के चालुक्य भी कहा जाता है, दक्षिण भारत के उन कुछ वंशों में हैं जिनका शासन-काल असाधारण रूप से लंबा रहा। इस शाखा की नींव 624 ईस्वी के आसपास कुब्ज विष्णुवर्धन ने रखी, जो बादामी के चालुक्य नरेश पुलकेशिन द्वितीय के भाई थे और जिन्हें आंध्र-विजय के बाद वहाँ का शासन सौंपा गया था। शीघ्र ही यह शाखा स्वतंत्र हो गई और लगभग पाँच शताब्दियों तक तटीय आंध्र पर बनी रही। इसका इतिहास तीन शक्तियों के बीच झूलता रहा — पश्चिम में राष्ट्रकूट, दक्षिण में चोल, और स्वयं बादामी के चालुक्य। ग्यारहवीं शताब्दी में वेंगी और चोल राजवंशों के बीच वैवाहिक संबंध इतने घने हो गए कि दोनों की रेखाएँ मिल गईं और कुलोत्तुंग प्रथम के साथ चोल सिंहासन पर वेंगी की रक्त-परंपरा पहुँच गई। सांस्कृतिक दृष्टि से इस वंश का सबसे बड़ा योगदान तेलुगु साहित्य के आरंभ से जुड़ा है : राजराज नरेंद्र के संरक्षण में नन्नय ने महाभारत का तेलुगु में अनुवाद आरंभ किया और वे तेलुगु के आदिकवि माने जाते हैं।
स्थान-नाम की पहचान वाले प्रश्न इतिहास के खंड में इसलिए लौटते हैं कि उनका उत्तर एक ही तथ्य पर टिका होता है और अनुमान की गुंजाइश कम रहती है। ऐसे प्रश्न में दो सहारे काम आते हैं। पहला, नाम की निरंतरता — प्राचीन नाम प्रायः आधुनिक नाम के भीतर बचा रहता है, जैसे वेंगी का 'वेगी' पेड्डावेगी में, या धान्यकटक का अंश अमरावती के आसपास के नामों में। दूसरा, क्षेत्रीय संगति — पूर्वी चालुक्य तटीय आंध्र में थे, इसलिए उत्तर उसी पट्टी में खोजा जाना चाहिए, और यदि कोई विकल्प दूसरे भाषा-क्षेत्र का लगे तो उसे पहले हटा देना चाहिए। इस प्रश्न में दोनों सहारे एक ही दिशा में इशारा करते हैं। एक बात और : तटीय आंध्र में बौद्ध पुरास्थलों की भरमार है और परीक्षा में उन्हें राजनीतिक केंद्रों के साथ मिलाकर विकल्प बनाए जाते हैं, इसलिए धार्मिक स्थल और राजधानी का भेद अलग से याद रखना चाहिए।
- पूर्वी चालुक्यों की राजधानी वेंगी की पहचान आधुनिक पेड्डावेगी से की जाती है, जो आंध्र प्रदेश में एलुरु के पास पश्चिमी गोदावरी क्षेत्र में है; उत्खनन में वहाँ विस्तृत प्राचीन बस्ती के अवशेष मिले हैं।
- पूर्वी चालुक्य वंश की स्थापना 624 ईस्वी के आसपास कुब्ज विष्णुवर्धन ने की, जो बादामी के चालुक्य नरेश पुलकेशिन द्वितीय के भाई थे; यह शाखा शीघ्र ही स्वतंत्र हो गई।
- वेंगी पूर्वी चालुक्यों से पहले शालंकायन और विष्णुकुंडिन शासकों के काल में भी सत्ता का केंद्र रह चुका था; बाद में पूर्वी चालुक्यों का केंद्र राजमहेंद्रवरम अर्थात् आज के राजमुंदरी की ओर भी खिसका।
- राजराज नरेंद्र के संरक्षण में नन्नय ने महाभारत का तेलुगु में अनुवाद आरंभ किया; वे तेलुगु के आदिकवि माने जाते हैं और यह वंश तेलुगु साहित्य के आरंभ से जुड़ा है।
- सालिहुन्डम श्रीकाकुलम क्षेत्र में वंशधारा नदी के तट पर स्थित बौद्ध पुरास्थल है, जहाँ स्तूपों और विहारों के अवशेष मिले हैं।
- भट्टीप्रोलू कृष्णा डेल्टा में गुंटूर के पास है और वहाँ की अस्थि-मंजूषाओं पर उत्कीर्ण अभिलेख ब्राह्मी के एक विशिष्ट प्रकार में हैं, जिसे भट्टीप्रोलू लिपि कहा जाता है।
- प्रसिद्ध बौद्ध पुरास्थलों को राजनीतिक राजधानी मान लेना; सालिहुन्डम और भट्टीप्रोलू दोनों धार्मिक-पुरातात्त्विक स्थल हैं, राजधानियाँ नहीं।
- पूर्वी चालुक्यों को बादामी के चालुक्यों से न अलग कर पाना; बादामी वातापी में थे, वेंगी की शाखा तटीय आंध्र में और उसकी स्थापना कुब्ज विष्णुवर्धन ने की।
- नाम-साम्य के सुराग़ की उपेक्षा कर देना; 'वेंगी' का अंश 'वेगी' पेड्डावेगी में बचा हुआ है और यही सबसे सस्ता संकेत है।
- अपरिचित नाम देखकर अनुमान लगा बैठना; जिस विकल्प का कोई संदर्भ न बने उसे छोड़ देना ही ठीक रहता है, विशेषकर ऋणात्मक अंकन वाली परीक्षा में।
प्राचीन और मध्यकालीन भारत के खंड में स्थान-पहचान का प्रश्न लगभग हर वर्ष किसी न किसी रूप में आता है : कभी राजधानी और आधुनिक नगर का मिलान, कभी पुरास्थल और उसकी विशेषता का, और कभी नदी-तट पर बसे नगर की पहचान। इसी प्रश्नपत्र में स्थल और मंदिर से जुड़े प्रश्न अलग से भी हैं, इसलिए यह विषय एक बार ठीक से पढ़ लेने पर कई प्रश्नों में लौटता है। सबसे उपयोगी तैयारी एक छोटी-सी तालिका है, जिसमें प्रत्येक बड़े राजवंश की राजधानी, उसका आधुनिक नाम और वह राज्य लिखा हो जिसमें वह स्थान आज पड़ता है। उसके साथ बौद्ध और जैन पुरास्थलों की एक अलग सूची रखिए, ताकि विकल्प में धार्मिक स्थल और राजनीतिक केंद्र एक साथ आने पर भ्रम न हो। और अंत में नाम की निरंतरता पर ध्यान दीजिए — बहुत बार प्राचीन नाम आधुनिक नाम के भीतर बचा हुआ मिलता है और वही सबसे तेज़ सुराग़ बन जाता है।
इस प्रश्न से सीधे संबंधित कोई पूर्व PYQ उपलब्ध नहीं।
- practice — not a real PYQ
पूर्वी चालुक्य (वेंगी के चालुक्य) वंश की स्थापना किसने की थी?
- (a)कुब्ज विष्णुवर्धन
- (b)पुलकेशिन द्वितीय
- (c)राजराज नरेंद्र
- (d)विजयादित्य तृतीय
उत्तर(a) कुब्ज विष्णुवर्धन — वे बादामी के चालुक्य नरेश पुलकेशिन द्वितीय के भाई थे और आंध्र-विजय के बाद वहाँ के शासक बनाए गए; शीघ्र ही यह शाखा स्वतंत्र हो गई। राजराज नरेंद्र इसी वंश के बाद के शासक थे, जिनके संरक्षण में नन्नय ने तेलुगु महाभारत आरंभ किया।
- practice — not a real PYQ
अस्थि-मंजूषाओं पर उत्कीर्ण उन अभिलेखों के लिए तटीय आंध्र का कौन-सा स्थल प्रसिद्ध है, जो ब्राह्मी के एक विशिष्ट प्रकार में लिखे गए हैं?
- (a)भट्टीप्रोलू
- (b)सालिहुन्डम
- (c)पेड्डावेगी
- (d)गुंटुपल्ली
उत्तर(a) भट्टीप्रोलू — यहाँ के स्तूप से मिली अस्थि-मंजूषाओं के अभिलेख ब्राह्मी के जिस प्रकार में हैं, उसे इसी स्थल के नाम पर भट्टीप्रोलू लिपि कहा जाता है।