कौटिल्य ने अपने अर्थशास्त्र में मोतियों की किस्मों की कहाँ से उपलब्धता का वर्णन किया है?
- (a)मदुरा क्षेत्र की पहाड़ियाँ
- (b)श्रवणबेलगोला पहाड़ियाँ
- (c)पांड्य राज की ताम्रपर्णी नदी
- (d)पलक्कड़ क्षेत्र की कावेरी नदी
सही उत्तर — C, (c) पांड्य राज की ताम्रपर्णी नदी। कौटिल्य का अर्थशास्त्र केवल राजनीति का ग्रंथ नहीं है; उसका दूसरा अधिकरण राज्य के अध्यक्षों के काम का ब्योरा देता है और उसमें कोश में आने वाले रत्नों की परीक्षा का एक पूरा प्रकरण है। वहीं मोतियों की किस्में उनके उद्गम-स्थान के नाम से गिनाई गई हैं, और सूची का पहला तथा सबसे प्रसिद्ध नाम ताम्रपर्णिक है — अर्थात् पांड्य देश की ताम्रपर्णी नदी से प्राप्त मोती। सूची में आगे पांड्यकवाटक, पाशिक्य, कौलेय, चूर्णेय, माहेन्द्र, कार्दमिक, स्रौतसीय, ह्रादीय और हैमवत जैसे नाम आते हैं। इनमें से कौलेय सिंहल की कुल नदी से और चूर्णेय केरल की चूर्णी नदी से जुड़ा है। इस पूरी सूची की बनावट एक ही है — मोती का नाम उस जलाशय या क्षेत्र से बनता है जहाँ से वह आता है, इसलिए विकल्प में जो जल-स्रोत छपा हो, प्रश्न वस्तुतः उसी की पहचान माँगता है। ताम्रपर्णी का उत्तर स्वतंत्र प्रमाणों से भी टिकता है। यह नदी दक्षिण तमिल क्षेत्र में बहकर मन्नार की खाड़ी में गिरती है, और उसके मुहाने पर बसा कोरकई पांड्यों का वह पत्तन था जिसकी मोती-मत्स्यन के लिए ख्याति संगम साहित्य और विदेशी विवरणों दोनों में मिलती है। पेरिप्लस जैसे यूनानी-रोमन वृत्तांत पांड्य तट के मोतियों का उल्लेख करते हैं, और रोम को होने वाले निर्यात में मोती एक प्रमुख मद था। अर्थशास्त्र का यह उल्लेख इसलिए महत्त्वपूर्ण है कि वह उत्तर भारत के एक राजनीतिक ग्रंथ में सुदूर दक्षिण के आर्थिक भूगोल की जानकारी दर्ज करता है — मौर्यकालीन उत्तर और सुदूर दक्षिण के बीच व्यापारिक संपर्क का यही सबसे उद्धृत साक्ष्य है, और परीक्षा में इसी कारण यह प्रश्न लौटता है।
- (a)मदुरा क्षेत्र की पहाड़ियाँ — यह विकल्प इस समुच्चय का सबसे कुशल जाल है, क्योंकि इसका आधा भाग सही है। मदुरा, अर्थात् मदुरै, पांड्यों की राजधानी थी, इसलिए 'पांड्य' और 'मदुरा' का जोड़ा मन में पहले से बना बैठता है। किन्तु मोती न पहाड़ियों से निकलते हैं और न किसी खान से — वे सीपियों से मिलते हैं, और उनका स्रोत समुद्र-तट अथवा नदी का मुहाना होता है। अर्थशास्त्र भी मोतियों की किस्में जल-स्रोतों के नाम से गिनाता है, पर्वतों के नाम से नहीं; पर्वत-नाम उस ग्रंथ में मणियों और अन्य रत्नों के प्रसंग में आते हैं। पांड्य देश का मोती-केंद्र राजधानी मदुरै नहीं, बल्कि ताम्रपर्णी के मुहाने पर बसा पत्तन कोरकई था। इसलिए विकल्प का 'क्षेत्र' सही होकर भी 'पहाड़ियाँ' उसे ग़लत कर देती हैं।
- (b)श्रवणबेलगोला पहाड़ियाँ — श्रवणबेलगोला कर्नाटक में है और उसकी प्रसिद्धि जैन धर्म से जुड़ी है, किसी रत्न-स्रोत से नहीं। वहाँ की दो पहाड़ियाँ चंद्रगिरि और विंध्यगिरि हैं; विंध्यगिरि पर गोमटेश्वर अर्थात् बाहुबली की विशाल एकाश्म प्रतिमा है, जिसे लगभग 981 ईस्वी में पश्चिमी गंग नरेश राचमल्ल के मंत्री चामुण्डराय ने स्थापित करवाया था। जैन परंपरा इस स्थान को भद्रबाहु और चंद्रगुप्त मौर्य की दक्षिण-यात्रा से भी जोड़ती है, और यही परंपरा इस विकल्प को ख़तरनाक बनाती है — प्रश्न में कौटिल्य का नाम है, कौटिल्य चंद्रगुप्त से जुड़े हैं, और अभ्यर्थी इसी शृंखला के सहारे यहाँ फिसल सकता है। मौर्य-संबंध चाहे जो हो, मोतियों की किस्मों की सूची में श्रवणबेलगोला कहीं नहीं आता।
- (d)पलक्कड़ क्षेत्र की कावेरी नदी — इस विकल्प में दो अलग-अलग भूगोल जबरन जोड़ दिए गए हैं। कावेरी कर्नाटक के कुर्ग क्षेत्र में तलकावेरी से निकलकर पूर्व की ओर बहती है और तमिलनाडु में बंगाल की खाड़ी में गिरती है; वह केरल के पलक्कड़ से होकर नहीं बहती। पलक्कड़ की मुख्य नदी भारतपुझा है, और पलक्कड़ की असली भौगोलिक पहचान पश्चिमी घाट का वह दर्रा है जो केरल को तमिल क्षेत्र से जोड़ता है। अर्थशास्त्र की सूची में केरल से जुड़ा नाम चूर्णेय है, जो चूर्णी नदी से आता है, कावेरी से नहीं। इसलिए यह विकल्प न नदी के नाम पर टिकता है और न क्षेत्र के नाम पर, और इसे ख़ारिज करने के लिए मानचित्र का सामान्य ज्ञान ही पर्याप्त है।
अर्थशास्त्र का दूसरा अधिकरण 'अध्यक्षप्रचार' कहलाता है और वह राज्य के विभिन्न अध्यक्षों — कोशाध्यक्ष, पण्याध्यक्ष, सीताध्यक्ष, सुवर्णाध्यक्ष, आकराध्यक्ष आदि — के कर्तव्य गिनाता है। कोश में आने वाले रत्नों की परीक्षा का प्रकरण इसी अधिकरण में है और वहीं मोती, मणि, हीरे, प्रवाल और शंख की किस्में उनके उद्गम के अनुसार वर्गीकृत हैं। इस वर्गीकरण की शैली एक ही है : वस्तु का नाम स्थान से बनता है, जैसे ताम्रपर्णी से ताम्रपर्णिक और चूर्णी से चूर्णेय। इतिहास की दृष्टि से इस सूची का महत्त्व दो कारणों से है। पहला, यह बताती है कि राज्य की आय में विलासिता की वस्तुओं का व्यापार कितना नियोजित था — रत्नों की परीक्षा, मूल्यांकन और कोश में प्रवेश तक की प्रक्रिया लिखित थी। दूसरा, यह उत्तर भारत में लिखे गए ग्रंथ में सुदूर दक्षिण और सिंहल तक के आर्थिक भूगोल की जानकारी दर्ज करती है, जिससे मौर्यकाल में उपमहाद्वीपीय व्यापारिक संपर्कों का अनुमान मिलता है।
पांड्य देश के मोतियों की ख्याति भारतीय और विदेशी दोनों साक्ष्यों में मिलती है, और यही इस प्रश्न का सहारा है। ताम्रपर्णी दक्षिण तमिल क्षेत्र की नदी है जो मन्नार की खाड़ी में गिरती है; उसके मुहाने पर बसा कोरकई पांड्यों का पत्तन था और मोती-मत्स्यन का केंद्र। संगम साहित्य में मोती पांड्य राज्य की पहचान की वस्तु है, और यूनानी-रोमन वृत्तांत भी भारत के दक्षिणी तट से मोतियों के निर्यात का उल्लेख करते हैं। इस पृष्ठभूमि में अर्थशास्त्र का उल्लेख अकेला नहीं पड़ता, बल्कि एक बड़े साक्ष्य-समूह का हिस्सा बन जाता है — और परीक्षा में जो प्रश्न इस तरह कई स्वतंत्र स्रोतों से टिकते हैं, वे बार-बार लौटते हैं। ध्यान देने योग्य एक और बात यह है कि इस प्रश्न का हिन्दी रूप पूरा प्रश्नवाचक वाक्य है, जबकि अंग्रेज़ी स्तंभ में यही प्रश्न अधूरे वाक्य के रूप में छपा है जिसे विकल्प पूरा करते हैं। अर्थ दोनों में एक ही है, केवल वाक्य-रचना अलग है, इसलिए हिन्दी माध्यम के अभ्यर्थी को यहाँ कोई अतिरिक्त सावधानी नहीं चाहिए।
- कौटिल्य के अर्थशास्त्र में मोतियों की किस्में उनके उद्गम-स्थान के नाम से गिनाई गई हैं, और उनमें ताम्रपर्णिक — पांड्य देश की ताम्रपर्णी नदी का मोती — सबसे प्रसिद्ध है।
- उसी सूची में पांड्यकवाटक, पाशिक्य, कौलेय, चूर्णेय, माहेन्द्र, कार्दमिक, स्रौतसीय, ह्रादीय और हैमवत जैसे नाम आते हैं; कौलेय सिंहल की कुल नदी से और चूर्णेय केरल की चूर्णी नदी से जुड़ा है।
- रत्नों की परीक्षा का यह प्रकरण अर्थशास्त्र के दूसरे अधिकरण 'अध्यक्षप्रचार' में है, जो राज्य के अध्यक्षों के कर्तव्यों का विस्तृत ब्योरा देता है।
- ताम्रपर्णी दक्षिण तमिल क्षेत्र में बहकर मन्नार की खाड़ी में गिरती है; उसके मुहाने पर बसा कोरकई पांड्यों का पत्तन और मोती-मत्स्यन का प्रसिद्ध केंद्र था।
- श्रवणबेलगोला कर्नाटक का जैन केंद्र है; विंध्यगिरि पर गोमटेश्वर (बाहुबली) की एकाश्म प्रतिमा लगभग 981 ईस्वी में पश्चिमी गंग नरेश राचमल्ल के मंत्री चामुण्डराय ने स्थापित करवाई थी।
- कावेरी कर्नाटक के तलकावेरी से निकलती है और पलक्कड़ से होकर नहीं बहती; पलक्कड़ की मुख्य नदी भारतपुझा है और उसकी पहचान पश्चिमी घाट के दर्रे से है।
- 'मदुरा' और 'पांड्य' के सही जोड़े से भ्रमित होकर पहला विकल्प चुन लेना; क्षेत्र सही है, पर मोती पहाड़ियों से नहीं मिलते और पांड्य मोती-केंद्र कोरकई था।
- कौटिल्य–चंद्रगुप्त–श्रवणबेलगोला की जैन परंपरा वाली शृंखला बनाकर दूसरा विकल्प चुन लेना; वह स्थल जैन इतिहास का है, रत्न-भूगोल का नहीं।
- कावेरी के प्रवाह-मार्ग पर ध्यान न देना; वह कर्नाटक से निकलकर तमिलनाडु में गिरती है और पलक्कड़ से होकर नहीं बहती।
- अर्थशास्त्र को केवल राजनीति का ग्रंथ मान लेना और उसके आर्थिक-भौगोलिक विवरणों की उपेक्षा कर देना, जबकि परीक्षा में वे विवरण ही पूछे जाते हैं।
प्राचीन भारत के खंड में अर्थशास्त्र से प्रश्न प्रायः तीन साँचों में आते हैं। पहला, ग्रंथ के किसी विशिष्ट विवरण की पहचान — जैसे यहाँ मोतियों का उद्गम, या अन्यत्र खान, नमक, सूत, मद्य और वेश्या तक पर राज्य के अध्यक्षों का नियंत्रण। दूसरा, ग्रंथ के सैद्धांतिक अंश — सप्तांग, मंडल सिद्धांत, षाड्गुण्य नीति — पर सीधा प्रश्न। तीसरा, ग्रंथ को अन्य स्रोतों के साथ मिलाकर पूछा गया युग्म-प्रश्न, जिसमें ग्रंथ और उसके लेखक अथवा विषय का सुमेलन कराया जाता है; इसी प्रश्नपत्र में प्राचीन ग्रंथ और उसके अर्थ का एक युग्म-प्रश्न अलग से है। तैयारी में सबसे अधिक लाभ इस बात से होता है कि हर विवरण को उसके भूगोल के साथ याद रखा जाए — नदी, पत्तन और राज्य एक साथ। इसी आदत से इस प्रश्न के तीनों असत्य विकल्प बिना ग्रंथ पढ़े भी कट जाते हैं।
इस प्रश्न से सीधे संबंधित कोई पूर्व PYQ उपलब्ध नहीं।
- practice — not a real PYQ
ताम्रपर्णी नदी के मुहाने पर बसा पांड्यों का वह प्राचीन पत्तन कौन-सा था, जो मोती-मत्स्यन के लिए प्रसिद्ध था?
- (a)कोरकई
- (b)अरिकामेडु
- (c)ताम्रलिप्ति
- (d)भड़ौच
उत्तर(a) कोरकई — यह पांड्य राज्य का पत्तन था और मोती-मत्स्यन का केंद्र। अरिकामेडु पूर्वी तट पर रोमन व्यापार से जुड़ा स्थल है, ताम्रलिप्ति बंगाल का पत्तन था और भड़ौच पश्चिमी तट का।
- practice — not a real PYQ
श्रवणबेलगोला में गोमटेश्वर (बाहुबली) की विशाल एकाश्म प्रतिमा किस राजवंश के काल में स्थापित हुई थी?
- (a)पश्चिमी गंग
- (b)राष्ट्रकूट
- (c)होयसल
- (d)कदंब
उत्तर(a) पश्चिमी गंग — यह प्रतिमा लगभग 981 ईस्वी में गंग नरेश राचमल्ल के मंत्री चामुण्डराय ने स्थापित करवाई थी। होयसल बाद के हैं और उनकी पहचान बेलूर तथा हलेबिड के मंदिरों से है।