उपचारात्मक याचिका (क्यूरेटिव पिटीशन) के बारे में, निम्नलिखित में से कौन-सा/से कथन सही है/हैं? 1. इस पर केवल भारत के उच्चतम न्यायालय में विचार हो सकता है। 2. इस पर भारत के उच्चतम न्यायालय और उच्च न्यायालयों में विचार हो सकता है। 3. उपचारात्मक याचिका दायर करने के लिए किसी वरिष्ठ अधिवक्ता द्वारा प्रमाणन आवश्यक है। नीचे दिए गए कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिए।
- (a)केवल 1
- (b)केवल 3
- (c)2 और 3
- (d)1 और 3
सही उत्तर — D, (d) 1 और 3 — उपचारात्मक याचिका पर विचार केवल उच्चतम न्यायालय में हो सकता है, और उसे दायर करने के लिए किसी वरिष्ठ अधिवक्ता का प्रमाणन आवश्यक है। पहले यह देखिए कि उपचारात्मक याचिका है क्या। उच्चतम न्यायालय को अपने ही निर्णय के पुनर्विलोकन की शक्ति अनुच्छेद 137 से मिलती है। किंतु पुनर्विलोकन याचिका भी ख़ारिज हो जाने के बाद क्या कोई रास्ता बचता है? इसी प्रश्न पर रूपा अशोक हुर्रा बनाम अशोक हुर्रा (2002) में उच्चतम न्यायालय ने यह व्यवस्था दी कि अंतिम निर्णय के विरुद्ध भी, अत्यंत सीमित परिस्थितियों में, एक अंतिम उपचार उपलब्ध रहेगा, ताकि न्याय की घोर विफलता को रोका जा सके और न्यायालय की प्रक्रिया के दुरुपयोग को टाला जा सके। यही उपचारात्मक याचिका है, और वह न्यायालय की अंतर्निहित शक्तियों तथा अनुच्छेद 142 की पूर्ण न्याय करने की शक्ति पर टिकी है। इसी से कथन 1 सही ठहरता है और कथन 2 ग़लत। यह उपचार उच्चतम न्यायालय की अपनी रचना है और उसके अपने अंतिम निर्णयों के लिए है; उच्च न्यायालयों में उपचारात्मक याचिका जैसी कोई व्यवस्था नहीं है। उच्च न्यायालयों के पास पुनर्विलोकन की अपनी शक्ति अवश्य है, पर वह भिन्न वस्तु है। ध्यान दीजिए कि कथन 1 और कथन 2 परस्पर विरोधी हैं — एक कहता है केवल उच्चतम न्यायालय, दूसरा कहता है उच्चतम न्यायालय और उच्च न्यायालय — इसलिए दोनों एक साथ सही नहीं हो सकते, और यह बनावट ही आधे विकल्प काट देती है। कथन 3 भी सही है। इसी निर्णय में न्यायालय ने प्रक्रिया की शर्तें तय कीं, और उनमें एक यह है कि याचिका के साथ किसी वरिष्ठ अधिवक्ता का प्रमाणन लगा हो कि निर्धारित अपेक्षाएँ पूरी होती हैं। यह शर्त इसीलिए रखी गई कि हर हारा हुआ पक्ष अंतिम निर्णय के बाद फिर से न्यायालय के द्वार न खटखटाने लगे; प्रमाणन एक छननी का काम करता है। यही प्रक्रिया आगे चलकर उच्चतम न्यायालय नियमावली, 2013 में भी रखी गई। शेष प्रक्रिया भी संक्षेप में याद रखिए, क्योंकि प्रश्न उसी से बनते हैं : याचिका पहले तीन वरिष्ठतम न्यायाधीशों तथा उन न्यायाधीशों के पास परिचालित की जाती है जिन्होंने वह निर्णय दिया था; यदि उनमें बहुमत यह माने कि मामला सुनने योग्य है, तभी वह सुनवाई के लिए लगती है, और सामान्यतः वह कक्ष में ही निपटाई जाती है जब तक न्यायालय मौखिक सुनवाई का आदेश न दे। आधार भी सीमित हैं — नैसर्गिक न्याय के सिद्धांतों का उल्लंघन, जैसे पक्षकार को सूचना ही न मिलना या उसे सुना ही न जाना, अथवा किसी न्यायाधीश के पक्षपात की आशंका। तुच्छ याचिका पर न्यायालय अनुकरणीय ख़र्च भी लगा सकता है। छपाई का एक छोटा विवरण भी ध्यान देने योग्य है : पहले दो विकल्पों में ‘केवल’ लिखा है और अंतिम दो में नहीं, जबकि तीनों कथनों में से दो का नाम लेने पर अर्थ वही रहता है।
- (a)केवल 1 — यह विकल्प कथन 1 को तो ठीक पहचानता है, पर कथन 3 को छोड़ देता है। वरिष्ठ अधिवक्ता का प्रमाणन उपचारात्मक याचिका की एक निर्धारित प्रक्रियागत अपेक्षा है, कोई वैकल्पिक औपचारिकता नहीं : याचिका के साथ यह प्रमाणन लगाना पड़ता है कि निर्धारित अपेक्षाएँ पूरी होती हैं। यह शर्त उसी निर्णय में रखी गई जिसमें यह उपचार गढ़ा गया, और उसका उद्देश्य स्पष्ट है — अंतिम निर्णय के बाद भी मुक़दमा चलाते रहने की प्रवृत्ति पर अंकुश। इसलिए ‘केवल 1’ अधूरा उत्तर है। ऐसे प्रश्नों में यह आदत उपयोगी है कि प्रत्येक कथन पर अलग-अलग निर्णय लिखकर आगे बढ़िए, फिर विकल्पों में वह संयोजन खोजिए जो आपके तीनों निर्णयों से मेल खाता हो।
- (b)केवल 3 — यह विकल्प कथन 3 को तो ठीक पहचानता है, पर कथन 1 को छोड़ देता है, जबकि वही इस उपचार की सबसे बुनियादी पहचान है। उपचारात्मक याचिका उच्चतम न्यायालय की अपनी रचना है और उसके अपने अंतिम निर्णयों के विरुद्ध अंतिम उपचार है; उच्च न्यायालयों के लिए ऐसी कोई व्यवस्था नहीं बनाई गई। यह भी ध्यान रखिए कि यह अपील का कोई नया स्तर नहीं है — यह उन बहुत थोड़े मामलों के लिए है जहाँ नैसर्गिक न्याय का उल्लंघन हुआ हो या पक्षपात की आशंका रही हो। इसलिए ‘केवल 3’ भी अधूरा उत्तर है, और अधूरे उत्तर वाले दो विकल्प इस प्रश्न में जान-बूझकर आमने-सामने रखे गए हैं।
- (c)2 और 3 — यह विकल्प कथन 2 को सही मान लेता है, और यहीं मूल भूल है। उच्च न्यायालयों में उपचारात्मक याचिका पर विचार नहीं होता; उनके पास सिविल प्रक्रिया संहिता के अंतर्गत पुनर्विलोकन की अपनी शक्ति अवश्य है, पर वह उपचारात्मक याचिका नहीं है। इस विकल्प को काटने का एक और सीधा रास्ता कथनों की बनावट में ही है : कथन 1 और कथन 2 परस्पर विरोधी हैं, इसलिए दोनों में से ठीक एक ही सही हो सकता है, और कथन 1 वह है जो न्यायालय की स्थापित व्यवस्था दोहराता है। ऐसे विरोधी युग्म कथन-आधारित प्रश्नों में अकसर रखे जाते हैं, और उन्हें पहचान लेना विकल्प काटने का सबसे तेज़ उपाय है।
भारत में उच्चतम न्यायालय के किसी निर्णय के विरुद्ध उपचारों का क्रम इस प्रकार है। पहले सामान्य अपील अथवा विशेष अनुमति याचिका के मार्ग से मामला न्यायालय तक आता है और निर्णय होता है। उसके बाद अनुच्छेद 137 के अधीन पुनर्विलोकन याचिका दायर की जा सकती है, जो सामान्यतः उन्हीं न्यायाधीशों के समक्ष और प्रायः कक्ष में ही निपटती है। पुनर्विलोकन भी ख़ारिज हो जाने पर अंतिम सीढ़ी उपचारात्मक याचिका है, जिसे रूपा अशोक हुर्रा बनाम अशोक हुर्रा (2002) में विकसित किया गया और जो न्यायालय की अंतर्निहित शक्तियों तथा अनुच्छेद 142 पर आधारित है। उसके आधार बहुत सीमित रखे गए — नैसर्गिक न्याय के सिद्धांतों का उल्लंघन, अर्थात् पक्षकार को सूचना न मिलना या उसे सुना न जाना, तथा किसी न्यायाधीश के पक्षपात की आशंका — और प्रक्रिया भी कठोर : वरिष्ठ अधिवक्ता का प्रमाणन, तीन वरिष्ठतम न्यायाधीशों तथा निर्णय देने वाले न्यायाधीशों के पास परिचालन, बहुमत की सहमति पर ही सुनवाई, और तुच्छ याचिका पर अनुकरणीय ख़र्च। यह प्रक्रिया आगे उच्चतम न्यायालय नियमावली, 2013 में भी रखी गई। इससे अलग एक और उपचार है — दया याचिका — जो न्यायिक नहीं, कार्यपालिका का उपचार है और अनुच्छेद 72 तथा 161 के अधीन क्रमशः राष्ट्रपति तथा राज्यपाल के पास जाती है।
इस विषय की परीक्षा-प्रासंगिकता इसलिए अधिक है कि यह न्यायपालिका की उस बारीक व्यवस्था को छूता है जहाँ अंतिमता और न्याय के बीच संतुलन बनाना पड़ता है। न्यायिक निर्णय की अंतिमता का अपना मूल्य है — मुक़दमे कभी न कभी समाप्त होने चाहिए — और दूसरी ओर यह भी नहीं हो सकता कि किसी को सुने बिना दिया गया निर्णय सदा के लिए बना रहे। उपचारात्मक याचिका इसी तनाव का समाधान है, और इसीलिए उसके आधार तथा प्रक्रिया दोनों जान-बूझकर संकीर्ण रखे गए हैं। परीक्षा में इसी से जुड़े भ्रम पूछे जाते हैं : पुनर्विलोकन और उपचारात्मक याचिका का अंतर, कौन-सी याचिका किस न्यायालय में चलती है, और किस याचिका के लिए कौन-सी अपेक्षा अनिवार्य है। ध्यान दीजिए कि उपचारात्मक याचिका को अपील का एक और स्तर मान लेना सबसे आम ग़लतफ़हमी है — वह हर मामले में उपलब्ध उपचार नहीं है, बल्कि अपवाद है, और उसके सफल होने के उदाहरण बहुत थोड़े हैं।
- उपचारात्मक याचिका पर विचार केवल उच्चतम न्यायालय में हो सकता है; उच्च न्यायालयों में ऐसी कोई व्यवस्था नहीं है, यद्यपि उनके पास पुनर्विलोकन की अपनी शक्ति है।
- यह उपचार रूपा अशोक हुर्रा बनाम अशोक हुर्रा (2002) में विकसित किया गया और यह न्यायालय की अंतर्निहित शक्तियों तथा अनुच्छेद 142 की पूर्ण न्याय करने की शक्ति पर आधारित है।
- याचिका के साथ किसी वरिष्ठ अधिवक्ता का प्रमाणन लगाना आवश्यक है कि निर्धारित अपेक्षाएँ पूरी होती हैं; यही शर्त छननी का काम करती है।
- याचिका तीन वरिष्ठतम न्यायाधीशों तथा उन न्यायाधीशों के पास परिचालित की जाती है जिन्होंने वह निर्णय दिया था, और बहुमत के मानने पर ही सुनवाई होती है; सामान्यतः वह कक्ष में निपटती है।
- इसके आधार सीमित हैं — नैसर्गिक न्याय के सिद्धांतों का उल्लंघन, जैसे पक्षकार को सूचना या सुनवाई न मिलना, तथा किसी न्यायाधीश के पक्षपात की आशंका; तुच्छ याचिका पर अनुकरणीय ख़र्च लगाया जा सकता है।
- उच्चतम न्यायालय को अपने निर्णय के पुनर्विलोकन की शक्ति अनुच्छेद 137 से मिलती है, और उपचारात्मक याचिका उसी के बाद की अंतिम सीढ़ी है।
- उपचारात्मक याचिका को अपील का एक और स्तर मान लेना; वह सीमित आधारों पर उपलब्ध अपवाद है।
- उच्च न्यायालयों को भी इस उपचार में सम्मिलित कर लेना; उनके पास पुनर्विलोकन की शक्ति है, उपचारात्मक याचिका की नहीं।
- वरिष्ठ अधिवक्ता के प्रमाणन को औपचारिकता मान लेना; वह निर्धारित प्रक्रियागत अपेक्षा है।
- परस्पर विरोधी कथनों को साथ-साथ सही मान लेना; कथन 1 और 2 एक साथ सत्य नहीं हो सकते।
- पुनर्विलोकन और उपचारात्मक याचिका के आधार आपस में मिला देना; दूसरे के आधार पहले से भी अधिक संकीर्ण हैं।
न्यायपालिका के इस भाग से प्रश्न तीन ढंग से आते हैं। पहला ढंग कथन-आधारित है, जैसा यहाँ है, और उसमें प्रायः दो परस्पर विरोधी कथन रखकर देखा जाता है कि अभ्यर्थी अधिकारिता पहचानता है या नहीं; ऐसे युग्म दिख जाएँ तो तुरंत यह लिखिए कि दोनों एक साथ सही नहीं हो सकते। दूसरा ढंग वाद और अनुच्छेद जोड़ने का है : उपचारात्मक याचिका किस वाद से आई, पुनर्विलोकन की शक्ति किस अनुच्छेद से, पूर्ण न्याय की शक्ति किस अनुच्छेद से। तीसरा ढंग प्रक्रिया का है : कौन प्रमाणित करेगा, याचिका किसके पास परिचालित होगी, सुनवाई कक्ष में होगी या खुले न्यायालय में। तीनों के लिए एक ही तैयारी काम आती है — उपचारों का क्रम एक पंक्ति में लिख लीजिए, प्रत्येक के आगे उसका स्रोत, आधार और प्रक्रिया की एक-एक विशेषता जोड़ दीजिए।
इस प्रश्न से सीधे संबंधित कोई पूर्व PYQ उपलब्ध नहीं।
- practice — not a real PYQ
उपचारात्मक याचिका की संकल्पना उच्चतम न्यायालय ने किस वाद में प्रतिपादित की थी?
- (a)रूपा अशोक हुर्रा बनाम अशोक हुर्रा
- (b)केशवानंद भारती बनाम केरल राज्य
- (c)ए. के. गोपालन बनाम मद्रास राज्य
- (d)इंद्रा साहनी बनाम भारत संघ
उत्तर(a) रूपा अशोक हुर्रा बनाम अशोक हुर्रा
- practice — not a real PYQ
उच्चतम न्यायालय को अपने ही निर्णय या आदेश के पुनर्विलोकन की शक्ति संविधान के किस अनुच्छेद से प्राप्त है?
- (a)अनुच्छेद 32
- (b)अनुच्छेद 137
- (c)अनुच्छेद 143
- (d)अनुच्छेद 226
उत्तर(b) अनुच्छेद 137