राज्यपाल की अध्यादेश बनाने की शक्ति के बारे में, निम्नलिखित में से कौन-सा/से कथन सही नहीं है/हैं? 1. यह एक विवेकाधिकार शक्ति है और इसके लिए मंत्रियों की सलाह आवश्यक नहीं है। 2. राज्यपाल की अध्यादेश बनाने की शक्ति, अनुसूची VII की सभी तीन सूचियों के विषयों तक सीमित है। 3. समवर्ती विषयों से संबंधित संघ की विधि के विरुद्ध होने के मामले में, राज्यपाल का अध्यादेश इस विरुद्धता के बावजूद अभिभावी होगा, यदि अध्यादेश भारत के राष्ट्रपति के ‘अनुदेश’ के अनुसरण में बनाया गया है। नीचे दिए गए कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिए।
- (a)केवल 1 और 2
- (b)1, 2 और 3
- (c)केवल 2 और 3
- (d)केवल 3
सही उत्तर — A, (a) केवल 1 और 2 — इन्हीं दो कथनों में गड़बड़ है, जबकि कथन 3 अनुच्छेद 213 और अनुच्छेद 254(2) की योजना को ठीक-ठीक दोहराता है। पहले पूछ की दिशा देख लीजिए। प्रश्न नकारात्मक है — पुस्तिका में ‘नहीं’ मोटे अक्षरों में छपा है — इसलिए चुनना उन कथनों को है जो सही नहीं हैं। यह वह जगह है जहाँ सबसे अधिक अंक गँवाए जाते हैं, क्योंकि तीनों कथनों का विश्लेषण ठीक करने के बाद भी दिशा उलट जाने से उत्तर बदल जाता है। कथन 1 सही नहीं है। राज्यपाल अध्यादेश अनुच्छेद 213 के अधीन प्रख्यापित करते हैं, किंतु यह उनकी विवेकाधीन शक्ति नहीं है। अनुच्छेद 163(1) के अनुसार राज्यपाल अपने कृत्यों में मंत्रिपरिषद की सहायता और सलाह से काम करते हैं, सिवाय उन कृत्यों के जिनमें संविधान उन्हें स्वविवेक से कार्य करने को कहता है — और अध्यादेश प्रख्यापित करना उन कृत्यों में नहीं है। व्यवहार में अध्यादेश मंत्रिमंडल के निर्णय पर लाया जाता है, और ‘राज्यपाल का समाधान’ वस्तुतः मंत्रिपरिषद का ही समाधान होता है। कथन 2 भी सही नहीं है, और यहाँ ग़लती एक शब्द की है : ‘सभी तीन सूचियों’। अनुच्छेद 213 की शक्ति उतनी ही दूर तक जाती है जितनी दूर राज्य विधानमंडल की विधायी शक्ति जाती है, अर्थात् राज्य सूची और समवर्ती सूची तक। संघ सूची के विषयों पर राज्य विधानमंडल विधि नहीं बना सकता, इसलिए राज्यपाल भी उन विषयों पर अध्यादेश नहीं ला सकते। अनुच्छेद 213(3) इसी को दूसरे ढंग से कहता है : अध्यादेश उस सीमा तक शून्य होगा जिस सीमा तक वह ऐसा उपबंध करता है जो राज्य विधानमंडल के अधिनियम में होने पर विधिमान्य न होता। कथन 3 सही है, और उसका आधार अनुच्छेद 213(1) का परंतुक है। वह परंतुक कहता है कि तीन स्थितियों में राज्यपाल राष्ट्रपति के अनुदेशों के बिना अध्यादेश प्रख्यापित नहीं करेंगे, और उनमें वह स्थिति भी है जहाँ उन्हीं उपबंधों वाला राज्य अधिनियम तब तक विधिमान्य न होता जब तक राष्ट्रपति के विचार के लिए आरक्षित होकर उनकी अनुमति न पा जाता। समवर्ती विषय पर संघ की विधि से विरुद्धता की स्थिति ठीक यही है : अनुच्छेद 254(2) के अनुसार राज्य की विधि उस राज्य में अभिभावी होती है यदि वह राष्ट्रपति के विचार के लिए आरक्षित होकर उनकी अनुमति पा चुकी हो। अध्यादेश के मामले में राष्ट्रपति के अनुदेश वही भूमिका निभाते हैं जो आरक्षित विधेयक के मामले में उनकी अनुमति निभाती है, इसलिए ऐसा अध्यादेश विरुद्धता के बावजूद अभिभावी रहता है। अतः सही नहीं होने वाले कथन 1 और 2 हैं, और उत्तर विकल्प (a) है।
- (b)1, 2 और 3 — यह विकल्प कथन 3 को भी ग़लत बताता है, जबकि वह कथन संविधान की योजना ठीक-ठीक दोहराता है। अनुच्छेद 213(1) का परंतुक तीन स्थितियों में राष्ट्रपति के अनुदेश अनिवार्य करता है, और उनमें वह स्थिति सम्मिलित है जहाँ उन्हीं उपबंधों वाला अधिनियम राष्ट्रपति के विचार के लिए आरक्षित होकर अनुमति पाए बिना विधिमान्य न होता। समवर्ती सूची पर संघ की विधि से विरुद्धता इसी श्रेणी में आती है, क्योंकि अनुच्छेद 254(2) उसी शर्त पर राज्य की विधि को उस राज्य में अभिभावी बनाता है। इसलिए राष्ट्रपति के अनुदेशों के अनुसरण में बना अध्यादेश विरुद्धता के बावजूद प्रभावी रहता है। तीनों को एक साथ ग़लत बता देना उस अभ्यर्थी की प्रवृत्ति है जो लंबे और कठिन कथन को बिना पढ़े संदेह के घेरे में डाल देता है।
- (c)केवल 2 और 3 — यह विकल्प कथन 1 को छोड़ देता है और कथन 3 को जोड़ लेता है — अर्थात् दोनों सिरों पर भूल करता है। कथन 1 वस्तुतः सही नहीं है, क्योंकि अध्यादेश प्रख्यापित करना राज्यपाल की विवेकाधीन शक्ति नहीं है : अनुच्छेद 163(1) उन्हें मंत्रिपरिषद की सहायता और सलाह से कार्य करने को कहता है, और स्वविवेक केवल उन्हीं कृत्यों में है जिनमें संविधान स्पष्ट रूप से ऐसा कहे। राज्यपाल के विवेकाधीन कार्यों की सूची अलग है — जैसे राष्ट्रपति के विचार के लिए विधेयक आरक्षित करना, अनुच्छेद 356 के अंतर्गत प्रतिवेदन भेजना, अथवा किसी पड़ोसी क्षेत्र के प्रशासक के रूप में कार्य करना — और उसमें अध्यादेश नहीं आता। और कथन 3, जैसा ऊपर दिखाया गया, सही है, इसलिए वह ‘सही नहीं’ वाली सूची में आ ही नहीं सकता।
- (d)केवल 3 — यह विकल्प पूरी दिशा उलट देता है : वह केवल उसी कथन को ग़लत बताता है जो अकेला सही है, और उन दोनों को छोड़ देता है जिनमें वास्तव में गड़बड़ है। ऐसा उत्तर तब बनता है जब अभ्यर्थी कथन 3 की लंबाई और भाषा से घबरा जाए और कथन 1 तथा 2 को उनकी सरल भाषा के कारण सही मान ले। यहीं इस प्रकार के प्रश्नों की एक सामान्य सीख है : कथन की विश्वसनीयता उसकी लंबाई से तय नहीं होती, और नकारात्मक पूछ में हर कथन पर अलग-अलग निर्णय लिखकर आगे बढ़ना चाहिए। कथन 2 की गड़बड़ तो एक ही शब्द में है — ‘सभी तीन सूचियों’ — क्योंकि अध्यादेश की शक्ति राज्य विधानमंडल की विधायी शक्ति तक ही सीमित है, अर्थात् राज्य सूची और समवर्ती सूची तक।
अनुच्छेद 213 राज्यपाल को अध्यादेश प्रख्यापित करने की शक्ति देता है, और उसकी शर्तें चार हैं। पहली, राज्य विधानमंडल सत्र में न हो — द्विसदनीय राज्य में दोनों सदन सत्र में न हों। दूसरी, राज्यपाल का समाधान हो जाए कि ऐसी परिस्थितियाँ विद्यमान हैं जिनके कारण तुरंत कार्रवाई आवश्यक है। तीसरी, विषय वही हो जिस पर राज्य विधानमंडल विधि बना सकता है, अर्थात् राज्य सूची या समवर्ती सूची का। चौथी, परंतुक की तीन स्थितियों में राष्ट्रपति के अनुदेश लिए जाएँ — जब उन्हीं उपबंधों वाले विधेयक को विधानमंडल में पुरःस्थापित करने के लिए राष्ट्रपति की पूर्व मंज़ूरी चाहिए होती, जब राज्यपाल उसे राष्ट्रपति के विचार के लिए आरक्षित करना आवश्यक समझते, अथवा जब उन्हीं उपबंधों वाला अधिनियम राष्ट्रपति की अनुमति के बिना विधिमान्य न होता। अध्यादेश को विधानमंडल के अधिनियम जैसा ही बल और प्रभाव प्राप्त है, किंतु उसकी आयु सीमित है : उसे विधानमंडल के समक्ष रखना पड़ता है और वह पुनः समवेत होने से छह सप्ताह की समाप्ति पर प्रवर्तन में नहीं रहता, अथवा उससे पहले ही यदि अस्वीकृति का संकल्प पारित हो जाए; राज्यपाल उसे किसी भी समय वापस भी ले सकते हैं। इसी से अधिकतम आयु लगभग छह मास और छह सप्ताह बनती है, क्योंकि विधानमंडल के दो सत्रों के बीच छह मास से अधिक का अंतर नहीं हो सकता।
इस शक्ति के चारों ओर न्यायिक विकास भी परीक्षा की दृष्टि से महत्त्वपूर्ण है। डी. सी. वाधवा बनाम बिहार राज्य (1987) में उच्चतम न्यायालय ने अध्यादेशों के बार-बार पुनः प्रख्यापन को संविधान के साथ कपट कहा था, क्योंकि बिहार में वर्षों तक अध्यादेश दोहराए जाते रहे थे और विधानमंडल की भूमिका व्यावहारिक रूप से समाप्त हो गई थी। कृष्ण कुमार सिंह बनाम बिहार राज्य (2017) में सात न्यायाधीशों की पीठ ने इसे और स्पष्ट किया : अध्यादेश को विधानमंडल के समक्ष रखना अनिवार्य है, पुनः प्रख्यापन असंवैधानिक है, और अध्यादेश की समाप्ति पर उससे उपजे अधिकार सामान्यतः बने नहीं रहते। एक संवैधानिक इतिहास भी याद रखने योग्य है : 38वें संशोधन (1975) ने राज्यपाल के समाधान को अंतिम और अविवाद्य बनाने वाला उपबंध जोड़ा था, जिसे 44वें संशोधन (1978) ने हटा दिया, अर्थात् आज यह शक्ति न्यायिक पुनर्विलोकन से परे नहीं है। तुलना के लिए अनुच्छेद 123 भी साथ पढ़िए, जो राष्ट्रपति को यही शक्ति देता है; वहाँ राष्ट्रपति के अनुदेश वाला परंतुक नहीं है, और वही इन दोनों अनुच्छेदों का प्रमुख भेद है।
- अनुच्छेद 213 की अध्यादेश-शक्ति राज्यपाल की विवेकाधीन शक्ति नहीं है; अनुच्छेद 163(1) के अनुसार वे मंत्रिपरिषद की सहायता और सलाह से कार्य करते हैं और स्वविवेक केवल उन कृत्यों में है जिनमें संविधान स्पष्ट रूप से ऐसा कहे।
- अध्यादेश की विषय-सीमा राज्य विधानमंडल की विधायी शक्ति तक है, अर्थात् राज्य सूची और समवर्ती सूची तक; संघ सूची के विषय उसमें नहीं आते, इसलिए ‘सभी तीन सूचियों’ वाला कथन ग़लत है।
- अनुच्छेद 213(3) के अनुसार अध्यादेश उस सीमा तक शून्य होगा जिस सीमा तक वह ऐसा उपबंध करता है जो राज्य विधानमंडल के अधिनियम में होने पर विधिमान्य न होता।
- अनुच्छेद 213(1) का परंतुक तीन स्थितियों में राष्ट्रपति के अनुदेश अनिवार्य करता है, और समवर्ती विषय पर संघ की विधि से विरुद्धता की स्थिति उन्हीं में आती है; अनुच्छेद 254(2) के अनुसार ऐसी राज्य-विधि उस राज्य में अभिभावी होती है।
- अध्यादेश को विधानमंडल के समक्ष रखना पड़ता है और वह पुनः समवेत होने से छह सप्ताह की समाप्ति पर प्रवर्तन में नहीं रहता; राज्यपाल उसे किसी भी समय वापस ले सकते हैं।
- डी. सी. वाधवा बनाम बिहार राज्य (1987) में पुनः प्रख्यापन को संविधान के साथ कपट कहा गया, और कृष्ण कुमार सिंह बनाम बिहार राज्य (2017) में सात न्यायाधीशों की पीठ ने विधानमंडल के समक्ष रखने की अनिवार्यता तथा पुनः प्रख्यापन की असंवैधानिकता दोहराई।
- नकारात्मक पूछ की दिशा उलट देना; पुस्तिका में ‘नहीं’ मोटे अक्षरों में छपा है और चुनने हैं वे कथन जो सही नहीं हैं।
- अध्यादेश-शक्ति को विवेकाधीन मान लेना; राज्यपाल इसमें भी मंत्रिपरिषद की सलाह से ही कार्य करते हैं।
- ‘सभी तीन सूचियों’ वाले शब्द को हल्के में पढ़ जाना; शक्ति राज्य सूची और समवर्ती सूची तक सीमित है।
- लंबे और कठिन कथन को केवल उसकी भाषा के कारण ग़लत मान लेना; कथन 3 संविधान की योजना ही दोहरा रहा है।
- अनुच्छेद 123 और 213 को एक मान लेना; राष्ट्रपति के अनुदेश वाला परंतुक केवल राज्यपाल की शक्ति के साथ है।
अध्यादेश-शक्ति से प्रश्न तीन ढंग से आते हैं। पहला ढंग कथन-आधारित है, जैसा यहाँ है, और उसमें एक कथन प्रायः शक्ति के स्रोत या विवेक से जुड़ा होता है, दूसरा विषय-सीमा से, और तीसरा परंतुक या अवधि से; इसलिए तीनों बिंदु — सलाह, सूचियाँ, और परंतुक — अलग-अलग याद रखिए। दूसरा ढंग तिथि और अवधि का है : अध्यादेश कब तक प्रभावी रहेगा, छह सप्ताह की गणना कहाँ से होगी, और अधिकतम आयु कितनी बनती है। तीसरा ढंग वाद-आधारित है : किस वाद में पुनः प्रख्यापन को संविधान के साथ कपट कहा गया, अथवा किस निर्णय ने विधानमंडल के समक्ष रखने की अनिवार्यता दोहराई। तीनों के लिए तैयारी का ढंग यही है कि अनुच्छेद 123 और 213 को आमने-सामने रखकर एक तालिका बना लीजिए, जिसमें शर्तें, सीमाएँ, परंतुक और अवधि एक साथ दिखें।
इस प्रश्न से सीधे संबंधित कोई पूर्व PYQ उपलब्ध नहीं।
- practice — not a real PYQ
यदि राज्य विधानमंडल किसी अध्यादेश को अनुमोदित न करे, तो अनुच्छेद 213 के अंतर्गत वह अधिक-से-अधिक कब तक प्रवर्तन में रह सकता है?
- (a)विधानमंडल के पुनः समवेत होने से छह सप्ताह की समाप्ति तक
- (b)प्रख्यापन की तिथि से ठीक छह मास तक
- (c)एक वर्ष तक
- (d)जब तक राज्यपाल चाहें
उत्तर(a) विधानमंडल के पुनः समवेत होने से छह सप्ताह की समाप्ति तक
- practice — not a real PYQ
किस वाद में उच्चतम न्यायालय ने अध्यादेशों के बार-बार पुनः प्रख्यापन को ‘संविधान के साथ कपट’ कहा था?
- (a)डी. सी. वाधवा बनाम बिहार राज्य
- (b)केशवानंद भारती बनाम केरल राज्य
- (c)एस. आर. बोम्मई बनाम भारत संघ
- (d)मिनर्वा मिल्स बनाम भारत संघ
उत्तर(a) डी. सी. वाधवा बनाम बिहार राज्य