लेखाकरण मानक–1 के अनुसार, निम्नलिखित में से कौन-सी, मूल लेखाकरण मान्यताएँ हैं?
- (a)सतत व्यापार, समनुरूपता, प्रोद्भवन
- (b)सतत व्यापार, मुद्रा-मापन, रूढ़िवादिता
- (c)सतत व्यापार, समनुरूपता, रूढ़िवादिता
- (d)सतत व्यापार, लेखांकन अवधि, प्रोद्भवन
सही उत्तर — A, (a) सतत व्यापार, समनुरूपता, प्रोद्भवन — यही तीन मान्यताएँ लेखाकरण मानक–1 में ‘मूलभूत लेखांकन मान्यताएँ’ (fundamental accounting assumptions) के नाम से गिनाई गई हैं, और मानक में इनकी संख्या तीन ही है। लेखाकरण मानक–1 का विषय है लेखांकन नीतियों का प्रकटीकरण। वह कहता है कि ये तीन मान्यताएँ किसी भी वित्तीय विवरण के आधार में स्वतः निहित मानी जाती हैं, इसलिए यदि इनका पालन किया गया है तो अलग से कुछ बताने की आवश्यकता नहीं; किंतु यदि इनमें से किसी का पालन नहीं किया गया है, तो उस तथ्य को प्रकट करना अनिवार्य है। प्रकटीकरण की यह उलटी बनावट ही बताती है कि ये तीन ‘मान्यताएँ’ हैं और शेष धारणाएँ नहीं। तीनों का अर्थ अलग-अलग देखिए। सतत व्यापार (going concern) का अर्थ है कि उद्यम निकट भविष्य में चलता रहेगा, उसका न तो समापन का इरादा है और न ही प्रचालन का पैमाना उल्लेखनीय रूप से घटाने की विवशता; इसी मान्यता के कारण स्थायी परिसंपत्तियाँ लागत में से ह्रास घटाकर दिखाई जाती हैं, न कि उस मूल्य पर जो आज बेचने पर मिलता। समनुरूपता (consistency) का अर्थ है कि एक ही उद्यम एक अवधि से दूसरी अवधि तक वही लेखांकन नीतियाँ अपनाए, ताकि वर्षों की तुलना संभव रहे। प्रोद्भवन (accrual) का अर्थ है कि आय और लागत उसी अवधि में दर्ज हों जिससे वे संबंधित हैं — जब वे अर्जित या उपगत हुईं, न कि जब नक़दी आई या गई; कंपनी अधिनियम, 2013 की धारा 128 भी कंपनियों से प्रोद्भवन आधार और दोहरा लेखा प्रणाली ही अपेक्षित करती है। हिन्दी पाठ में एक शब्द पर सावधानी चाहिए। ‘समनुरूपता’ पढ़कर कई अभ्यर्थी उसे ‘एकरूपता’ के अर्थ में ले लेते हैं, मानो सभी उद्यमों को एक जैसी नीतियाँ अपनानी हों। मान्यता यह है ही नहीं : वह एक ही उद्यम के भीतर, समय के आर-पार नीतियों के स्थिर बने रहने की बात कहती है। साथ ही ध्यान रहे कि पुस्तिका में ‘मानक–1’ अंक से पहले लंबी डैश के साथ छपा है। विकल्पों की बनावट भी संकेत देती है : चारों में सतत व्यापार समान है, इसलिए निर्णय शेष दो पदों पर टिकता है, और (c) तथा (d) में ठीक एक-एक बाहरी पद घुसाया गया है।
- (b)सतत व्यापार, मुद्रा-मापन, रूढ़िवादिता — इस विकल्प में तीन में से दो पद बाहर के हैं। मुद्रा-मापन (money measurement) एक आधारभूत लेखांकन संकल्पना अवश्य है — केवल वही लेन-देन बहीखाते में आते हैं जिन्हें मुद्रा में मापा जा सके, इसलिए कर्मचारियों का मनोबल या प्रबंधन की कुशलता खातों में नहीं दिखती — किंतु लेखाकरण मानक–1 उसे मूलभूत मान्यताओं में नहीं गिनता। रूढ़िवादिता या विवेकशीलता (conservatism/prudence) भी मानक–1 में आती है, पर एक भिन्न शीर्ष के नीचे : वह उन तीन प्रमुख विचारों में से एक है जो लेखांकन नीतियों के चयन और प्रयोग को नियंत्रित करते हैं — विवेकशीलता, रूप पर सार की प्रधानता, और सारता। यही इस प्रश्न का सबसे उपयोगी भेद है : विवेकशीलता मानक में उपस्थित तो है, पर मान्यता के रूप में नहीं। और इस विकल्प में प्रोद्भवन का छूट जाना उसे स्वतः ही अधूरा कर देता है।
- (c)सतत व्यापार, समनुरूपता, रूढ़िवादिता — यह निकटतम जाल है, क्योंकि इसमें तीन में से दो पद ठीक हैं — सतत व्यापार और समनुरूपता — और केवल तीसरा बदल दिया गया है। रूढ़िवादिता की जगह वहाँ प्रोद्भवन आना चाहिए था। रूढ़िवादिता का अपना अर्थ ठीक है : संभावित हानियों का प्रावधान कर लो, पर अनर्जित लाभ मत गिनो; इसी से समापन-स्कंध का मूल्यांकन लागत या निवल वसूली-योग्य मूल्य, इनमें से जो कम हो उस पर होता है, और संदिग्ध ऋणों का प्रावधान बनाया जाता है। किंतु मानक–1 में उसका स्थान नीतियों के चयन को नियंत्रित करने वाले विचारों में है, मूलभूत मान्यताओं में नहीं। एक-पद-बदला विकल्प इस प्रकार के प्रश्नों की सामान्य बनावट है, इसलिए तीनों पद पढ़े बिना टिक मत लगाइए।
- (d)सतत व्यापार, लेखांकन अवधि, प्रोद्भवन — यह दूसरा निकटतम जाल है : सतत व्यापार और प्रोद्भवन दोनों ठीक हैं, पर समनुरूपता के स्थान पर लेखांकन अवधि रख दी गई है। लेखांकन अवधि (accounting period) की धारणा भी सही और उपयोगी है — उद्यम का अनंत जीवन बारह-बारह महीनों में बाँटकर देखा जाता है, तभी आवधिक लाभ निकाला जा सकता है — किंतु मानक–1 उसे मूलभूत मान्यता के रूप में नहीं गिनाता। ध्यान दीजिए कि यह धारणा सतत व्यापार से जुड़ी हुई है, उसका पर्याय नहीं : सतत व्यापार यह कहता है कि उद्यम चलता रहेगा, और लेखांकन अवधि यह कि उस निरंतर चलने वाले जीवन को मापने के लिए हम उसे कृत्रिम खंडों में बाँट लेते हैं। दो सही पद देखकर तीसरा मान लेना ही वह भूल है जिसके लिए यह विकल्प रखा गया है।
लेखाकरण मानक–1 (लेखांकन नीतियों का प्रकटीकरण) भारत के लेखा-मानकों में सबसे पहला और सबसे व्यापक है, क्योंकि वह किसी एक मद का उपचार नहीं बताता, बल्कि यह बताता है कि वित्तीय विवरण किन आधारों पर खड़े हैं और उनमें क्या-क्या बताना अनिवार्य है। उसकी तीन मूलभूत मान्यताएँ हैं — सतत व्यापार, समनुरूपता और प्रोद्भवन — और इनकी विशेषता यह है कि इन्हें स्वतः लागू माना जाता है : पालन करने पर बताने की आवश्यकता नहीं, पालन न करने पर बताना अनिवार्य। इनसे अलग, मानक तीन ऐसे विचार भी गिनाता है जो नीतियों के चयन और प्रयोग को नियंत्रित करते हैं — विवेकशीलता, रूप पर सार की प्रधानता, और सारता। परीक्षा की दृष्टि से यही दो सूचियाँ आपस में मिलाकर पूछी जाती हैं, और अधिकांश विकल्प इसी अदला-बदली से बनते हैं। इनके अलावा मुद्रा-मापन, लेखांकन अवधि, लागत, द्वैत, उपार्जन और मिलान जैसी धारणाएँ लेखांकन की सामान्य संकल्पनाएँ हैं, जिन्हें पाठ्यपुस्तकें आधार तो मानती हैं पर मानक–1 उन्हें मूलभूत मान्यता नहीं कहता। एक और तुलना ध्यान में रखिए : भारतीय लेखांकन मानकों (Ind AS) की संकल्पनात्मक रूपरेखा में केवल सतत व्यापार को अंतर्निहित मान्यता कहा गया है, अर्थात् गिनती वहाँ और भी छोटी हो जाती है।
इस प्रश्न की उपयोगिता केवल तीन नाम याद रखने में नहीं है, बल्कि यह समझने में है कि मान्यता और नीति अलग-अलग वस्तुएँ हैं। मान्यता वह आधार है जिस पर पूरा विवरण खड़ा है; नीति वह चुनाव है जो उद्यम अपनी परिस्थितियों के अनुसार करता है — ह्रास की विधि, स्कंध के मूल्यांकन का ढंग, अनुसंधान व्यय का उपचार। मानक–1 का पूरा उद्देश्य यही है कि ये चुनाव पाठक के सामने खुलकर रखे जाएँ, क्योंकि दो कंपनियों के लाभ की तुलना तभी अर्थपूर्ण है जब यह पता हो कि उन्होंने कौन-से चुनाव किए। इसी कारण मानक कहता है कि सभी महत्त्वपूर्ण लेखांकन नीतियाँ एक ही स्थान पर, वित्तीय विवरणों के अंग के रूप में, प्रकट की जाएँ और नीति में हुए किसी भी ऐसे परिवर्तन को बताया जाए जिसका चालू या आगामी अवधियों पर सारवान प्रभाव पड़ता हो। सतत व्यापार की मान्यता का व्यावहारिक महत्त्व भी देखिए : यदि लेखापरीक्षक को लगे कि उद्यम चलता नहीं रहेगा, तो परिसंपत्तियों का मूल्यांकन ही बदल जाता है और लेखापरीक्षा प्रतिवेदन में उसका उल्लेख करना पड़ता है।
- लेखाकरण मानक–1 का विषय लेखांकन नीतियों का प्रकटीकरण है, और उसमें मूलभूत लेखांकन मान्यताएँ ठीक तीन हैं — सतत व्यापार, समनुरूपता और प्रोद्भवन।
- इन तीनों को स्वतः लागू माना जाता है : पालन करने पर अलग से प्रकटीकरण अपेक्षित नहीं, किंतु पालन न करने पर उस तथ्य को प्रकट करना अनिवार्य है।
- मानक–1 तीन ऐसे विचार भी गिनाता है जो लेखांकन नीतियों के चयन और प्रयोग को नियंत्रित करते हैं — विवेकशीलता, रूप पर सार की प्रधानता, और सारता; विवेकशीलता यहीं आती है, मान्यताओं में नहीं।
- सतत व्यापार का अर्थ है कि उद्यम निकट भविष्य में चलता रहेगा; इसी कारण स्थायी परिसंपत्तियाँ लागत में से ह्रास घटाकर दिखाई जाती हैं, बेचने पर मिलने वाले मूल्य पर नहीं।
- प्रोद्भवन का अर्थ है आय और लागत को अर्जन या उपगत होने की अवधि में दर्ज करना; कंपनी अधिनियम, 2013 की धारा 128 कंपनियों से प्रोद्भवन आधार पर दोहरे लेखा की बहियाँ रखने की अपेक्षा करती है।
- समनुरूपता एक ही उद्यम के भीतर, समय के आर-पार नीतियों के स्थिर रहने की बात कहती है — सभी उद्यमों की नीतियों को एक जैसा करने की नहीं।
- तीन में से दो पद सही देखकर विकल्प चुन लेना; (c) और (d) दोनों में ठीक एक-एक बाहरी पद घुसाया गया है, इसलिए तीनों पद पढ़ना अनिवार्य है।
- विवेकशीलता या रूढ़िवादिता को मूलभूत मान्यता मान लेना; वह मानक–1 में है, पर नीतियों के चयन को नियंत्रित करने वाले विचारों में।
- मुद्रा-मापन और लेखांकन अवधि जैसी सामान्य संकल्पनाओं को मानक की मान्यताओं से मिला देना; वे लेखांकन के आधार तो हैं, पर मानक–1 की सूची में नहीं।
- ‘समनुरूपता’ को सभी उद्यमों में एकरूपता के अर्थ में पढ़ लेना; वह एक ही उद्यम की, वर्षों के आर-पार, नीति-स्थिरता है।
- प्रकटीकरण का नियम उलटा याद रखना; बताना तब पड़ता है जब मान्यता का पालन न किया गया हो।
लेखा-मानकों से यह खंड प्रायः तीन ढंग से पूछा जाता है। पहला ढंग सीधी सूची का है, जैसा यहाँ है — तीन नाम गिनवाकर एक पद बदल देना, और अधिकतर विकल्पों में पहला पद समान रखकर निर्णय को अंतिम दो पदों पर धकेल देना। दूसरा ढंग सुमेलन का है, जिसमें मानक की संख्या और उसका विषय जोड़ने को कहा जाता है — मानक–1 नीतियों का प्रकटीकरण, मानक–2 स्कंध का मूल्यांकन, मानक–5 पूर्व-अवधि तथा असाधारण मदें, और इसी क्रम में आगे। तीसरा ढंग स्थिति-आधारित है : कोई उद्यम ह्रास की विधि बदल देता है या समापन के कगार पर है, और पूछा जाता है कि किस मान्यता पर प्रश्न खड़ा होता है और क्या प्रकट करना पड़ेगा। तीनों के लिए एक ही तैयारी काम आती है — तीन मान्यताएँ और तीन विचार अलग-अलग सूचियों में कंठस्थ कर लीजिए, और हर सामान्य संकल्पना के आगे यह लिख लीजिए कि वह मानक की सूची में है या पाठ्यपुस्तक की।
इस प्रश्न से सीधे संबंधित कोई पूर्व PYQ उपलब्ध नहीं।
- practice — not a real PYQ
लेखाकरण मानक–1 के अनुसार, लेखांकन नीतियों के चयन और प्रयोग को नियंत्रित करने वाले प्रमुख विचार कौन-से हैं?
- (a)सतत व्यापार, समनुरूपता, प्रोद्भवन
- (b)विवेकशीलता, रूप पर सार की प्रधानता, सारता
- (c)मुद्रा-मापन, लेखांकन अवधि, लागत
- (d)द्वैत, उपार्जन, मिलान
उत्तर(b) विवेकशीलता, रूप पर सार की प्रधानता, सारता
- practice — not a real PYQ
यदि किसी उद्यम ने मूलभूत लेखांकन मान्यताओं में से किसी का अनुसरण न किया हो, तो लेखाकरण मानक–1 के अनुसार क्या अपेक्षित है?
- (a)कुछ भी प्रकट करने की आवश्यकता नहीं, क्योंकि मान्यताएँ स्वतः लागू मानी जाती हैं
- (b)उस तथ्य को प्रकट करना अनिवार्य है
- (c)केवल लेखापरीक्षक को लिखित सूचना देना पर्याप्त है
- (d)पिछले तीन वर्षों के खाते नए सिरे से बनाना अनिवार्य है
उत्तर(b) उस तथ्य को प्रकट करना अनिवार्य है