एक बहुविकल्पीय प्रश्न-पत्र में 50 प्रश्न हैं। प्रत्येक प्रश्न के लिए चार विकल्प A, B, C और D हैं। प्रत्येक सही उत्तर के लिए 4 अंक हैं और प्रत्येक गलत उत्तर के लिए –1 अंक है। कोई अभ्यर्थी प्रश्न संख्या 1 से शुरू कर, पैटर्न A, B, C, D, A, B, C, D, A, B, C, D, … में टिक करना तय करता है और इसी क्रम में अंत तक। यदि प्रत्येक प्रश्न में विकल्प (C) सही उत्तर है, तो उस अभ्यर्थी का कुल प्राप्तांक क्या है?
- (a)6
- (b)8
- (c)10
- (d)12
सही उत्तर — C, (c) 10। इसे दो चरणों में कीजिए, और फिर वह छोटा रास्ता देखिए जो पूरे प्रश्न को कुछ ही क्षणों का बना देता है। पहला चरण — कितने टिक सही हैं। अभ्यर्थी प्रश्न संख्या 1 से आरंभ करके A, B, C, D, A, B, C, D के क्रम में टिक करता जाता है, इसलिए पैटर्न हर चार प्रश्नों पर दोहराता है और C प्रत्येक चक्र के तीसरे प्रश्न पर पड़ता है : प्रश्न 3, 7, 11, और इसी तरह, हर बार चार का अंतर। पचास से अधिक न जाने वाला ऐसा अंतिम प्रश्न 47 है, इसलिए C वाले टिकों की संख्या (47 − 3)/4 + 1 = 12 होती है। यही गिनती भाग देने से भी निकलती है : 50 = 4 × 12 + 2, अर्थात् अभ्यर्थी बारह पूरे चक्र पूरे करता है, जो प्रश्न 1 से 48 तक चलते हैं, और फिर प्रश्न 49 पर A तथा प्रश्न 50 पर B टिक करता है। बारह पूरे चक्रों का अर्थ है बारह C वाले टिक। चूँकि हर प्रश्न में सही उत्तर C ही है, उसके 12 उत्तर सही हुए, और चूँकि उसने सभी प्रश्न किए हैं, 50 − 12 = 38 उत्तर ग़लत हुए। दूसरा चरण — प्राप्तांक। प्रत्येक सही उत्तर के 4 अंक और प्रत्येक ग़लत उत्तर के −1 अंक हैं, इसलिए कुल योग 12 × 4 − 38 × 1 = 48 − 38 = 10 होता है। अब छोटा रास्ता। मान लीजिए अभ्यर्थी पचास में से n उत्तर सही करता है और सभी प्रश्न करता है; तब उसका प्राप्तांक 4n − (50 − n) = 5n − 50 होगा, जो हर पूर्ण संख्या n के लिए पाँच का गुणज है। अर्थात् इस अंक-योजना में, सभी पचास प्रश्न करने पर, कुल प्राप्तांक सदा पाँच का गुणज ही होगा। छपे हुए चार मानों में से केवल 10 पाँच का गुणज है — 6, 8 और 12 नहीं हैं — इसलिए एक भी C गिने बिना उत्तर (c) निकल आता है। इसे किसी चालाकी की तरह नहीं, एक तकनीक की तरह अपनाइए : जब अंक-योजना अंकगणित को बाँध देती है, तो प्राप्य प्राप्तांकों का समुच्चय प्रायः एक जाली बन जाता है, और विभाज्यता जाँचना उत्तर निकालने से कहीं तेज़ी से विकल्प काट देता है। पुस्तिका की दो छपाई-विशेषताएँ भी ध्यान देने योग्य हैं : स्टेम में लिखा है कि प्रश्न-पत्र में 'चार विकल्प हैं', और −1 का ऋण-चिह्न लंबी डैश जैसी लंबाई में छपा है।
- (a)6 — 6 इस अंक-योजना में बन ही नहीं सकता। जब सभी पचास प्रश्न किए गए हों और n उत्तर सही हों, तो प्राप्तांक 4n − (50 − n) = 5n − 50 होता है, और यह व्यंजक n के किसी भी पूर्ण मान पर पाँच का गुणज रहता है : प्राप्य कुल योग −50, −45, −40 से लेकर 200 तक की श्रेणी बनाते हैं, और 6 उनमें कहीं नहीं आता। यह विकल्प संभवतः उस अभ्यर्थी के लिए है जिसने C वाले स्थान ग़लत गिन लिए हों और फिर घटाव करके बिना जाँचे कोई संख्या लिख दी हो। यहीं से इस प्रश्न का सामान्य पाठ भी निकलता है : उत्तर लिखने से पहले यह देख लेना कि वह अंक-योजना के अनुरूप संभव भी है या नहीं, कई बार पूरी गणना से सस्ता पड़ता है।
- (b)8 — विकल्प (a) की तरह 8 भी संभव प्राप्तांक नहीं है। इस योजना में हर कुल योग 5n − 50 के रूप का होता है और इसलिए 0 या 5 पर समाप्त होता है, अतः 6 और 8 दोनों देखते ही हट जाते हैं। छोटी सम संख्याओं पर संदेह करने का एक दूसरा कारण भी है : सही उत्तर के अंक और ग़लत उत्तर की कटौती दोनों पूर्ण संख्याएँ हैं और उनका अंतर 5 है, और यही अंतर — न कि उनके अपने मान — यह तय करता है कि दो क्रमागत प्राप्तांकों के बीच कितनी दूरी होगी। यदि अंक-योजना 3 और −1 की होती तो अंतर 4 होता और प्राप्तांक चार-चार की जाली पर बैठते; यही सोच किसी भी अंक-योजना वाले प्रश्न में तुरंत लगाई जा सकती है।
- (d)12 — 12 वह संख्या है जितने उत्तर अभ्यर्थी ने सही किए हैं, उसका प्राप्तांक नहीं, और पूरा प्रश्न इसी जाल के चारों ओर बनाया गया है : कठिन काम गिनती का है, और उसे कर लेने के बाद अभ्यर्थी को वही संख्या लिख देने का प्रलोभन होता है। किन्तु पूछ कुल प्राप्तांक की है, जिसके लिए अंक अभी लगाने बाक़ी हैं — बारह सही उत्तरों के 4-4 अंक, और उनमें से अड़तीस ग़लत उत्तरों का 1-1 अंक घटाकर, कुल 10। यह भी ध्यान दीजिए कि 12 पाँच का गुणज नहीं है, इसलिए विभाज्यता वाली जाँच से ही यह विकल्प गिर जाता है, बिना यह याद किए कि 12 का अर्थ क्या था। दो चरणों वाले प्रश्नों में पहला चरण पूरा करके रुक जाना इस खंड में अंक गँवाने का सबसे आम कारण है।
इस प्रश्न में दो अलग-अलग कौशल एक साथ परखे गए हैं। पहला चक्रीय पैटर्न की गिनती है : जब कोई क्रम k की अवधि पर दोहराता हो, तो किसी विशेष स्थान की आवृत्ति निकालने के लिए कुल संख्या को k से भाग दीजिए — भागफल पूरे चक्रों की संख्या देता है और शेषफल बताता है कि अंतिम अधूरे चक्र में कौन-से स्थान आए। यहाँ 50 = 4 × 12 + 2 है, इसलिए बारह पूरे चक्र और उसके बाद दो अतिरिक्त प्रश्न, जिन पर A और B पड़ते हैं; चूँकि C तीसरे स्थान पर आता है, वह अधूरे चक्र में आता ही नहीं और उसकी आवृत्ति ठीक बारह रहती है। यही विधि 'हर सातवें दिन', 'हर पाँचवें पद' जैसे प्रश्नों में भी चलती है। दूसरा कौशल अंक-योजना का बीजगणित है : यदि सही उत्तर पर a अंक मिलते हों और ग़लत पर b अंक कटते हों तथा सभी प्रश्न किए गए हों, तो n सही उत्तरों पर प्राप्तांक an − b(N − n) = (a + b)n − bN होता है, जो (a + b) की जाली पर बैठता है। इसका व्यावहारिक अर्थ यह है कि विकल्पों में दिखने वाला हर मान संभव नहीं होता, और यह जाँच बहुधा गणना से पहले ही उत्तर तक पहुँचा देती है। यही तर्क इस प्रश्नपत्र की अपनी अंक-योजना पर भी लागू होता है, जिसमें ग़लत उत्तर पर उस प्रश्न के अंकों का एक-तिहाई कटता है।
इस प्रकार के प्रश्न विवेचन खंड में इसलिए रखे जाते हैं कि वे गणना नहीं, अनुशासन परखते हैं। उनकी बनावट प्रायः दो चरणों की होती है — पहला चरण कठिन दिखता है और दूसरा इतना सरल कि वह छूट जाता है — और विकल्प-समुच्चय में पहले चरण का परिणाम अलग से रख दिया जाता है, ताकि रुक जाने वाला अभ्यर्थी उसी को उत्तर मान ले। यहाँ वह संख्या बारह है। इसलिए ऐसे प्रश्नों में उत्तर लिखने से पहले पूछ को दोबारा पढ़िए और यह पूछिए कि जो राशि आपने निकाली है वही पूछी गई थी या नहीं। दूसरी बात, विभाज्यता वाली जाँच को आदत बना लीजिए : किसी भी अंक-योजना वाले प्रश्न में पहले यह देख लीजिए कि प्राप्य प्राप्तांक किस जाली पर बैठते हैं, और फिर विकल्पों को उसी कसौटी पर काटिए। तीसरी बात, पैटर्न वाले प्रश्नों में शेषफल की जाँच अनिवार्य है — यदि यहाँ पैटर्न में C पहले स्थान पर होता तो अंतिम अधूरा चक्र भी एक अतिरिक्त सही उत्तर दे देता और गिनती तेरह हो जाती, तथा प्राप्तांक 15 आता। यह छोटा-सा परिवर्तन बताता है कि गिनती में शेषफल कितना निर्णायक है।
- चार अक्षरों का पैटर्न हर चार प्रश्नों पर दोहराता है और C उसके तीसरे स्थान पर पड़ता है, इसलिए वह प्रश्न 3, 7, 11 और इसी क्रम में 47 तक आता है; ऐसे प्रश्नों की संख्या (47 − 3)/4 + 1 = 12 है।
- वही गिनती भाग से भी निकलती है : 50 = 4 × 12 + 2, अर्थात् बारह पूरे चक्र प्रश्न 1 से 48 तक चलते हैं और शेष दो प्रश्नों, 49 तथा 50, पर क्रमशः A और B पड़ते हैं, इसलिए अधूरे चक्र से कोई अतिरिक्त सही उत्तर नहीं मिलता।
- बारह उत्तर सही और शेष अड़तीस ग़लत होने पर प्राप्तांक 12 × 4 − 38 × 1 = 48 − 38 = 10 होता है, क्योंकि प्रत्येक सही उत्तर के 4 अंक और प्रत्येक ग़लत उत्तर के −1 अंक हैं।
- सभी पचास प्रश्न करने पर n सही उत्तरों का प्राप्तांक 4n − (50 − n) = 5n − 50 होता है, जो हर पूर्ण n के लिए पाँच का गुणज रहता है; इसलिए इस योजना में केवल पाँच के गुणज ही प्राप्य हैं और छपे चार मानों में केवल 10 इस कसौटी पर टिकता है।
- सामान्य रूप यह है कि सही उत्तर पर a अंक और ग़लत पर b अंक की कटौती होने तथा सभी N प्रश्न किए जाने पर प्राप्तांक (a + b)n − bN होता है, अर्थात् वह (a + b) की जाली पर बैठता है — यही विभाज्यता की जाँच का आधार है।
- पहले चरण पर रुक जाना और सही उत्तरों की संख्या को ही प्राप्तांक मान लेना; यहाँ बारह वह संख्या है जितने उत्तर सही हुए, और वही विकल्प-समुच्चय में अलग से रखी गई है।
- अंतिम अधूरे चक्र की उपेक्षा करना; 50 को 4 से भाग देने पर शेष 2 बचता है और उन दो प्रश्नों पर A तथा B पड़ते हैं, इसलिए गिनती बारह ही रहती है, तेरह नहीं।
- ग़लत उत्तरों की संख्या भूल जाना; अभ्यर्थी हर प्रश्न पर टिक करता है, इसलिए ग़लत उत्तर 50 − 12 = 38 हैं, और केवल सही उत्तरों के अंक जोड़ देने पर 48 आ जाता है।
- विभाज्यता वाली जाँच न करना; इस अंक-योजना में हर प्राप्तांक पाँच का गुणज होता है, इसलिए 6, 8 और 12 तीनों बिना किसी गणना के हटाए जा सकते थे।
इस प्रकार के प्रश्न विवेचन और संख्यात्मक खंड की सीमा पर बैठते हैं और वे प्रायः दो रूपों में आते हैं : चक्रीय पैटर्न में किसी स्थान की आवृत्ति पूछना, अथवा अंक-योजना देकर प्राप्तांक पुछवाना। दोनों को एक साथ मिला देना, जैसा यहाँ है, आयोग का प्रिय ढंग है, क्योंकि इससे प्रश्न दो चरणों का हो जाता है और अधूरा हल भी विकल्पों में मिल जाता है। इसलिए तैयारी के लिए तीन आदतें बनाइए : कुल संख्या को अवधि से भाग देकर भागफल और शेषफल दोनों देखना, प्राप्तांक का बीजीय रूप लिखकर उसकी जाली पहचानना, और उत्तर लिखने से पहले पूछ दोबारा पढ़ना। यही विभाज्यता वाली दृष्टि इस प्रश्नपत्र की अपनी अंक-योजना पर भी लागू होती है, जिसमें ग़लत उत्तर पर उस प्रश्न के अंकों का एक-तिहाई कटता है और इसलिए अनुमान की सीमा तय होती है।
इस प्रश्न से सीधे संबंधित कोई पूर्व PYQ उपलब्ध नहीं।
- practice — not a real PYQ
किसी परीक्षा में 60 प्रश्न हैं और अभ्यर्थी प्रश्न संख्या 1 से आरंभ करके A, B, C, D के चक्रीय क्रम में टिक करता जाता है। यदि प्रत्येक प्रश्न का सही उत्तर D हो, तो उसके कितने उत्तर सही होंगे?
- (a)12
- (b)15
- (c)16
- (d)20
उत्तर(b) 15 — पैटर्न चार की अवधि पर दोहराता है और D उसके चौथे स्थान पर पड़ता है, अर्थात् प्रश्न 4, 8, 12 और इसी क्रम में 60 तक; ऐसे प्रश्नों की संख्या 60/4 = 15 है। चूँकि 60 चार से पूरी तरह विभाजित हो जाता है, कोई अधूरा चक्र बचता ही नहीं और गिनती ठीक पंद्रह रहती है।
- practice — not a real PYQ
किसी परीक्षा में 100 प्रश्न हैं, प्रत्येक सही उत्तर के 3 अंक हैं और प्रत्येक ग़लत उत्तर पर 1 अंक काटा जाता है। यदि कोई अभ्यर्थी सभी प्रश्न करता है, तो निम्नलिखित में से कौन-सा प्राप्तांक उसके लिए संभव नहीं है?
- (a)0
- (b)100
- (c)150
- (d)200
उत्तर(c) 150 — सभी सौ प्रश्न करने पर n सही उत्तरों का प्राप्तांक 3n − (100 − n) = 4n − 100 होता है, इसलिए हर प्राप्य प्राप्तांक चार का गुणज होगा। इनमें 0, 100 और 200 चार के गुणज हैं और क्रमशः n = 25, 50 तथा 75 से प्राप्त होते हैं, जबकि 150 चार का गुणज नहीं है और इसलिए असंभव है।