O केन्द्र वाले एक वृत्त की जीवाएँ PQ और RS हैं। मान लीजिए PQ और RS का प्रतिच्छेद-बिन्दु A है। निम्नलिखित में से कौन-सा/से कथन सही है/हैं? 1. यदि A और O संपाती हैं, तो जीवाओं द्वारा बने वृत्त के चारों भागों के क्षेत्रफल सदैव समान होंगे। 2. यदि A और O संपाती नहीं हैं, तो जीवाओं द्वारा बने वृत्त के चारों भागों में से दो भागों के क्षेत्रफल सदैव समान होंगे। नीचे दिए गए कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिए।
- (a)केवल 1
- (b)केवल 2
- (c)1 और 2 दोनों
- (d)न तो 1 और न ही 2
सही उत्तर — D, (d) न तो 1 और न ही 2। दोनों कथनों को 'सदैव' शब्द ही गिरा देता है : प्रत्येक कथन किसी एक विशेष स्थिति में सत्य है और फिर उसी को सामान्य नियम बना देता है। कथन 1। यदि A केंद्र O पर ही पड़े, तो दोनों जीवाएँ केंद्र से होकर जाएँगी, अर्थात् दोनों व्यास होंगी। दो व्यास वृत्त को चार त्रिज्यखंडों में काटते हैं, और त्रिज्यखंड का क्षेत्रफल उसके कोण पर निर्भर करता है। यदि दोनों व्यास θ कोण पर मिलें तो चारों त्रिज्यखंडों के कोण θ, 180° − θ, θ और 180° − θ होंगे, जो तभी बराबर होंगे जब θ = 90° हो। 60° पर मिलने वाले दो व्यास लीजिए : त्रिज्यखंड 60°, 120°, 60° और 120° के होंगे, अर्थात् क्षेत्रफल πr²/6, πr²/3, πr²/6 और πr²/3 — दो भिन्न मान, एक नहीं। इसलिए चारों भाग केवल लंबवत् व्यासों की दशा में बराबर होते हैं, और 'सदैव बराबर होंगे' कहना असत्य है। कथन 2। यदि A और O संपाती न हों, तो दावा यह है कि चारों में से दो भागों के क्षेत्रफल सदैव बराबर होंगे। यह तब सत्य होता है जब आकृति सममित हो — यदि दोनों जीवाएँ केंद्र से समान दूरी पर हों, तो O और A से होकर जाने वाली रेखा परावर्तन का अक्ष बन जाती है, वह एक जीवा को दूसरी पर ले जाती है और इस प्रकार दो भागों के क्षेत्रफल बराबर हो जाते हैं। किन्तु कथन में कहीं यह अपेक्षा नहीं है कि जीवाएँ केंद्र से समान दूरी पर हों। एक इकाई त्रिज्या का वृत्त लीजिए जिसका केंद्र O है, एक जीवा केंद्र से 0·2 की दूरी पर और दूसरी उस पर लंबवत्, केंद्र से 0·5 की दूरी पर। ये केंद्र से भिन्न किसी बिंदु पर मिलती हैं, और चारों भागों के क्षेत्रफल लगभग 0·21, 0·41, 0·97 तथा 1·56 वर्ग इकाई निकलते हैं, जिनका योग π है और जिनमें कोई दो बराबर नहीं। एक प्रति-उदाहरण पर्याप्त है, इसलिए यह दावा भी गिर जाता है। दोनों कथन असत्य हैं, इसलिए उत्तर (d) है। पूँछ में एक रोचक डंक भी है : जिस दशा को कथन 2 बाहर रखता है, अर्थात् A और O के संपाती होने की दशा, उसी में चारों में से दो भाग सदैव बराबर होते हैं, क्योंकि दो व्यास शीर्षाभिमुख त्रिज्यखंडों के दो बराबर युग्म बनाते हैं। जो गुण कथन 2 असंपाती दशा के बारे में बताता है, वह वस्तुतः संपाती दशा में लागू होता है। अब पूछ को दोबारा पढ़िए। यह सकारात्मक है — कौन-सा कथन सही है — और निषेध कथन 2 के भीतर बैठा है, उन शब्दों में कि 'यदि A और O संपाती नहीं हैं'। इस प्रश्नपत्र में सत्रह प्रश्नों की पूछ नकारात्मक है और पुस्तिका उन सबमें 'नहीं' मोटे अक्षरों में छापती है; यहाँ वही 'नहीं' सामान्य मोटाई में छपा है, क्योंकि वह पूछ का नहीं, एक कथन का अंश है। जिस अभ्यर्थी को उन सत्रह प्रश्नों ने मोटे अक्षर देखकर सतर्क होना सिखा दिया है, उसे यहाँ कोई चेतावनी मिलती ही नहीं।
- (a)केवल 1 — 'केवल 1' चुनने का अर्थ है चारों भागों के बराबर होने वाला दावा स्वीकार कर लेना, और यही यहाँ सबसे आम भूल है, क्योंकि 'केंद्र से होकर जाने वाली जीवाएँ' सुनते ही मन में जो चित्र बनता है वह दो लंबवत् व्यासों का सुथरा चित्र होता है, जो वृत्त को चार चौथाइयों में काट देता है। वह चित्र एक विशेष दशा है। A का O पर पड़ना दोनों जीवाओं को व्यास तो बना देता है, किन्तु उनके बीच के कोण के बारे में कुछ नहीं कहता, और समकोण के अतिरिक्त किसी भी कोण पर चारों त्रिज्यखंड दो-दो के दो भिन्न युग्मों में बँट जाते हैं — जैसे 60° पर 60°, 120°, 60°, 120°। यही कारण है कि कथन में 'सदैव' शब्द उसे असत्य बना देता है, जबकि 'हो सकते हैं' कहा गया होता तो वह सही रहता।
- (b)केवल 2 — 'केवल 2' चुनने का अर्थ है पहला कथन ठीक ही अस्वीकार करना और दूसरा ग़लत ही स्वीकार कर लेना। कथन 2 का आकर्षण यह है कि सममित चित्र उसका समर्थन करता है : बराबर लंबाई की दो जीवाएँ केंद्र से हटकर एक-दूसरे को काटती हुई खींचिए और चारों में से दो भाग सचमुच बराबर निकलेंगे, क्योंकि केंद्र को प्रतिच्छेद-बिंदु से जोड़ने वाली रेखा पूरी आकृति को अपने ऊपर परावर्तित कर देती है। किन्तु बराबर लंबाई की जीवाएँ केंद्र से बराबर दूरी पर होती हैं, और कथन ऐसी कोई शर्त नहीं लगाता। जैसे ही दोनों जीवाओं की केंद्र से दूरियाँ भिन्न होती हैं, सममिति टूट जाती है और चारों क्षेत्रफल भिन्न हो सकते हैं — जैसा 0·2 और 0·5 वाली दूरियों के उदाहरण में हुआ।
- (c)1 और 2 दोनों — '1 और 2 दोनों' उस अभ्यर्थी का विकल्प है जो दोनों कथनों को एक सुथरे युग्म की तरह पढ़ता है — एक सममित दशा का वर्णन करता हुआ और दूसरा असममित दशा का — और उन्हें साथ-साथ स्वीकार कर लेता है क्योंकि वे परस्पर पूरक सुनाई देते हैं। वे पूरक हैं ही नहीं; वे दोनों अति-सामान्यीकृत हैं। कथन 1 का निष्कर्ष निकलने के लिए व्यासों का लंबवत् होना आवश्यक है, और कथन 2 का निष्कर्ष निकलने के लिए जीवाओं का केंद्र से समान दूरी पर होना आवश्यक है; दोनों शर्तें कथनों में हैं नहीं। यहीं इस बनावट का सामान्य पाठ भी है : जब किसी कथन में 'सदैव' आए, तो उसे सिद्ध करने की नहीं, तोड़ने की कोशिश कीजिए — एक प्रति-उदाहरण खोजना पूरे प्रमाण से कहीं सस्ता पड़ता है।
इस प्रश्न में ज्यामिति उतनी नहीं है जितनी तर्क की सतर्कता। ज्यामिति का हिस्सा दो साधारण तथ्यों तक सीमित है : केंद्र से होकर जाने वाली जीवा व्यास होती है, और दो व्यासों से बने चार त्रिज्यखंडों के क्षेत्रफल उनके कोणों के समानुपाती होते हैं, इसलिए वे तभी बराबर होंगे जब व्यास परस्पर लंबवत् हों। बाक़ी सब मात्रात्मक तर्क है। कथन-आधारित प्रश्नों में 'सदैव', 'कभी नहीं', 'केवल' और 'अवश्य' जैसे शब्द सार्वभौमिक दावे बनाते हैं, और सार्वभौमिक दावे की सबसे बड़ी कमज़ोरी यह है कि एक ही प्रति-उदाहरण उसे नष्ट कर देता है। इसलिए ऐसे कथन को पढ़ते ही तीन प्रकार की स्थितियाँ मन में परखनी चाहिए : सबसे सममित स्थिति, सबसे असममित स्थिति, और सीमांत स्थिति। यहाँ सममित स्थिति दोनों कथनों को सही दिखाती है और असममित स्थिति दोनों को गिरा देती है। दूसरी उपयोगी आदत यह है कि जब किसी आकृति में कोई प्रतिबंध न दिया गया हो — जैसे यहाँ जीवाओं के बीच का कोण या केंद्र से उनकी दूरी — तो उसे स्वतंत्र चर मानिए और उसका मान बदलकर देखिए कि निष्कर्ष टिकता है या नहीं। यही विधि सांख्यिकी, समुच्चय और संख्या-पद्धति वाले कथन-प्रश्नों में भी उतनी ही काम करती है।
यह प्रश्न इस प्रश्नपत्र के दो सबसे सूक्ष्म जालों में से एक है, और उसका कारण छपाई से जुड़ा है। इस पुस्तिका में सत्रह प्रश्न ऐसे हैं जिनकी पूछ नकारात्मक है, और उन सबमें 'नहीं' मोटे अक्षरों में छापा गया है, जिससे अभ्यर्थी की आँख यह सीख जाती है कि निषेध हमेशा मोटे अक्षरों में दिखेगा। यहाँ पूछ सकारात्मक है और निषेध कथन 2 के भीतर सामान्य मोटाई में छपा है — 'यदि A और O संपाती नहीं हैं'। इसका परिणाम यह होता है कि अभ्यर्थी कथन 2 को उसकी उलटी दशा में पढ़ लेता है, अर्थात् संपाती दशा के बारे में, और वहाँ दो भाग सचमुच बराबर होते हैं, इसलिए वह कथन 2 को सही मान बैठता है और 'केवल 2' चुन लेता है। इसीलिए इस प्रकार के प्रश्न में एक यांत्रिक अनुशासन उपयोगी है : पहले पूछ को अलग से पढ़िए और तय कीजिए कि आपको सही कथन चाहिए या असत्य; फिर प्रत्येक कथन को अलग से, बिना दूसरे को देखे, सही या ग़लत ठहराइए; और तभी कूट में उतरिए। इस प्रश्नपत्र में एक और प्रश्न इसी बनावट का है, जहाँ निषेध फिर किसी कथन के भीतर सामान्य मोटाई में बैठा है।
- यदि दो जीवाओं का प्रतिच्छेद-बिंदु वृत्त का केंद्र ही हो, तो दोनों जीवाएँ व्यास होती हैं और वृत्त चार त्रिज्यखंडों में बँटता है, जिनके क्षेत्रफल कोणों के समानुपाती होते हैं; इसलिए चारों तभी बराबर होंगे जब दोनों व्यास परस्पर लंबवत् हों।
- दो व्यास θ कोण पर मिलें तो त्रिज्यखंडों के कोण θ, 180° − θ, θ और 180° − θ होते हैं — उदाहरण के लिए 60° पर क्षेत्रफल πr²/6, πr²/3, πr²/6 और πr²/3 निकलते हैं, अर्थात् दो भिन्न मान, इसलिए चारों भागों के 'सदैव' बराबर होने का दावा असत्य है।
- प्रतिच्छेद-बिंदु के केंद्र पर न होने की दशा में दो भागों के बराबर होने का दावा भी सार्वभौमिक नहीं है : इकाई त्रिज्या के वृत्त में केंद्र से 0·2 और 0·5 की दूरी पर खींची गई दो परस्पर लंबवत् जीवाएँ चार ऐसे भाग बनाती हैं जिनके क्षेत्रफल लगभग 0·21, 0·41, 0·97 और 1·56 वर्ग इकाई हैं और जिनका योग π है।
- दो भागों की समानता तब निश्चित होती है जब दोनों जीवाएँ केंद्र से समान दूरी पर हों, क्योंकि तब केंद्र और प्रतिच्छेद-बिंदु से जाने वाली रेखा परावर्तन-अक्ष बन जाती है; समान दूरी का अर्थ है समान लंबाई की जीवाएँ, और कथन में यह शर्त कहीं नहीं लगाई गई।
- संपाती दशा में, जिसे कथन 2 बाहर रखता है, चारों में से दो भाग सदैव बराबर होते हैं, क्योंकि दो व्यास शीर्षाभिमुख त्रिज्यखंडों के दो बराबर युग्म बनाते हैं — अर्थात् कथन 2 जिस गुण का दावा करता है वह उसी दशा में लागू होता है जिसे वह अलग कर देता है।
- पूछ को नकारात्मक मानकर पढ़ लेना; यहाँ पूछ सकारात्मक है और 'नहीं' कथन 2 के भीतर सामान्य मोटाई में छपा है, जबकि इस प्रश्नपत्र के सत्रह नकारात्मक प्रश्नों में वह मोटे तिरछे अक्षरों में रहता है।
- कथन 2 को उसकी उलटी दशा में पढ़ लेना, अर्थात् संपाती दशा के बारे में; उस दशा में दो भाग सचमुच बराबर होते हैं, और यही भ्रम अभ्यर्थी को 'केवल 2' की ओर ले जाता है।
- मन में बना सुथरा चित्र — दो लंबवत् व्यास या समान लंबाई की दो जीवाएँ — पूरे कथन का प्रमाण मान लेना; वह एक विशेष दशा है, और कथन में उसकी कोई शर्त नहीं लगाई गई।
- 'सदैव' जैसे सार्वभौमिक शब्द की उपेक्षा कर देना; ऐसे कथन को सिद्ध करने के बजाय एक प्रति-उदाहरण से तोड़ने की कोशिश करना कहीं तेज़ और सुरक्षित होता है।
कथन-और-कूट वाली बनावट इस प्रश्नपत्र के गणित तथा विवेचन खंड में बार-बार आती है, और उसमें अंक प्रायः गणना से नहीं, कथन के शब्दों को ठीक-ठीक पढ़ने से मिलते हैं। अपेक्षा रखिए कि कम-से-कम एक कथन में 'सदैव', 'कभी नहीं' या 'अवश्य' जैसा शब्द होगा और वही उसे असत्य बनाएगा, तथा कम-से-कम एक कथन ऐसा होगा जो किसी सममित विशेष दशा में सही है और सामान्य दशा में नहीं। इसलिए तैयारी में दो आदतें बनाइए : प्रत्येक कथन को अलग-अलग सही या ग़लत ठहराना और तभी कूट देखना, तथा सार्वभौमिक दावे के सामने तुरंत प्रति-उदाहरण खोजना। ज्यामिति की ओर से यहाँ केवल इतना चाहिए कि व्यास, त्रिज्यखंड का क्षेत्रफल और केंद्र से जीवा की दूरी वाले तीन-चार मूल तथ्य स्पष्ट हों।
इस प्रश्न से सीधे संबंधित कोई पूर्व PYQ उपलब्ध नहीं।
- practice — not a real PYQ
किसी वृत्त की दो जीवाएँ उसके केंद्र पर एक-दूसरे को काटती हैं। इस स्थिति में वृत्त के चारों भागों के क्षेत्रफल बराबर होने के लिए निम्नलिखित में से कौन-सी शर्त आवश्यक और पर्याप्त है?
- (a)दोनों जीवाओं की लंबाई बराबर हो
- (b)दोनों जीवाएँ परस्पर लंबवत् हों
- (c)दोनों जीवाएँ केंद्र से समान दूरी पर हों
- (d)ऐसी कोई शर्त आवश्यक नहीं, चारों भाग सदैव बराबर होते हैं
उत्तर(b) दोनों जीवाएँ परस्पर लंबवत् हों — केंद्र पर काटने का अर्थ है कि दोनों जीवाएँ व्यास हैं, और दो व्यासों से बने चार त्रिज्यखंडों के क्षेत्रफल उनके कोणों के समानुपाती होते हैं; θ कोण पर वे θ, 180° − θ, θ और 180° − θ होते हैं, जो केवल θ = 90° पर बराबर होते हैं। केंद्र से गुजरने वाली सभी जीवाएँ पहले से ही बराबर लंबाई की और केंद्र से शून्य दूरी पर होती हैं, इसलिए वे दोनों शर्तें यहाँ कुछ तय नहीं करतीं।
- practice — not a real PYQ
किसी वृत्त की दो जीवाएँ केंद्र से भिन्न किसी बिंदु पर एक-दूसरे को काटती हैं। वृत्त के बने चार भागों में से दो भागों के क्षेत्रफल बराबर होने की गारंटी निम्नलिखित में से किस दशा में होती है?
- (a)जब दोनों जीवाएँ केंद्र से समान दूरी पर हों
- (b)जब दोनों जीवाएँ परस्पर लंबवत् हों
- (c)जब एक जीवा दूसरी से दुगुनी लंबी हो
- (d)ऐसी कोई दशा नहीं होती
उत्तर(a) जब दोनों जीवाएँ केंद्र से समान दूरी पर हों — तब वे बराबर लंबाई की होती हैं और केंद्र तथा प्रतिच्छेद-बिंदु से जाने वाली रेखा परावर्तन-अक्ष बन जाती है, जो एक भाग को दूसरे पर ले जाकर उनके क्षेत्रफल बराबर कर देती है। केवल लंबवत् होना पर्याप्त नहीं है, जैसा केंद्र से 0·2 और 0·5 दूरी वाली दो लंबवत् जीवाओं के उदाहरण से दिखता है, जहाँ चारों क्षेत्रफल भिन्न निकलते हैं।