कामगारों का हड़ताल का आश्रय लेने का अधिकार
- (a)मूल अधिकार है
- (b)सांविधिक अधिकार है
- (c)निर्णयज विधि (कॉमन लॉ) अधिकार है
- (d)साम्यापूर्ण अधिकार है
सही उत्तर — C, (c) निर्णयज विधि (कॉमन लॉ) अधिकार है। प्रश्न हड़ताल के अधिकार का स्रोत पूछ रहा है, और आयोग ने जिस वर्गीकरण को कुंजी में रखा है वह भारतीय विधि में स्थिर दो प्रतिज्ञाओं पर टिका है। पहली यह कि संविधान इसे प्रदान नहीं करता। अनुच्छेद 19(1)(c) संगम या संघ बनाने का अधिकार देता है, और 1962 के बैंक कर्मचारियों वाले मामले में उच्चतम न्यायालय ने कहा कि इस प्रत्याभूति के साथ हड़ताल करने या प्रभावी सामूहिक सौदेबाज़ी करने का प्रत्याभूत अधिकार नहीं आता; उसी वर्ष सरकारी कर्मचारियों के प्रदर्शन से जुड़े मामले में भी न्यायालय ने यही दृष्टिकोण लिया, और 2003 में तमिलनाडु के सरकारी कर्मचारियों वाले मामले में उसने यह स्थिति दोहराते हुए स्पष्ट शब्दों में कहा कि हड़ताल पर जाने का कोई मूल अधिकार नहीं है और सरकारी कर्मचारियों को हड़ताल का कोई विधिक, नैतिक या साम्यापूर्ण अधिकार भी प्राप्त नहीं है। इससे विकल्प (a) बाहर हो जाता है और न्यायालय की अपनी भाषा विकल्प (d) को भी समाप्त कर देती है। दूसरी प्रतिज्ञा यह है कि श्रम-अधिनियम भी यह अधिकार प्रदान नहीं करते। औद्योगिक विवाद अधिनियम, 1947 धारा 2(q) में हड़ताल की परिभाषा देता है, धारा 22 सार्वजनिक सुविधा सेवा में हड़ताल से पहले सूचना अनिवार्य करती है, धारा 23 सुलह, अधिनिर्णयन तथा माध्यस्थम् की विनिर्दिष्ट अवस्थाओं में हड़ताल का प्रतिषेध करती है, धारा 24 इन उपबंधों के उल्लंघन में की गई हड़ताल को अवैध घोषित करती है और धारा 26 उसके लिए दंड देती है। इनमें से प्रत्येक उपबंध किसी क्रिया को निर्बंधित करता है; कोई भी उसे सृजित नहीं करता। जो विधि यह बताती है कि कोई काम कब नहीं किया जा सकता, वह पहले से मान लेती है कि वह काम अन्यथा किया जा सकता था — और वह पूर्वमान्यता कामगारों की उसी सामान्य स्वतंत्रता की है, जो निर्णयज विधि में है : संगठित होकर काम जारी रखने से इनकार कर देना। ट्रेड यूनियन अधिनियम, 1926 भी इसी लय में काम करता है : धारा 17 और 18 हड़ताल का अधिकार देती नहीं, वे उस अधिकार का प्रयोग करते समय यूनियन के सदस्यों को आपराधिक षड्यंत्र तथा कतिपय दीवानी वादों से बचाती हैं। इसलिए यह अधिकार निर्णयज विधि पर खड़ा है और उसे सांविधिक उपबंध चारों ओर से घेरे हुए हैं — यही विकल्प (c) का वर्गीकरण है।
- (a)मूल अधिकार है — मूल अधिकार का अर्थ होता संविधान के भाग III द्वारा प्रत्याभूत ऐसा अधिकार जो अनुच्छेद 32 और 226 के अधीन राज्य के विरुद्ध प्रवर्तनीय हो, और हड़ताल को भारत में यह दर्जा कभी नहीं मिला। 1962 के बैंक कर्मचारियों वाले मामले में उच्चतम न्यायालय ने कहा कि अनुच्छेद 19(1)(c) की संगम बनाने की स्वतंत्रता में हड़ताल का प्रत्याभूत अधिकार सम्मिलित नहीं है, और उसका तर्क यह था कि संघ बनाने के अधिकार की प्रत्याभूति के साथ यह प्रत्याभूति नहीं आ जाती कि उस संघ के प्रत्येक उद्देश्य को हर साधन से पूरा करने की छूट होगी। इसी कारण हड़ताल पर लगने वाले सांविधिक निर्बंधन अनुच्छेद 19(4) की युक्तियुक्त निर्बंधन वाली कसौटी पर नहीं, साधारण विधायी शक्ति पर परखे जाते हैं, और यही भेद इस विकल्प को असत्य बनाता है।
- (b)सांविधिक अधिकार है — यह निकटतम चूक है और इस विषय को जानने वाले अधिकांश अभ्यर्थी यहीं ठिठकते हैं, क्योंकि उन्हें याद रहता है कि हड़ताल का विस्तृत विवेचन औद्योगिक विवाद अधिनियम, 1947 में है। किन्तु देखिए कि वे उपबंध करते क्या हैं। धारा 2(q) केवल पद को परिभाषित करती है; धारा 22 सार्वजनिक सुविधा सेवा में हड़ताल से पहले सूचना अनिवार्य करती है; धारा 23 सुलह, अधिनिर्णयन या माध्यस्थम् के दौरान तथा उनके बाद की नियत अवधियों में हड़ताल का प्रतिषेध करती है; धारा 24 इनके उल्लंघन में की गई हड़ताल को अवैध ठहराती है; और धारा 26 उसे दंडनीय बनाती है। यह पूरी शृंखला विनियमन की है, प्रदान करने की नहीं — और जो अधिनियम केवल यह बताता हो कि हड़ताल कब नहीं की जा सकती, उसे उस अधिकार का स्रोत नहीं कहा जा सकता।
- (d)साम्यापूर्ण अधिकार है — साम्यापूर्ण अधिकार वह होता है जिसे साम्या-न्यायालयों में विकसित अधिकारिता मान्यता देती है — न्यास, विनिर्दिष्ट अनुपालन, व्यादेश और उसी प्रकार के उपचार — और हड़ताल का उस सूची में कोई स्थान नहीं है। इस विकल्प को सीधे प्राधिकार से भी हटाया जा सकता है : तमिलनाडु के सरकारी कर्मचारियों की सामूहिक बर्ख़ास्तगी से जुड़े 2003 के मामले में उच्चतम न्यायालय ने कहा कि सरकारी कर्मचारियों को हड़ताल पर जाने का कोई मूल, विधिक, नैतिक या साम्यापूर्ण अधिकार नहीं है — जो इस वर्गीकरण का उतना ही स्पष्ट निषेध है जितना संवैधानिक वर्गीकरण का। इसलिए यह विकल्प उस निर्णय के शब्दों से ही समाप्त हो जाता है जिससे इस विषय का अधिकांश उत्तर निकलता है।
हड़ताल के अधिकार की स्थिति भारतीय श्रम-विधि की उन थोड़ी-सी बातों में है जो पूरी तरह न्यायिक निर्णयों से तय हुई हैं, और उसका ढाँचा तीन परतों में समझा जाना चाहिए। सबसे नीचे निर्णयज विधि की वह सामान्य स्वतंत्रता है कि कामगार सामूहिक रूप से काम जारी रखने से इनकार कर सकते हैं; यह स्वतंत्रता किसी अधिनियम से नहीं आती, वह पहले से है। उसके ऊपर सांविधिक संरक्षण की परत है — ट्रेड यूनियन अधिनियम, 1926 की धारा 17 और 18, जो इस स्वतंत्रता का प्रयोग करने वालों को आपराधिक षड्यंत्र तथा कतिपय दीवानी वादों से बचाती हैं, ताकि उन्नीसवीं शताब्दी की तरह हर हड़ताल आपराधिक षड्यंत्र न बन जाए। उसके ऊपर निर्बंधन की परत है — औद्योगिक विवाद अधिनियम, 1947 की धारा 22 से 26 तक, जो सूचना, प्रतिषेध, अवैधता और दंड की व्यवस्था करती हैं। संविधान इस पूरे ढाँचे के बाहर खड़ा है : अनुच्छेद 19(1)(c) संघ बनाने का अधिकार देता है, पर हड़ताल का नहीं, यह उच्चतम न्यायालय 1962 से लगातार कहता आया है। औद्योगिक संबंध संहिता, 2020 ने इस चित्र को एक दिशा में बदला है — उसने सूचना की वह अपेक्षा, जो 1947 के अधिनियम में केवल सार्वजनिक सुविधा सेवाओं पर लागू थी, सभी औद्योगिक स्थापनों पर फैला दी और तदनुरूप उन अवधियों को भी बढ़ा दिया जिनमें हड़ताल आरंभ नहीं की जा सकती।
इस प्रश्न की बनावट वर्गीकरण की है, तथ्य की नहीं : चारों विकल्प विधि की असली कोटियाँ हैं और अभ्यर्थी से यह अपेक्षित है कि वह अधिकार को सही कोटि में रखे। ऐसे प्रश्न में सबसे कारगर विधि उन्मूलन की है — पहले पूछिए कि क्या यह संविधान में है, फिर पूछिए कि क्या यह किसी अधिनियम ने दिया है, और यदि दोनों उत्तर नहीं हैं तो शेष कोटि ही उत्तर है। यहाँ दोनों उत्तर स्पष्ट रूप से नहीं हैं, और साम्या वाली कोटि को स्वयं उच्चतम न्यायालय के शब्दों ने बंद कर दिया है। दूसरी बात, यह विषय समसामयिक चर्चा में बार-बार लौटता है — सरकारी कर्मचारियों की हड़ताल, आवश्यक सेवाओं में हड़ताल पर रोक, और आवश्यक सेवा अनुरक्षण से जुड़ी विधियाँ — इसलिए इसे केवल परीक्षा-तथ्य की तरह नहीं, एक स्थिर विधिक स्थिति की तरह याद रखना चाहिए। तीसरी बात, पुस्तिका ने इस प्रश्न का स्टेम अधूरे वाक्य के रूप में छापा है, बिना प्रश्नचिह्न के, और विकल्प उसे पूरा करते हैं; इसे वैसा ही पढ़िए जैसा छपा है और विकल्प जोड़कर पूरा वाक्य मन में बनाइए, अन्यथा पूछ ही अस्पष्ट रह जाती है।
- हड़ताल का अधिकार भारत में मूल अधिकार नहीं है : अनुच्छेद 19(1)(c) संगम या संघ बनाने का अधिकार देता है, और 1962 के बैंक कर्मचारियों वाले मामले में उच्चतम न्यायालय ने कहा कि इसके साथ हड़ताल करने या प्रभावी सामूहिक सौदेबाज़ी करने का प्रत्याभूत अधिकार नहीं आता।
- 2003 में तमिलनाडु के सरकारी कर्मचारियों वाले मामले में उच्चतम न्यायालय ने कहा कि सरकारी कर्मचारियों को हड़ताल पर जाने का कोई मूल, विधिक, नैतिक या साम्यापूर्ण अधिकार नहीं है — यह भाषा संवैधानिक वर्गीकरण के साथ-साथ साम्यापूर्ण वर्गीकरण को भी समाप्त कर देती है।
- औद्योगिक विवाद अधिनियम, 1947 हड़ताल को विनियमित करता है, प्रदान नहीं : धारा 2(q) उसे परिभाषित करती है, धारा 22 सार्वजनिक सुविधा सेवा में सूचना अनिवार्य करती है, धारा 23 सुलह, अधिनिर्णयन तथा माध्यस्थम् के दौरान और उसके बाद की नियत अवधियों में प्रतिषेध करती है, धारा 24 उल्लंघन में की गई हड़ताल को अवैध ठहराती है और धारा 26 उसे दंडनीय बनाती है।
- ट्रेड यूनियन अधिनियम, 1926 इस स्वतंत्रता के प्रयोग की रक्षा करता है, उसे देता नहीं : धारा 17 यूनियन के उद्देश्यों को आगे बढ़ाने वाले क़रारों पर आपराधिक षड्यंत्र के अभियोजन से उन्मुक्ति देती है और धारा 18 व्यापार-विवाद की चिंतना या अग्रसरण में किए गए कार्यों पर कतिपय दीवानी वादों से संरक्षण देती है।
- औद्योगिक संबंध संहिता, 2020 ने सूचना की वह अपेक्षा, जो 1947 के अधिनियम में केवल सार्वजनिक सुविधा सेवाओं पर लागू थी, सभी औद्योगिक स्थापनों तक फैला दी है और तदनुरूप उन अवधियों को भी विस्तृत किया है जिनमें हड़ताल आरंभ नहीं की जा सकती।
- यह मान लेना कि जिस विषय पर अधिनियम में विस्तृत उपबंध हों, वही अधिनियम उस अधिकार का स्रोत भी होगा; औद्योगिक विवाद अधिनियम, 1947 हड़ताल को केवल विनियमित करता है, और विनियमन प्रदान करना नहीं है।
- अनुच्छेद 19(1)(c) से हड़ताल का अधिकार निकाल लेना; न्यायालय ने 1962 से लगातार कहा है कि संघ बनाने की स्वतंत्रता में हड़ताल का प्रत्याभूत अधिकार सम्मिलित नहीं है।
- ट्रेड यूनियन अधिनियम की धारा 17 और 18 को अधिकार-प्रदाता समझ लेना; वे उन्मुक्ति और संरक्षण देती हैं, जो अधिकार के अस्तित्व को पहले से मान लेता है।
- 'विधिक अधिकार' और 'निर्णयज विधि का अधिकार' को एक मान लेना; 2003 के निर्णय की भाषा सरकारी कर्मचारियों के संदर्भ में विधिक अधिकार का भी निषेध करती है, फिर भी सामान्य कामगारों की यह स्वतंत्रता निर्णयज विधि में बनी रहती है और सांविधिक निर्बंधनों के अधीन है।
हड़ताल का अधिकार EPFO, UPSC और राज्य आयोगों में लगभग सदैव वर्गीकरण के रूप में पूछा जाता है — मूल, सांविधिक, निर्णयज विधि का, अथवा साम्यापूर्ण — अथवा उससे जुड़े किसी निर्णय का सार पुछवाकर। कभी-कभी वही विषय उलटकर पूछा जाता है, जैसे यह कि किस अधिनियम की किस धारा के अधीन हड़ताल अवैध होती है, या सार्वजनिक सुविधा सेवा में सूचना की अवधि क्या है। इसलिए तैयारी में तीन चीज़ें साथ रखिए : वर्गीकरण और उसका कारण, औद्योगिक विवाद अधिनियम की धारा 22 से 26 तक की शृंखला, और दो-तीन निर्णयों का सार। इससे यह पूरा विषय किसी भी रूप में पूछे जाने पर सुलझ जाता है, और औद्योगिक संबंध संहिता, 2020 के परिवर्तन जोड़ लेने पर समसामयिकी वाला रूप भी सध जाता है।
इस प्रश्न से सीधे संबंधित कोई पूर्व PYQ उपलब्ध नहीं।
- practice — not a real PYQ
औद्योगिक विवाद अधिनियम, 1947 के अधीन सार्वजनिक सुविधा सेवा में नियोजित व्यक्तियों द्वारा हड़ताल से पहले सूचना देने की अपेक्षा निम्नलिखित में से किस धारा में है?
- (a)धारा 2(q)
- (b)धारा 22
- (c)धारा 24
- (d)धारा 26
उत्तर(b) धारा 22 — यही धारा सार्वजनिक सुविधा सेवा में नियोजित व्यक्तियों द्वारा हड़ताल तथा नियोजकों द्वारा तालाबंदी से पहले विहित अवधि के भीतर सूचना देना अनिवार्य करती है। धारा 2(q) हड़ताल की परिभाषा देती है, धारा 24 इन उपबंधों के उल्लंघन में की गई हड़ताल को अवैध ठहराती है, और धारा 26 अवैध हड़ताल के लिए दंड का उपबंध करती है।
- practice — not a real PYQ
भारतीय संविधान के अनुच्छेद 19(1)(c) के संदर्भ में उच्चतम न्यायालय की स्थापित स्थिति निम्नलिखित में से कौन-सी है?
- (a)संघ बनाने के अधिकार में हड़ताल का प्रत्याभूत अधिकार भी सम्मिलित है
- (b)संघ बनाने के अधिकार में हड़ताल का प्रत्याभूत अधिकार सम्मिलित नहीं है
- (c)हड़ताल का अधिकार अनुच्छेद 21 से निकलता है
- (d)हड़ताल का अधिकार केवल सरकारी कर्मचारियों को प्राप्त है
उत्तर(b) संघ बनाने के अधिकार में हड़ताल का प्रत्याभूत अधिकार सम्मिलित नहीं है — 1962 के बैंक कर्मचारियों वाले मामले से लेकर 2003 के तमिलनाडु सरकारी कर्मचारियों वाले मामले तक उच्चतम न्यायालय यही कहता आया है, और 2003 में उसने यह भी जोड़ा कि सरकारी कर्मचारियों को हड़ताल का कोई विधिक, नैतिक या साम्यापूर्ण अधिकार भी नहीं है। इसलिए शेष तीनों कथन न्यायालय की स्थापित स्थिति के विरुद्ध हैं।