ट्रेड यूनियन अधिनियम, 1926 के अधीन कामगारों के ट्रेड यूनियनों का पंजीकरण
- (a)वैकल्पिक है
- (b)अनिवार्य है
- (c)गैर-सार्वजनिक सुविधा सेवा स्थापनों में कार्यरत कामगारों के लिए वैकल्पिक है
- (d)सार्वजनिक सुविधा सेवा स्थापनों में कार्यरत कामगारों के लिए अनिवार्य है
सही उत्तर — A, (a) वैकल्पिक है। ट्रेड यूनियन अधिनियम, 1926 में ऐसा कुछ भी नहीं है जो कामगारों के किसी संगम को स्वयं को पंजीकृत कराने के लिए बाध्य करता हो। धारा 4 की भाषा ही अनुज्ञात्मक है — किसी ट्रेड यूनियन के सात या अधिक सदस्य, उसके नियमों पर अपने नाम अंकित करके और अधिनियम की अन्य अपेक्षाओं का पालन करके, पंजीकरण के लिए आवेदन कर सकते हैं — और अधिनियम में कहीं कोई उपबंध अपंजीकृत यूनियन को विधिविरुद्ध नहीं ठहराता, न ही पंजीकरण न कराने पर कोई शास्ति है। कामगार संगठित हो सकते हैं, सभाएँ कर सकते हैं, चंदा जमा कर सकते हैं और माँगें रख सकते हैं, बिना कभी रजिस्ट्रार के पास गए। अधिनियम इसके स्थान पर प्रलोभन देता है : पंजीकरण किसी स्वैच्छिक संगम को परिभाषित विशेषाधिकारों वाली विधिक इकाई में बदल देता है, और जो यूनियन उसे नहीं लेती वह केवल उन विशेषाधिकारों से वंचित रह जाती है। ये विशेषाधिकार पर्याप्त हैं। धारा 13 के अधीन पंजीकृत ट्रेड यूनियन शाश्वत उत्तराधिकार तथा सामान्य मुद्रा वाला निगमित निकाय बन जाती है, संपत्ति धारण कर सकती है और अपने नाम से वाद ला तथा झेल सकती है। धारा 17 के अधीन उसके पदाधिकारी और सदस्य यूनियन के उद्देश्यों को आगे बढ़ाने के लिए किए गए क़रारों के संबंध में आपराधिक षड्यंत्र के अभियोजन से उन्मुक्त हैं। धारा 18 के अधीन यूनियन तथा उसके पदाधिकारी उन कार्यों के लिए दीवानी वाद से संरक्षित हैं जो व्यापार-विवाद की चिंतना या अग्रसरण में किए गए हों और जो नियोजन-संविदा के भंग को प्रेरित करते हों या व्यापार अथवा नियोजन में हस्तक्षेप करते हों। धारा 19 के अधीन सदस्यों के बीच के क़रार केवल इस कारण शून्य नहीं होते कि वे व्यापार-निर्बंधन में हैं, और धारा 16 पृथक् राजनीतिक निधि की अनुमति देती है। अपंजीकृत यूनियन के पास इनमें से कुछ भी नहीं होता। एक बात और ध्यान देने योग्य है : आवेदन करना यद्यपि वैकल्पिक है, दूसरे छोर पर पंजीकरण करना विवेकाधीन नहीं है — धारा 8 रजिस्ट्रार से अपेक्षा करती है कि जिस यूनियन ने पंजीकरण संबंधी सारी अपेक्षाएँ पूरी कर दी हों उसे वह पंजीकृत करे, इसलिए अनुपालन करने वाले आवेदक को लौटाया नहीं जा सकता।
- (b)अनिवार्य है — अनिवार्य पंजीकरण एक पूरी तरह अलग सांविधिक योजना होती — उसमें पंजीकरण कराने का कर्तव्य होता, उसके लिए समय-सीमा होती, चूक पर शास्ति होती, और व्यवहार में अपंजीकृत संगम को बंद कराने की शक्ति भी होती। 1926 के अधिनियम में इनमें से कुछ भी नहीं है। यह अधिनियम मद्रास लेबर यूनियन के विरुद्ध मद्रास उच्च न्यायालय की कार्रवाई के बाद इसीलिए पारित हुआ था कि ट्रेड यूनियन गतिविधि पर से आपराधिक षड्यंत्र और दीवानी दायित्व की छाया हटे, और उसकी तकनीक निगमीकरण को पुरस्कृत करने की है, संगठित होने को बाध्य करने की नहीं। इसलिए यह विकल्प अधिनियम की मूल प्रकृति को ही उलट देता है : वहाँ अधिकार दिया गया है, कर्तव्य नहीं थोपा गया।
- (c)गैर-सार्वजनिक सुविधा सेवा स्थापनों में कार्यरत कामगारों के लिए वैकल्पिक है — अधिनियम पंजीकरण के प्रयोजन के लिए सार्वजनिक सुविधा सेवाओं और अन्य सेवाओं के बीच कोई भेद ही नहीं करता, और ऐसा कोई वर्गीकरण उसमें कहीं आता भी नहीं। यह पदावली दूसरी विधि की है : 'सार्वजनिक सुविधा सेवा' की परिभाषा औद्योगिक विवाद अधिनियम, 1947 की धारा 2(n) में है और उसकी सूची उस अधिनियम की पहली अनुसूची में, तथा उसका परिणाम प्रक्रियात्मक है — उस अधिनियम की धारा 22 के अधीन सार्वजनिक सुविधा सेवा में नियोजित व्यक्ति विहित अवधि के भीतर सूचना दिए बिना हड़ताल नहीं कर सकता। इसलिए यह विकल्प एक अधिनियम की अवधारणा उठाकर दूसरे अधिनियम में रख देता है, जो श्रम-विधि के प्रश्नों में असत्य विकल्प बनाने की सबसे आम युक्ति है।
- (d)सार्वजनिक सुविधा सेवा स्थापनों में कार्यरत कामगारों के लिए अनिवार्य है — यह विकल्प (c) का दर्पण-प्रतिबिंब है और उसी कारण से असत्य है, एक अतिरिक्त मोड़ के साथ : यह पंजीकरण को ठीक वहाँ अनिवार्य बना देता है जहाँ विधि हड़ताल पर विशेष निर्बंधन लगाती है, जो प्रशासनिक दृष्टि से विश्वसनीय सुनाई देता है और पूरी तरह गढ़ा हुआ है। ट्रेड यूनियन अधिनियम, 1926 में कुछ भी पंजीकरण को उद्योग की प्रकृति से नहीं जोड़ता, और औद्योगिक विवाद अधिनियम, 1947 में कुछ भी सार्वजनिक सुविधा सेवाओं की यूनियनों से पंजीकृत होने की अपेक्षा नहीं करता। विकल्प (c) और (d) का यह जोड़ा एक ही गढ़ी हुई अवधारणा को दो दिशाओं में रखकर यह जाँचता है कि अभ्यर्थी को सचमुच याद है या वह केवल विश्वसनीय सुनाई देने वाला वाक्य चुन रहा है।
ट्रेड यूनियन अधिनियम, 1926 का पूरा ढाँचा एक ही विचार पर टिका है : संगठित होना अपने आप में विधिविरुद्ध नहीं है, और जो यूनियन पंजीकरण करा ले उसे विधि कुछ विशेष संरक्षण देती है। इसीलिए अधिनियम में पंजीकरण कहीं भी बाध्यता के रूप में नहीं आता। धारा 4 आवेदन की अनुमति देती है, धारा 5 से 7 आवेदन की सामग्री और रजिस्ट्रार की जाँच की बात करती हैं, धारा 8 रजिस्ट्रार को अनुपालन करने वाली यूनियन का पंजीकरण करने को बाध्य करती है, और धारा 9 प्रमाणपत्र को पंजीकरण का निर्णायक साक्ष्य बनाती है। इसके बाद विशेषाधिकार आते हैं — धारा 13 का निगमित दर्जा, धारा 16 की राजनीतिक निधि, धारा 17 की आपराधिक षड्यंत्र से उन्मुक्ति, धारा 18 का दीवानी वाद से संरक्षण, धारा 19 का व्यापार-निर्बंधन संबंधी बचाव। दूसरी ओर बाध्यताएँ भी हैं — धारा 15 साधारण निधि के व्यय के प्रयोजन सीमित करती है, धारा 21 अवयस्क सदस्यता का उपबंध करती है, धारा 22 पदाधिकारियों में बाहरी व्यक्तियों का अनुपात सीमित करती है, और धारा 28 वार्षिक विवरणी भेजना अनिवार्य करती है। अंत में यह भेद सदा ध्यान में रखिए कि पंजीकरण और मान्यता दो अलग चीज़ें हैं : पंजीकरण इस अधिनियम के अधीन विधिक दर्जा देता है, जबकि सौदेबाज़ी करने वाली यूनियन के रूप में मान्यता देने का कोई तंत्र इस अधिनियम में है ही नहीं।
इस प्रश्न का स्टेम अधूरा वाक्य है और विकल्प उसे पूरा करते हैं; पुस्तिका ने उसके अंत में न प्रश्नचिह्न लगाया है और न कोई विराम-चिह्न, और उसे वैसा ही पढ़ना चाहिए जैसा छपा है। ऐसे प्रश्न में सबसे बड़ा जोखिम यह है कि विकल्प अपने आप में विश्वसनीय सुनाई देते हैं, क्योंकि उनमें प्रयुक्त पद असली हैं — 'सार्वजनिक सुविधा सेवा' श्रम-विधि का वास्तविक पद है, केवल वह इस अधिनियम का नहीं, दूसरे अधिनियम का है। यही इस खंड की सबसे आम युक्ति है : एक विधि की अवधारणा दूसरी विधि में रखकर देखा जाता है कि अभ्यर्थी को सीमा-रेखा याद है या नहीं। इसलिए तैयारी में हर अवधारणा के साथ उसका अधिनियम बाँधकर रखिए — सार्वजनिक सुविधा सेवा, छँटनी, कर्मचारी-कटौती और हड़ताल-सूचना औद्योगिक विवाद अधिनियम, 1947 के पद हैं; पंजीकरण, उन्मुक्ति और राजनीतिक निधि ट्रेड यूनियन अधिनियम, 1926 के। दूसरी बात, इस प्रश्न का उत्तर 'वैकल्पिक' है, किन्तु उसका अर्थ यह नहीं कि रजिस्ट्रार जब चाहे मना कर दे; धारा 8 उसे अनुपालन करने वाली यूनियन का पंजीकरण करने को बाध्य करती है, और यह दूसरा आधा तथ्य स्वयं एक स्वतंत्र प्रश्न बनता है।
- ट्रेड यूनियन अधिनियम, 1926 के अधीन पंजीकरण स्वैच्छिक है : धारा 4 केवल यह कहती है कि सात या अधिक सदस्य आवेदन कर सकते हैं, और अधिनियम में कोई उपबंध पंजीकरण को बाध्यकर नहीं बनाता या अपंजीकृत यूनियन पर शास्ति नहीं लगाता — वह वैध बनी रहती है, केवल विशेषाधिकारों से वंचित रहती है।
- दूसरी ओर रजिस्ट्रार के लिए पंजीकरण विवेकाधीन नहीं है : धारा 8 उससे अपेक्षा करती है कि जिस ट्रेड यूनियन ने पंजीकरण संबंधी सारी अपेक्षाएँ पूरी कर दी हों उसका वह पंजीकरण करे, और धारा 9 पंजीयन-प्रमाणपत्र को पंजीकरण का निर्णायक साक्ष्य बनाती है।
- पंजीकरण के विशेषाधिकार हैं — धारा 13 के अधीन शाश्वत उत्तराधिकार तथा सामान्य मुद्रा वाला निगमित दर्जा, धारा 17 के अधीन यूनियन के उद्देश्यों को आगे बढ़ाने वाले क़रारों पर आपराधिक षड्यंत्र के अभियोजन से उन्मुक्ति, धारा 18 के अधीन व्यापार-विवाद की चिंतना या अग्रसरण में किए गए कार्यों पर कतिपय दीवानी वादों से संरक्षण, धारा 19 का व्यापार-निर्बंधन संबंधी बचाव, तथा धारा 16 के अधीन पृथक् राजनीतिक निधि।
- 'सार्वजनिक सुविधा सेवा' की अवधारणा औद्योगिक विवाद अधिनियम, 1947 की है — परिभाषा धारा 2(n) में और सूची पहली अनुसूची में — जहाँ उसका परिणाम यह है कि धारा 22 के अधीन ऐसी सेवा में हड़ताल तथा तालाबंदी से पहले सूचना देनी पड़ती है; ट्रेड यूनियन अधिनियम के पंजीकरण से उसका कोई संबंध नहीं है।
- पंजीकरण और सौदेबाज़ी करने वाली यूनियन के रूप में मान्यता दो अलग बातें हैं : 1926 के अधिनियम में मान्यता का कोई तंत्र नहीं है, इस विषय पर 1947 का संशोधन अधिनियम कभी प्रवृत्त नहीं हुआ, और मान्यता अनुशासन-संहिताओं, राज्य विधियों तथा औद्योगिक संबंध संहिता, 2020 के परक्राम्य यूनियन संबंधी उपबंधों पर टिकी रही है।
- 'वैकल्पिक' का अर्थ यह लगा लेना कि रजिस्ट्रार चाहे तो मना कर सकता है; आवेदन करना वैकल्पिक है, किन्तु धारा 8 के अधीन अनुपालन करने वाली यूनियन का पंजीकरण करना रजिस्ट्रार के लिए बाध्यकर है।
- एक अधिनियम का पद दूसरे अधिनियम में उठा लेना — 'सार्वजनिक सुविधा सेवा' औद्योगिक विवाद अधिनियम, 1947 की अवधारणा है और पंजीकरण से उसका कोई संबंध नहीं; यही युक्ति इस प्रश्न के दो विकल्प बनाती है।
- अपंजीकृत यूनियन को विधिविरुद्ध मान लेना; वह वैध रहती है और कामगार बिना पंजीकरण के भी संगठित हो सकते हैं, केवल उन्हें धारा 13, 17, 18 और 19 के संरक्षण नहीं मिलते।
- पंजीकरण और मान्यता को एक मान लेना; 1926 का अधिनियम विधिक दर्जा देता है, सौदेबाज़ी की मान्यता नहीं, और यह भेद अलग से पूछा जाता है।
यह अधिनियम EPFO और राज्य आयोगों में लगभग हर वर्ष आता है, और उसके प्रश्न चार खानों में बँटते हैं : पंजीकरण की शर्तें और संख्याएँ, पंजीकरण की प्रकृति यानी वैकल्पिक या अनिवार्य, पंजीकृत यूनियन की उन्मुक्तियाँ, तथा निधियों का भेद। इस प्रश्न वाला खाना सबसे छोटा है और इसीलिए सबसे निश्चित अंक देता है, बशर्ते अभ्यर्थी यह याद रखे कि अधिनियम अधिकार देता है, कर्तव्य नहीं थोपता। असत्य विकल्प प्रायः दूसरे श्रम-अधिनियमों के पद उठाकर बनाए जाते हैं, इसलिए दोहराते समय हर पद के आगे उसका अधिनियम लिखने की आदत डालिए। साथ ही धारा 17 और 18 की उन्मुक्तियों को अलग से याद रखिए, क्योंकि वही 'पंजीकरण से क्या मिलता है' वाले प्रश्न का उत्तर बनती हैं और हड़ताल के अधिकार वाले प्रश्नों में भी लौटती हैं।
इस प्रश्न से सीधे संबंधित कोई पूर्व PYQ उपलब्ध नहीं।
- practice — not a real PYQ
ट्रेड यूनियन अधिनियम, 1926 के अधीन पंजीकृत ट्रेड यूनियन के पदाधिकारियों तथा सदस्यों को यूनियन के उद्देश्यों को आगे बढ़ाने के लिए किए गए क़रारों के संबंध में आपराधिक षड्यंत्र के अभियोजन से उन्मुक्ति किस धारा से मिलती है?
- (a)धारा 13
- (b)धारा 16
- (c)धारा 17
- (d)धारा 18
उत्तर(c) धारा 17 — यही धारा पंजीकृत ट्रेड यूनियन के पदाधिकारियों और सदस्यों को यूनियन के उद्देश्यों को आगे बढ़ाने के लिए किए गए क़रारों पर आपराधिक षड्यंत्र के अभियोजन से उन्मुक्ति देती है। धारा 13 निगमित दर्जा देती है, धारा 16 पृथक् राजनीतिक निधि की अनुमति देती है, और धारा 18 व्यापार-विवाद की चिंतना या अग्रसरण में किए गए कार्यों पर कतिपय दीवानी वादों से संरक्षण देती है।
- practice — not a real PYQ
'सार्वजनिक सुविधा सेवा' की अवधारणा, जिसके अधीन हड़ताल तथा तालाबंदी से पहले सूचना देना अनिवार्य है, भारतीय श्रम-विधि में निम्नलिखित में से किस अधिनियम से आती है?
- (a)ट्रेड यूनियन अधिनियम, 1926
- (b)औद्योगिक विवाद अधिनियम, 1947
- (c)कारखाना अधिनियम, 1948
- (d)मजदूरी संदाय अधिनियम, 1936
उत्तर(b) औद्योगिक विवाद अधिनियम, 1947 — 'सार्वजनिक सुविधा सेवा' की परिभाषा उसकी धारा 2(n) में है, सूची पहली अनुसूची में, और धारा 22 के अधीन ऐसी सेवा में हड़ताल या तालाबंदी से पहले विहित सूचना अनिवार्य है। ट्रेड यूनियन अधिनियम, 1926 में यह अवधारणा आती ही नहीं, और शेष दोनों अधिनियम क्रमशः कार्य-दशाओं तथा मजदूरी के संदाय से संबंधित हैं।