अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन (ILO) द्वारा अंगीकृत निम्नलिखित प्रमुख कन्वेंशनों में से किसकी भारत ने संपुष्टि नहीं की है ?
- (a)बलात् श्रम कन्वेंशन (सं० 29)
- (b)समान पारिश्रमिक कन्वेंशन (सं० 100)
- (c)संघ बनाने की स्वतंत्रता और सम्मेलन आयोजित करने के अधिकार का संरक्षण कन्वेंशन (सं० 87)
- (d)भेदभाव (नियुक्ति एवं व्यवसाय) कन्वेंशन (सं० 111)
सही उत्तर — C, (c) वह कन्वेंशन जिसकी संख्या 87 है — संघ बनाने की स्वतंत्रता से संबंधित अभिसमय। अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन के 1998 के 'कार्य पर मूल सिद्धांतों और अधिकारों संबंधी घोषणा-पत्र' ने जिन आठ अभिसमयों को मूल (core) घोषित किया, उनमें से भारत ने छह की संपुष्टि की है और दो की नहीं, और वे दो वही युग्म हैं जो संघ बनाने की स्वतंत्रता तथा सामूहिक सौदेबाज़ी से संबंधित है : 1948 का अभिसमय संख्या 87 और 1949 का अभिसमय संख्या 98। इस प्रश्न में उस युग्म का केवल एक सदस्य रखा गया है, इसलिए उत्तर (c) है। संपुष्टि रोके रखने के लिए भारत जो कारण दशकों से देता आया है, उसका संबंध औद्योगिक कामगारों से नहीं, सरकारी सेवकों से है : अभिसमय संख्या 87 राज्य से यह अपेक्षा करता है कि लोक सेवकों को भी अपनी पसंद के संगठन बनाने और उनमें सम्मिलित होने तथा उन संगठनों को बिना हस्तक्षेप के काम करने की स्वतंत्रता मिले, और क्रमिक सरकारों का रुख यह रहा है कि यह उन आचरण-नियमों के साथ नहीं बैठता जो सिविल सेवकों के संघ बनाने, आंदोलन करने और सामूहिक सौदेबाज़ी करने पर निर्बंधन लगाते हैं। शेष छह मूल अभिसमयों को भारत ने अलग-अलग वर्षों में स्वीकार किया — बलात् श्रम कन्वेंशन 1954 में, समान पारिश्रमिक कन्वेंशन 1958 में, भेदभाव (नियुक्ति एवं व्यवसाय) कन्वेंशन 1960 में, बलात् श्रम उन्मूलन कन्वेंशन 2000 में, तथा बाल श्रम से जुड़े दोनों अभिसमय, अर्थात् न्यूनतम आयु और बाल श्रम के निकृष्टतम रूप, दोनों एक साथ 2017 में। एक बात इस पुस्तिका के हिन्दी स्तंभ की भी ध्यान देने योग्य है : अभिसमय संख्या 87 को सामान्यतः 'संगठित होने के अधिकार का संरक्षण' कहा जाता है, जबकि यहाँ उसका नाम 'सम्मेलन आयोजित करने के अधिकार का संरक्षण' छपा है; संख्या 87 से अभिसमय की पहचान फिर भी असंदिग्ध रहती है। और स्टेम को ध्यान से पढ़िए : यह नकारात्मक प्रश्न है, किन्तु उसका निषेध पूछ के परिचित हिस्से में नहीं, क्रिया के भीतर छिपा है — 'किसकी भारत ने संपुष्टि नहीं की है'। पुस्तिका 'नहीं' को मोटे अक्षरों में छापती है, फिर भी यह रचना पूरे प्रश्नपत्र में सबसे आसानी से छूट जाने वाली है, क्योंकि आँख निषेध को पूछ के अंत में ढूँढ़ती है और वह यहाँ वाक्य के भीतर बैठा है।
- (a)बलात् श्रम कन्वेंशन (सं० 29) — बलात् श्रम कन्वेंशन, 1930 का अभिसमय संख्या 29, भारत ने 1954 में संपुष्ट किया और वह उन छह मूल अभिसमयों में है जिन्हें भारत स्वीकार कर चुका है, इसलिए यह 'संपुष्टि नहीं की' वाले प्रश्न का उत्तर नहीं हो सकता। यह अभिसमय संपुष्टि करने वाले राज्य को यह बाध्यता देता है कि वह बलात् या अनिवार्य श्रम के सभी रूपों का दमन करे, जिसमें केवल कुछ संकीर्ण अपवाद हैं — अनिवार्य सैन्य सेवा, सामान्य नागरिक दायित्व, न्यायालय की दोषसिद्धि के परिणामस्वरूप कराया गया कार्य, आपात स्थितियाँ और छोटे सामुदायिक कार्य। इसके घरेलू समकक्ष अनुच्छेद 23 है, जो मानव के दुर्व्यापार और बेगार को प्रतिषिद्ध करता है, तथा बंधुआ मजदूरी पद्धति (उत्सादन) अधिनियम, 1976।
- (b)समान पारिश्रमिक कन्वेंशन (सं० 100) — समान पारिश्रमिक कन्वेंशन, 1951 का अभिसमय संख्या 100, भारत ने 1958 में संपुष्ट किया, इसलिए यह भी उत्तर नहीं है। यह पुरुष और महिला कामगारों को समान मूल्य के कार्य के लिए समान पारिश्रमिक देने की अपेक्षा करता है। इसकी घरेलू अभिव्यक्ति संविधान के अनुच्छेद 39(d) से आरंभ होती है, जो राज्य के नीति-निदेशक तत्त्व के रूप में यह कहता है कि राज्य पुरुषों और स्त्रियों दोनों के लिए समान कार्य के लिए समान वेतन सुनिश्चित करे; फिर समान पारिश्रमिक अधिनियम, 1976 आता है, और अब मजदूरी संहिता, 2019 के वे उपबंध, जो लिंग के आधार पर मजदूरी में विभेद का प्रतिषेध करते हैं। संविधान और अधिनियम दोनों में स्पष्ट आधार होने के कारण भारत के लिए इसे स्वीकार करना कठिन नहीं था।
- (d)भेदभाव (नियुक्ति एवं व्यवसाय) कन्वेंशन (सं० 111) — भेदभाव (नियुक्ति एवं व्यवसाय) कन्वेंशन, 1958 का अभिसमय संख्या 111, भारत ने 1960 में संपुष्ट किया। यह संपुष्टि करने वाले राज्य से ऐसी राष्ट्रीय नीति की अपेक्षा करता है जो नियुक्ति और व्यवसाय में अवसर तथा व्यवहार की समानता को बढ़ावा दे और जाति-प्रजाति, रंग, लिंग, धर्म, राजनीतिक विचार, राष्ट्रीय मूल तथा सामाजिक उद्भव जैसे आधारों पर विभेद समाप्त करे। भारत की संवैधानिक व्यवस्था — अनुच्छेद 14 की विधि के समक्ष समता, अनुच्छेद 15 का विभेद-प्रतिषेध और अनुच्छेद 16 की लोक नियोजन में अवसर की समानता — ने इस संपुष्टि को स्वाभाविक बना दिया, इसलिए यह विकल्प भी उस युग्म से बाहर है जिसकी संपुष्टि रुकी हुई है।
अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन की स्थापना 1919 में वर्साय की संधि के अधीन हुई, वह संयुक्त राष्ट्र की पहली विशिष्ट अभिकरण बना, और उसकी संरचना अनूठे रूप से त्रिपक्षीय है — प्रत्येक सदस्य राज्य के प्रतिनिधिमंडल में सरकार, नियोजक और कामगार तीनों के प्रतिनिधि होते हैं। भारत उसका संस्थापक सदस्य है। संगठन दो प्रकार के दस्तावेज़ अपनाता है : अभिसमय, जो संपुष्टि करने वाले राज्यों पर बाध्यकारी होते हैं, और सिफ़ारिशें, जो बाध्यकारी नहीं होतीं। 1998 के घोषणा-पत्र ने आठ अभिसमयों को मूल घोषित किया और चार सिद्धांतों में बाँटा : संघ बनाने की स्वतंत्रता तथा सामूहिक सौदेबाज़ी के अधिकार की प्रभावी मान्यता (अभिसमय 87 और 98), बलात् श्रम के सभी रूपों का उन्मूलन (29 और 105), बाल श्रम का प्रभावी उन्मूलन (138 और 182), तथा नियुक्ति और व्यवसाय में विभेद का उन्मूलन (100 और 111)। इस विभाजन को याद रखना परीक्षा की दृष्टि से सबसे उपयोगी है, क्योंकि प्रश्न प्रायः यही पूछता है कि किस युग्म की संपुष्टि हुई और किसकी नहीं। 2022 में अंतर्राष्ट्रीय श्रम सम्मेलन ने इन सिद्धांतों में एक और जोड़ा — सुरक्षित और स्वस्थ कार्य-परिवेश — जिससे व्यावसायिक सुरक्षा एवं स्वास्थ्य से संबंधित अभिसमय संख्या 155 तथा उसके संवर्धनात्मक ढाँचे से संबंधित अभिसमय संख्या 187 भी मूल अभिसमयों की श्रेणी में आ गए।
इस प्रश्न की असली कठिनाई तथ्य में नहीं, वाक्य-रचना में है। इस प्रश्नपत्र में सत्रह प्रश्नों की पूछ नकारात्मक है, और उनमें से अधिकांश में निषेध वहीं बैठता है जहाँ आँख उसे ढूँढ़ती है — 'कौन-सा एक सही नहीं है' के रूप में, वाक्य के अंत में। यहाँ वह क्रिया के भीतर है : 'किसकी भारत ने संपुष्टि नहीं की है'। पुस्तिका उसे मोटे अक्षरों में छापती अवश्य है, फिर भी जल्दबाज़ी में पढ़ने वाला अभ्यर्थी इसे 'भारत ने किसकी संपुष्टि की है' पढ़कर तीन में से कोई एक चुन लेता है और उसे तीन में से तीन बार सही होने का भ्रम भी रहता है, क्योंकि तीनों ही संपुष्ट हैं। इसलिए इस प्रकार के प्रश्न में उत्तर लिखने से पहले यह पूछना उपयोगी है कि 'मुझे वह विकल्प चाहिए जो सत्य है या जो असत्य है'। दूसरी बात, यह विषय स्वयं बहुत सीमित है — आठ अभिसमय, दो संपुष्ट नहीं — इसलिए यहाँ अंक निश्चित हैं यदि सूची और संपुष्टि-वर्ष याद हों। तीसरी बात, हिन्दी स्तंभ में अभिसमय 87 का नाम प्रचलित रूप से भिन्न छपा है, इसलिए पहचान नाम से नहीं, संख्या से कीजिए — यह आदत सभी अंतर्राष्ट्रीय अभिसमयों पर लागू होनी चाहिए।
- अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन के 1998 के 'कार्य पर मूल सिद्धांतों और अधिकारों संबंधी घोषणा-पत्र' द्वारा चिह्नित आठ मूल अभिसमय हैं — संघ बनाने की स्वतंत्रता तथा सामूहिक सौदेबाज़ी पर संख्या 87 और 98, बलात् श्रम पर 29 और 105, बाल श्रम पर 138 और 182, तथा समान पारिश्रमिक व विभेद-निषेध पर 100 और 111।
- भारत ने इनमें से छह की संपुष्टि की है — संख्या 29 सन् 1954 में, संख्या 100 सन् 1958 में, संख्या 111 सन् 1960 में, संख्या 105 सन् 2000 में, तथा संख्या 138 और 182 दोनों एक साथ 2017 में — और संख्या 87 तथा 98 की संपुष्टि नहीं की है।
- संख्या 87 और 98 की संपुष्टि रोके रखने के लिए लगातार दिया जाने वाला कारण यह है कि वे सरकारी सेवकों को अपनी पसंद के संगठन बनाने तथा सामूहिक सौदेबाज़ी करने की अनुमति देने की अपेक्षा करते हैं, जिसे क्रमिक सरकारें सिविल सेवकों पर लागू आचरण-नियमों के साथ असंगत बताती रही हैं।
- 2022 में अंतर्राष्ट्रीय श्रम सम्मेलन ने मूल सिद्धांतों में सुरक्षित और स्वस्थ कार्य-परिवेश को जोड़ा, जिससे व्यावसायिक सुरक्षा एवं स्वास्थ्य संबंधी अभिसमय संख्या 155 तथा उसके संवर्धनात्मक ढाँचे संबंधी अभिसमय संख्या 187 भी मूल अभिसमयों की श्रेणी में आ गए।
- अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन की स्थापना 1919 में वर्साय की संधि के अधीन हुई, वह संयुक्त राष्ट्र की पहली विशिष्ट अभिकरण बना और उसकी संरचना त्रिपक्षीय है; वह बाध्यकारी अभिसमय तथा बाध्यकारी न होने वाली सिफ़ारिशें दोनों अपनाता है, और भारत उसका संस्थापक सदस्य है।
- निषेध को पूछ के अंत में ढूँढ़ना और क्रिया के भीतर छिपे 'नहीं' से चूक जाना; यहाँ पूछ 'किसकी संपुष्टि नहीं की है' है, और इसे 'किसकी संपुष्टि की है' पढ़ लेने पर तीनों शेष विकल्प सही लगने लगते हैं।
- अभिसमय को नाम से पहचानने की कोशिश करना; हिन्दी स्तंभ में संख्या 87 का नाम प्रचलित रूप से भिन्न छपा है, इसलिए पहचान सदैव संख्या से करनी चाहिए।
- यह मान लेना कि जो अभिसमय भारत ने संपुष्ट नहीं किया, उसके विषय पर भारत में कोई विधि ही नहीं है; ट्रेड यूनियन अधिनियम, 1926 संघ बनाने की स्वतंत्रता को संरक्षण देता है, फिर भी अभिसमय 87 की संपुष्टि नहीं हुई है।
- संपुष्टि के वर्षों को गड्डमड्ड करना — बलात् श्रम के दो अभिसमय अलग-अलग समय पर स्वीकार हुए, एक 1954 में और दूसरा 2000 में, और यही भेद प्रश्न में दोहराया जा सकता है।
अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन से आने वाले प्रश्न प्रायः चार साँचों में लौटते हैं : कौन-से अभिसमय मूल हैं, भारत ने किनकी संपुष्टि की है और किनकी नहीं, किसी एक अभिसमय की संख्या और विषय का सुमेलन, और संगठन की त्रिपक्षीय संरचना। इनमें संपुष्टि वाला प्रश्न सबसे आम है, क्योंकि उसका उत्तर पूर्णतः निश्चित है और सूची छोटी है। असत्य विकल्प उन्हीं मूल अभिसमयों से बनाए जाते हैं जिनकी संपुष्टि हो चुकी है, इसलिए वे सुपरिचित लगते हैं। तैयारी के लिए एक आठ-पंक्ति की तालिका पर्याप्त है जिसमें संख्या, विषय, वर्ष और भारत की स्थिति लिखी हो, तथा उसके नीचे 2022 में जुड़े दो अभिसमयों की पंक्ति। यही तालिका श्रम-विधि के संवैधानिक उपबंधों वाले प्रश्नों में भी काम आती है, क्योंकि परीक्षक प्रायः अभिसमय और तत्संगत अनुच्छेद का सुमेलन कराता है।
इस प्रश्न से सीधे संबंधित कोई पूर्व PYQ उपलब्ध नहीं।
- practice — not a real PYQ
अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन के 1998 के घोषणा-पत्र द्वारा चिह्नित मूल अभिसमयों में से भारत ने निम्नलिखित में से किस युग्म की संपुष्टि नहीं की है?
- (a)संख्या 29 और संख्या 105
- (b)संख्या 87 और संख्या 98
- (c)संख्या 100 और संख्या 111
- (d)संख्या 138 और संख्या 182
उत्तर(b) संख्या 87 और संख्या 98 — ये दोनों संघ बनाने की स्वतंत्रता तथा संगठित होने और सामूहिक सौदेबाज़ी के अधिकार से संबंधित हैं, और भारत ने इन्हीं दो मूल अभिसमयों की संपुष्टि नहीं की है। बलात् श्रम के दोनों अभिसमय क्रमशः 1954 और 2000 में, समान पारिश्रमिक तथा विभेद-निषेध वाले 1958 और 1960 में, और बाल श्रम वाले दोनों 2017 में संपुष्ट किए जा चुके हैं।
- practice — not a real PYQ
अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन की संरचना के संदर्भ में, उसे अन्य अंतर्राष्ट्रीय संगठनों से भिन्न बनाने वाली प्रमुख विशेषता निम्नलिखित में से कौन-सी है?
- (a)उसके निर्णय सभी सदस्य देशों पर स्वतः बाध्यकारी होते हैं
- (b)उसके प्रतिनिधिमंडल में सरकार, नियोजक और कामगार तीनों का प्रतिनिधित्व होता है
- (c)उसकी सदस्यता केवल विकासशील देशों तक सीमित है
- (d)वह संयुक्त राष्ट्र की स्थापना के बाद 1946 में बनाया गया था
उत्तर(b) उसके प्रतिनिधिमंडल में सरकार, नियोजक और कामगार तीनों का प्रतिनिधित्व होता है — यही त्रिपक्षीय संरचना अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन की विशिष्ट पहचान है। उसके अभिसमय केवल संपुष्टि करने वाले राज्यों पर बाध्यकारी होते हैं, सदस्यता किसी वर्ग तक सीमित नहीं है, और संगठन की स्थापना 1919 में वर्साय की संधि के अधीन हुई थी, यद्यपि वह बाद में संयुक्त राष्ट्र की पहली विशिष्ट अभिकरण बना।