किसी स्थापन में न्यूनतम कितने कर्मचारी कार्यरत होने अपेक्षित हैं, ताकि नियोक्ता, स्थापन के बहुसंख्यक कर्मचारियों के प्राधिकार से, केन्द्र सरकार को इस आशय का आवेदन कर सके कि उस नियोक्ता को कर्मचारी भविष्य निधि और प्रकीर्ण उपबंध अधिनियम, 1952 के अधीन कर्मचारियों के लिए पृथक् भविष्य निधि लेखा सृजित करने के लिए प्राधिकृत किया जाए?
- (a)एक सौ
- (b)तीन सौ
- (c)पाँच सौ
- (d)एक हज़ार
सही उत्तर — A, (a) एक सौ। यह उपबंध कर्मचारी भविष्य निधि और प्रकीर्ण उपबंध अधिनियम, 1952 की धारा 16A है, जिसका शीर्षक ही यह है कि कतिपय नियोजकों को भविष्य निधि लेखे स्वयं रखने के लिए प्राधिकृत करना। धारा कहती है कि जहाँ किसी स्थापन में एक सौ या अधिक व्यक्ति नियोजित हों, वहाँ केंद्र सरकार, नियोजक के आवेदन पर तथा उस स्थापन के बहुसंख्यक कर्मचारियों के प्राधिकार से, उस नियोजक को लिखित रूप में यह प्राधिकार दे सकती है कि वह योजना में विनिर्दिष्ट निबंधनों पर स्थापन के लिए भविष्य निधि लेखा स्वयं रखे। तीन शर्तें एक साथ चाहिए — कर्मचारियों की संख्या, नियोजक का आवेदन, और बहुसंख्यक कर्मचारियों का प्राधिकार — और यही तीनों स्टेम में गिनाई गई हैं, इसलिए प्रश्न वस्तुतः केवल संख्या पूछ रहा है। धारा 16A का परंतुक एक और शर्त जोड़ता है : ऐसा प्राधिकार नहीं दिया जाएगा यदि नियोजक ने प्राधिकार की तिथि से ठीक पहले के तीन वर्षों में भविष्य निधि अंशदान के संदाय में कोई चूक की हो अथवा अधिनियम के अधीन कोई अन्य अपराध किया हो, और निबंधनों का पालन न करने पर दिया गया प्राधिकार वापस भी लिया जा सकता है। यह भेद ध्यान में रखिए, क्योंकि यहीं सबसे अधिक भ्रम होता है : धारा 16A के अधीन मिला प्राधिकार छूट नहीं है। स्थापन अधिनियम के अधीन आच्छादित बना रहता है, कर्मचारियों के हक़ ज्यों के त्यों रहते हैं, और नियोजक को विवरणियाँ देनी, अंशदान जमा करना, निरीक्षण कराना तथा विहित प्रशासनिक प्रभार चुकाना पड़ता है — केवल लेखे रखने का काम उसके पास आ जाता है। वास्तविक छूट धारा 17 के अधीन दी जाती है, जहाँ शर्त यह है कि स्थापन की अपनी भविष्य निधि योजना अंशदान की दरों तथा अन्य हितलाभों में सांविधिक व्यवस्था से कम अनुकूल न हो।
- (b)तीन सौ — तीन सौ की संख्या 1952 के अधिनियम में कहीं भी प्रयुक्त नहीं होती, और विकल्प-समुच्चय में उसकी उपस्थिति श्रम-विधि के दूसरे कोने से उधार ली गई है, जहाँ यह संख्या अब सुपरिचित हो चुकी है : औद्योगिक संबंध संहिता, 2020 स्थायी आदेशों के लागू होने तथा छँटनी, कर्मचारी-कटौती और बंदी से पहले सरकार की पूर्व अनुमति की अपेक्षा के लिए तीन सौ कामगारों की सीमा रखती है, जो औद्योगिक विवाद अधिनियम, 1947 के तत्संगत उपबंधों की एक सौ की संख्या का स्थान लेती है। जिस अभ्यर्थी ने हाल ही में संहिताएँ दोहराई हैं उसे यह संख्या परिचित लगेगी और वह उसे यहाँ उठा लाएगा। इसीलिए संख्याओं को अधिनियम के नाम के साथ बाँधकर याद रखना चाहिए, अकेले नहीं।
- (c)पाँच सौ — पाँच सौ इस संदर्भ में अधिनियम में कहीं नहीं आती, और इसे चुनने के पीछे प्रायः यह मान्यता होती है कि ऐसी सुविधा बहुत बड़े नियोजकों के लिए ही आरक्षित होगी। यह मान्यता धारा 16A के प्रयोजन को ग़लत पढ़ती है, जो पुरस्कार नहीं, प्रशासनिक सुविधा है : जो स्थापन अपना ठीक-ठाक लेखा-विभाग चला सकता है वह अपने भविष्य निधि अभिलेख केंद्रीय कार्यालय की अपेक्षा सस्ते और तेज़ रख सकता है, और इसीलिए विधि उसे यह अनुमति देती है। सुरक्षा-कवच अलग से रखे गए हैं — बहुसंख्यक कर्मचारियों की अपनी सहमति, केंद्र सरकार का आदेश, तीन वर्ष का निर्दोष अनुपालन-रिकॉर्ड, और निबंधनों का उल्लंघन होने पर प्राधिकार वापस लिए जाने की शक्ति — इसलिए सीमा को अत्यधिक ऊँचा रखने की आवश्यकता ही नहीं थी।
- (d)एक हज़ार — एक हज़ार प्रस्तुत विकल्पों में सबसे बड़ी संख्या है और धारा से सबसे दूर। इसका स्रोत भी वही अनुमान है कि यह रियायत असाधारण होनी चाहिए, और उत्तर भी वही है : यह अधिनियम अपनी रेखाएँ बहुत नीचे खींचता है — धारा 1(3) के अधीन सामान्य आच्छादन के लिए बीस, धारा 16(1)(a) के अधीन शक्ति की सहायता के बिना चलने वाली सहकारी सोसाइटी के लिए पचास, और धारा 16A के अधीन स्वयं लेखे रखने के प्राधिकार के लिए एक सौ। अधिनियम के इस भाग में यही तीन कर्मचारी-संख्याएँ हैं, और यह प्रश्नपत्र इनमें से दो को थोड़े ही अंतराल पर पूछ चुका है, इसलिए तीनों को एक साथ, धारा-सहित याद कर लेना यहाँ सीधे अंक देता है।
कर्मचारी भविष्य निधि और प्रकीर्ण उपबंध अधिनियम, 1952 में भविष्य निधि के प्रशासन के तीन ढंग हैं, और उनका भेद परीक्षा की दृष्टि से निर्णायक है। पहला और सामान्य ढंग यह है कि नियोजक अंशदान काटकर कर्मचारी भविष्य निधि संगठन को विप्रेषित करे, जो केंद्रीय निधि में लेखे रखता है। दूसरा ढंग धारा 16A का है : सौ या अधिक कर्मचारियों वाले स्थापन का नियोजक, बहुसंख्यक कर्मचारियों के प्राधिकार से आवेदन करके, केंद्र सरकार से यह अनुमति ले सकता है कि लेखे वह स्वयं रखे — पर स्थापन आच्छादित बना रहता है और अधिनियम की शेष सारी बाध्यताएँ चलती रहती हैं। तीसरा ढंग धारा 17 की छूट है, जहाँ समुचित सरकार किसी स्थापन को योजना के प्रवर्तन से ही छूट दे सकती है, बशर्ते उसकी अपनी भविष्य निधि व्यवस्था अंशदान की दरों तथा अन्य हितलाभों में सांविधिक व्यवस्था से कम अनुकूल न हो; ऐसे छूट-प्राप्त स्थापन सामान्यतः न्यासी बोर्ड के माध्यम से अपनी निधि चलाते हैं। इन तीनों के ऊपर आच्छादन के नियम हैं — धारा 1(3) की बीस की सीमा, धारा 1(4) का स्वैच्छिक आच्छादन, धारा 16 का अपवर्जन और धारा 1(5) का 'एक बार आच्छादित, सदा आच्छादित' नियम। प्रश्नपत्र इन खानों को अलग-अलग परखता है, इसलिए इन्हें अलग-अलग ही याद रखना चाहिए।
इस प्रश्न का सबसे बड़ा जोखिम यह है कि उसका स्टेम लंबा है और उसमें तीन शर्तें एक साथ आती हैं — बहुसंख्यक कर्मचारियों का प्राधिकार, केंद्र सरकार को आवेदन, और पृथक् भविष्य निधि लेखा — जिससे अभ्यर्थी को लगता है कि प्रश्न किसी जटिल प्रक्रिया के बारे में है। वस्तुतः पूछा केवल यह गया है कि उस प्रक्रिया का द्वार किस संख्या पर खुलता है। इसलिए ऐसे प्रश्नों में पहले स्टेम को छोटा कीजिए : सारे विशेषण हटाकर देखिए कि पूछ क्या है, और फिर उस पूछ से जुड़ी धारा याद कीजिए। दूसरी बात, यह प्रश्नपत्र इसी अधिनियम की दो संख्याएँ पास-पास पूछता है — पचास और एक सौ — और दोनों बार भ्रम इसी बात का है कि संख्या किस काम से बँधी है। तीसरी बात, 'पृथक् भविष्य निधि लेखा सृजित करना' और 'योजना से छूट पाना' दो अलग बातें हैं; पहली धारा 16A है, दूसरी धारा 17। जो अभ्यर्थी इन दोनों को एक मान लेता है, वह इस प्रश्न में भी और छूट-प्राप्त स्थापनों वाले प्रश्नों में भी चूकेगा।
- कर्मचारी भविष्य निधि और प्रकीर्ण उपबंध अधिनियम, 1952 की धारा 16A केंद्र सरकार को यह शक्ति देती है कि वह एक सौ या अधिक व्यक्ति नियोजित करने वाले स्थापन के नियोजक को, उसके आवेदन तथा बहुसंख्यक कर्मचारियों के प्राधिकार पर, योजना में विनिर्दिष्ट निबंधनों पर स्थापन के लिए भविष्य निधि लेखा स्वयं रखने के लिए लिखित रूप में प्राधिकृत करे।
- धारा 16A(1) का परंतुक ऐसा प्राधिकार देने से रोकता है यदि नियोजक ने प्राधिकार की तिथि से ठीक पहले के तीन वर्षों में भविष्य निधि अंशदान के संदाय में कोई चूक की हो या अधिनियम के अधीन कोई अन्य अपराध किया हो, और निबंधनों का पालन न करने पर दिया गया प्राधिकार वापस लिया जा सकता है।
- धारा 16A का प्राधिकार छूट नहीं है : स्थापन अधिनियम के अधीन आच्छादित बना रहता है और कर्मचारियों के हक़ अपरिवर्तित रहते हैं, जबकि नियोजक को विवरणियाँ देनी, अंशदान जमा करना, निरीक्षण कराना और विहित प्रशासनिक प्रभार चुकाना पड़ता है।
- वास्तविक छूट धारा 17 के अधीन दी जाती है, जहाँ समुचित सरकार किसी स्थापन को योजना के प्रवर्तन से छूट दे सकती है यदि उसकी अपनी भविष्य निधि व्यवस्था अंशदान की दरों तथा अन्य हितलाभों में सांविधिक व्यवस्था से कम अनुकूल न हो; छूट-प्राप्त स्थापन सामान्यतः न्यासी बोर्ड के माध्यम से अपनी निधि चलाते हैं।
- अधिनियम के इस भाग की कर्मचारी-संख्याएँ तीन हैं — धारा 1(3) के अधीन सामान्य आच्छादन के लिए बीस, धारा 16(1)(a) के अधीन शक्ति की सहायता के बिना चलने वाली पंजीकृत सहकारी सोसाइटी के लिए पचास, और धारा 16A के अधीन स्वयं लेखे रखने के प्राधिकार के लिए एक सौ।
- धारा 16A के प्राधिकार को धारा 17 की छूट मान लेना; पहले में स्थापन आच्छादित बना रहता है और केवल लेखे स्वयं रखता है, दूसरे में वह योजना के प्रवर्तन से ही बाहर हो जाता है।
- औद्योगिक संबंध संहिता, 2020 की तीन सौ की सीमा को इस अधिनियम में उठा लाना; संख्याएँ अधिनियम के नाम के साथ बाँधकर याद रखनी चाहिए, अन्यथा एक संहिता की सीमा दूसरी विधि में चली जाती है।
- लंबे स्टेम से घबराकर यह मान लेना कि प्रश्न प्रक्रिया पूछ रहा है, जबकि सारी शर्तें स्टेम में ही गिना दी गई हैं और पूछा केवल यह गया है कि वह द्वार किस संख्या पर खुलता है।
- धारा 16A के परंतुक की तीन वर्ष वाली अनुपालन-शर्त भूल जाना, जो स्वयं एक स्वतंत्र प्रश्न बनती है और जिसके बिना यह उपबंध अधूरा याद रहता है।
कर्मचारी भविष्य निधि अधिनियम की सीमा-संख्याएँ इस परीक्षा की सबसे नियमित सामग्री हैं, क्योंकि APFC पद स्वयं इसी अधिनियम के प्रशासन का है। ये तीन साँचों में लौटती हैं : संख्या सीधे पूछना, संख्या से धारा पुछवाना, और किसी काल्पनिक स्थापन का विवरण देकर यह पुछवाना कि उस पर कौन-सा उपबंध लागू होगा। असत्य विकल्प दो स्रोतों से आते हैं — उसी अधिनियम की दूसरी संख्याएँ, और दूसरे श्रम-अधिनियमों की प्रसिद्ध संख्याएँ जैसे तीन सौ या पाँच सौ। इसलिए दोहराने की सबसे अच्छी इकाई एक ऐसा पन्ना है जिसमें बाईं ओर संख्या, बीच में धारा और दाईं ओर वह काम लिखा हो जिससे संख्या बँधी है; और यह पन्ना केवल इसी अधिनियम का हो, दूसरी विधियों से मिला हुआ नहीं। यही अनुशासन इसी प्रश्नपत्र के उस प्रश्न में भी काम आता है जो सहकारी सोसाइटी वाली पचास की सीमा पूछता है।
इस प्रश्न से सीधे संबंधित कोई पूर्व PYQ उपलब्ध नहीं।
- practice — not a real PYQ
कर्मचारी भविष्य निधि और प्रकीर्ण उपबंध अधिनियम, 1952 की धारा 16A के अधीन नियोजक को स्वयं भविष्य निधि लेखे रखने का प्राधिकार देने से पहले कितने वर्षों का अंशदान-संबंधी निर्दोष अनुपालन अपेक्षित है?
- (a)एक वर्ष
- (b)दो वर्ष
- (c)तीन वर्ष
- (d)पाँच वर्ष
उत्तर(c) तीन वर्ष — धारा 16A(1) का परंतुक ऐसा प्राधिकार देने से रोकता है यदि नियोजक ने प्राधिकार की तिथि से ठीक पहले के तीन वर्षों में भविष्य निधि अंशदान के संदाय में कोई चूक की हो अथवा अधिनियम के अधीन कोई अन्य अपराध किया हो; और निबंधनों का पालन न करने पर दिया गया प्राधिकार वापस भी लिया जा सकता है।
- practice — not a real PYQ
कर्मचारी भविष्य निधि और प्रकीर्ण उपबंध अधिनियम, 1952 के अधीन किसी स्थापन को योजना के प्रवर्तन से छूट देने की शक्ति निम्नलिखित में से किस धारा में है?
- (a)धारा 1(4)
- (b)धारा 16A
- (c)धारा 17
- (d)धारा 7A
उत्तर(c) धारा 17 — इसी धारा के अधीन समुचित सरकार किसी स्थापन को योजना के प्रवर्तन से छूट दे सकती है, बशर्ते उसकी अपनी भविष्य निधि व्यवस्था अंशदान की दरों तथा अन्य हितलाभों में सांविधिक व्यवस्था से कम अनुकूल न हो। धारा 1(4) स्वैच्छिक आच्छादन की है, धारा 16A केवल स्वयं लेखे रखने का प्राधिकार देती है और छूट नहीं, तथा धारा 7A देय राशि के अधिनिर्णयन की है।