कितनी प्रतिकर राशि उस कर्मचारी को भुगतान की जाएगी, जो कर्मचारी प्रतिकर अधिनियम, 1923 के उपबंधों के अधीन क्षति के परिणामस्वरूप स्थायी रूप से पूर्ण अशक्त हो गया है? (संकेत : आहरित मासिक मजदूरी ₹22,500 थी और सुसंगत गुणक 159·80 है)
- (a)₹ 14,38,200
- (b)₹ 23,97,000
- (c)₹ 21,57,300
- (d)₹ 7,67,040
सही उत्तर — A, (a) ₹ 14,38,200। शासी उपबंध कर्मचारी प्रतिकर अधिनियम, 1923 की धारा 4(1)(b) है : जहाँ क्षति से स्थायी पूर्ण अशक्तता होती है, वहाँ प्रतिकर मासिक मजदूरी के साठ प्रतिशत को सुसंगत गुणक से गुणा करने पर आने वाली राशि होगी, अथवा एक लाख चालीस हज़ार रुपये, इनमें से जो अधिक हो। किन्तु गणना में लगाने के लिए मासिक मजदूरी वह नहीं ली जाती जो कर्मचारी वास्तव में पाता था; धारा 4(1) का स्पष्टीकरण II उसे केंद्र सरकार द्वारा अधिसूचित राशि पर सीमित कर देता है, और वह सीमा जनवरी 2020 की अधिसूचना से पंद्रह हज़ार रुपये प्रति मास है, जो उससे पहले आठ हज़ार रुपये थी। यही इस प्रश्न का पूरा भार उठाता है। स्टेम में आहरित मासिक मजदूरी बाईस हज़ार पाँच सौ रुपये बताई गई है, अर्थात् सीमा से ऊपर, इसलिए गणना में वह नहीं, पंद्रह हज़ार रुपये ही लिए जाएँगे। अब सूत्र लगाइए : पंद्रह हज़ार का साठ प्रतिशत नौ हज़ार रुपये होता है, और नौ हज़ार को दिए गए सुसंगत गुणक 159·80 से गुणा करने पर चौदह लाख अड़तीस हज़ार दो सौ रुपये आते हैं। यह राशि एक लाख चालीस हज़ार की सांविधिक न्यूनतम राशि से कहीं अधिक है, इसलिए देय यही होगी, और यही विकल्प (a) है। गणित सरल है और परीक्षा यहाँ गणित की नहीं, विधि की हो रही है : प्रश्न यह देख रहा है कि अभ्यर्थी को स्पष्टीकरण II की मजदूरी-सीमा याद है या नहीं। इसीलिए स्टेम में वास्तविक मजदूरी जान-बूझकर सीमा से ऊपर रखी गई है, ताकि सीमा भूलने वाला अभ्यर्थी एक ऐसी संख्या तक पहुँचे जो विकल्पों में उपलब्ध है। सुसंगत गुणक स्वयं अनुसूची IV से आता है और दुर्घटना की तिथि से ठीक पहले पड़ने वाले जन्मदिन पर कर्मचारी की पूरी हो चुकी आयु के सामने पढ़ा जाता है; कर्मचारी जितना कम आयु का होगा, गुणक उतना अधिक होगा, क्योंकि प्रतिकर उतनी ही लंबी अवधि की खोई हुई आय का स्थान लेता है।
- (b)₹ 23,97,000 — ₹ 23,97,000 ठीक पंद्रह हज़ार को 159·80 से गुणा करने पर आता है। यह उस अभ्यर्थी का उत्तर है जिसे कठिन आधा भाग — मजदूरी की सीमा — याद रह गया, किन्तु प्रतिशत भूल गया, और उसने सीमित मजदूरी को साठ प्रतिशत लिए बिना सीधे गुणक से गुणा कर दिया। अधिनियम कभी भी पूरी मासिक मजदूरी को गुणक से गुणा करके प्रतिकर नहीं देता : प्रतिशत ही वह तरीक़ा है जिससे विधि यह व्यक्त करती है कि योजना आय के किस अंश की भरपाई करती है, और वह अंश दशा के अनुसार बदलता है — धारा 4(1)(b) के अधीन स्थायी पूर्ण अशक्तता पर साठ प्रतिशत और धारा 4(1)(a) के अधीन मृत्यु पर पचास प्रतिशत। प्रतिशत छोड़ देने से राशि लगभग दो-तिहाई बढ़ जाती है, इसलिए यह विकल्प सबसे बड़ा भी है, और यही उसकी पहचान है।
- (c)₹ 21,57,300 — ₹ 21,57,300 वह राशि है जो बाईस हज़ार पाँच सौ के साठ प्रतिशत को 159·80 से गुणा करने पर आती है, अर्थात् सही सूत्र उस मजदूरी पर लगाया गया जो कर्मचारी वास्तव में पाता था। यह उस अभ्यर्थी का स्वाभाविक उत्तर है जिसने धारा 4(1)(b) तो पढ़ी है पर स्पष्टीकरण II नहीं, और वस्तुतः प्रश्न का निशाना यही अभ्यर्थी है : स्टेम में वास्तविक मासिक मजदूरी इसीलिए छापी गई है कि यह संख्या उपलब्ध रहे। मजदूरी-सीमा इसलिए है कि यह अधिनियम नुक़सानी का वाद नहीं, परिभाषित दायित्व वाली सामाजिक बीमा व्यवस्था है, और वह सीमा समय-समय पर अधिसूचना से संशोधित होती है — 2010 से आठ हज़ार और जनवरी 2020 से पंद्रह हज़ार। इसलिए यहाँ ग़लती गणित की नहीं, विधि की है।
- (d)₹ 7,67,040 — ₹ 7,67,040 आठ हज़ार के साठ प्रतिशत को 159·80 से गुणा करने पर आता है, अर्थात् सही पद्धति पुरानी, अधिक्रांत मजदूरी-सीमा पर लगाई गई। यह उस अच्छी तैयारी वाले अभ्यर्थी के लिए जाल है जिसके नोट्स पुराने पड़ चुके हैं, और यह श्रम-विधि की संख्याओं के स्वभाव के बारे में एक उपयोगी चेतावनी है : इन अधिनियमों की सबसे अधिक पूछी जाने वाली कई संख्याएँ अधिनियम के मूल पाठ में नहीं, अधिसूचनाओं में बैठी होती हैं, और वे बदलती रहती हैं। धारा 4(1) के स्पष्टीकरण II की मजदूरी-सीमा जनवरी 2020 से प्रभावी होकर आठ हज़ार से पंद्रह हज़ार हो गई, इसलिए पुरानी सीमा पर की गई कोई भी गणना सही राशि के आधे से कुछ ही अधिक निकलेगी — जैसा यहाँ स्पष्ट दिख रहा है।
कर्मचारी प्रतिकर अधिनियम, 1923 में प्रतिकर की राशि विवेक से नहीं, सूत्र से निकलती है, और वह सूत्र धारा 4 में है। मृत्यु की दशा में धारा 4(1)(a) मासिक मजदूरी का पचास प्रतिशत गुणक से गुणा करने को कहती है, न्यूनतम एक लाख बीस हज़ार रुपये; स्थायी पूर्ण अशक्तता की दशा में धारा 4(1)(b) साठ प्रतिशत लेती है, न्यूनतम एक लाख चालीस हज़ार रुपये। दोनों दशाओं में तीन इनपुट लगते हैं — मासिक मजदूरी, प्रतिशत और सुसंगत गुणक — और तीनों पर एक-एक नियम चढ़ा हुआ है। मासिक मजदूरी पर स्पष्टीकरण II की अधिसूचित सीमा चढ़ती है, जो इस समय पंद्रह हज़ार रुपये है। प्रतिशत दशा के अनुसार बदलता है। और गुणक अनुसूची IV से आता है, जो आयु के सामने संख्या देती है — आयु जितनी कम, गुणक उतना अधिक, क्योंकि क्षति उतने ही अधिक शेष कार्य-वर्षों की आय छीनती है। स्थायी आंशिक अशक्तता के लिए धारा 4(1)(c) यही राशि अनुसूची I में दिए गए अर्जन-क्षमता की हानि के प्रतिशत के अनुपात में देती है, और अस्थायी अशक्तता के लिए धारा 4(1)(d) अर्धमासिक संदाय की व्यवस्था करती है। इसके अतिरिक्त धारा 4(2A) नियोजन के अनुक्रम में हुई क्षतियों के उपचार पर वास्तव में हुए चिकित्सा-व्यय की प्रतिपूर्ति अनिवार्य करती है और धारा 4(4) मृत्यु की दशा में अंत्येष्टि-व्यय की।
यह प्रश्न देखने में अंकगणित का है और वस्तुतः विधि का। तीनों असत्य विकल्प एक-एक विशिष्ट भूल के परिणाम हैं, और तीनों भूलें गणना की नहीं, उपबंध की जानकारी की हैं : एक में प्रतिशत छूट गया, एक में मजदूरी-सीमा छूट गई, और एक में पुरानी सीमा लगा दी गई। इसका सीधा अर्थ यह है कि ऐसे प्रश्न में उत्तर-विकल्पों से पीछे की ओर चलकर सोचना अत्यंत उपयोगी है : जो राशि सबसे बड़ी है वह प्रायः प्रतिशत छोड़ने से बनती है, और जो सबसे छोटी है वह प्रायः पुरानी सीमा से। दूसरी बात, गणना करते समय क्रम निश्चित रखिए — पहले मजदूरी को सीमा तक घटाइए, फिर प्रतिशत लगाइए, फिर गुणक से गुणा कीजिए, और अंत में सांविधिक न्यूनतम से तुलना कीजिए। यही क्रम मृत्यु वाली दशा में भी चलेगा, केवल प्रतिशत और न्यूनतम राशि बदलेंगे। तीसरी बात, इस प्रश्नपत्र में इसी अधिनियम से प्रक्रिया वाला प्रश्न भी है, इसलिए तैयारी में धारा 4 का सूत्र और धारा 25A की समय-सीमा दोनों साथ-साथ रखनी चाहिए। छपाई की एक बात भी ध्यान देने योग्य है : गुणक दशमलव के लिए उठे हुए मध्य-बिंदु के साथ 159·80 छपा है, और विकल्पों में रुपये का चिह्न प्रत्येक राशि से पहले छपा है।
- कर्मचारी प्रतिकर अधिनियम, 1923 की धारा 4(1)(b) स्थायी पूर्ण अशक्तता के लिए प्रतिकर मासिक मजदूरी के साठ प्रतिशत को सुसंगत गुणक से गुणा करने पर आने वाली राशि अथवा एक लाख चालीस हज़ार रुपये, जो अधिक हो, नियत करती है; मृत्यु के लिए धारा 4(1)(a) पचास प्रतिशत तथा एक लाख बीस हज़ार रुपये की न्यूनतम राशि लेती है।
- धारा 4(1) का स्पष्टीकरण II गणना में प्रयुक्त मासिक मजदूरी को केंद्र सरकार द्वारा अधिसूचित राशि तक सीमित करता है, जो जनवरी 2020 की अधिसूचना से पंद्रह हज़ार रुपये प्रति मास है और उससे पहले आठ हज़ार रुपये थी; इसलिए इससे ऊपर वास्तव में आहरित मजदूरी गणना में नहीं ली जाती।
- इस प्रश्न के आँकड़ों पर देय राशि इस प्रकार निकलती है : पंद्रह हज़ार का साठ प्रतिशत, अर्थात् नौ हज़ार रुपये, को सुसंगत गुणक 159·80 से गुणा करने पर चौदह लाख अड़तीस हज़ार दो सौ रुपये, जो सांविधिक न्यूनतम एक लाख चालीस हज़ार से अधिक है और इसलिए देय है।
- सुसंगत गुणक अनुसूची IV से आता है और दुर्घटना की तिथि से ठीक पहले पड़ने वाले जन्मदिन पर कर्मचारी की पूरी हो चुकी आयु के सामने पढ़ा जाता है; आयु जितनी कम होगी गुणक उतना अधिक होगा, क्योंकि प्रतिकर उतनी ही लंबी अवधि की खोई हुई आय का स्थान लेता है।
- धारा 4(2A) नियोजन के अनुक्रम में हुई क्षतियों के उपचार पर वास्तव में हुए चिकित्सा-व्यय की प्रतिपूर्ति अनिवार्य करती है, धारा 4(4) मृत्यु की दशा में अंत्येष्टि-व्यय का उपबंध करती है, और स्थायी आंशिक अशक्तता के लिए धारा 4(1)(c) अनुसूची I में दिए गए अर्जन-क्षमता की हानि के प्रतिशत के अनुपात में राशि देती है।
- वास्तव में आहरित मजदूरी को ही गणना में डाल देना; स्पष्टीकरण II की सीमा लगाना पहला क़दम है, और स्टेम में वास्तविक मजदूरी जान-बूझकर सीमा से ऊपर रखी जाती है ताकि यह भूल एक उपलब्ध विकल्प तक पहुँचा दे।
- प्रतिशत छोड़ देना और सीमित मजदूरी को सीधे गुणक से गुणा कर देना; अधिनियम कभी पूरी मजदूरी नहीं लेता, स्थायी पूर्ण अशक्तता पर साठ प्रतिशत और मृत्यु पर पचास प्रतिशत लेता है।
- पुरानी मजदूरी-सीमा से गणना कर बैठना; यह संख्या अधिसूचना से बदलती है और जनवरी 2020 से आठ हज़ार के स्थान पर पंद्रह हज़ार है, इसलिए पुराने नोट्स यहाँ सीधे अंक गँवा देते हैं।
- सांविधिक न्यूनतम राशि से तुलना करना भूल जाना; धारा 4 की भाषा 'जो अधिक हो' है, इसलिए बहुत कम मजदूरी या बहुत कम गुणक वाली दशाओं में न्यूनतम राशि ही देय बन जाती है।
प्रतिकर की गणना वाला प्रश्न APFC प्रश्नपत्र का नियमित अंग है और वह लगभग सदैव इसी रूप में आता है — स्टेम में मासिक मजदूरी और सुसंगत गुणक देकर देय राशि पूछना, अथवा राशि देकर यह पूछना कि कौन-सी दशा लागू है। असत्य विकल्प यंत्रवत् बनाए जाते हैं : एक में प्रतिशत छोड़ दिया जाता है, एक में मजदूरी-सीमा छोड़ दी जाती है, और एक में पुरानी सीमा लगा दी जाती है, इसलिए विकल्पों को देखकर ही यह अनुमान लगाया जा सकता है कि परीक्षक किन तीन भूलों की परीक्षा ले रहा है। तैयारी की सबसे कारगर इकाई एक चार-पंक्ति वाला सूत्र-पत्रक है : मृत्यु पर पचास प्रतिशत और न्यूनतम एक लाख बीस हज़ार, स्थायी पूर्ण अशक्तता पर साठ प्रतिशत और न्यूनतम एक लाख चालीस हज़ार, मजदूरी-सीमा पंद्रह हज़ार, और गुणक अनुसूची IV से आयु के अनुसार। यही पत्रक कर्मचारी राज्य बीमा अधिनियम के अशक्तता हितलाभ से तुलना करते समय भी काम आता है।
इस प्रश्न से सीधे संबंधित कोई पूर्व PYQ उपलब्ध नहीं।
- practice — not a real PYQ
कर्मचारी प्रतिकर अधिनियम, 1923 के अधीन प्रतिकर की गणना करते समय मासिक मजदूरी को अधिकतम कितनी राशि तक ही संगणना में लिया जाता है, जैसा कि धारा 4(1) के स्पष्टीकरण II के अधीन अधिसूचित है?
- (a)₹ 8,000 प्रति मास
- (b)₹ 15,000 प्रति मास
- (c)₹ 21,000 प्रति मास
- (d)कोई सीमा नहीं है
उत्तर(b) ₹ 15,000 प्रति मास — धारा 4(1) का स्पष्टीकरण II गणना में प्रयुक्त मासिक मजदूरी को केंद्र सरकार द्वारा अधिसूचित राशि तक सीमित करता है, और जनवरी 2020 की अधिसूचना से वह सीमा पंद्रह हज़ार रुपये है, जो उससे पहले आठ हज़ार रुपये थी। इक्कीस हज़ार की संख्या कर्मचारी राज्य बीमा अधिनियम की वेतन-सीमा से जुड़ी है, इस अधिनियम की गणना से नहीं।
- practice — not a real PYQ
किसी कर्मचारी की नियोजन के अनुक्रम में हुई क्षति से मृत्यु हो जाती है; उसकी आहरित मासिक मजदूरी ₹18,000 थी और सुसंगत गुणक 200 है। कर्मचारी प्रतिकर अधिनियम, 1923 के अधीन देय प्रतिकर कितना होगा?
- (a)₹ 15,00,000
- (b)₹ 18,00,000
- (c)₹ 21,60,000
- (d)₹ 36,00,000
उत्तर(a) ₹ 15,00,000 — मृत्यु की दशा में धारा 4(1)(a) मासिक मजदूरी का पचास प्रतिशत लेकर गुणक से गुणा करती है, और मजदूरी स्पष्टीकरण II के अधीन पंद्रह हज़ार पर सीमित हो जाती है; इसलिए पंद्रह हज़ार का पचास प्रतिशत, अर्थात् साढ़े सात हज़ार, को गुणक 200 से गुणा करने पर पंद्रह लाख रुपये आते हैं, जो न्यूनतम एक लाख बीस हज़ार से अधिक होने के कारण देय है।