कर्मचारी राज्य बीमा अधिनियम, 1948 के अधीन अशक्तता से संबंधित कोई प्रश्न निम्नलिखित में से किस प्राधिकारी द्वारा अवधारण किया जाएगा ?
- (a)बीमा चिकित्सा व्यवसायी
- (b)सामाजिक सुरक्षा अधिकारी
- (c)चिकित्सा बोर्ड
- (d)चिकित्सा अपील अधिकरण
सही उत्तर — C, (c) चिकित्सा बोर्ड। कर्मचारी राज्य बीमा अधिनियम, 1948 की धारा 54 का शीर्षक ही 'अशक्तता के प्रश्न का अवधारण' है और वह इस पूरी कोटि के प्रश्नों को एक चिकित्सा बोर्ड को सौंपती है। अधिनियम इन प्रश्नों को 'अशक्तता संबंधी प्रश्न' नाम देता है और उनकी सूची विशिष्ट है : क्या किसी दुर्घटना का परिणाम स्थायी अशक्तता है, क्या अर्जन-क्षमता की हानि का निर्धारण अनंतिम रूप से किया जा सकता है या अंतिम रूप से, कोई निर्धारण अनंतिम है या अंतिम, और अनंतिम निर्धारण कितनी अवधि तक प्रभावी रहेगा। ये सब चिकित्सा-आकलन के प्रश्न हैं, और अधिनियम इन्हें किसी एक चिकित्सक के बजाय एक बोर्ड को सौंपता है, क्योंकि निर्णय का परिणाम केवल उपचार नहीं बल्कि हानि का प्रतिशत होता है, जिस पर अशक्तता हितलाभ की मात्रा और अवधि निर्भर करती है। यहीं यह भी समझ लीजिए कि तीनों शेष विकल्प अधिनियम के वास्तविक पात्र हैं, किन्तु उनकी भूमिकाएँ भिन्न हैं। बीमा चिकित्सा व्यवसायी उपचार करता है और वे प्रमाणपत्र देता है जिनके आधार पर रुग्णता तथा अस्थायी अशक्तता हितलाभ चुकाए जाते हैं। सामाजिक सुरक्षा अधिकारी, अर्थात् धारा 45 के अधीन नियुक्त निरीक्षक-वर्ग का अब प्रचलित पदनाम, अंशदान और अभिलेख की अनुपालना देखता है। और चिकित्सा अपील अधिकरण अपील सुनता है : धारा 54A के अधीन चिकित्सा बोर्ड के विनिश्चय से अपील उसी अधिकरण में जाती है और उससे आगे कर्मचारी बीमा न्यायालय में, तथा कुछ परिस्थितियों में सीधे उसी न्यायालय में भी। इसलिए प्रथम दृष्टया अवधारण करने वाला प्राधिकारी चिकित्सा बोर्ड है, और यही (c) है। धारा 54A यह भी उपबंध करती है कि यदि निर्धारण कपट या दुर्व्यपदेशन से प्राप्त किया गया हो, अथवा क्षति में सारवान् और अप्रत्याशित वृद्धि हो गई हो, तो बोर्ड का निर्धारण पुनर्विलोकन के लिए खोला जा सकता है — जिससे यह और स्पष्ट हो जाता है कि आकलन का केंद्र बोर्ड ही है।
- (a)बीमा चिकित्सा व्यवसायी — बीमा चिकित्सा व्यवसायी योजना का सबसे निकटवर्ती चिकित्सक है — वही व्यक्ति जो बीमाकृत व्यक्ति की जाँच करता है, चिकित्सा हितलाभ देता है और वे प्रमाणपत्र जारी करता है जिनके आधार पर रुग्णता हितलाभ तथा अस्थायी अशक्तता हितलाभ का भुगतान होता है। यही कारण है कि यह विकल्प लुभाता है : अभ्यर्थी सोचता है कि अशक्तता का प्रश्न तो चिकित्सा का प्रश्न है, इसलिए निकटतम चिकित्सक ही उसका उत्तर होगा। किन्तु अधिनियम दो कामों में भेद करता है — किसी व्यक्ति की वर्तमान दशा प्रमाणित करना, जो एकल व्यवसायी नियमित रूप से करता है, और अशक्तता संबंधी प्रश्न का अवधारण करना, जो स्थायी क्षति का प्रतिशत तय करता है और जिस पर दीर्घकालिक हितलाभ टिकते हैं। दूसरा काम धारा 54 के अधीन बोर्ड को सौंपा गया है, और यही भेद इस प्रश्न का पूरा भार उठाता है।
- (b)सामाजिक सुरक्षा अधिकारी — सामाजिक सुरक्षा अधिकारी वह पदनाम है जो अब अधिनियम की धारा 45 के अधीन नियुक्त निरीक्षण-अधिकारियों के लिए प्रयुक्त होता है, और उसका काम प्रवर्तन का है। ऐसा अधिकारी नियोजकों से अभिलेख प्रस्तुत करवाता है, मजदूरी-रजिस्टर तथा विवरणियाँ जाँचता है, यह अन्वेषण करता है कि अंशदान ठीक से चुकाया गया या नहीं, परिसर में प्रवेश करता है और अनुपालना न होने की रिपोर्ट देता है। इस पूरी भूमिका में कुछ भी नैदानिक नहीं है, और अधिनियम कहीं भी निरीक्षण-अधिकारी को चिकित्सा-आकलन में कोई भूमिका नहीं देता। कर्मचारी राज्य बीमा तंत्र की दो शाखाओं को — एक ओर अंशदान का प्रवर्तन और दूसरी ओर चिकित्सा हितलाभ तथा आकलन — आपस में मिला देना ही वह भूल है जिसके लिए यह विकल्प रखा गया है।
- (d)चिकित्सा अपील अधिकरण — चिकित्सा अपील अधिकरण अधिनियम का वास्तविक निकाय है, और यही उसे सबसे प्रबल असत्य विकल्प बनाता है, क्योंकि वह क़ानून के ठीक उसी कोने में बैठता है। किन्तु वह चिकित्सा बोर्ड के स्थान पर नहीं, उसके ऊपर बैठता है : धारा 54A के अधीन चिकित्सा बोर्ड के विनिश्चय से अपील चिकित्सा अपील अधिकरण में होती है और उससे आगे कर्मचारी बीमा न्यायालय में, तथा कुछ परिस्थितियों में अपील सीधे उसी न्यायालय में भी की जा सकती है। जो निकाय अपील सुनता है वह प्रथम दृष्टया अवधारण करने वाला प्राधिकारी नहीं हो सकता, इसलिए यह विकल्प वस्तुतः उस प्रश्न का उत्तर देता है जो पूछा ही नहीं गया — 'बोर्ड के निर्णय के विरुद्ध अपील कौन सुनेगा'। पदानुक्रम याद रखिए : बोर्ड, फिर अधिकरण, फिर कर्मचारी बीमा न्यायालय।
कर्मचारी राज्य बीमा अधिनियम, 1948 भारत की पहली व्यापक सामाजिक बीमा योजना है, जिसमें नियोजक और कर्मचारी दोनों के अंशदान से बनी निधि से बीमाकृत व्यक्तियों को हितलाभ दिए जाते हैं और जिसका प्रशासन कर्मचारी राज्य बीमा निगम करता है। धारा 46 में गिनाए गए हितलाभ छह हैं : रुग्णता हितलाभ, प्रसूति हितलाभ, अशक्तता हितलाभ, आश्रित हितलाभ, चिकित्सा हितलाभ और अंत्येष्टि व्यय। इनमें अशक्तता हितलाभ ही वह है जिस पर प्रस्तुत प्रश्न टिका है, क्योंकि उसकी मात्रा अर्जन-क्षमता की हानि के प्रतिशत पर निर्भर करती है और वह प्रतिशत किसी को तो तय करना है। अधिनियम इसके लिए एक क्रम बनाता है : धारा 54 के अधीन चिकित्सा बोर्ड अवधारण करता है, धारा 54A के अधीन उसके विनिश्चय से चिकित्सा अपील अधिकरण में अपील होती है, और उससे आगे कर्मचारी बीमा न्यायालय है, जो धारा 74 के अधीन गठित होता है और अधिनियम के अधीन उठने वाले प्रश्नों का न्यायनिर्णयन करता है। दूसरी ओर धारा 51A से 51E तक वे उपधारणाएँ हैं जो नियोजन-क्षति के दावों को व्यवहार्य बनाती हैं — जैसे यह उपधारणा कि नियोजन के अनुक्रम में हुई दुर्घटना नियोजन से उद्भूत भी मानी जाएगी, तथा नियोजक के वाहन से यात्रा करते समय, आपात स्थिति से निपटते समय और आने-जाने के दौरान हुई दुर्घटनाओं को भी नियोजन से उद्भूत माना जाना।
इस प्रश्न की बनावट श्रम-विधि खंड की एक विशिष्ट कोटि की है : चारों विकल्प असली संस्थाएँ हैं और भूल किसी तथ्य की नहीं, भूमिका की होती है। ऐसे प्रश्न में केवल यह याद रखना पर्याप्त नहीं कि चिकित्सा बोर्ड होता है; याद यह रखना है कि कौन-सा काम किसका है और कौन किसके ऊपर बैठता है। इसलिए इस अधिनियम की तैयारी में एक पदानुक्रम-रेखा बना लेना सबसे उपयोगी है — बीमा चिकित्सा व्यवसायी उपचार और प्रमाणन करता है, चिकित्सा बोर्ड स्थायी अशक्तता का अवधारण करता है, चिकित्सा अपील अधिकरण उससे अपील सुनता है, कर्मचारी बीमा न्यायालय अंतिम न्यायनिर्णयन करता है, और सामाजिक सुरक्षा अधिकारी इस पूरी रेखा से बाहर, अंशदान-प्रवर्तन की समांतर शाखा में खड़ा है। दूसरी बात, पदनामों का बदलना स्वयं परीक्षा-योग्य है : निरीक्षक अब सामाजिक सुरक्षा अधिकारी कहलाते हैं, और जिस अभ्यर्थी ने पुराना पदनाम याद कर रखा है वह विकल्प देखकर चौंक सकता है। तीसरी बात, कर्मचारी प्रतिकर अधिनियम और कर्मचारी राज्य बीमा अधिनियम एक ही क्षति को अलग-अलग तंत्रों से ढँकते हैं, और उनके प्राधिकारी अलग हैं — वहाँ आयुक्त, यहाँ बोर्ड और न्यायालय।
- कर्मचारी राज्य बीमा अधिनियम, 1948 की धारा 54 उपबंध करती है कि यह प्रश्न कि दुर्घटना का परिणाम स्थायी अशक्तता है या नहीं, अर्जन-क्षमता की हानि का निर्धारण अनंतिम हो सकता है या अंतिम, कोई निर्धारण अनंतिम है या अंतिम, और अनंतिम निर्धारण कितनी अवधि तक प्रभावी रहेगा — इन सबका अवधारण चिकित्सा बोर्ड करेगा; अधिनियम इन्हें अशक्तता संबंधी प्रश्न कहता है।
- धारा 54A चिकित्सा बोर्ड के निर्धारण का पुनर्विलोकन उस दशा में करने देती है जब वह कपट या दुर्व्यपदेशन से प्राप्त किया गया हो अथवा क्षति में सारवान् और अप्रत्याशित वृद्धि हुई हो, और वह चिकित्सा अपील अधिकरण को अपील तथा उससे आगे कर्मचारी बीमा न्यायालय को अपील का उपबंध करती है।
- बीमा चिकित्सा व्यवसायी बीमाकृत व्यक्तियों का उपचार करता है और वे प्रमाणपत्र जारी करता है जिन पर रुग्णता तथा अस्थायी अशक्तता हितलाभ आधारित होते हैं, जबकि सामाजिक सुरक्षा अधिकारी — धारा 45 के अधीन नियुक्त निरीक्षण-अधिकारियों का वर्तमान पदनाम — अंशदान तथा अभिलेख-रखरखाव की बाध्यताओं का प्रवर्तन करता है; इनमें से कोई भी अशक्तता संबंधी प्रश्न का अवधारण नहीं करता।
- धारा 46 के अधीन हितलाभ छह हैं — रुग्णता हितलाभ, प्रसूति हितलाभ, अशक्तता हितलाभ, आश्रित हितलाभ, चिकित्सा हितलाभ और अंत्येष्टि व्यय — जो नियोजक तथा कर्मचारी के अंशदानों से वित्तपोषित होते हैं और जिनका प्रशासन कर्मचारी राज्य बीमा निगम करता है।
- धारा 51A से 51E तक की उपधारणाएँ नियोजन-क्षति के दावों को व्यवहार्य बनाती हैं, जिनमें यह उपधारणा सम्मिलित है कि नियोजन के अनुक्रम में हुई दुर्घटना नियोजन से उद्भूत भी मानी जाएगी, तथा नियोजक के वाहन से यात्रा करते समय, आपात स्थिति से निपटते समय और आवागमन के दौरान हुई दुर्घटनाएँ भी नियोजन से उद्भूत मानी जाएँगी।
- अशक्तता के प्रश्न को उपचार का प्रश्न मान लेना और बीमा चिकित्सा व्यवसायी चुन लेना; व्यवसायी वर्तमान दशा प्रमाणित करता है, जबकि स्थायी हानि का प्रतिशत तय करना धारा 54 के अधीन बोर्ड का काम है।
- अपील सुनने वाले निकाय को प्रथम दृष्टया अवधारण करने वाला प्राधिकारी मान लेना — चिकित्सा अपील अधिकरण बोर्ड के ऊपर है, उसके स्थान पर नहीं, और यही इस प्रश्न का सबसे प्रबल असत्य विकल्प है।
- अधिनियम की दो शाखाओं को मिला देना : अंशदान और अभिलेख का प्रवर्तन सामाजिक सुरक्षा अधिकारी के पास है, जबकि चिकित्सा हितलाभ तथा आकलन पूर्णतः भिन्न शाखा है।
- पदनामों के बदलने की उपेक्षा करना — निरीक्षक अब सामाजिक सुरक्षा अधिकारी कहलाते हैं, और विकल्प-सूची पुराने के बजाय नए पदनाम से बनाई जाती है।
कर्मचारी राज्य बीमा अधिनियम से प्रायः तीन प्रकार के प्रश्न आते हैं : हितलाभों की सूची और उनकी शर्तें, अंशदान तथा वेतन-सीमा की संख्याएँ, और यह प्रश्न कि कौन-सा काम किस प्राधिकारी का है। तीसरा प्रकार सबसे अधिक अंक तय करता है, क्योंकि उसमें चारों विकल्प असली निकाय होते हैं और भूल भूमिका की होती है। इसलिए दोहराते समय अधिनियम के प्राधिकारियों की एक पदानुक्रम-रेखा बनाइए और प्रत्येक के सामने एक क्रिया लिखिए — उपचार तथा प्रमाणन, अवधारण, अपील, न्यायनिर्णयन, प्रवर्तन। यही अनुशासन कर्मचारी प्रतिकर अधिनियम के आयुक्त और कर्मचारी भविष्य निधि अधिनियम के अधिनिर्णयन-प्राधिकारी पर भी लागू होता है, और इन तीनों अधिनियमों के प्राधिकारी आपस में गड्डमड्ड कर देना इस खंड में अंक गँवाने का सबसे आम कारण है।
इस प्रश्न से सीधे संबंधित कोई पूर्व PYQ उपलब्ध नहीं।
- practice — not a real PYQ
कर्मचारी राज्य बीमा अधिनियम, 1948 के अधीन चिकित्सा बोर्ड के विनिश्चय से व्यथित बीमाकृत व्यक्ति सामान्यतः निम्नलिखित में से किसके समक्ष अपील कर सकता है?
- (a)बीमा चिकित्सा व्यवसायी
- (b)चिकित्सा अपील अधिकरण
- (c)सामाजिक सुरक्षा अधिकारी
- (d)राज्य सरकार का श्रम विभाग
उत्तर(b) चिकित्सा अपील अधिकरण — धारा 54A के अधीन चिकित्सा बोर्ड के विनिश्चय से अपील चिकित्सा अपील अधिकरण में होती है और उससे आगे कर्मचारी बीमा न्यायालय में; कुछ परिस्थितियों में सीधे उसी न्यायालय में भी अपील की जा सकती है। बीमा चिकित्सा व्यवसायी उपचार और प्रमाणन करता है, सामाजिक सुरक्षा अधिकारी अंशदान का प्रवर्तन करता है, और राज्य का श्रम विभाग इस अपील-क्रम में आता ही नहीं।
- practice — not a real PYQ
कर्मचारी राज्य बीमा अधिनियम, 1948 की धारा 46 के अधीन उपबंधित हितलाभों में निम्नलिखित में से कौन-सा सम्मिलित नहीं है?
- (a)प्रसूति हितलाभ
- (b)आश्रित हितलाभ
- (c)अंत्येष्टि व्यय
- (d)उपदान (ग्रैच्युटी)
उत्तर(d) उपदान (ग्रैच्युटी) — धारा 46 के अधीन हितलाभ छह हैं : रुग्णता हितलाभ, प्रसूति हितलाभ, अशक्तता हितलाभ, आश्रित हितलाभ, चिकित्सा हितलाभ और अंत्येष्टि व्यय। उपदान इस अधिनियम का हितलाभ नहीं है, वह उपदान संदाय अधिनियम, 1972 के अधीन देय होता है, इसलिए वही यहाँ बाहर का पद है।