निम्नलिखित में से कौन-सा एक युग्म सही सुमेलित नहीं है ? (प्राचीन ग्रंथ/नाम) (अर्थ)
- (a)समरांगण-सूत्रधार : प्राचीन भारतीय वास्तुकला-विषयक वैज्ञानिक ग्रंथ
- (b)हर्मिका : एक मंदिर वास्तुकला शैली जिसका उद्भव चोल राजाओं के अधीन हुआ
- (c)विमान : द्रविड़ शैली के मंदिरों का एक असाधारण लक्षण
- (d)कूटागार-शाला : नुकीली छत वाली एक कुटी, जहाँ यात्री भिक्षु ठहरा करते थे
सही उत्तर — B, (b) हर्मिका : एक मंदिर वास्तुकला शैली जिसका उद्भव चोल राजाओं के अधीन हुआ — यही वह युग्म है जो सही सुमेलित नहीं है। हर्मिका न तो मंदिर-वास्तुकला की कोई शैली है और न ही उसका चोलों से कोई संबंध है : वह बौद्ध स्तूप का एक विशिष्ट अंग है। अर्धगोलाकार गुंबद, अर्थात् अंड, के ऊपर पत्थर की वेदिका से बना एक छोटा वर्गाकार घेरा बैठता है — वही हर्मिका है — और वह उस यष्टि यानी स्तंभ के पाद को घेरती है जो उसमें से ऊपर उठकर छत्रावली धारण करती है। यह पूरी रचना विश्व-पर्वत के शिखर पर देवताओं के निवास का प्रतीक मानी जाती है और अस्थि-मंजूषा के ठीक ऊपर पड़ने वाले पवित्रीकृत बिंदु को चिह्नित करती है; साँची के महास्तूप पर यह स्पष्ट दिखती है, जहाँ प्रदक्षिणापथ के ऊपर गुंबद पर हर्मिका विराजमान है। इसलिए यह शब्द ईसवी सन् के आगे-पीछे की शताब्दियों की बौद्ध स्मारक-वास्तुकला की शब्दावली का है, नवीं से तेरहवीं शताब्दी की द्रविड़ मंदिर-निर्माण परंपरा का नहीं। विकल्प में उससे जोड़ा गया अर्थ गढ़ा हुआ है, और यह दुहरा चारा है : चोल काल सचमुच वही युग है जिसमें द्रविड़ मंदिर-वास्तुकला तंजावुर और गंगैकोंडचोलपुरम में अपने सबसे भव्य रूप तक पहुँची, इसलिए जिस अभ्यर्थी के कान में 'चोल' शब्द वास्तुकला की दृष्टि से गंभीर सुनाई देता है, वह उस पद की जाँच किए बिना ही युग्म स्वीकार कर सकता है जिससे यह अर्थ जोड़ा गया है। प्रश्न की पूछ नकारात्मक है और 'नहीं' मोटे अक्षरों में छपा है, तथा शेष तीनों युग्म सही सुमेलित हैं, इसलिए उत्तर (b) है। बनावट पर भी ध्यान दीजिए : यह युग्म-सुमेलन वाला प्रश्न है जिसमें (प्राचीन ग्रंथ/नाम) और (अर्थ) शीर्षकों के नीचे हर विकल्प स्वयं एक पूरा युग्म है, जिसे छपा हुआ विसर्ग-चिह्न जोड़ता है; यह सूची I और सूची II वाला कूट-ग्रिड प्रश्न नहीं है।
- (a)समरांगण-सूत्रधार : प्राचीन भारतीय वास्तुकला-विषयक वैज्ञानिक ग्रंथ — यह युग्म सही सुमेलित है, इसलिए उत्तर नहीं हो सकता। समरांगण-सूत्रधार वास्तुकला पर लिखा संस्कृत ग्रंथ है, जिसका कर्तृत्व मालवा के धारा के परमार राजा भोज को दिया जाता है और जिसका काल ग्यारहवीं शताब्दी है। इसमें बस्तियों के स्थान-चयन, गृह तथा प्रासाद की योजना, मंदिरों के प्रकार, प्रतिमा-निर्माण और प्रयुक्त होने वाले अनुपातों का क्रमबद्ध विवेचन है, तथा यंत्रों पर एक सुविख्यात प्रकरण भी है। ऐसे वास्तु-शास्त्रीय ग्रंथ को प्राचीन भारतीय वास्तुकला-विषयक वैज्ञानिक ग्रंथ कहना ठीक-ठीक सही विवरण है। पुस्तिका इस शीर्षक को तिरछे अक्षरों में छापती है, जो संकेत है कि यह कोई ग्रंथ है, कोई पारिभाषिक पद नहीं; और असत्य युग्म ढूँढ़ते समय केवल इस कारण यहाँ अटकना नहीं चाहिए कि शीर्षक अपरिचित लग रहा है।
- (c)विमान : द्रविड़ शैली के मंदिरों का एक असाधारण लक्षण — यह युग्म भी सही सुमेलित है। विमान दक्षिणी मंदिर के गर्भगृह के ऊपर उठने वाली संरचना है — स्पष्ट रूप से पीछे हटती मंज़िलों का पिरामिड, जिसकी हर मंज़िल के किनारे लघु देवालयों की पंक्ति चलती है और जिसके ऊपर छोटा अष्टकोणीय या गुंबदाकार शिखर तथा कलश रहता है — और यही वह एकमात्र लक्षण है जिससे द्रविड़ शैली पहचानी जाती है, उत्तर की नागर शैली के वक्ररेखीय शिखर के सामने। तंजावुर का बृहदेश्वर, जिसका विमान साठ मीटर से अधिक ऊँचा है, इसका मानक उदाहरण है। चूँकि इस विकल्प में दिया गया अर्थ ठीक पाठ्यपुस्तक का विवरण है, इसे असंगत मानना समुच्चय के सबसे सुरक्षित युग्म को अस्वीकार करना होगा।
- (d)कूटागार-शाला : नुकीली छत वाली एक कुटी, जहाँ यात्री भिक्षु ठहरा करते थे — यह युग्म भी सही सुमेलित है, और इसमें दिया गया अर्थ लगभग उन्हीं शब्दों में है जिनमें मानक विवरण इस पद को समझाता है : कूटागार-शाला का शाब्दिक अर्थ है नुकीली छत वाली कुटी, और यह उन स्थानों में से एक थी जहाँ छठी शताब्दी ईसा पूर्व के भ्रमणशील भिक्षु तथा आचार्य ठहरते, वाद-विवाद करते और उपदेश देते थे; दूसरा ऐसा स्थान बस्तियों के किनारे के उपवन होते थे। यह पद महाजनपद काल के आरंभिक बौद्ध तथा जैन परिवेश का है, स्मारकीय अर्थ में वास्तुकला का नहीं — और इसीलिए विमान तथा हर्मिका के बीच यह कुछ बेमेल-सा लगता है। किन्तु बेमेल लगना और ग़लत सुमेलित होना दो अलग बातें हैं, और यहाँ दी गई परिभाषा सही है।
भारतीय धार्मिक वास्तुकला की शब्दावली परंपराओं के अनुसार साफ़-साफ़ बँटी हुई है, और इस प्रकार के अधिकांश प्रश्न पहले यह पूछकर हल हो जाते हैं कि दिया गया पद किस परंपरा का है। स्तूप की शब्दावली : वेदिका वह घेरा है जो प्रदक्षिणापथ को घेरता है, तोरण उसमें बना उत्कीर्ण प्रवेश-द्वार है, मेधि वह चबूतरा या ढोल है जिस पर अंड टिकता है, अंड अर्धगोलाकार गुंबद है, हर्मिका गुंबद के ऊपर की छोटी वर्गाकार वेदिका-घेरी है, यष्टि उसमें से उठने वाला स्तंभ है, और छत्र उसके शीर्ष पर लगी छत्रावली। मंदिर की शब्दावली : गर्भगृह मूल कक्ष है, मंडप उसके आगे का स्तंभयुक्त कक्ष, शिखर उत्तर की नागर शैली की वक्ररेखीय संरचना, विमान दक्षिण की द्रविड़ शैली का मंज़िलदार पिरामिडाकार शिखर-रूप, आमलक और कलश उत्तरी शिखर के शीर्ष-अलंकरण, तथा गोपुर दक्षिणी परिसर की चारदीवारी का प्रवेश-द्वार-मीनार। ग्रंथों की शब्दावली : समरांगण-सूत्रधार जैसे वास्तु-शास्त्रीय ग्रंथ तथा दक्षिणी परंपरा के मयमत और मानसार स्थान-चयन, अनुपात और प्रतिमा-लक्षण का विधान करते हैं और भवनों के लिखित समकक्ष के रूप में परखे जाते हैं। किसी पद को इन तीन परिवारों में से एक में रख दीजिए, और ग़लत अर्थ प्रायः स्वयं प्रकट हो जाएगा, क्योंकि वह अर्थ पद से भिन्न परिवार का निकलेगा।
यह युग्म-सुमेलन प्रश्न उस बनावट का है जिसमें कूट-ग्रिड नहीं होता : प्रत्येक विकल्प स्वयं एक पूरा युग्म है, बाईं ओर ग्रंथ या पद और दाईं ओर उसका अर्थ, और दोनों के बीच का विसर्ग-चिह्न पुस्तिका में छपा हुआ है। इस बनावट में हल करने की विधि सूची I–सूची II वाले प्रश्न से भिन्न है : वहाँ आप एक निश्चित मिलान बनाकर कूट में खोजते हैं, यहाँ आपको चारों युग्मों को अलग-अलग सही या ग़लत ठहराना पड़ता है, और लाभ यह है कि तीन युग्म पहचान लेने पर चौथा अपने आप उत्तर बन जाता है। इस प्रश्न में परीक्षक ने असत्य युग्म बनाने की सबसे प्रचलित युक्ति अपनाई है — पद एक परंपरा से लिया और अर्थ दूसरी परंपरा से गढ़ा, और उस गढ़े हुए अर्थ में एक ऐसा प्रामाणिक नाम जोड़ दिया, 'चोल', जो सुनने में वास्तुकला की दृष्टि से भरोसेमंद लगता है। इसीलिए इस खंड की तैयारी में हर पद के साथ केवल अर्थ नहीं, उसकी परंपरा भी याद रखनी चाहिए — बौद्ध स्तूप, मंदिर, अथवा ग्रंथ। यह अनुशासन इसी प्रश्नपत्र के मंदिर-वास्तुकला वाले प्रश्न में भी सीधे काम आता है, जहाँ विमान और शिखर का भेद परखा गया है।
- हर्मिका बौद्ध स्तूप के अर्धगोलाकार गुंबद, अर्थात् अंड, के ऊपर बनी छोटी वर्गाकार वेदिका-घेरी है; उसमें से यष्टि या स्तंभ ऊपर उठकर छत्रावली धारण करता है, और यह व्यवस्था साँची के महास्तूप पर देखी जा सकती है। यह स्तूप-वास्तुकला का अंग है, मंदिर-वास्तुकला का नहीं, और इसका चोलों से कोई संबंध नहीं है।
- समरांगण-सूत्रधार ग्यारहवीं शताब्दी का संस्कृत वास्तु-शास्त्रीय ग्रंथ है जिसका कर्तृत्व मालवा के धारा के परमार राजा भोज को दिया जाता है; इसमें बस्तियों के स्थान-चयन, गृह और प्रासाद की योजना, मंदिरों के प्रकार, प्रतिमा-निर्माण तथा अनुपात का विवेचन है और यंत्रों पर एक प्रकरण भी है।
- विमान दक्षिणी मंदिर के गर्भगृह के ऊपर बनी मंज़िलदार पिरामिडाकार संरचना है और द्रविड़ शैली का निदानात्मक लक्षण है, जबकि उत्तर की नागर शैली आमलक तथा कलश से युक्त वक्ररेखीय शिखर से पहचानी जाती है; तंजावुर के बृहदेश्वर का विमान इसका सबसे प्रसिद्ध उदाहरण है।
- कूटागार-शाला का शाब्दिक अर्थ है नुकीली छत वाली कुटी, जो छठी शताब्दी ईसा पूर्व के भ्रमणशील भिक्षुओं के ठहरने, वाद-विवाद करने और उपदेश देने के स्थानों में से एक थी; दूसरा ऐसा स्थान बस्तियों के बाहर के उपवन होते थे, और यह पद स्मारकीय वास्तुकला के बजाय आरंभिक बौद्ध-जैन परिवेश का है।
- यह पुस्तिका सूची I और सूची II वाला कूट-ग्रिड प्रश्न एक ही बार छापती है, Q67 पर, जबकि इस बनावट के युग्म-सुमेलन प्रश्न दो हैं — Q25 और Q63 — जिनमें प्रत्येक विकल्प स्वयं एक युग्म है और पूछ यह है कि कौन-सा युग्म सही सुमेलित नहीं है।
- गढ़े हुए अर्थ में जुड़े प्रामाणिक नाम पर भरोसा कर लेना : 'चोल' शब्द वास्तुकला की दृष्टि से गंभीर लगता है और इसी कारण अभ्यर्थी उस पद की जाँच किए बिना युग्म स्वीकार कर लेता है जिससे वह अर्थ जोड़ा गया है।
- अपरिचित शीर्षक को ही असत्य मान लेना — समरांगण-सूत्रधार बहुतों के लिए नया नाम होगा, पर उसका अर्थ ठीक-ठीक सही दिया गया है, जबकि असत्य युग्म वहाँ है जहाँ पद सुपरिचित लगता है।
- इस बनावट को सूची I–सूची II वाला कूट-ग्रिड प्रश्न मान लेना; यहाँ कोई कूट नहीं है, हर विकल्प स्वयं एक युग्म है, और तीन युग्मों को सही ठहरा देने भर से उत्तर निकल आता है।
- किसी पद को केवल इसलिए असंगत मान लेना कि वह शेष पदों से भिन्न कोटि का लगता है — कूटागार-शाला विमान और हर्मिका के बीच बेमेल दिखती है, फिर भी उसका अर्थ सही सुमेलित है।
कला और वास्तुकला की शब्दावली इन परीक्षाओं में लगभग सदैव सुमेलन के रूप में आती है, कभी सूची I और सूची II तथा कूट के साथ और कभी इस प्रश्न की तरह, जहाँ प्रत्येक विकल्प एक स्वतंत्र युग्म होता है। असत्य युग्म बनाने की तीन प्रचलित युक्तियाँ हैं : पद एक परंपरा का और अर्थ दूसरी परंपरा का जोड़ देना, जैसा यहाँ हर्मिका के साथ हुआ; सही अर्थ के साथ ग़लत राजवंश या शताब्दी जोड़ देना; और दो निकट पदों के अर्थ आपस में बदल देना, जैसे शिखर और विमान अथवा वेदिका और हर्मिका। तैयारी की कारगर इकाई इसलिए तीन छोटी सूचियाँ हैं — स्तूप के अंग, मंदिर के अंग, और वास्तु-ग्रंथ — जिनमें प्रत्येक पद के साथ एक उदाहरण-स्थल जुड़ा हो। इससे सुमेलन-प्रश्न कुछ सेकंड में निपटता है, क्योंकि परंपरा पहचानते ही ग़लत अर्थ स्वयं दिख जाता है।
इस प्रश्न से सीधे संबंधित कोई पूर्व PYQ उपलब्ध नहीं।
- practice — not a real PYQ
बौद्ध स्तूप की वास्तुकला के संदर्भ में, अर्धगोलाकार गुंबद के ऊपर बनी उस छोटी वर्गाकार वेदिका-घेरी को क्या कहा जाता है, जिसमें से यष्टि ऊपर उठकर छत्रावली धारण करती है?
- (a)मेधि
- (b)हर्मिका
- (c)तोरण
- (d)आमलक
उत्तर(b) हर्मिका — यह अंड के ऊपर की वर्गाकार वेदिका-घेरी है जिसमें से यष्टि निकलकर छत्रावली धारण करती है, और साँची के महास्तूप पर स्पष्ट दिखती है। मेधि वह चबूतरा है जिस पर अंड टिकता है, तोरण वेदिका में बना उत्कीर्ण प्रवेश-द्वार है, और आमलक उत्तरी नागर मंदिर के शिखर के शीर्ष पर लगा धारीदार चक्र है, अर्थात् वह स्तूप की नहीं, मंदिर की शब्दावली का पद है।
- practice — not a real PYQ
वास्तुकला विषयक संस्कृत ग्रंथ समरांगण-सूत्रधार का कर्तृत्व सामान्यतः निम्नलिखित में से किस शासक को दिया जाता है?
- (a)धारा के परमार राजा भोज
- (b)कन्नौज के गुर्जर-प्रतिहार राजा मिहिरभोज
- (c)कल्याणी के चालुक्य राजा सोमेश्वर तृतीय
- (d)काश्मीर के राजा ललितादित्य मुक्तापीड
उत्तर(a) धारा के परमार राजा भोज — ग्यारहवीं शताब्दी का यह वास्तु-शास्त्रीय ग्रंथ उन्हीं के नाम से जुड़ा है और इसमें बस्तियों के स्थान-चयन, गृह तथा प्रासाद की योजना, मंदिर-प्रकार, प्रतिमा-निर्माण और यंत्रों तक का विवेचन है। मिहिरभोज प्रतिहार शासक हैं और उनका कोई ऐसा ग्रंथ नहीं माना जाता; सोमेश्वर तृतीय से मानसोल्लास जोड़ा जाता है; और ललितादित्य मार्तंड सूर्य मंदिर के निर्माता के रूप में स्मरण किए जाते हैं।