प्राचीन भारतीय मृद्भांड के बारे में, निम्नलिखित में से कौन-सा एक कथन सही है ?
- (a)उत्तरी कृष्ण ओपयुक्त मृद्भांड (NBPW) उस प्रकार के मृद्भांड को निर्दिष्ट करता है, जो 600 ईसा पूर्व के भारत के पुरातत्त्व-स्थलों से मिलते हैं ।
- (b)चित्रित धूसर मृद्भांड (PGW) उस प्रकार के मृद्भांड को निर्दिष्ट करता है, जो संगम काल के आसपास दक्षिण भारत के बड़े भूभाग में मिलते हैं ।
- (c)गैरिक मृद्भांड (OCP) स्थल केवल दक्षिण भारत में अवस्थित हैं ।
- (d)कृष्ण-एवं-लाल मृद्भांड (BRW) नवपाषाण स्थलों पर कभी नहीं मिलते हैं ।
सही उत्तर — A, (a) उत्तरी कृष्ण ओपयुक्त मृद्भांड (NBPW) वह प्रकार है जो 600 ईसा पूर्व के भारतीय पुरातत्त्व-स्थलों से मिलता है। ध्यान रखिए कि यहाँ पूछ सकारात्मक है — 'कौन-सा एक कथन सही है' — अर्थात् चारों में केवल एक सत्य है और तीन असत्य, जो पिछले दो प्रश्नों की नकारात्मक पूछ से ठीक उलटी स्थिति है। उत्तरी कृष्ण ओपयुक्त मृद्भांड मध्य गंगा मैदान का महीन, चाक पर बना, चमकदार विशिष्ट मृद्भांड है, जिसकी परंपरागत तिथि लगभग 700–600 ईसा पूर्व से लेकर लगभग 200 ईसा पूर्व तक मानी जाती है; अतः उसे 600 ईसा पूर्व के स्थलों से जोड़ने वाला कथन सही है। इसकी पहचान इसकी सतह है : पतली दीवारों वाले बर्तनों पर काली या इस्पाती-धूसर, लगभग दर्पण जैसी चमक, जिसे उत्पन्न करने की तकनीक आज तक पूरी तरह पुनर्निर्मित नहीं हो सकी। पुरातत्त्व की दृष्टि से यह द्वितीय नगरीकरण का सूचक स्तर है — जिन परतों में यह मिलता है उन्हीं में मात्रा में लोहा, आहत चाँदी के सिक्के, पकी ईंट, कुएँ की चक्रिकाएँ और क़िलेबंदी भी मिलती है, अर्थात् महाजनपदों और उन नगरों की भौतिक पहचान जिनसे आगे मगध का साम्राज्य बना। यह स्पष्टतः रोज़मर्रा का रसोई-बर्तन नहीं, विलास की वस्तु था : उन्हीं स्थलों पर मोटे धूसर और लाल मृद्भांडों के साथ यह थोड़ी मात्रा में मिलता है, अपने मूल गंगा-क्षेत्र से बहुत दूर तक पहुँचा है, और इसके टुकड़े धातु की कीलों से जोड़े हुए मिले हैं — सस्ते बर्तन की मरम्मत कोई इस तरह नहीं करता। शेष तीन कथन या तो भूगोल पर टूटते हैं या किसी निरपेक्ष शब्द पर। ऐसे सकारात्मक चार-कथन प्रश्न में सबसे तेज़ रास्ता प्रत्येक विकल्प को मानचित्र पर जाँचना है : PGW और OCP दोनों उत्तर-पश्चिमी तथा ऊपरी गंगा क्षेत्र के हैं, दक्षिण के नहीं, और 'कभी नहीं मिलते' जैसा दावा इतना कड़ा होता है कि एक ही स्थल उसे तोड़ देता है।
- (b)चित्रित धूसर मृद्भांड (PGW) उस प्रकार के मृद्भांड को निर्दिष्ट करता है, जो संगम काल के आसपास दक्षिण भारत के बड़े भूभाग में मिलते हैं । — चित्रित धूसर मृद्भांड न तो दक्षिणी है और न ही उसका संगम काल से कोई संबंध है। यह काले रंग में ज्यामितीय अभिकल्प लिए हुए महीन धूसर मृद्भांड है, जिसकी तिथि मोटे तौर पर 1200–600 ईसा पूर्व मानी जाती है, और जिसका विस्तार ऊपरी गंगा-यमुना दोआब के साथ पंजाब, हरियाणा तथा उत्तरी राजस्थान है — हस्तिनापुर, अहिच्छत्र, अतरंजीखेड़ा और भगवानपुरा वे स्थल हैं जिनका नाम प्रायः लिया जाता है। यह उत्तर वैदिक काल तथा उत्तर-पश्चिम की लोहा-प्रयोगी बस्तियों से जोड़ा जाता है, और इसके उत्खनन का इतिहास महाभारत में नामित स्थलों से मिलान करने के प्रयासों से उलझा हुआ है। संगम काल तमिल क्षेत्र का है और ईसवी सन् के आसपास की आरंभिक शताब्दियों का — अर्थात् कई शताब्दी बाद और उपमहाद्वीप के दूसरे छोर पर। यह विकल्प एक उत्तरी मृद्भांड को उठाकर दक्षिणी कालक्रम में रोप देता है।
- (c)गैरिक मृद्भांड (OCP) स्थल केवल दक्षिण भारत में अवस्थित हैं । — गैरिक मृद्भांड भी उत्तरी है, इसलिए उसे केवल दक्षिण भारत तक सीमित बताना मानचित्र को ही उलट देना है। OCP कच्ची पकाई वाला, प्रायः घिसा हुआ मृद्भांड है जिसका नारंगी-लाल लेप उँगलियों पर उतर आता है — यही गुण उसके नाम का आधार है — और वह ऊपरी गंगा दोआब, पश्चिमी उत्तर प्रदेश, हरियाणा तथा राजस्थान से लगभग 2000–1500 ईसा पूर्व की सीमा में सूचित हुआ है। पाठ्यक्रम में उसका मुख्य महत्त्व दोआब के ताम्र-निधियों से उसके संबंध तथा इस विवाद में है कि दोनों एक ही संस्कृति के अंग हैं या नहीं और उस संस्कृति का उत्तर-हड़प्पा से क्या संबंध है। इस पूरे विवरण में कुछ भी प्रायद्वीपीय नहीं है, और 'केवल' शब्द के साथ ग़लत क्षेत्र जुड़ जाने से यह तीनों असत्य विकल्पों में सबसे आसानी से हटाया जाने वाला बन जाता है।
- (d)कृष्ण-एवं-लाल मृद्भांड (BRW) नवपाषाण स्थलों पर कभी नहीं मिलते हैं । — यहाँ चूक 'कभी नहीं' शब्दों में है। कृष्ण-एवं-लाल मृद्भांड किसी एक काल का निदानात्मक मृद्भांड है ही नहीं; वह एक तकनीक है — पकाने की ऐसी व्यवस्था जिससे भीतरी सतह और मुख काले रह जाते हैं जबकि बाहरी देह लाल रहती है — और वह भारतीय प्रागितिहास तथा आरंभिक इतिहास के बहुत बड़े फैलाव में बार-बार लौटती है। यह राजस्थान के आहड़ जैसे ताम्रपाषाणिक संदर्भों में मिलता है, कुछ स्थलों पर गंगा घाटी में चित्रित धूसर मृद्भांड की परतों के नीचे मिलता है, और सबसे अधिक प्रायद्वीपीय भारत की महापाषाणिक समाधियों में; दक्षिणी नवपाषाण बस्तियों के परवर्ती नवपाषाण-ताम्रपाषाण चरणों से भी यह सूचित हुआ है, अर्थात् ठीक उसी संदर्भ से जिसे यह विकल्प असंभव घोषित करता है। सार्वभौमिक निषेध परीक्षक का सबसे कमज़ोर कथन होता है, क्योंकि एक प्रति-उदाहरण उसे नष्ट कर देता है, और यहाँ प्रति-उदाहरण सामान्य हैं।
मृद्भांड भारतीय पुरातत्त्व का सबसे भरोसेमंद साक्ष्य है, क्योंकि बर्तन टूटते हैं, ठीकरे बचे रह जाते हैं, और शैलियाँ इतनी तेज़ी से बदलती हैं कि किसी परत की तिथि निकाली जा सके। पाठ्यक्रम के इस हिस्से में लगभग सारे अंक चार मृद्भांडों से आते हैं, और हर एक को 'तिथि + क्षेत्र + संबंध' की तिकड़ी के रूप में याद रखना चाहिए। गैरिक मृद्भांड : लगभग 2000–1500 ईसा पूर्व, ऊपरी गंगा दोआब, हरियाणा और राजस्थान, ताम्र-निधियों से संबद्ध और उत्तर-हड़प्पा के संदर्भ में विवादित। चित्रित धूसर मृद्भांड : लगभग 1200–600 ईसा पूर्व, गंगा-यमुना दोआब तथा पंजाब-हरियाणा, महीन धूसर गठन पर काली ज्यामितीय चित्रकारी, उत्तर वैदिक काल और आरंभिक लोहे से संबद्ध। उत्तरी कृष्ण ओपयुक्त मृद्भांड : लगभग 700/600–200 ईसा पूर्व, मध्य गंगा मैदान और उससे आगे, चमकदार विशिष्ट मृद्भांड, द्वितीय नगरीकरण, आहत सिक्कों, क़िलेबंद नगरों तथा महाजनपदों से संबद्ध। कृष्ण-एवं-लाल मृद्भांड : कोई एक काल नहीं, बल्कि पकाने की तकनीक, जो ताम्रपाषाणिक राजस्थान और गंगा घाटी में तथा सबसे अधिक प्रायद्वीप की महापाषाणिक समाधियों में मिलती है। उत्तर में स्तर-क्रम इसलिए OCP, फिर PGW, फिर NBPW रहता है, जहाँ एक ही स्थल पर एक से अधिक मिलें — और यही क्रम स्वयं एक प्रिय प्रश्न है। बनाने योग्य आदत यह है कि हर मृद्भांड के साथ एक क्षेत्र चिपका दिया जाए, क्योंकि इस क्षेत्र के अधिकांश असत्य विकल्प किसी मृद्भांड को मानचित्र के ग़लत हिस्से में खिसकाकर बनाए जाते हैं।
इस प्रश्न की बनावट दो कारणों से सिखाने योग्य है। पहला, पूछ सकारात्मक है, जबकि इसी प्रश्नपत्र में इससे ठीक पहले और बाद के प्रश्नों की पूछ नकारात्मक है; यही अदल-बदल परीक्षक की सबसे सस्ती और सबसे कारगर युक्ति है, क्योंकि लय में पढ़ता हुआ अभ्यर्थी पिछली पूछ को इस प्रश्न पर चढ़ा देता है और सही कथन खोजने के बजाय असत्य कथन खोजने लगता है। दूसरा, तीनों असत्य विकल्प तीन अलग-अलग प्रकार से असत्य बनाए गए हैं — एक में क्षेत्र और काल दोनों बदल दिए गए हैं, दूसरे में 'केवल' जोड़कर विस्तार सीमित कर दिया गया है, और तीसरे में 'कभी नहीं' जोड़कर सार्वभौमिक निषेध बना दिया गया है। इन तीनों में सबसे कमज़ोर तीसरा होता है, इसलिए विकल्पों में 'केवल', 'कभी नहीं', 'सदैव' जैसे शब्द दिखते ही उन्हें पहले जाँचिए : ऐसे कथन को तोड़ने के लिए एक ही प्रति-उदाहरण पर्याप्त होता है, जबकि सामान्य कथन को तोड़ने के लिए पूरा तथ्य याद करना पड़ता है। यह आदत इसी प्रश्नपत्र के गणित और विवेचन खंड में भी काम आती है, जहाँ कथनों में 'सदैव' शब्द ही उन्हें असत्य करता है।
- उत्तरी कृष्ण ओपयुक्त मृद्भांड महीन, पतली दीवारों वाला, चाक-निर्मित विशिष्ट मृद्भांड है जिसकी सतह काली या इस्पाती-धूसर चमक लिए होती है; इसकी तिथि लगभग 700–600 ईसा पूर्व से लगभग 200 ईसा पूर्व तक है और यह मध्य गंगा मैदान के द्वितीय नगरीकरण का सूचक है, जो लोहे, आहत सिक्कों, पकी ईंट और क़िलेबंदी के साथ मिलता है।
- चित्रित धूसर मृद्भांड, लगभग 1200–600 ईसा पूर्व, काली ज्यामितीय चित्रकारी वाला महीन धूसर मृद्भांड है जो गंगा-यमुना दोआब, पंजाब, हरियाणा तथा उत्तरी राजस्थान में हस्तिनापुर, अहिच्छत्र और अतरंजीखेड़ा जैसे स्थलों पर मिलता है; यह उत्तर वैदिक काल से जुड़ा है और उत्तरी है, दक्षिणी नहीं।
- गैरिक मृद्भांड, लगभग 2000–1500 ईसा पूर्व, कच्ची पकाई वाला मृद्भांड है जिसका नारंगी-लाल लेप उँगलियों पर उतर आता है; यह ऊपरी गंगा दोआब, पश्चिमी उत्तर प्रदेश, हरियाणा तथा राजस्थान से सूचित हुआ है और मुख्यतः ताम्र-निधियों तथा उत्तर-हड़प्पा के प्रश्न के संबंध में चर्चित है।
- कृष्ण-एवं-लाल मृद्भांड पकाने की उस तकनीक का नाम है जिससे भीतरी सतह और मुख काले तथा बाहरी देह लाल रह जाती है; यह राजस्थान के आहड़ जैसे ताम्रपाषाणिक संदर्भों से लेकर प्रायद्वीपीय भारत की महापाषाणिक समाधियों तक बार-बार मिलता है और दक्षिण के परवर्ती नवपाषाण-ताम्रपाषाण स्तरों से भी सूचित है, इसलिए इसे नवपाषाण स्थलों से पूरी तरह बाहर करने वाला कोई कथन टिक नहीं सकता।
- जहाँ एक ही स्थल पर उत्तर के एक से अधिक मृद्भांड मिलते हैं, वहाँ स्तर-क्रम नीचे गैरिक मृद्भांड, उसके ऊपर चित्रित धूसर मृद्भांड और उसके ऊपर उत्तरी कृष्ण ओपयुक्त मृद्भांड रहता है — और यह क्रम स्वयं कालक्रम-प्रश्न के रूप में पूछा जाता है।
- पिछली नकारात्मक पूछ की लय में इस प्रश्न को भी 'कौन-सा सही नहीं है' पढ़ लेना; यहाँ पूछ सकारात्मक है और खोजना उस एक कथन को है जो सही हो, तीन असत्य कथनों के बीच।
- मृद्भांडों के संक्षिप्त नामों को याद रखकर उनके क्षेत्र भूल जाना — इस क्षेत्र के अधिकांश असत्य विकल्प किसी उत्तरी मृद्भांड को दक्षिण में या किसी दक्षिणी संदर्भ को उत्तर में खिसकाकर बनाए जाते हैं।
- 'केवल' और 'कभी नहीं' जैसे निरपेक्ष शब्दों की उपेक्षा कर देना; ऐसा कथन एक ही प्रति-उदाहरण से टूट जाता है, इसलिए विकल्पों में इन शब्दों को पहले जाँचना सबसे किफ़ायती है।
- कृष्ण-एवं-लाल मृद्भांड को किसी एक काल का सूचक मान लेना, जबकि वह पकाने की तकनीक है और ताम्रपाषाण से महापाषाण तक अनेक संदर्भों में लौटती है।
मृद्भांड-अनुक्रम इस खंड की सबसे नियमित सामग्री है और वह तीन साँचों में लौटता है : किसी एक मृद्भांड की तिथि या क्षेत्र सीधे पूछना, चार मृद्भांडों को कालक्रम में जमाना, अथवा मृद्भांड और स्थल का सुमेलन कराना। असत्य विकल्प बनाने के लिए परीक्षक प्रायः क्षेत्र बदलता है, कभी-कभी शताब्दी खिसकाता है, और कभी 'केवल' या 'कभी नहीं' जोड़कर सही कथन को अतिशय बना देता है। इसलिए दोहराने की सबसे कारगर इकाई एक छोटी तालिका है जिसमें चार पंक्तियाँ हों — OCP, PGW, NBPW, BRW — और चार खाने : तिथि, क्षेत्र, विशिष्ट लक्षण, और साथ मिलने वाली सामग्री। यही तालिका द्वितीय नगरीकरण और उत्तर वैदिक काल के प्रश्नों में भी सीधे काम आती है, क्योंकि परीक्षक उन विषयों की पहचान भी प्रायः मृद्भांड के नाम से ही कराता है।
इस प्रश्न से सीधे संबंधित कोई पूर्व PYQ उपलब्ध नहीं।
- practice — not a real PYQ
उत्तर भारत के जिन स्थलों पर एक से अधिक मृद्भांड-परंपराएँ मिलती हैं, वहाँ नीचे से ऊपर की ओर उनका स्तर-क्रम निम्नलिखित में से कौन-सा है?
- (a)चित्रित धूसर मृद्भांड, गैरिक मृद्भांड, उत्तरी कृष्ण ओपयुक्त मृद्भांड
- (b)गैरिक मृद्भांड, चित्रित धूसर मृद्भांड, उत्तरी कृष्ण ओपयुक्त मृद्भांड
- (c)उत्तरी कृष्ण ओपयुक्त मृद्भांड, गैरिक मृद्भांड, चित्रित धूसर मृद्भांड
- (d)गैरिक मृद्भांड, उत्तरी कृष्ण ओपयुक्त मृद्भांड, चित्रित धूसर मृद्भांड
उत्तर(b) गैरिक मृद्भांड, चित्रित धूसर मृद्भांड, उत्तरी कृष्ण ओपयुक्त मृद्भांड — गैरिक मृद्भांड लगभग 2000–1500 ईसा पूर्व का है, चित्रित धूसर मृद्भांड लगभग 1200–600 ईसा पूर्व का, और उत्तरी कृष्ण ओपयुक्त मृद्भांड लगभग 700/600–200 ईसा पूर्व का; चूँकि नीचे की परत पुरानी होती है, यही क्रम स्तरविन्यास में नीचे से ऊपर मिलता है।
- practice — not a real PYQ
चित्रित धूसर मृद्भांड (PGW) के संदर्भ में, निम्नलिखित में से कौन-सा क्षेत्र-समूह उसके विस्तार को सही रूप में व्यक्त करता है?
- (a)तमिलनाडु और केरल का संगम-कालीन क्षेत्र
- (b)गंगा-यमुना दोआब, पंजाब, हरियाणा और उत्तरी राजस्थान
- (c)गुजरात और महाराष्ट्र का तटवर्ती क्षेत्र
- (d)ओड़िशा और तटीय आंध्र
उत्तर(b) गंगा-यमुना दोआब, पंजाब, हरियाणा और उत्तरी राजस्थान — हस्तिनापुर, अहिच्छत्र, अतरंजीखेड़ा और भगवानपुरा इस मृद्भांड के प्रसिद्ध स्थल हैं, और यह उत्तर वैदिक काल तथा आरंभिक लोहे से जोड़ा जाता है। संगम काल का तमिल क्षेत्र कई शताब्दी बाद का और भिन्न परंपरा का है, जबकि शेष दोनों क्षेत्र-समूह इस मृद्भांड के विस्तार में नहीं आते।