कर्मचारी प्रतिकर अधिनियम, 1923 के उपबंधों के अधीन निर्देश-तिथि से किस विहित समय-सीमा के अंदर आयुक्त (कमिश्नर) को प्रतिकर से संबंधित मामले का निपटान कर कर्मचारी को निर्णय से अवगत कराना अपेक्षित है ?
- (a)छः मास
- (b)एक वर्ष
- (c)दो मास
- (d)तीन मास
सही उत्तर — D, (d) तीन मास। यह उपबंध कर्मचारी प्रतिकर अधिनियम, 1923 की धारा 25A है, जिसका शीर्षक ही 'प्रतिकर से संबंधित मामलों के निपटान के लिए समय-सीमा' है, और वह स्पष्ट शब्दों में कहती है कि आयुक्त (कमिश्नर) इस अधिनियम के अधीन प्रतिकर से संबंधित मामले का निपटान निर्देश-तिथि से तीन मास की अवधि के भीतर करेगा और उसी अवधि के भीतर अपने निर्णय से कर्मचारी को अवगत कराएगा। प्रश्न के दोनों अंग — निपटान और सूचना — एक ही अंक से ढँक जाते हैं, इसीलिए इस प्रश्न का उत्तर एक ही धारा से निकल आता है। धारा 25A मूल अधिनियम में नहीं थी; इसे 2009 के संशोधन अधिनियम से जोड़ा गया, उसी संशोधन से जिसने पूरे अधिनियम में 'वर्कमैन' के स्थान पर 'कर्मचारी' शब्द रखा और अधिनियम को उसका वर्तमान नाम दिया। इस धारा के अस्तित्व का कारण भी वही है : आयुक्तों के समक्ष प्रतिकर के दावे वर्षों खिंच जाते थे, और जो हितकारी विधि देर से भुगतान करे वह वस्तुतः भुगतान करती ही नहीं, क्योंकि यह धन घायल कर्मचारी अथवा आश्रित परिवार की खोई हुई आय का स्थान लेने के लिए होता है। अधिनियम विलंब पर दोनों ओर से प्रहार करता है। धारा 4A नियोजक को यह बाध्यता देती है कि प्रतिकर देय होते ही चुका दिया जाए, और यदि नियोजक एक मास तक चूक करे तो आयुक्त बारह प्रतिशत वार्षिक ब्याज का आदेश दे सकता है तथा विलंब अनुचित पाए जाने पर प्रतिकर के पचास प्रतिशत तक का अतिरिक्त शास्ति-भार भी लगा सकता है। इसके बाद धारा 25A उसी अनुशासन में निर्णायक प्राधिकारी को भी तीन मास की बाहरी सीमा से बाँध देती है। जो अभ्यर्थी इस अंक को केवल 'तीन मास' के रूप में नहीं, बल्कि धारा के साथ जोड़कर याद रखता है, वह इसी प्रश्न का कठिन रूप भी हल कर लेता है, जिसमें पूछा जाता है कि यह सीमा किस धारा में है या कब जोड़ी गई।
- (a)छः मास — छः मास इस अधिनियम में आयुक्त द्वारा प्रतिकर-मामले के निपटान के लिए कहीं भी विहित अवधि नहीं है, और इसे चुनने के पीछे प्रायः धारा 25A की कोई स्मृति नहीं, बल्कि यह सामान्य धारणा होती है कि अर्ध-न्यायिक प्राधिकारी को आधा वर्ष मिलता ही होगा। यह देखना उपयोगी है कि छः मास वाला अंक क्या अर्थ रखता : जो उपबंध 2009 में विशेष रूप से हितकारी विधि में विलंब रोकने के लिए जोड़ा गया हो, वह यदि वास्तविक धारा की दुगुनी अवधि दे दे तो उसका प्रयोजन ही शेष नहीं रहता। अधिनियम की अपनी गति भी इसके विपरीत है — धारा 4A के अधीन प्रतिकर देय होते ही चुकाना है, एक मास की चूक पर ब्याज चलने लगता है, और अनुचित विलंब पर पचास प्रतिशत तक शास्ति लग सकती है। इस गति के साथ छः मास की बाहरी सीमा बैठती ही नहीं।
- (b)एक वर्ष — एक वर्ष प्रस्तुत विकल्पों में सबसे लंबी अवधि है और धारा से सबसे दूर। यह उस अभ्यर्थी के लिए विश्वसनीय दिखने वाला जाल है जो निपटान के बजाय परिसीमा के बारे में सोच रहा हो : अधिनियम में एक लंबी अवधि है अवश्य, किन्तु वह धारा 10 के अधीन वे दो वर्ष हैं जिनके भीतर प्रतिकर का दावा प्रस्तुत करना होता है, और वे दुर्घटना घटित होने से अथवा वृत्तिजन्य रोग की दशा में रोग के आरंभ से गिने जाते हैं। ये दो अलग घड़ियाँ हैं — एक बताती है कि दावेदार के पास आयुक्त तक पहुँचने के लिए कितना समय है, दूसरी बताती है कि मामला सामने आ जाने के बाद आयुक्त कितना समय ले सकता है। इन दोनों को गड्डमड्ड कर देना इस अधिनियम में सबसे आम भूलों में से है, और परीक्षक इसी भूल के लिए यह विकल्प रखता है।
- (c)दो मास — दो मास निकटतम चूक है और इसीलिए सबसे ख़तरनाक विकल्प, क्योंकि यह इतना छोटा है कि किसी सुधारवादी उपबंध जैसा लगता है। किन्तु अधिनियम के इस भाग में दो मास की कोई अवधि आती ही नहीं। जो छोटी अवधियाँ आती हैं वे भिन्न कोटि की हैं और भिन्न धाराओं की : एक मास वह बिंदु है जिसके बाद धारा 4A के अधीन चूककर्ता नियोजक पर ब्याज चलने लगता है, तीस दिन वह समय है जिसके भीतर नियोजक को धारा 10A के अधीन घातक दुर्घटना के विषय में विवरण देना होता है, और सात दिन धारा 10B के अधीन घातक दुर्घटनाओं की सूचना देने की अवधि है। इनमें से कोई भी आयुक्त द्वारा निपटान की सीमा नहीं है। यही इस मद का असली पाठ है : अधिनियम में कई अवधियाँ हैं, और प्रत्येक किसी एक कर्ता के किसी एक कर्तव्य से बँधी है।
कर्मचारी प्रतिकर अधिनियम, 1923 भारत का सबसे पुराना सामाजिक सुरक्षा क़ानून है और इसका मूल विचार यह है कि नियोजन के दौरान और नियोजन के कारण हुई क्षति की भरपाई नियोजक को करनी चाहिए, चाहे उसकी कोई उपेक्षा सिद्ध हो या नहीं। यही इसे साधारण अपकृत्य-वाद से अलग करता है : कर्मचारी को नियोजक की लापरवाही सिद्ध नहीं करनी पड़ती, उसे केवल यह दिखाना होता है कि क्षति नियोजन से उद्भूत और नियोजन के अनुक्रम में हुई। इसके बदले में प्रतिकर की मात्रा वाद की तरह खुली नहीं रहती, बल्कि सूत्र से निकलती है — धारा 4 में मृत्यु के लिए मासिक मजदूरी का पचास प्रतिशत और स्थायी पूर्ण अशक्तता के लिए साठ प्रतिशत, दोनों को अनुसूची IV के सुसंगत गुणक से गुणा करके, न्यूनतम राशि की गारंटी के साथ। अधिनियम की प्रक्रिया-धुरी आयुक्त है, जो दावों का निपटान करता है, राशि जमा कराता है और आश्रितों में वितरण करता है; उसके आदेश से अपील धारा 30 के अधीन उच्च न्यायालय में जाती है। समय-सीमाएँ इस ढाँचे की रीढ़ हैं : दावा दो वर्ष में, भुगतान देय होते ही, ब्याज एक मास की चूक पर, और आयुक्त द्वारा निपटान निर्देश-तिथि से तीन मास में। धारा 17 इस पूरे ढाँचे की रक्षा करती है — वह प्रत्येक ऐसी संविदा को शून्य ठहराती है जिससे कर्मचारी प्रतिकर का अपना अधिकार छोड़ता हो।
APFC पद के लिए यह खंड सबसे अधिक अंक देने वाला है, और उसमें भी संख्याओं वाले प्रश्न सबसे नियमित हैं, क्योंकि उनका उत्तर विवाद से परे होता है। इस प्रश्न की बनावट उसी परिवार की है : चार अवधियाँ दी गई हैं और उनमें से तीन ऐसी हैं जो या तो अधिनियम में हैं ही नहीं या किसी दूसरे कर्तव्य से जुड़ी हैं। इसलिए तैयारी का सबसे कारगर तरीक़ा यह है कि प्रत्येक श्रम-अधिनियम के लिए एक 'संख्या-पत्रक' बना लिया जाए, जिसमें हर अंक के सामने तीन बातें लिखी हों — किस धारा में, किस कर्ता पर, और किस कर्तव्य के लिए। केवल 'तीन मास' रट लेने से वह प्रश्न नहीं निकलता जिसमें धारा पूछी जाए, और केवल धारा-संख्या रट लेने से वह प्रश्न नहीं निकलता जिसमें यह पूछा जाए कि यह सीमा कब जोड़ी गई। दूसरी बात, 2009 का संशोधन इस अधिनियम में एक विभाजक रेखा है — उसी से नाम बदला, 'कर्मचारी' शब्द आया, और निपटान की समय-सीमा जुड़ी — इसलिए संशोधन को अलग से याद रखना उतना ही उपयोगी है जितना धाराओं को।
- कर्मचारी प्रतिकर अधिनियम, 1923 की धारा 25A आयुक्त से यह अपेक्षा करती है कि वह प्रतिकर से संबंधित मामले का निपटान निर्देश-तिथि से तीन मास के भीतर करे और उसी अवधि के भीतर अपने निर्णय की सूचना कर्मचारी को दे।
- धारा 25A को 2009 के संशोधन अधिनियम से जोड़ा गया, उसी संशोधन ने पूरे अधिनियम में 'वर्कमैन' के स्थान पर 'कर्मचारी' शब्द रखा और अधिनियम का नाम बदलकर कर्मचारी प्रतिकर अधिनियम किया; इसका उद्देश्य ऐसी हितकारी विधि में विलंब रोकना था जहाँ देर से किया गया भुगतान प्रयोजन ही विफल कर देता है।
- धारा 4A के अधीन प्रतिकर देय होते ही चुकाना अनिवार्य है; नियोजक की एक मास की चूक पर आयुक्त बारह प्रतिशत वार्षिक ब्याज का निदेश दे सकता है, और विलंब अनुचित होने पर प्रतिकर के पचास प्रतिशत तक का अतिरिक्त शास्ति-भार भी लगाया जा सकता है।
- प्रतिकर का दावा धारा 10 के अधीन दुर्घटना घटित होने से, अथवा वृत्तिजन्य रोग की दशा में रोग के आरंभ से, दो वर्ष के भीतर प्रस्तुत करना होता है; धारा 10A के अधीन नियोजक को घातक दुर्घटना का विवरण तीस दिन में देना होता है और धारा 10B के अधीन घातक दुर्घटनाएँ सात दिन में सूचित करनी होती हैं।
- आयुक्त के आदेश से अपील धारा 30 के अधीन उच्च न्यायालय में होती है; धारा 17 प्रत्येक ऐसी संविदा को शून्य ठहराती है जिससे कर्मचारी प्रतिकर का अधिकार छोड़ता हो, और 2017 में जोड़ी गई धारा 17A नियोजक को यह कर्तव्य देती है कि वह कर्मचारी को उसके प्रतिकर-संबंधी अधिकारों की जानकारी दे।
- दावा प्रस्तुत करने की दो वर्ष की परिसीमा और आयुक्त द्वारा निपटान की तीन मास की सीमा को आपस में बदल देना; ये दो अलग घड़ियाँ हैं, एक दावेदार पर चलती है और दूसरी अधिनिर्णायक पर।
- अधिनियम की छोटी अवधियों को एक ही ढेर में रख लेना — एक मास ब्याज के लिए, सात दिन घातक दुर्घटना की सूचना के लिए, तीस दिन नियोजक के विवरण के लिए — जबकि प्रत्येक अवधि एक निश्चित कर्ता के एक निश्चित कर्तव्य से बँधी है।
- यह मान लेना कि हर समय-सीमा मूल 1923 के अधिनियम में रही होगी; निपटान की तीन मास वाली सीमा 2009 के संशोधन की देन है, और संशोधन-वर्ष स्वयं पूछा जाता है।
- प्रतिकर की गणना और प्रक्रिया को एक विषय मान लेना; प्रश्नपत्र इन्हें अलग-अलग पूछता है, और इसी प्रश्नपत्र में आगे प्रतिकर की गणना पर एक स्वतंत्र प्रश्न भी है।
श्रम-विधि खंड में समय-सीमा वाले प्रश्न सबसे नियमित हैं, क्योंकि उनका उत्तर पूर्णतः निश्चित होता है और आयोग को कोई व्याख्यात्मक विवाद नहीं झेलना पड़ता। अपेक्षा रखिए कि यही सामग्री तीन रूपों में लौटेगी — सीधे अवधि पूछना, अवधि से धारा पुछवाना, और चार अवधियों का सुमेलन कराना। असत्य विकल्प प्रायः उसी अधिनियम की दूसरी अवधियों से उठाए जाते हैं, इसलिए वे सुपरिचित लगते हैं; इस प्रश्न में एक वर्ष का विकल्प दावे की दो वर्ष वाली परिसीमा की छाया है और दो मास का विकल्प ब्याज तथा सूचना की छोटी अवधियों की। इसलिए दोहराते समय हर अधिनियम के लिए अवधियों की एक ही सूची बनाइए और उसमें कर्ता तथा कर्तव्य अवश्य लिखिए। यही अनुशासन कर्मचारी भविष्य निधि तथा कर्मचारी राज्य बीमा अधिनियमों की संख्याओं पर भी उतना ही काम करता है।
इस प्रश्न से सीधे संबंधित कोई पूर्व PYQ उपलब्ध नहीं।
- practice — not a real PYQ
कर्मचारी प्रतिकर अधिनियम, 1923 के अधीन प्रतिकर का दावा सामान्यतः दुर्घटना घटित होने से अथवा वृत्तिजन्य रोग के आरंभ से कितनी अवधि के भीतर प्रस्तुत किया जाना चाहिए?
- (a)तीन मास
- (b)छः मास
- (c)एक वर्ष
- (d)दो वर्ष
उत्तर(d) दो वर्ष — धारा 10 के अधीन प्रतिकर का दावा दुर्घटना घटित होने की तिथि से, अथवा वृत्तिजन्य रोग की दशा में रोग के आरंभ से, दो वर्ष के भीतर प्रस्तुत करना होता है। तीन मास वह अवधि है जिसमें आयुक्त को धारा 25A के अधीन मामले का निपटान करना है, और शेष दोनों अवधियाँ इस संदर्भ में अधिनियम में आती ही नहीं।
- practice — not a real PYQ
कर्मचारी प्रतिकर अधिनियम, 1923 के अधीन नियोजक द्वारा देय प्रतिकर के भुगतान में एक मास से अधिक की चूक होने पर आयुक्त कितनी दर से ब्याज का निदेश दे सकता है?
- (a)छः प्रतिशत वार्षिक
- (b)नौ प्रतिशत वार्षिक
- (c)बारह प्रतिशत वार्षिक
- (d)अठारह प्रतिशत वार्षिक
उत्तर(c) बारह प्रतिशत वार्षिक — धारा 4A के अधीन प्रतिकर देय होते ही चुकाना होता है, और एक मास की चूक पर आयुक्त बारह प्रतिशत वार्षिक की दर से ब्याज का निदेश दे सकता है; यदि विलंब बिना उचित कारण के हो तो प्रतिकर के पचास प्रतिशत तक का अतिरिक्त शास्ति-भार भी लगाया जा सकता है।