निम्नलिखित में से किसका छठी और चौथी शताब्दी ईसा पूर्व के बीच मगध के सबसे शक्तिशाली महाजनपद के रूप में उभरने में महत्त्वपूर्ण योगदान था ?
- (a)समृद्ध स्वर्ण खदानों तक सुगम पहुँच
- (b)अपेक्षाकृत उत्कृष्ट अश्वारोही सेना
- (c)कृषि की उपज वाला क्षेत्र
- (d)शासन की गणतंत्रीय व्यवस्था
सही उत्तर — C, (c) कृषि की उपज वाला क्षेत्र। मगध, जो मोटे तौर पर आज के बिहार के पटना और गया ज़िलों में फैला था, मध्य गंगा के मैदान की जलोढ़ मिट्टी पर बसा था, जहाँ गहरी, नमी सँभालने वाली मिट्टी और भरोसेमंद मानसूनी वर्षा धान की खेती को उस पैमाने पर सँभाल सकती थी जो सूखे ऊपरी गंगा क्षेत्र या उत्तर-पश्चिम के बस की बात नहीं थी। ठीक उन्हीं शताब्दियों में दो तकनीकी परिवर्तनों ने इस प्राकृतिक लाभ को कई गुना कर दिया, जिनका उल्लेख प्रश्न में है : लोहे का हलफाल, जिससे भारी जलोढ़ मिट्टी पलटी जा सकी, और धान की रोपाई, जिसने अधिक श्रम की क़ीमत पर उपज तेज़ी से बढ़ाई। परिणाम था एक बड़ा और नियमित कृषि-अधिशेष — और अधिशेष ही वह चीज़ है जिस पर राज्य कर लगा सकता है। जुती हुई भूमि से मिलने वाला राजस्व, जिसे परंपरागत रूप से उपज का एक अंश 'भाग' कहा गया, वही स्थायी सेना और वेतनभोगी अधिकारी-तंत्र का ख़र्च उठाता था, और यही कारण है कि मगध लगातार अभियान चला सका जबकि उसके प्रतिद्वंद्वी नहीं चला सके। मगध के जो अन्य लाभ गिनाए जाते हैं वे इसी आधार को मज़बूत करते हैं, उसका स्थान नहीं लेते : दक्षिणी सीमांत पर, आज के झारखंड के इलाक़े में, लौह-अयस्क सुलभ था, जिससे औज़ार और हथियार बने; क्षेत्र के जंगलों से युद्ध के हाथी मिले, जिस अंग के लिए मगध विख्यात हुआ; और गंगा तथा उसकी सहायक नदियाँ माल और सैनिकों को सस्ते में ढोती थीं — इसी कारण उदयिन ने आगे चलकर राजधानी पहाड़ियों से घिरे राजगृह से हटाकर नदी-संगम पर स्थित पाटलिपुत्र कर दी। किन्तु आयोग ने जिस विकल्प को कुंजी में रखा है वह इन सबके नीचे बैठा आर्थिक आधार है। जिस प्रश्न में तीन गढ़े हुए कारणों के बीच एक सच्चा कारण रखा गया हो, वहाँ सुरक्षित रास्ता यह पूछना है कि कौन-सा विकल्प ऐसी वस्तु बताता है जिस पर राज्य कर लगा सके, जिससे सेना का पेट भरे, या जो नदी पर ढोई जा सके — और यह केवल (c) करता है।
- (a)समृद्ध स्वर्ण खदानों तक सुगम पहुँच — मगध का खनिज-लाभ लोहा था, स्वर्ण नहीं। क्षेत्र के दक्षिणी छोर पर, आधुनिक झारखंड के छोटानागपुर क्षेत्र में, लौह-अयस्क के भंडार थे जिनसे हलफाल, कुल्हाड़ियाँ और हथियार बने, और उसी पट्टी में ताँबा भी निकाला जाता था। प्राचीन भारत का सोना मुख्यतः सुदूर दक्षिण से आता था — कर्नाटक का कोलार क्षेत्र — तथा नदियों की रेत धोकर; इनमें से कोई भी मगध में या उसके आसपास नहीं था। यह विकल्प जान-बूझकर लोहे वाले तथ्य के साँचे में धातु बदलकर गढ़ा गया है, और इस खंड में असत्य विकल्प बनाने का यही सबसे आम तरीक़ा है। इसलिए वाक्य की बनावट देखकर नहीं, उसमें आई संज्ञा देखकर निर्णय कीजिए : 'खदानों तक सुगम पहुँच' सुनने में मगध जैसा लगता है, पर 'स्वर्ण' उसे तुरंत असत्य कर देता है।
- (b)अपेक्षाकृत उत्कृष्ट अश्वारोही सेना — मगध जिस युद्ध-अंग के लिए स्मरण किया जाता है वह हाथी है, घुड़सवार सेना नहीं। क्षेत्र के जंगलों से मिले हाथी क़िलेबंदी और सैन्य-पंक्तियाँ तोड़ने में काम आते थे, और नंदों तथा मौर्यों के विषय में यूनानी वृत्तांत हाथियों की संख्या पर ही ठहरते हैं, अश्वारोहियों पर नहीं। अच्छी घुड़सवार सेना युद्ध के घोड़ों की आपूर्ति पर निर्भर थी, और वे भारत में उत्तर-पश्चिम से आते थे — कंबोज, गांधार और उससे आगे के क्षेत्रों से। इसलिए अश्व-बल स्वाभाविक रूप से उत्तर-पश्चिमी राज्यों का लाभ था, दक्षिण बिहार में बसे किसी राज्य का नहीं। मगध को उत्कृष्ट अश्वारोही सेना का श्रेय देना घोड़ों के व्यापार की भौगोलिक दिशा को ही उलट देना है।
- (d)शासन की गणतंत्रीय व्यवस्था — मगध अपने उत्थान के पूरे कालखंड में एक राजतंत्र रहा — बिंबिसार और अजातशत्रु के अधीन हर्यंक वंश, फिर शिशुनाग, फिर नंद, फिर मौर्य — और उसका विस्तार वंशानुगत शक्ति वाले राजाओं तथा उनके पीछे खड़ी करदाता किसान-आबादी के बल पर हुआ। उस युग की गणतंत्रीय या कुलीनतंत्रीय व्यवस्थाएँ गण-संघ थीं : वैशाली के लिच्छवियों के नेतृत्व वाला वज्जि संघ, मल्ल, और कपिलवस्तु के शाक्य। मगध गणराज्य होना तो दूर, उसने एक गणराज्य को नष्ट किया — वज्जियों के विरुद्ध अजातशत्रु का लंबा अभियान इस काल का प्रसिद्ध प्रसंग है। यह विकल्प ठीक उसी विरोध को उलट देता है जो पाठ्यक्रम राजतंत्रों और गण-संघों के बीच खींचता है, इसलिए इसे पहचानना सबसे आसान होना चाहिए।
लगभग छठी से चौथी शताब्दी ईसा पूर्व के बीच उत्तर भारत सोलह महाजनपदों में संगठित था — वे बड़े प्रादेशिक राज्य जिनकी सूची अंगुत्तर निकाय जैसे आरंभिक बौद्ध ग्रंथों में मिलती है। इनमें कुछ राजतंत्र थे और कुछ गण-संघ, अर्थात् ऐसी व्यवस्थाएँ जिनमें सत्ता किसी एक वंशानुगत राजा के बजाय प्रमुखों की सभा में रहती थी। इन सोलह में से मगध ने शेष सबको आत्मसात् कर लिया, और इसका मानक स्पष्टीकरण एकहरा नहीं, परतदार है। भौतिक आधार असाधारण रूप से उपजाऊ कृषि-क्षेत्र था : जलोढ़ मिट्टी, अच्छी वर्षा, लोहे का हलफाल और धान की रोपाई — जिनसे इतना अधिशेष बना कि उस पर कर लगाया जा सके। उस आधार पर क्षेत्र की शेष संपदाएँ टिकी थीं — हथियारों के लिए सुलभ लौह-अयस्क, युद्ध के हाथी देने वाले जंगल, और सस्ते राजमार्ग की तरह काम करता गंगा-तंत्र। इनके ऊपर नीति और व्यक्तित्व थे : बिंबिसार के वैवाहिक संबंध और अंग का विलय, कोसल तथा वज्जियों के विरुद्ध अजातशत्रु के युद्ध, और नंदों द्वारा विशाल सेना व कोष का संचय। मगध की राजधानियाँ भी इसी तर्क का अनुसरण करती हैं — पहले पहाड़ियों से सुरक्षित राजगृह, फिर पाटलिपुत्र, जो वहाँ बसाया गया जहाँ सोन और गंगा मिलती हैं, ताकि हर दिशा का नदी-यातायात नियंत्रित किया जा सके। परीक्षा-योग्य विचार यह है कि राज्य-निर्माण अधिशेष के पीछे चलता है : जो राज्य सेना को स्थायी रूप से खिला और वेतन दे सकता है, वह उस राज्य से अधिक टिकता है जिसे हर मौसम में सेना बिखेरनी पड़ती है।
इस प्रकार का प्रश्न 'कारण' पूछता है, 'तथ्य' नहीं, और यही उसे कठिन बनाता है। अभ्यर्थी को मगध के उत्थान के चार-पाँच कारण प्रायः याद रहते हैं, किन्तु प्रश्न यह पूछता है कि इनमें से कौन-सा वस्तुतः प्रश्नपत्र के विकल्पों में उपस्थित है — और तीन विकल्प ऐसे गढ़े गए हैं जो सुनने में सुपरिचित लगते हैं क्योंकि उनमें केवल एक शब्द बदला गया है। लोहे की जगह स्वर्ण, हाथी की जगह अश्वारोही, राजतंत्र की जगह गणतंत्र : तीनों बार जो बदला गया वह संज्ञा है, वाक्य की बनावट नहीं। इसलिए इस खंड में पढ़ने की तकनीक यह होनी चाहिए कि विकल्प की मुख्य संज्ञा पर उँगली रखिए और पूछिए कि क्या वह संज्ञा वास्तव में मगध से जुड़ी है। दूसरी बात, जब चारों विकल्प एक ही घटना के 'कारण' बताते हों, तो आर्थिक आधार वाला विकल्प प्रायः सबसे नीचे की परत होता है और परीक्षक उसे ही कुंजी में रखता है, क्योंकि सेना, हाथी और नदी-मार्ग सब उसी पर टिके हैं। इस प्रश्नपत्र की मार्किंग को देखते हुए — प्रत्येक ग़लत उत्तर पर उस प्रश्न के अंकों का एक-तिहाई कटता है — यहाँ अनुमान की भी गुंजाइश है, क्योंकि तीन विकल्प तथ्यात्मक रूप से हटाए जा सकते हैं और चौथा अपने आप बचता है।
- मगध, आज के बिहार के पटना और गया ज़िलों के क्षेत्र में, छठी से चौथी शताब्दी ईसा पूर्व के बीच आरंभिक बौद्ध साहित्य में गिनाए गए सोलह महाजनपदों में सबसे शक्तिशाली बना और हर्यंक, शिशुनाग, नंद तथा अंततः मौर्य वंशों के अधीन अपने प्रतिद्वंद्वियों को आत्मसात् करता गया।
- निर्णायक तत्त्व कृषि-आधार था : मध्य गंगा मैदान की जलोढ़ मिट्टी और भरोसेमंद वर्षा, लोहे के हलफाल तथा धान की रोपाई के साथ मिलकर, इतना अधिशेष उत्पन्न करती थी कि उस पर कर लगाया जा सके — और भू-राजस्व ही स्थायी सेना तथा वेतनभोगी प्रशासन का ख़र्च उठाता था।
- सहायक लाभ थे : दक्षिणी सीमांत पर छोटानागपुर के इलाक़े में औज़ारों और हथियारों के लिए सुलभ लौह-अयस्क, युद्ध के हाथी देने वाले जंगल, तथा सैनिकों और माल की सस्ती आवाजाही के लिए गंगा और उसकी सहायक नदियाँ।
- मगध राजतंत्र था, गणराज्य नहीं; उस युग के गण-संघ थे वैशाली के लिच्छवियों के नेतृत्व वाला वज्जि संघ, मल्ल और शाक्य — और वज्जियों के विरुद्ध अजातशत्रु का अभियान किसी राजतंत्र द्वारा किसी कुलीनतंत्र को नष्ट करने का मानक उदाहरण है।
- राजधानी पहाड़ियों से घिरे क़िलेबंद स्थल राजगृह से हटकर सोन और गंगा के संगम पर स्थित पाटलिपुत्र आई — यह परिवर्तन उदयिन के समय पाँचवीं-चौथी शताब्दी ईसा पूर्व में हुआ, अर्थात् रक्षात्मक स्थल से हटकर ऐसा स्थल, जहाँ से हर दिशा का नदी-संपर्क नियंत्रित हो सके।
- 'खदानों तक सुगम पहुँच' पढ़कर विकल्प को स्वीकार कर लेना, यह ध्यान दिए बिना कि उसमें धातु स्वर्ण है, लोहा नहीं — मगध का खनिज-लाभ लोहा और ताँबा था, और भारत का प्राचीन स्वर्ण मुख्यतः कोलार तथा नदी-रेत से आता था।
- मगध को 'उत्कृष्ट अश्वारोही सेना' का श्रेय दे देना, जबकि यूनानी वृत्तांत तक उसकी हस्ति-सेना पर ठहरते हैं; युद्ध के घोड़े उत्तर-पश्चिम से आयात होते थे, इसलिए अश्व-बल गांधार-कंबोज जैसे क्षेत्रों का लाभ था।
- गण-संघ और राजतंत्र का भेद उलट देना — मगध ने वज्जि संघ को नष्ट किया था, वह स्वयं गणतंत्र नहीं था; यही भेद इस खंड में बार-बार परखा जाता है।
- 'कारण' पूछे जाने पर सबसे रोचक कारण चुन लेना, जबकि परीक्षक प्रायः वह आधारभूत आर्थिक कारण चाहता है जिस पर शेष सब टिका हो — यहाँ कृषि-अधिशेष, जिससे कर, वेतन और स्थायी सेना संभव हुई।
मगध का उत्थान EPFO, UPSC और राज्य आयोगों में लगभग सदैव 'निम्नलिखित में से कौन-सा कारक उत्तरदायी था' अथवा 'कौन-सा युग्म सुमेलित नहीं है' के रूप में आता है, क्योंकि इसके कारणों की सूची लंबी है और उसमें एक शब्द बदलकर असत्य विकल्प बनाना सरल है। तैयारी का सबसे कारगर तरीक़ा यह है कि कारणों को चार खानों में बाँट लिया जाए — भौगोलिक (जलोढ़ मिट्टी, वर्षा, नदियाँ), संसाधन (लोहा, हाथी, लकड़ी), राजनीतिक (महत्त्वाकांक्षी राजा, विवाह-संबंध, विलय) और सांस्थानिक (राजधानी का स्थान, स्थायी सेना, कर) — और प्रत्येक खाने में दो ठोस उदाहरण याद रखे जाएँ। साथ ही राजगृह से पाटलिपुत्र की ओर राजधानी का स्थानांतरण अलग से पूछा जाता है, प्रायः यह पूछते हुए कि यह किस शासक के समय हुआ।
इस प्रश्न से सीधे संबंधित कोई पूर्व PYQ उपलब्ध नहीं।
- practice — not a real PYQ
मगध की राजधानी राजगृह से हटाकर सोन और गंगा के संगम पर बसाए गए पाटलिपुत्र में ले जाने का श्रेय सामान्यतः निम्नलिखित में से किस शासक को दिया जाता है?
- (a)बिंबिसार
- (b)अजातशत्रु
- (c)उदयिन
- (d)महापद्म नंद
उत्तर(c) उदयिन — अजातशत्रु के उत्तराधिकारी उदयिन के समय राजधानी पाटलिपुत्र स्थानांतरित हुई, जो सोन और गंगा के संगम पर स्थित होने के कारण हर दिशा के नदी-यातायात को नियंत्रित करती थी। बिंबिसार और अजातशत्रु राजगृह से शासन करते रहे, यद्यपि अजातशत्रु ने वज्जियों के विरुद्ध अभियान के लिए पाटलिग्राम में क़िलेबंदी आरंभ की थी; महापद्म नंद बहुत बाद के हैं और उनका संबंध राजधानी बदलने से नहीं है।
- practice — not a real PYQ
छठी शताब्दी ईसा पूर्व के महाजनपदों के संदर्भ में, निम्नलिखित में से कौन-सा एक गण-संघ (गणतंत्रीय व्यवस्था) था, न कि राजतंत्र?
- (a)मगध
- (b)कोसल
- (c)अवंति
- (d)वज्जि
उत्तर(d) वज्जि — वैशाली के लिच्छवियों के नेतृत्व वाला वज्जि संघ इस युग का सबसे प्रसिद्ध गण-संघ था, जहाँ सत्ता किसी एक वंशानुगत राजा के बजाय कुल-प्रमुखों की सभा में निहित थी। मगध, कोसल और अवंति तीनों राजतंत्र थे; और मगध के अजातशत्रु द्वारा वज्जियों के विरुद्ध चलाया गया लंबा अभियान इस काल में राजतंत्र द्वारा गण-संघ को समाप्त करने का मानक उदाहरण माना जाता है।