उन्नीसवीं-बीसवीं शताब्दी के पुरातत्त्वविदों के कार्यों से संबंधित निम्नलिखित प्रेक्षणों में से कौन-सा एक सही नहीं है ?
- (a)भारतीय पुरातत्त्व सर्वेक्षण के पहले महानिदेशक अलेक्जैंडर कनिंघम का मत था कि भारत का इतिहास सिंधु घाटी की सभ्यता के उद्भव से शुरू हुआ ।
- (b)जॉन मार्शल ने आमतौर पर नियमित समतल इकाइयों के साथ-साथ उत्खनन की पद्धति अपनाई और स्थल के स्तरविन्यास की उपेक्षा की ।
- (c)आर० ई० एम० व्हीलर ने समतल रेखाओं के साथ-साथ खुदाई करने के स्थान पर टीले के स्तरविन्यास का अनुसरण करने की आवश्यकता को सबसे पहले पहचाना ।
- (d)अमलानंद घोष पूर्व-हड़प्पा और परिपक्व-हड़प्पा संस्कृतियों के बीच समानताओं की पहचान करने वाले पहले व्यक्ति थे ।
सही उत्तर — A, (a) यह कथन कि भारतीय पुरातत्त्व सर्वेक्षण के पहले महानिदेशक अलेक्जैंडर कनिंघम का मत था कि भारत का इतिहास सिंधु घाटी की सभ्यता के उद्भव से शुरू हुआ। प्रश्न नकारात्मक है — पुस्तिका में 'नहीं' मोटे अक्षरों में छपा है — इसलिए खोजना उसी एक प्रेक्षण को है जो ग़लत हो, और शेष तीन सही होंगे। कनिंघम (1814–1893) निस्संदेह भारतीय पुरातत्त्व सर्वेक्षण के पहले महानिदेशक थे, किन्तु उनकी शोध-परिधि प्रारंभिक ऐतिहासिक काल थी, अर्थात् लगभग छठी शताब्दी ईसा पूर्व के बाद का भारत। वे सेना के अभियंता से पुरातत्त्वविद् बने थे और उनकी कार्य-पद्धति ग्रंथ-आधारित थी : चीनी बौद्ध यात्रियों फ़ाहियान और ह्वेनसांग के यात्रा-वृत्तांतों को वे क्षेत्र-निर्देशिका की तरह प्रयोग करते थे, उनके मार्ग पर पड़ने वाले टीलों की पहचान करते थे, और अभिलेख पढ़कर तथा सिक्के एकत्र कर राजवंश व तिथियाँ स्थिर करते थे। इस पद्धति पर भारतीय इतिहास का आरंभ गंगा-घाटी के नगरों, बुद्ध के काल और प्रारंभिक ऐतिहासिक राजवंशों से होता था — किसी सिंधु सभ्यता से नहीं, जिसका अस्तित्व उनके जीवनकाल में किसी को ज्ञात ही नहीं था। हड़प्पाई नगरों का उत्खनन 1921–22 में हुआ — हड़प्पा में दयाराम साहनी और मोहनजोदड़ो में राखालदास बनर्जी — और जॉन मार्शल ने एक नई सभ्यता की खोज की घोषणा 1924 में की, कनिंघम की मृत्यु के तीन दशक बाद। इस विकल्प को जान-बूझकर बनाया गया जाल इसलिए कहा जाना चाहिए कि कनिंघम के हाथ से हड़प्पाई प्रमाण गुज़र भी चुका था : उन्हें एक अंग्रेज़ ने हड़प्पा से मिली एक मुहर दिखाई थी, और चूँकि वह उनके किसी परिचित कालखंड में नहीं बैठती थी, उन्होंने उसे भारत से बाहर की कोई वस्तु मानकर छोड़ दिया। अतः सत्य ठीक इस विकल्प का उलटा है — कनिंघम का भारत प्रारंभिक ऐतिहासिक काल से शुरू होता था, और सिंधु का प्रमाण उनकी दृष्टि से चूक गया। विकल्प (b), (c) और (d) तीनों मानक विवरणों के अनुरूप हैं, इसीलिए (a) ही उत्तर है।
- (b)जॉन मार्शल ने आमतौर पर नियमित समतल इकाइयों के साथ-साथ उत्खनन की पद्धति अपनाई और स्थल के स्तरविन्यास की उपेक्षा की । — यह कथन जैसा छपा है वैसा ही सही है, इसलिए 'सही नहीं है' वाले प्रश्न का उत्तर नहीं बन सकता। जॉन मार्शल 1902 से 1928 तक महानिदेशक रहे, सर्वेक्षण के प्रमुख बनने वाले पहले प्रशिक्षित पुरातत्त्वविद् थे और उन्हीं के कार्यकाल में हड़प्पा सभ्यता की घोषणा हुई; किन्तु उत्खनन-तकनीक उनके कार्यकाल का सबसे कमज़ोर पक्ष रही। वे पूरे टीले पर एक समान माप की समतल इकाइयाँ लेकर खुदाई करते थे, जिसका अर्थ यह हुआ कि टीले के भिन्न-भिन्न हिस्सों में एक ही गहराई पर मिली सामग्री को समकालीन मान लिया गया, जबकि वह थी नहीं। टीला वस्तुतः एक के ऊपर एक जमी आवास-परतों से बनता है और ये परतें कहीं ऊपर उठती हैं, कहीं नीचे बैठती हैं; समान गहराई पर खोदने से यह क्रम चपटा हो जाता है और भिन्न कालों की वस्तुएँ आपस में मिल जाती हैं। किसी प्रसिद्ध पुरातत्त्वविद् की आलोचना पढ़कर कथन को ग़लत मान लेना यहाँ भूल होगी — यह आलोचना ही पाठ्यपुस्तक की स्थापित स्थिति है।
- (c)आर० ई० एम० व्हीलर ने समतल रेखाओं के साथ-साथ खुदाई करने के स्थान पर टीले के स्तरविन्यास का अनुसरण करने की आवश्यकता को सबसे पहले पहचाना । — यह भी सही है, और वस्तुतः विकल्प (b) का पूरक तथ्य है। सर आर० ई० एम० व्हीलर 1944 से 1948 तक महानिदेशक रहे और उन्होंने भारतीय क्षेत्र-पुरातत्त्व में सैनिक अनुशासन लाया। उनका मूल आग्रह यही था कि टीले की खुदाई उसके स्तरविन्यास (stratigraphy) का अनुसरण करते हुए हो — अर्थात् जिस क्रम में परतें जमी हैं उसी क्रम में उन्हें उघाड़ा जाए — न कि पूरे टीले पर एक समान समतल रेखाओं के सहारे। 1946 में हड़प्पा में उनके द्वारा काटे गए ऊर्ध्वाधर खंड, जिनसे टीले की परतें एक अनुप्रस्थ काट में पढ़ी जा सकीं, इसका मानक उदाहरण हैं। परतों का क्रम पहचान लेने पर ही किसी वस्तु को सापेक्ष कालक्रम में रखा जा सकता है, इसलिए यह परिवर्तन मार्शल की पद्धति और आधुनिक उत्खनन के बीच की विभाजक रेखा माना जाता है। जिस अभ्यर्थी को केवल यह युग्म याद है — मार्शल : समतल इकाइयाँ, व्हीलर : स्तरविन्यास — वह (b) और (c) दोनों को एक साथ हटा सकता है।
- (d)अमलानंद घोष पूर्व-हड़प्पा और परिपक्व-हड़प्पा संस्कृतियों के बीच समानताओं की पहचान करने वाले पहले व्यक्ति थे । — यह कथन भी सही है और तीनों सही कथनों में सबसे कम परिचित है, इसीलिए अनुमान लगाने वाले अभ्यर्थी को यही सबसे अधिक लुभाता है। अमलानंद घोष 1953 से 1968 तक भारतीय पुरातत्त्व सर्वेक्षण के महानिदेशक रहे और उन्होंने 1950 के दशक के आरंभ में उत्तरी राजस्थान में घग्घर तथा उसकी सहायक धाराओं के सूखे पाटों का सर्वेक्षण किया। वहाँ उन्होंने जिस सोथी सामग्री की पहचान की, उसे उन्होंने परिपक्व हड़प्पा से पहले का और उससे निरंतरता रखने वाला माना — यही वह श्रेय है जो परंपरागत रूप से उन्हें पूर्व-हड़प्पा और परिपक्व-हड़प्पा संस्कृतियों के बीच समानताएँ पहचानने वाले पहले व्यक्ति के रूप में दिया जाता है, अर्थात् नगर आकाश से पूरी तरह बने-बनाए नहीं उतरे। अपरिचित होना असत्य होना नहीं है : चार कथनों वाले नकारात्मक प्रश्न में जिस कथन से आप कभी मिले ही नहीं, उसे सबसे अंत में जाँचिए, पहले उन तीन को जाँचिए जिन्हें आप सचमुच परख सकते हैं।
यह प्रश्न अतीत के बारे में नहीं, अतीत का अध्ययन करने वाले अनुशासन के इतिहास के बारे में है, और यह इतिहास एक छोटी-सी क्रमबद्ध कहानी की तरह याद रखने योग्य है। अलेक्जैंडर कनिंघम 1861 में पुरातत्त्व सर्वेक्षक नियुक्त हुए और आगे चलकर भारतीय पुरातत्त्व सर्वेक्षण के पहले महानिदेशक बने; उन्होंने भारतीय पुरातत्त्व को ग्रंथों के चारों ओर खड़ा किया — फ़ाहियान और ह्वेनसांग के वृत्तांत बताते थे कि कहाँ खोदना है, और अभिलेख तथा सिक्के बताते थे कि अवशेष किसके हैं। इसलिए उनका क्षितिज प्रारंभिक ऐतिहासिक काल, लगभग छठी शताब्दी ईसा पूर्व, से आरंभ होता था। जॉन मार्शल (1902–1928) ने सर्वेक्षण को व्यावसायिक रूप दिया और उन्हीं के कार्यकाल में 1924 में हड़प्पा सभ्यता की घोषणा हुई, जिसका आधार 1921–22 के दयाराम साहनी (हड़प्पा) और राखालदास बनर्जी (मोहनजोदड़ो) के उत्खनन थे; किन्तु वे एक समान समतल इकाइयों में खोदते थे और इस कारण स्तर-क्रम खो देते थे। आर० ई० एम० व्हीलर (1944–1948) ने इसके स्थान पर परत-दर-परत उत्खनन की पद्धति स्थापित की, अर्थात् यह सिद्धांत कि स्थल को उसी क्रम में पढ़ा जाए जिस क्रम में वह जमा हुआ है। अमलानंद घोष (1953–1968) ने मानचित्र का विस्तार किया और घग्घर-तंत्र के सर्वेक्षण से एक पूर्व-हड़प्पा सामग्री को परिपक्व चरण से जोड़ा। पूरी कहानी की धुरी एक ही है : दृष्टि-फलक का लगातार चौड़ा होना — पहले बुद्ध की शताब्दी से शुरू होने वाला इतिहास, फिर उससे डेढ़ हज़ार वर्ष पुराने नगरों से शुरू होने वाला, और अंततः यह प्रश्न कि वे नगर स्वयं कहाँ से आए।
EPFO के सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र का भाग B अपने इतिहास-खंड की शुरुआत प्राचीन और मध्यकालीन सामग्री से करता है, और यह प्रश्न उस खंड की पसंदीदा बनावट दिखाता है — 'X कब हुआ' नहीं, बल्कि 'किसी विद्वत्-प्रसंग से जुड़े इन चार कथनों में से कौन-सा असत्य है'। इस बनावट के लिए तैयारी भी दूसरी तरह की चाहिए। केवल तिथियाँ रटने से काम नहीं चलेगा; आपको यह बताना आना चाहिए कि हर व्यक्ति किस मत को मानता था और उसकी पद्धति में क्या दोष था, क्योंकि असत्य कथन प्रायः एक व्यक्ति की स्थिति दूसरे के नाम चढ़ाकर, या किसी स्थापित निर्णय को उलटकर गढ़ा जाता है। नकारात्मक पूछ इस कठिनाई को दुगुना कर देती है। पुस्तिका 'नहीं' को मोटे अक्षरों में छापती है, जो वास्तविक सहायता है, फिर भी समय के दबाव में अभ्यर्थी पहला विश्वसनीय दिखने वाला कथन पढ़कर उसे चिह्नित कर देता है और आगे बढ़ जाता है। जो अनुशासन काम करता है वह यांत्रिक है : पूछ को दो बार पढ़िए, फिर चारों विकल्पों के आगे हाशिए पर स-स-ग-स (सही/ग़लत) लिखिए, और तभी उत्तर दीजिए। इस प्रश्नपत्र में प्रत्येक ग़लत उत्तर पर उस प्रश्न के अंकों का एक-तिहाई कटता है, इसलिए जिस विकल्प को आपने सक्रिय रूप से असत्य सिद्ध कर लिया है वह चिह्नित करने योग्य है, और जो विकल्प केवल अपरिचित लग रहा है वह नहीं।
- अलेक्जैंडर कनिंघम भारतीय पुरातत्त्व सर्वेक्षण के पहले महानिदेशक थे और वे ग्रंथों से आगे बढ़ते थे — चीनी यात्रियों फ़ाहियान तथा ह्वेनसांग के वृत्तांत, साथ ही अभिलेख और सिक्के — इसलिए उनका भारत लगभग छठी शताब्दी ईसा पूर्व के प्रारंभिक ऐतिहासिक काल से शुरू होता था, सिंधु सभ्यता से नहीं, जो उनके जीवनकाल में अज्ञात थी।
- कनिंघम को एक अंग्रेज़ ने हड़प्पा से प्राप्त एक मुहर दिखाई थी और वे उसे अपने किसी परिचित कालखंड में नहीं बिठा सके; उन्होंने उसे भारत से बाहर की वस्तु मान लिया — यही वह प्रसंग है जिसे इस प्रश्न का असत्य कथन उलटकर प्रस्तुत करता है।
- हड़प्पाई नगरों का उत्खनन 1921–22 में हुआ — हड़प्पा में दयाराम साहनी और मोहनजोदड़ो में राखालदास बनर्जी — और जॉन मार्शल ने एक नई सभ्यता की खोज की घोषणा 1924 में की, जो 1893 में हुई कनिंघम की मृत्यु के तीन दशक बाद की बात है।
- जॉन मार्शल (महानिदेशक 1902–1928) पूरे टीले पर एक समान समतल इकाइयों में खुदाई करते थे और इस प्रकार स्थल के स्तरविन्यास की उपेक्षा कर बैठते थे, जिससे भिन्न कालों की सामग्री मिल जाती थी; आर० ई० एम० व्हीलर (महानिदेशक 1944–1948) ने यह आग्रह करके इसे सुधारा कि उत्खनन टीले की परतों का अनुसरण करे।
- अमलानंद घोष (महानिदेशक 1953–1968) ने 1950 के दशक के आरंभ में उत्तरी राजस्थान में सूखे घग्घर-तंत्र का सर्वेक्षण किया, वहाँ सोथी सामग्री की पहचान की, और परंपरागत रूप से उन्हें पूर्व-हड़प्पा तथा परिपक्व-हड़प्पा संस्कृतियों के बीच समानताएँ सबसे पहले पहचानने का श्रेय दिया जाता है।
- पूछ को 'कौन-सा सही है' पढ़ लेना, जबकि पुस्तिका ने 'नहीं' मोटे अक्षरों में छापा है; इस प्रश्नपत्र में सत्रह प्रश्नों की पूछ नकारात्मक है, और पहला सही-सा दिखने वाला कथन चिह्नित कर देना उन अंकों को गँवाने का सबसे सामान्य तरीक़ा है।
- यह मान लेना कि किसी प्रसिद्ध पुरातत्त्वविद् की आलोचना करने वाला कथन ही असत्य होगा — मार्शल की समतल-इकाई पद्धति की आलोचना और व्हीलर को स्तरविन्यास का श्रेय, दोनों ही पाठ्यपुस्तक की स्थापित स्थितियाँ हैं।
- कनिंघम 'क्या जान सकते थे' और 'क्या जानते थे' को गड्डमड्ड कर देना : उनके हाथ में हड़प्पाई मुहर आई अवश्य, पर उसे रखने के लिए कोई ढाँचा नहीं था, इसलिए वे सिंधु सभ्यता से चूकने के लिए याद किए जाते हैं, उसके अध्ययन की नींव रखने के लिए नहीं।
- समुच्चय के सबसे अपरिचित नाम को — यहाँ अमलानंद घोष को — केवल इसलिए अस्वीकार कर देना कि आप उससे कभी मिले नहीं; नकारात्मक प्रश्न में अपरिचित कथन को सबसे अंत में जाँचना चाहिए, सबसे पहले नहीं।
APFC सामान्य अध्ययन के प्राचीन-इतिहास खंड का झुकाव राजवंशीय वृत्तांत की अपेक्षा कला, पुरातत्त्व और इतिहास के स्रोतों की ओर रहता है, और वह प्रायः यही चार-कथन वाला नकारात्मक साँचा प्रयोग करता है। अपेक्षा रखिए कि असत्य कथन दो विद्वानों की स्थितियाँ आपस में बदलकर, किसी खोज को ग़लत शताब्दी में खिसकाकर, या किसी व्यक्ति को उसके उत्तराधिकारी का श्रेय देकर गढ़ा जाएगा। इसलिए दोहराने की उपयोगी इकाई 'व्यक्ति + उसकी स्थिति' का कार्ड है — कनिंघम के साथ ग्रंथ और प्रारंभिक ऐतिहासिक ढाँचा, मार्शल के साथ समतल इकाइयाँ और 1924 की घोषणा, व्हीलर के साथ स्तरविन्यास, घोष के साथ घग्घर सर्वेक्षण — क्योंकि प्रश्न अपना असत्य इसी सामग्री से बनाता है। यही खंड आगे चलकर मृद्भांड-अनुक्रम और मंदिर-शैलियों पर भी इसी बनावट में लौटता है।
इस प्रश्न से सीधे संबंधित कोई पूर्व PYQ उपलब्ध नहीं।
- practice — not a real PYQ
1921–22 के जिन उत्खननों से हड़प्पाई नगर पहली बार प्रकाश में आए, वे हड़प्पा और मोहनजोदड़ो में क्रमशः निम्नलिखित में से किस युग्म द्वारा किए गए थे?
- (a)अलेक्जैंडर कनिंघम और जॉन मार्शल
- (b)दयाराम साहनी और राखालदास बनर्जी
- (c)आर० ई० एम० व्हीलर और एस० आर० राव
- (d)अमलानंद घोष और बी० बी० लाल
उत्तर(b) दयाराम साहनी और राखालदास बनर्जी — साहनी ने हड़प्पा में और बनर्जी ने मोहनजोदड़ो में 1921–22 में उत्खनन किया, और इन्हीं के कार्य के बल पर तत्कालीन महानिदेशक जॉन मार्शल ने 1924 में एक नई सभ्यता की खोज की घोषणा की। कनिंघम की मृत्यु 1893 में हो चुकी थी; व्हीलर और राव क्रमशः हड़प्पा तथा लोथल में 1940 के दशक और उसके बाद कार्यरत रहे; घोष और लाल स्वतंत्रता के बाद के घग्घर-सर्वेक्षण तथा कालीबंगा से जुड़े हैं।
- practice — not a real PYQ
भारतीय पुरातत्त्व में यह सिद्धांत कि टीले की खुदाई पूरे स्थल पर एक समान समतल रेखाओं के सहारे नहीं, बल्कि उसकी जमा हुई परतों के क्रम का अनुसरण करते हुए होनी चाहिए, मुख्यतः किसके द्वारा लाया गया?
- (a)अलेक्जैंडर कनिंघम
- (b)जॉन मार्शल
- (c)आर० ई० एम० व्हीलर
- (d)दयाराम साहनी
उत्तर(c) आर० ई० एम० व्हीलर — 1944 से 1948 तक महानिदेशक रहते हुए उन्होंने आग्रह किया कि उत्खनन टीले के स्तरविन्यास का अनुसरण करे, और इस प्रकार ठीक उसी समान-समतल-इकाई वाली पद्धति को सुधारा जिसे मार्शल ने अपनाया था और जिसने भिन्न कालों की सामग्री मिला दी थी। कनिंघम परतों के क्रम की अपेक्षा ग्रंथों और अभिलेखों से काम लेते थे, मार्शल वही व्यक्ति हैं जिनकी पद्धति सुधारी गई, और साहनी 1921 के हड़प्पा उत्खनन के लिए स्मरण किए जाते हैं।