वैश्वीकरण के बारे में, निम्नलिखित में से कौन-सा/से कथन सही है/हैं? 1. इसके कारण मुद्राओं, डिजिटल रोकड़ और वैश्विक क्रेडिट कार्ड का सीमा-पार प्रसार अत्यधिक बढ़ गया है। 2. संपूर्ण विश्व में, इलेक्ट्रॉनिक व्यापार के विकास के साथ प्रतिभूति बाजारों ने एक वैश्विक आयाम प्राप्त कर लिया है। नीचे दिए गए कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिए।
- (a)केवल 1
- (b)केवल 2
- (c)1 और 2 दोनों
- (d)न तो 1 और न ही 2
सही उत्तर — C, (c) 1 और 2 दोनों — दोनों कथन वैश्वीकरण के आर्थिक पक्ष की दो अलग-अलग, पर समान रूप से स्थापित, विशेषताएँ बताते हैं। कथन 1 मुद्रा के पक्ष की बात करता है। वैश्वीकरण के साथ मुद्राओं का प्रसार अपनी जारीकर्ता सीमाओं से बहुत आगे चला गया है — अमेरिकी डॉलर और यूरो अपने घरेलू क्षेत्रों के बाहर लेन-देन, अनुबंधों और भंडारों में व्यापक रूप से प्रयोग होते हैं, और उन्हीं के आसपास विदेशी मुद्रा तथा यूरो-मुद्रा के बड़े बाज़ार खड़े हुए हैं। इसके साथ इलेक्ट्रॉनिक या डिजिटल रूप में रखी और चुकाई जाने वाली राशि का प्रचलन बढ़ा है, और वैश्विक कार्ड नेटवर्क ने यह संभव कर दिया है कि एक देश में जारी कार्ड दूसरे देश में स्वीकार हो जाए। इसलिए कथन 1 सही है। कथन 2 पूँजी बाज़ार के पक्ष की बात करता है। स्क्रीन-आधारित और इलेक्ट्रॉनिक व्यापार आने के बाद प्रतिभूति बाज़ार राष्ट्रीय खाँचों में नहीं रह गए : समय-मंडलों के क्रम में व्यापार टोक्यो से लंदन और फिर न्यूयॉर्क की ओर बढ़ता है, इसलिए किसी न किसी बड़े बाज़ार में सौदे लगभग पूरे दिन चलते रहते हैं। इसके साथ कंपनियों का एक से अधिक देशों के बाज़ारों में सूचीबद्ध होना, निक्षेपागार रसीदों के माध्यम से विदेशों से पूँजी जुटाना, और विदेशी पोर्टफ़ोलियो निवेश का घरेलू बाज़ारों में आना-जाना — तीनों ने प्रतिभूति बाज़ार को सचमुच वैश्विक आयाम दे दिया है। इसलिए कथन 2 भी सही है। दोनों सही हैं, इसलिए उत्तर 'दोनों' है। दो भाषा-संबंधी बातें ध्यान देने योग्य हैं, क्योंकि दोनों स्तंभों में शब्दों का बाँटा अलग है। अंग्रेज़ी स्तंभ में 'trans-border' केवल मुद्राओं के साथ लगा है, जबकि हिन्दी में 'सीमा-पार' पूरे प्रसार के साथ जुड़ता है। और अंग्रेज़ी का 'round-the-world trading' — अर्थात् वह व्यापार जो पृथ्वी का चक्कर लगाता चलता है — हिन्दी में 'संपूर्ण विश्व में' बनकर वाक्य के आरंभ में चला गया है, जिससे घड़ी के साथ चलने वाला वह भाव कुछ मंद पड़ जाता है। कथनों का सही-ग़लत होना इससे नहीं बदलता।
- (a)केवल 1 — यह विकल्प कथन 2 को अस्वीकार करता है, अर्थात् यह मानता है कि प्रतिभूति बाज़ार अब भी राष्ट्रीय सीमाओं में बँधे हुए हैं। यह आज की स्थिति के विरुद्ध है। स्क्रीन-आधारित व्यापार ने भौतिक सौदा-कक्ष की आवश्यकता ही समाप्त कर दी, जिससे कोई भी निवेशक कहीं से भी सौदा कर सकता है; कंपनियाँ एक से अधिक देशों के बाज़ारों में सूचीबद्ध होती हैं; और भारतीय कंपनियाँ 1990 के दशक से निक्षेपागार रसीदों के माध्यम से विदेशी बाज़ारों से पूँजी जुटाती रही हैं। इसके साथ विदेशी पोर्टफ़ोलियो निवेश का प्रवाह घरेलू सूचकांकों को रोज़ प्रभावित करता है। इस वैश्विक जुड़ाव का उल्टा पक्ष भी सच है और उसे जानना उपयोगी है : जुड़े हुए बाज़ार झटके भी तेज़ी से एक-दूसरे तक पहुँचा देते हैं, जैसा 2008 के वैश्विक वित्तीय संकट में दिखा। पर यह कथन 2 को ग़लत नहीं करता, बल्कि उसी को और पुष्ट करता है।
- (b)केवल 2 — यह विकल्प कथन 1 को अस्वीकार करता है, प्रायः इस संदेह से कि 'सीमा-पार मुद्रा' जैसी कोई चीज़ होती ही नहीं, क्योंकि हर देश की अपनी मुद्रा होती है और वही उसके यहाँ विधिमान्य होती है। कथन का दावा यह नहीं है कि विधिमान्यता बदल गई; दावा यह है कि मुद्राओं, डिजिटल रूप में रखी राशि और वैश्विक कार्डों का प्रसार सीमाओं के पार बहुत बढ़ गया है — और यह प्रत्यक्ष रूप से सही है। अमेरिकी डॉलर अपनी सीमाओं के बाहर व्यापार-अनुबंधों, विदेशी मुद्रा भंडारों और अनेक देशों के दैनिक लेन-देन में चलता है; वैश्विक कार्ड नेटवर्क सीमापार भुगतान को सामान्य बना चुके हैं; और डिजिटल रूप में मूल्य रखने तथा चुकाने का प्रश्न अब केंद्रीय बैंकों की नीति का विषय भी बन गया है, जिसके अंतर्गत भारतीय रिज़र्व बैंक ने डिजिटल रुपये के प्रायोगिक कार्यक्रम चलाए हैं। इसलिए कथन 1 को छोड़ना उचित नहीं।
- (d)न तो 1 और न ही 2 — यह विकल्प दोनों कथनों को एक साथ ठुकराता है, और ऐसा प्रायः इसलिए होता है कि पाठक वैश्वीकरण के बारे में अपनी राय को कथनों के सही-ग़लत होने के साथ मिला देता है। यहाँ ध्यान देने की बात यह है कि दोनों कथन वर्णनात्मक हैं, मूल्यांकनात्मक नहीं — वे यह नहीं कहते कि यह प्रसार अच्छा हुआ या बुरा, केवल यह कहते हैं कि हुआ। कथन-आधारित प्रश्नों में यह अनुशासन बहुत काम आता है : पहले पूछिए कि कथन तथ्य बता रहा है या मत, और फिर तथ्य को उसी कसौटी पर परखिए। वैश्वीकरण के आलोचनात्मक पक्ष अपनी जगह पूरी तरह वैध हैं — असमानता, नीति-स्वायत्तता का सिकुड़ना, संकट का तेज़ी से फैलना — पर वे इन दोनों कथनों के तथ्य को ग़लत नहीं ठहराते, क्योंकि वे उसी बढ़े हुए जुड़ाव को मानकर ही चलते हैं।
वैश्वीकरण का अर्थ है देशों की अर्थव्यवस्थाओं, समाजों और संस्कृतियों का बढ़ता हुआ पारस्परिक जुड़ाव, जो वस्तुओं, सेवाओं, पूँजी, प्रौद्योगिकी, सूचना और लोगों के सीमा-पार प्रवाह से बनता है। इसके आर्थिक पक्ष को चार धाराओं में देखा जाता है : व्यापार का उदारीकरण, पूँजी का सीमा-पार प्रवाह, प्रौद्योगिकी का हस्तांतरण और श्रम की गतिशीलता। इस प्रश्न के दोनों कथन इन्हीं में से पूँजी और मुद्रा वाली धारा पर हैं। मुद्रा की ओर देखें तो वैश्वीकरण ने तीन चीज़ें एक साथ बढ़ाई हैं — कुछ मुद्राओं का अपनी सीमाओं के बाहर प्रयोग, मूल्य के इलेक्ट्रॉनिक या डिजिटल रूपों का प्रचलन, और भुगतान के वैश्विक नेटवर्क। बाज़ार की ओर देखें तो स्क्रीन-आधारित व्यापार, बहु-देशीय सूचीबद्धता, निक्षेपागार रसीदें और विदेशी पोर्टफ़ोलियो निवेश ने प्रतिभूति बाज़ारों को आपस में जोड़ दिया है। भारत के लिए यह यात्रा 1991 के आर्थिक सुधारों से तेज़ हुई, जिनके तीन स्तंभ उदारीकरण, निजीकरण और वैश्वीकरण कहे जाते हैं।
इस जुड़ाव के दो पक्ष हैं और परीक्षा दोनों पूछती है। एक ओर पूँजी तक पहुँच सस्ती और आसान हुई, कंपनियों को घरेलू बाज़ार से बड़ा निवेशक-वर्ग मिला, और भुगतान की लागत तथा समय घटा। दूसरी ओर जुड़े हुए बाज़ार झटकों को भी तेज़ी से बाँटते हैं, इसलिए किसी एक बड़े बाज़ार की उथल-पुथल दूसरे देशों की मुद्रा और सूचकांक को उसी दिन प्रभावित कर देती है। इसी कारण पूँजी खाते के प्रबंधन, विदेशी पोर्टफ़ोलियो निवेश के नियमन और विदेशी मुद्रा भंडार रखने की नीतियाँ महत्त्वपूर्ण मानी जाती हैं। एक भेद यहीं स्पष्ट कर लीजिए, क्योंकि वह बार-बार पूछा जाता है : विदेशी प्रत्यक्ष निवेश दीर्घकालिक होता है और उसमें प्रबंधन में हिस्सेदारी आती है, जबकि विदेशी पोर्टफ़ोलियो निवेश प्रतिभूतियों में होता है, प्रबंधन-नियंत्रण नहीं देता, और अपेक्षाकृत सुगमता से बाहर निकल सकता है — इसीलिए उसे चंचल पूँजी भी कहा जाता है। छपाई की एक छोटी बात : इस प्रश्न में 'बाजार' बिना नुक़्ते के छपा है, जबकि इसी प्रश्नपत्र में अन्यत्र 'हज़ार' नुक़्ते के साथ है, अर्थात् पुस्तिका नुक़्ते के प्रयोग में एकरूप नहीं है।
- कथन 1 और कथन 2 दोनों सही हैं, इसलिए कुंजी 'दोनों' पर जाती है।
- वैश्वीकरण के आर्थिक पक्ष की चार धाराएँ : व्यापार, पूँजी, प्रौद्योगिकी और श्रम का सीमा-पार प्रवाह।
- मुद्रा-पक्ष : कुछ मुद्राओं का अपनी जारीकर्ता सीमाओं से बहुत आगे प्रयोग, इलेक्ट्रॉनिक या डिजिटल रूप में रखी और चुकाई जाने वाली राशि का प्रचलन, तथा वैश्विक कार्ड नेटवर्क।
- बाज़ार-पक्ष : स्क्रीन-आधारित इलेक्ट्रॉनिक व्यापार, समय-मंडलों के क्रम में लगभग निरंतर सौदे, बहु-देशीय सूचीबद्धता, निक्षेपागार रसीदें और विदेशी पोर्टफ़ोलियो निवेश।
- भारत में यह यात्रा 1991 के सुधारों से तेज़ हुई, जिनके तीन स्तंभ उदारीकरण, निजीकरण और वैश्वीकरण कहे जाते हैं।
- विदेशी प्रत्यक्ष निवेश दीर्घकालिक होता है और प्रबंधन में हिस्सेदारी देता है; विदेशी पोर्टफ़ोलियो निवेश प्रतिभूतियों में होता है, नियंत्रण नहीं देता और सुगमता से बाहर निकल सकता है।
- जुड़े हुए बाज़ार लाभ के साथ जोखिम भी बाँटते हैं — 2008 का वैश्विक वित्तीय संकट इसका सबसे बड़ा उदाहरण है।
- दोनों स्तंभों में शब्दों का बाँटा अलग है : अंग्रेज़ी में 'trans-border' केवल मुद्राओं के साथ है और 'round-the-world trading' एक ही पद है, जबकि हिन्दी में 'सीमा-पार' पूरे प्रसार से जुड़ता है और 'संपूर्ण विश्व में' वाक्य के आरंभ में चला गया है।
- वैश्वीकरण पर अपनी राय को कथन के सही-ग़लत होने से मिला देना; दोनों कथन वर्णनात्मक हैं, मूल्यांकनात्मक नहीं।
- 'सीमा-पार मुद्रा' को विधिमान्यता का दावा समझ लेना; कथन केवल प्रसार की बात कर रहा है।
- प्रतिभूति बाज़ार को अब भी राष्ट्रीय खाँचे में मान लेना; बहु-देशीय सूचीबद्धता और पोर्टफ़ोलियो प्रवाह इसे काटते हैं।
- विदेशी प्रत्यक्ष निवेश और विदेशी पोर्टफ़ोलियो निवेश को एक मान लेना; पहला नियंत्रण देता है, दूसरा नहीं।
- 'संपूर्ण विश्व में' पढ़कर यह मान लेना कि कथन हर देश के बारे में सार्वभौमिक दावा कर रहा है; वह इलेक्ट्रॉनिक व्यापार के विश्वव्यापी फैलाव की बात कर रहा है।
वैश्वीकरण से प्रश्न तीन ढंग से आते हैं। पहला यही — दो या तीन वर्णनात्मक कथन देकर पूछना कि कौन सही है, जहाँ कथन प्रायः पाठ्यपुस्तक जैसी भाषा में होते हैं और उन्हें तथ्य की तरह परखना होता है, राय की तरह नहीं। दूसरा ढंग परिभाषा और भेद का है : वैश्वीकरण, उदारीकरण और निजीकरण में अंतर, या विदेशी प्रत्यक्ष निवेश और पोर्टफ़ोलियो निवेश में अंतर। तीसरा ढंग संस्थागत है : विश्व व्यापार संगठन, अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष और विश्व बैंक की भूमिका, या भारत में प्रतिभूति बाज़ार के नियामक की भूमिका। तीनों में एक ही तैयारी काम आती है : वैश्वीकरण के चार प्रवाहों की सूची बनाइए और हर प्रवाह के सामने दो भारतीय उदाहरण लिख लीजिए, ताकि कथन पढ़ते ही उसका ठिकाना पहचान में आ जाए।
इस प्रश्न से सीधे संबंधित कोई पूर्व PYQ उपलब्ध नहीं।
- practice — not a real PYQ
वैश्वीकरण के आर्थिक आयाम में सामान्यतः किन प्रवाहों को गिना जाता है?
- (a)केवल वस्तुओं का व्यापार
- (b)वस्तुओं और सेवाओं का व्यापार, पूँजी, प्रौद्योगिकी तथा श्रम का सीमा-पार प्रवाह
- (c)केवल विदेशी प्रत्यक्ष निवेश
- (d)केवल विदेशी मुद्रा भंडार का संचय
उत्तर(b) वस्तुओं और सेवाओं का व्यापार, पूँजी, प्रौद्योगिकी तथा श्रम का सीमा-पार प्रवाह
- practice — not a real PYQ
विदेशी प्रत्यक्ष निवेश और विदेशी पोर्टफ़ोलियो निवेश में मुख्य अंतर क्या है?
- (a)पोर्टफ़ोलियो निवेश में प्रबंधन-नियंत्रण मिलता है, प्रत्यक्ष निवेश में नहीं
- (b)प्रत्यक्ष निवेश दीर्घकालिक होता है और प्रबंधन में हिस्सेदारी देता है, जबकि पोर्टफ़ोलियो निवेश प्रतिभूतियों में होता है और अपेक्षाकृत सुगमता से बाहर निकल सकता है
- (c)दोनों में कोई अंतर नहीं है
- (d)पोर्टफ़ोलियो निवेश केवल सरकारी प्रतिभूतियों में ही किया जा सकता है
उत्तर(b) प्रत्यक्ष निवेश दीर्घकालिक होता है और प्रबंधन में हिस्सेदारी देता है, जबकि पोर्टफ़ोलियो निवेश प्रतिभूतियों में होता है और अपेक्षाकृत सुगमता से बाहर निकल सकता है