'मानव विकास' के बारे में, निम्नलिखित में से कौन-सा एक कथन सही नहीं है?
- (a)मानव विकास के आय उपागम की आधारभूत संकल्पना यह है कि आय का स्तर व्यक्ति द्वारा उपभोग की जाने वाली स्वतंत्रता के स्तर को प्रतिबिंबित करता है।
- (b)मानव विकास का मूल आवश्यकताओं का उपागम प्रारंभ में अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन (ILO) द्वारा प्रस्तावित किया गया था।
- (c)मानव गरीबी सूचकांक, मानव विकास की कमियों को मापता है।
- (d)मानव विकास के कल्याण उपागम के अंतर्गत सरकार निजी उद्यमियों को कल्याण पर व्यय को अधिकतम करने के लिए संरक्षण और प्रोत्साहन देती है।
सही उत्तर — D, (d) मानव विकास के कल्याण उपागम के अंतर्गत सरकार निजी उद्यमियों को कल्याण पर व्यय को अधिकतम करने के लिए संरक्षण और प्रोत्साहन देती है — यही वह कथन है जो सही नहीं है। पूछ नकारात्मक है और पुस्तिका में 'नहीं' मोटे अक्षरों में छपा है, इसलिए खोजना उस एक कथन को है जो ग़लत हो। यहाँ काम आसान इसलिए हो जाता है कि चारों कथन कक्षा 12 की मानव भूगोल की NCERT पुस्तक के मानव विकास वाले अध्याय से, लगभग शब्दशः, उठाए गए हैं — और उनमें से एक में जान-बूझकर एक शब्द बदल दिया गया है। कल्याण उपागम पुस्तक में इस प्रकार है : यह उपागम मनुष्यों को विकास की सारी गतिविधियों का लाभार्थी या लक्ष्य मानता है; यह शिक्षा, स्वास्थ्य और सुविधाओं पर अधिक सरकारी व्यय की वकालत करता है; लोग विकास में भागीदार नहीं, केवल निष्क्रिय प्राप्तकर्ता होते हैं; और कल्याण पर व्यय को अधिकतम करके मानव विकास का स्तर बढ़ाना सरकार का उत्तरदायित्व है। अब विकल्प (d) को उसके सामने रखिए। वहाँ कर्ता बदल दिया गया है : कल्याण पर व्यय अधिकतम करने का काम सरकार का नहीं, निजी उद्यमियों का बता दिया गया है, और सरकार की भूमिका उन्हें संरक्षण तथा प्रोत्साहन देने तक सीमित कर दी गई है। यह कल्याण उपागम के मूल तर्क को ही उलट देता है, क्योंकि उस उपागम की पूरी पहचान ही यह है कि व्यय सरकार करती है और लोग उसे पाते हैं। इसीलिए यही कथन सही नहीं है और यही उत्तर है। एक और बात ध्यान देने योग्य है : निजी उद्यमियों को संरक्षण और प्रोत्साहन देना कल्याण उपागम की नहीं, किसी वृद्धि-केंद्रित या बाज़ार-केंद्रित नीति की भाषा है। कल्याण उपागम इसके ठीक उलट, राज्य के सीधे व्यय पर टिका है — और उसकी सबसे बड़ी आलोचना भी यही रही है कि वह लोगों को कर्ता नहीं, प्राप्तकर्ता बना देता है। इसी आलोचना से आगे चलकर अमर्त्य सेन का क्षमता उपागम निकला, जो मानव विकास को स्वास्थ्य, शिक्षा और संसाधनों तक पहुँच में मनुष्य की क्षमताओं के निर्माण से जोड़ता है।
- (a)मानव विकास के आय उपागम की आधारभूत संकल्पना यह है कि आय का स्तर व्यक्ति द्वारा उपभोग की जाने वाली स्वतंत्रता के स्तर को प्रतिबिंबित करता है। — यह कथन सही है, इसलिए नकारात्मक पूछ का उत्तर नहीं बनता। आय उपागम मानव विकास के सबसे पुराने उपागमों में गिना जाता है और उसकी मूल बात ठीक यही है : मानव विकास को आय से जोड़कर देखा जाता है, और यह माना जाता है कि आय का स्तर उस स्वतंत्रता के स्तर को प्रतिबिंबित करता है जिसका उपभोग व्यक्ति करता है — जितनी अधिक आय, उतना अधिक मानव विकास। पाठ्यपुस्तक का वाक्य लगभग यही है, इसलिए यहाँ कोई शब्द बदला नहीं गया। तर्क को समझ लीजिए तो कथन और भी स्पष्ट हो जाता है : आय अपने-आप में लक्ष्य नहीं मानी जाती, उसे इसलिए महत्त्व दिया जाता है कि वह विकल्प चुनने की गुंजाइश देती है — भोजन, शिक्षा, चिकित्सा और अवकाश में से चुनने की। इसी उपागम की सीमा यह है कि आय का बढ़ना अपने-आप स्वास्थ्य या शिक्षा में नहीं बदलता, और यही सीमा आगे के उपागमों को जन्म देती है।
- (b)मानव विकास का मूल आवश्यकताओं का उपागम प्रारंभ में अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन (ILO) द्वारा प्रस्तावित किया गया था। — यह कथन भी सही है। मूल आवश्यकताओं का उपागम आरंभ में अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन द्वारा ही प्रस्तावित किया गया था, और उसमें छह मूल आवश्यकताएँ गिनाई गई थीं — स्वास्थ्य, शिक्षा, भोजन, जल आपूर्ति, स्वच्छता और आवास। इस उपागम की पहचान यह है कि इसमें मानवीय विकल्पों का प्रश्न छोड़ दिया जाता है और ज़ोर इस पर रहता है कि निर्धारित वर्गों तक ये मूल आवश्यकताएँ पहुँच जाएँ। यही कथन इसलिए भी पूछने योग्य है कि इसमें संस्था का नाम है और संस्थाओं के नाम बदलकर पूछना परीक्षा की पुरानी चाल है — यहाँ ILO के स्थान पर UNDP, विश्व बैंक या WHO रखा जा सकता था। ध्यान रखिए कि UNDP का संबंध मानव विकास रिपोर्ट और मानव विकास सूचकांक से है, मूल आवश्यकताओं के उपागम के प्रस्ताव से नहीं। इस प्रश्न में यह नाम बदला नहीं गया है, इसलिए कथन सही है।
- (c)मानव गरीबी सूचकांक, मानव विकास की कमियों को मापता है। — यह कथन भी सही है। मानव गरीबी सूचकांक मानव विकास सूचकांक से जुड़ा हुआ है और वह मानव विकास में रह गई कमी को, अर्थात् उसकी न्यूनता को मापता है — जबकि मानव विकास सूचकांक यह मापता है कि उपलब्धि कितनी हुई। दोनों को एक ही सिक्के के दो पहलू मानिए : एक बताता है कि कितना पा लिया गया, दूसरा कि कितना पाना बाक़ी है। एक बात यहीं जोड़ लीजिए, क्योंकि वह इस सूचकांक की आज की स्थिति है : मानव गरीबी सूचकांक 1997 की मानव विकास रिपोर्ट में लाया गया था और 2010 की रिपोर्ट में उसकी जगह बहुआयामी गरीबी सूचकांक ने ले ली, जिसे ऑक्सफ़ोर्ड के गरीबी एवं मानव विकास पहल तथा UNDP ने मिलकर विकसित किया। यानी परिभाषा वही रही जो कथन में है, पर आज प्रकाशित होने वाला सूचकांक बहुआयामी गरीबी सूचकांक है। प्रश्न पाठ्यपुस्तक की परिभाषा पूछ रहा है, और उस कसौटी पर यह कथन सही है।
मानव विकास को समझने के चार उपागम पाठ्यपुस्तक में एक साथ दिए गए हैं और यह प्रश्न उन्हीं में से तीन पर टिका है। आय उपागम सबसे पुराना है और मानव विकास को आय से जोड़ता है, इस विचार पर कि आय का स्तर व्यक्ति की स्वतंत्रता के स्तर को प्रतिबिंबित करता है। कल्याण उपागम मनुष्यों को विकास का लाभार्थी या लक्ष्य मानता है, शिक्षा-स्वास्थ्य-सुविधाओं पर अधिक सरकारी व्यय की वकालत करता है, और लोगों को भागीदार नहीं बल्कि निष्क्रिय प्राप्तकर्ता मानता है; इसमें कल्याण पर व्यय को अधिकतम करना सरकार का उत्तरदायित्व है। मूल आवश्यकताओं का उपागम अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन से आया और छह मूल आवश्यकताओं — स्वास्थ्य, शिक्षा, भोजन, जल आपूर्ति, स्वच्छता और आवास — की पूर्ति पर ज़ोर देता है, मानवीय विकल्पों के प्रश्न को छोड़कर। क्षमता उपागम अमर्त्य सेन से जुड़ा है और स्वास्थ्य, शिक्षा तथा संसाधनों तक पहुँच के क्षेत्रों में मानवीय क्षमताओं का निर्माण ही उसकी कुंजी है। इन्हीं के साथ मानव विकास के चार स्तंभ भी याद रखिए — समता, सतत्पोषणीयता, उत्पादकता और सशक्तीकरण।
मापन की ओर से देखें तो मानव विकास सूचकांक देशों को तीन क्षेत्रों में उनके प्रदर्शन पर श्रेणीबद्ध करता है — स्वास्थ्य, शिक्षा और संसाधनों तक पहुँच। स्वास्थ्य के लिए जन्म के समय जीवन प्रत्याशा ली जाती है, ज्ञान तक पहुँच के लिए शिक्षा से जुड़े सूचक, और संसाधनों तक पहुँच क्रय शक्ति के रूप में डॉलर में मापी जाती है। अंक शून्य और एक के बीच होता है और जो अंक एक के जितना निकट हो, मानव विकास का स्तर उतना ऊँचा। पुस्तक स्वयं यह चेतावनी भी देती है कि यह सूचकांक सबसे विश्वसनीय माप नहीं है, क्योंकि वह वितरण के बारे में कुछ नहीं बताता — और यही कमी मानव गरीबी सूचकांक तथा बाद में बहुआयामी गरीबी सूचकांक के पीछे का कारण है। ऐतिहासिक पृष्ठभूमि भी उपयोगी है : पहली मानव विकास रिपोर्ट 1990 में आई और उसी में मानव विकास सूचकांक प्रस्तुत हुआ; उसके पीछे महबूब उल हक़ का नेतृत्व था और वैचारिक आधार अमर्त्य सेन के क्षमता-संबंधी काम से आया। परीक्षा की दृष्टि से इस प्रश्न की बनावट सबसे अधिक सिखाने वाली है : चार में से तीन कथन पाठ्यपुस्तक के वाक्य हैं और चौथे में केवल कर्ता बदल दिया गया है, इसलिए उत्तर तक पहुँचने का रास्ता यह पहचानना है कि किस कथन में काम करने वाला बदल गया।
- पूछ नकारात्मक है और पुस्तिका में 'नहीं' मोटे अक्षरों में छपा है — खोजना उस कथन को है जो सही नहीं है।
- चारों कथन कक्षा 12 की मानव भूगोल की NCERT पुस्तक के मानव विकास वाले अध्याय से आते हैं, और केवल कल्याण उपागम वाले कथन में कर्ता बदला गया है।
- कल्याण उपागम में कल्याण पर व्यय को अधिकतम करके मानव विकास बढ़ाना सरकार का उत्तरदायित्व है; लोग भागीदार नहीं, निष्क्रिय प्राप्तकर्ता होते हैं।
- आय उपागम सबसे पुराने उपागमों में है और मानता है कि आय का स्तर व्यक्ति द्वारा उपभोग की जाने वाली स्वतंत्रता के स्तर को प्रतिबिंबित करता है।
- मूल आवश्यकताओं का उपागम आरंभ में अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन ने प्रस्तावित किया और उसमें छह आवश्यकताएँ गिनाई गईं — स्वास्थ्य, शिक्षा, भोजन, जल आपूर्ति, स्वच्छता और आवास।
- क्षमता उपागम अमर्त्य सेन से जुड़ा है — स्वास्थ्य, शिक्षा और संसाधनों तक पहुँच में मानवीय क्षमताओं का निर्माण।
- मानव गरीबी सूचकांक मानव विकास की कमी को मापता है; वह 1997 की मानव विकास रिपोर्ट में आया और 2010 में उसकी जगह बहुआयामी गरीबी सूचकांक ने ले ली।
- मानव विकास के चार स्तंभ : समता, सतत्पोषणीयता, उत्पादकता और सशक्तीकरण।
- पहली मानव विकास रिपोर्ट 1990 में प्रकाशित हुई और उसी में मानव विकास सूचकांक प्रस्तुत किया गया।
- नकारात्मक पूछ भूलकर सबसे सही दिखने वाला कथन चुन लेना; यहाँ खोजना उसे है जो ग़लत हो।
- कल्याण उपागम में कर्ता के बदलाव को न पकड़ पाना; पाठ्यपुस्तक में व्यय सरकार करती है, विकल्प में वह काम निजी उद्यमियों को सौंप दिया गया है।
- मूल आवश्यकताओं के उपागम को UNDP या विश्व बैंक से जोड़ देना; वह अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन से आया है।
- मानव गरीबी सूचकांक और मानव विकास सूचकांक को एक मान लेना; एक कमी मापता है, दूसरा उपलब्धि।
- क्षमता उपागम और कल्याण उपागम को मिला देना; पहला लोगों को कर्ता मानता है, दूसरा प्राप्तकर्ता।
मानव विकास से प्रश्न चार ढंग से आते हैं। पहला यही — चार कथन देकर पूछना कि कौन सही नहीं है, जहाँ कथन पाठ्यपुस्तक से उठाए जाते हैं और किसी एक में एक शब्द या कर्ता बदल दिया जाता है; ऐसे प्रश्न में सबसे तेज़ रास्ता यह पूछना है कि हर कथन में काम कौन कर रहा है। दूसरा युग्म वाला है : उपागम और उससे जुड़ी संस्था या व्यक्ति का मिलान, जहाँ अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन, अमर्त्य सेन, महबूब उल हक़ और UNDP बार-बार लौटते हैं। तीसरा सूचकांक वाला है : किस सूचकांक में कौन-से आयाम हैं, किसने और कब बनाया, और कौन-सा किसकी जगह आया। चौथा संकल्पना वाला है : मानव विकास और आर्थिक वृद्धि का भेद, या चार स्तंभों में से किसी एक की परिभाषा। इन सबके लिए एक ही पृष्ठ पर्याप्त है, जिसमें चार उपागम, चार स्तंभ, तीन सूचकांक और चार नाम एक साथ लिख लिए जाएँ।
इस प्रश्न से सीधे संबंधित कोई पूर्व PYQ उपलब्ध नहीं।
- practice — not a real PYQ
मानव विकास का क्षमता (सामर्थ्य) उपागम मुख्यतः किससे जुड़ा हुआ है?
- (a)महबूब उल हक़
- (b)अमर्त्य सेन
- (c)अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन
- (d)गुन्नार मिर्डाल
उत्तर(b) अमर्त्य सेन
- practice — not a real PYQ
मानव विकास की संकल्पना जिन चार स्तंभों पर टिकी बताई जाती है, वे कौन-से हैं?
- (a)समता, सतत्पोषणीयता, उत्पादकता और सशक्तीकरण
- (b)स्वास्थ्य, शिक्षा, आय और रोज़गार
- (c)स्वतंत्रता, समता, न्याय और बंधुत्व
- (d)भोजन, आवास, स्वच्छता और जल आपूर्ति
उत्तर(a) समता, सतत्पोषणीयता, उत्पादकता और सशक्तीकरण