निम्नलिखित में से कौन-कौन से व्यय भारत की संचित निधि पर प्रभारित होते हैं? 1. ऋण प्रभार, जिनके लिए भारत सरकार दायी है 2. राष्ट्रपति की परिलब्धियाँ और भत्ते तथा उनके कार्यालय से संबंधित अन्य खर्च 3. उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीशों को देय या उनसे संबंधित वेतन, भत्ते और पेंशन 4. राज्य सभा के सभापति और उपसभापति तथा लोक सभा के अध्यक्ष और उपाध्यक्ष के वेतन और भत्ते नीचे दिए गए कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिए।
- (a)केवल 1 और 2
- (b)1, 2, 3 और 4
- (c)केवल 2, 3 और 4
- (d)केवल 3 और 4
सही उत्तर — B, (b) 1, 2, 3 और 4 — चारों कथन भारत के संविधान के अनुच्छेद 112(3) की सूची से ही उठाए गए हैं, इसलिए चारों भारित व्यय हैं। अनुच्छेद 112(3) उन व्ययों को गिनाता है जो भारत की संचित निधि पर 'भारित' होते हैं। वह सूची इस प्रकार है : राष्ट्रपति की परिलब्धियाँ और भत्ते तथा उनके कार्यालय से संबंधित अन्य व्यय; राज्य सभा के सभापति और उपसभापति तथा लोक सभा के अध्यक्ष और उपाध्यक्ष के वेतन और भत्ते; वे ऋण प्रभार जिनके लिए भारत सरकार दायी है, जिनमें ब्याज, निक्षेप निधि प्रभार, मोचन प्रभार तथा ऋण उगाहने और उसकी सेवा एवं मोचन से संबंधित अन्य व्यय शामिल हैं; उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीशों को देय या उनसे संबंधित वेतन, भत्ते और पेंशन तथा उच्च न्यायालयों के न्यायाधीशों की पेंशन; भारत के नियंत्रक-महालेखापरीक्षक का वेतन, भत्ते और पेंशन; किसी न्यायालय या माध्यस्थम् अधिकरण के निर्णय, डिक्री या पंचाट की तुष्टि के लिए अपेक्षित राशियाँ; और कोई अन्य व्यय जो संविधान द्वारा या संसद द्वारा विधि बनाकर भारित घोषित किया जाए। अब प्रश्न के चारों कथन इस सूची पर रखिए। कथन 1 ऋण प्रभार है, कथन 2 राष्ट्रपति की परिलब्धियाँ, कथन 3 उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीशों के वेतन-भत्ते-पेंशन, और कथन 4 दोनों सदनों के पीठासीन अधिकारियों के वेतन-भत्ते। चारों सीधे सूची में हैं, इसलिए कोई भी 'केवल' वाला विकल्प नहीं चल सकता। भारित व्यय का अर्थ भी समझ लीजिए, क्योंकि प्रश्न इसी शब्द पर टिका है। अनुच्छेद 113(1) के अनुसार भारित व्यय के प्राक्कलन संसद के मतदान के लिए नहीं रखे जाते — उन पर चर्चा हो सकती है, पर मत नहीं डाला जाता। शेष व्यय अनुदान की माँगों के रूप में लोक सभा के समक्ष रखा जाता है, जो उसे स्वीकार कर सकती है, अस्वीकार कर सकती है या घटा सकती है। यह व्यवस्था क्यों है, यह याद रखने से सूची अपने-आप याद रह जाती है। जिन पदों की स्वतंत्रता बहुमत के दबाव से बचानी है — न्यायाधीश, नियंत्रक-महालेखापरीक्षक, दोनों सदनों के पीठासीन अधिकारी, राष्ट्रपति — उनका वेतन मतदान से बाहर रखा गया; और जिन दायित्वों का चुकाया जाना देश की साख का प्रश्न है — ऋण प्रभार और न्यायालय के निर्णय — उन्हें भी मतदान से बाहर रखा गया।
- (a)केवल 1 और 2 — यह विकल्प कथन 3 और 4 को छोड़ देता है, अर्थात् उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीशों तथा दोनों सदनों के पीठासीन अधिकारियों के वेतन-भत्ते को — और ठीक यही दोनों वे मदें हैं जिनके लिए भारित व्यय की व्यवस्था सबसे अधिक अर्थपूर्ण है। न्यायाधीशों का वेतन इसलिए भारित रखा गया कि कार्यपालिका या बहुमत उनकी परिलब्धियों पर मतदान का दबाव न बना सके; न्यायिक स्वतंत्रता की जो कड़ियाँ गिनाई जाती हैं — नियुक्ति की प्रक्रिया, कार्यकाल की सुरक्षा, हटाने की कठिन विधि — उनमें यह भी एक है। इसी तर्क से पीठासीन अधिकारियों का वेतन भी भारित है, क्योंकि सदन का अध्यक्ष उसी सदन के बहुमत का वेतन-भोगी नहीं दिखना चाहिए। दोनों अनुच्छेद 112(3) में नाम लेकर गिनाए गए हैं, इसलिए इन्हें छोड़ना पाठ के विरुद्ध है। यह विकल्प उस अभ्यर्थी के लिए है जो केवल राष्ट्रपति और ऋण को याद रखता है और मानता है कि वेतन तो सब मतदान से ही पास होते हैं।
- (c)केवल 2, 3 और 4 — यह विकल्प केवल कथन 1 — ऋण प्रभार — को बाहर करता है, और यही इस प्रश्न का सबसे सुगढ़ काँटा है, क्योंकि शेष तीनों 'पदाधिकारियों के वेतन' जैसे दिखते हैं और ऋण उनसे अलग जाति का लगता है। पर अनुच्छेद 112(3) में ऋण प्रभार स्पष्ट रूप से भारित हैं, और वह मद सबसे विस्तृत भी है : उसमें ब्याज, निक्षेप निधि प्रभार और मोचन प्रभार तो हैं ही, ऋण उगाहने तथा ऋण की सेवा और मोचन से संबंधित अन्य व्यय भी शामिल हैं। कारण भी उतना ही ठोस है : यदि ब्याज का भुगतान हर वर्ष मतदान पर निर्भर होता, तो सरकार की साख ही संदिग्ध हो जाती और उधार लेना महँगा हो जाता। व्यावहारिक दृष्टि से भी यह ध्यान देने योग्य है कि भारित व्यय का सबसे बड़ा हिस्सा ब्याज-भुगतान ही होता है, इसलिए इसे भूल जाना केवल एक कथन भूलना नहीं है।
- (d)केवल 3 और 4 — यह विकल्प कथन 1 और 2 दोनों को छोड़ता है, अर्थात् ऋण प्रभार और राष्ट्रपति की परिलब्धियाँ — और राष्ट्रपति वाली मद तो अनुच्छेद 112(3) की सूची में सबसे पहले ही आती है। ध्यान दीजिए कि कथन 2 केवल वेतन तक सीमित नहीं है : वह 'परिलब्धियाँ और भत्ते तथा उनके कार्यालय से संबंधित अन्य खर्च' कहता है, और संविधान का पाठ भी यही कहता है, इसलिए राष्ट्रपति सचिवालय का व्यय भी इसी में आता है। यह विकल्प उस अभ्यर्थी के लिए बना है जिसे इतना याद है कि न्यायाधीशों और पीठासीन अधिकारियों का वेतन भारित होता है, पर जिसने सूची का शेष हिस्सा नहीं पढ़ा। ऐसे कूट-आधारित प्रश्नों में सबसे सुरक्षित रास्ता यह है कि पहले हर कथन को अलग-अलग सही या ग़लत ठहराइए और उसके बाद ही विकल्पों की ओर देखिए, क्योंकि विकल्प स्वयं संकेत देकर भटकाते हैं।
भारत सरकार का व्यय बजट में दो भागों में बँटा होता है। भारित व्यय वह है जो संचित निधि पर सीधे भारित होता है और अनुच्छेद 113(1) के अनुसार संसद के मतदान के लिए नहीं रखा जाता, यद्यपि उस पर चर्चा हो सकती है। शेष व्यय अनुदान की माँगों के रूप में केवल लोक सभा के समक्ष रखा जाता है, जो उसे स्वीकार, अस्वीकार या कम कर सकती है। अनुच्छेद 112(3) की सूची के अलावा संविधान अन्यत्र भी कुछ व्ययों को भारित घोषित करता है, और वे इसी सूची के अंतिम खंड 'कोई अन्य व्यय जो संविधान द्वारा भारित घोषित किया जाए' से जुड़ जाते हैं : संघ लोक सेवा आयोग के अध्यक्ष और सदस्यों के वेतन, भत्ते तथा पेंशन अनुच्छेद 322 से; नियंत्रक-महालेखापरीक्षक के कार्यालय का प्रशासनिक व्यय अनुच्छेद 148(6) से; और अनुच्छेद 275(1) के अधीन राज्यों को दी जाने वाली सहायता-अनुदान की राशियाँ, जो उसी अनुच्छेद के शब्दों में भारत की संचित निधि पर भारित होती हैं। राज्यों के लिए इसी की समानांतर व्यवस्था अनुच्छेद 202(3) में है, जहाँ राज्यपाल की परिलब्धियाँ, विधान सभा के अध्यक्ष-उपाध्यक्ष तथा विधान परिषद के सभापति-उपसभापति के वेतन-भत्ते, राज्य के ऋण प्रभार, उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों के वेतन और भत्ते, तथा न्यायालय के निर्णयों की तुष्टि की राशियाँ राज्य की संचित निधि पर भारित हैं।
एक विषमता याद रखने लायक़ है और परीक्षा में बार-बार पूछी जाती है : उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों के वेतन और भत्ते संबंधित राज्य की संचित निधि पर भारित होते हैं, पर उनकी पेंशन भारत की संचित निधि पर। इसका कारण यह है कि एक न्यायाधीश अपने कार्यकाल में एक से अधिक उच्च न्यायालयों में स्थानांतरित हो सकता है, इसलिए पेंशन का भार किसी एक राज्य पर डालना उचित नहीं होता। उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीशों के मामले में वेतन, भत्ते और पेंशन तीनों भारत की संचित निधि पर हैं। एक और भेद जो प्रायः गड़बड़ाता है : राष्ट्रपति और पीठासीन अधिकारियों का वेतन भारित है, पर मंत्रियों का वेतन भारित नहीं — वह मतदान वाले व्यय में आता है, क्योंकि मंत्री कार्यपालिका के सदस्य हैं और संसद के प्रति उत्तरदायी हैं, इसलिए उनके व्यय पर संसद का मत होना ही चाहिए। तीन निधियों का भेद भी इसी के साथ दोहरा लीजिए : संचित निधि अनुच्छेद 266(1) में, लोक लेखा अनुच्छेद 266(2) में, और आकस्मिकता निधि अनुच्छेद 267 में — आकस्मिकता निधि राष्ट्रपति के अधिकार में रहती है और उससे किया गया अग्रिम व्यय बाद में संसद के अनुमोदन से संचित निधि से भरपाई किया जाता है।
- अनुच्छेद 112(3) उन व्ययों को गिनाता है जो भारत की संचित निधि पर भारित हैं, और प्रश्न के चारों कथन इसी सूची से हैं।
- सूची में हैं — राष्ट्रपति की परिलब्धियाँ, भत्ते तथा उनके कार्यालय का अन्य व्यय; दोनों सदनों के पीठासीन और उप-पीठासीन अधिकारियों के वेतन-भत्ते; भारत सरकार के ऋण प्रभार; उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीशों के वेतन, भत्ते और पेंशन तथा उच्च न्यायालयों के न्यायाधीशों की पेंशन; नियंत्रक-महालेखापरीक्षक का वेतन, भत्ते और पेंशन; न्यायालय या माध्यस्थम् अधिकरण के निर्णय की तुष्टि की राशियाँ; और कोई अन्य व्यय जो संविधान या संसद द्वारा भारित घोषित हो।
- ऋण प्रभार में ब्याज, निक्षेप निधि प्रभार, मोचन प्रभार तथा ऋण उगाहने और उसकी सेवा एवं मोचन से जुड़ा अन्य व्यय शामिल है।
- अनुच्छेद 113(1) : भारित व्यय के प्राक्कलन संसद के मतदान के लिए नहीं रखे जाते, यद्यपि उन पर चर्चा हो सकती है।
- संविधान के अन्य भारित व्यय : संघ लोक सेवा आयोग के अध्यक्ष और सदस्यों के वेतन-भत्ते-पेंशन (अनुच्छेद 322), नियंत्रक-महालेखापरीक्षक के कार्यालय का प्रशासनिक व्यय (अनुच्छेद 148(6)), तथा राज्यों को अनुच्छेद 275(1) के अधीन दी जाने वाली सहायता-अनुदान की राशियाँ।
- उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों के वेतन और भत्ते राज्य की संचित निधि पर भारित हैं, पर उनकी पेंशन भारत की संचित निधि पर।
- मंत्रियों का वेतन भारित व्यय नहीं है — वह मतदान वाले व्यय में आता है।
- अनुच्छेद 202(3) राज्यों के लिए यही व्यवस्था करता है, जिसमें राज्यपाल की परिलब्धियाँ और राज्य के ऋण प्रभार भी हैं।
- ऋण प्रभार को साधारण सरकारी व्यय मानकर छोड़ देना; वह अनुच्छेद 112(3) में स्पष्ट रूप से भारित है और भारित व्यय का सबसे बड़ा हिस्सा भी।
- मंत्रियों के वेतन को भी भारित मान लेना; वह मतदान वाले व्यय में आता है।
- उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों के वेतन और पेंशन को एक ही निधि पर मान लेना; वेतन-भत्ते राज्य की संचित निधि पर हैं और पेंशन भारत की संचित निधि पर।
- भारित व्यय को 'चर्चा से भी बाहर' मान लेना; उस पर चर्चा हो सकती है, केवल मतदान नहीं होता।
- कूट देखकर अनुमान लगाना; पहले हर कथन को अलग-अलग परखिए, फिर विकल्पों की ओर देखिए।
संचित निधि और भारित व्यय से प्रश्न चार ढंग से आते हैं। पहला यही — मदों की सूची देकर पूछना कि कौन-कौन सी भारित हैं, जहाँ ऋण प्रभार और मंत्रियों का वेतन सबसे अधिक भ्रम पैदा करते हैं। दूसरा नकारात्मक होता है : कौन-सा व्यय भारित नहीं है, जहाँ उत्तर प्रायः किसी कार्यपालिका-पद या किसी योजना का व्यय होता है। तीसरा प्रक्रिया वाला है : यह पूछना कि भारित व्यय पर मतदान होता है या नहीं, या अनुदान की माँगों का सदन कौन-सा है। चौथा निधि-भेद वाला है : संचित निधि, आकस्मिकता निधि और लोक लेखा में से कोई एक बताकर उसका अनुच्छेद या उससे निकासी की शर्त पूछना। इन सबके लिए एक ही तैयारी काफ़ी है — अनुच्छेद 112(3) की सात मदों की सूची कंठस्थ कीजिए और उसके साथ तीन अतिरिक्त भारित व्यय जोड़ लीजिए : संघ लोक सेवा आयोग, नियंत्रक-महालेखापरीक्षक का कार्यालय, और अनुच्छेद 275 के अनुदान।
इस प्रश्न से सीधे संबंधित कोई पूर्व PYQ उपलब्ध नहीं।
- practice — not a real PYQ
निम्नलिखित में से कौन-सा व्यय भारत की संचित निधि पर भारित नहीं होता?
- (a)राष्ट्रपति की परिलब्धियाँ और भत्ते
- (b)भारत के नियंत्रक-महालेखापरीक्षक का वेतन
- (c)उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीशों के वेतन और भत्ते
- (d)संघ के किसी मंत्री का वेतन
उत्तर(d) संघ के किसी मंत्री का वेतन
- practice — not a real PYQ
उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों को देय पेंशन किस पर भारित होती है?
- (a)संबंधित राज्य की संचित निधि पर
- (b)भारत की संचित निधि पर
- (c)भारत की आकस्मिकता निधि पर
- (d)भारत के लोक लेखा पर
उत्तर(b) भारत की संचित निधि पर