बीमा में प्रत्यासन-सिद्धांत (प्रिंसिपल ऑफ़ सब्रोगेशन) किसकी अनुमति देता है?
- (a)पॉलिसी की राशि के निवेश की
- (b)बीमादार और बीमादार की बीमा कंपनी के लिए रकम वापसी
- (c)पॉलिसी का स्वतःनवीकरण
- (d)बीमादार का क्षतिपूरण
सही उत्तर — B, (b) बीमादार और बीमादार की बीमा कंपनी के लिए रकम वापसी — प्रत्यासन का पूरा विषय यही है : हानि के लिए ज़िम्मेदार तीसरे पक्ष से रकम वसूल करना। पहले शब्द साफ़ कर लीजिए। 'बीमादार' यहाँ बीमित व्यक्ति के लिए है, अर्थात् वह जिसका बीमा हुआ है — विकल्प (b) का वाक्यांश 'बीमादार की बीमा कंपनी' स्वयं यह स्पष्ट कर देता है, क्योंकि बीमा कंपनी उसकी है, वह स्वयं बीमा कंपनी नहीं। वाणिज्य की हिन्दी में यही व्यक्ति प्रायः बीमित या बीमाधारक कहलाता है और कंपनी बीमाकर्ता; 'बीमादार' कम प्रचलित रूप है और आरंभ में उलटा अर्थ दे सकता है। 'प्रत्यासन' subrogation का मानक हिन्दी विधिक शब्द है और पुस्तिका ने कोष्ठक में अंग्रेज़ी उच्चारण भी दे दिया है। अब सिद्धांत। मान लीजिए किसी तीसरे व्यक्ति की लापरवाही से आपका वाहन क्षतिग्रस्त हुआ। बीमा कंपनी आपको हानि की भरपाई कर देती है। उसी क्षण से वह आपके स्थान पर खड़ी हो जाती है और उस तीसरे व्यक्ति के विरुद्ध आपके सारे अधिकार तथा उपचार उसे मिल जाते हैं — यही प्रत्यासन है। इसका उद्देश्य दो हैं : एक, आप एक ही हानि के लिए दो जगह से — बीमा कंपनी से भी और दोषी से भी — वसूली न कर लें; और दो, हानि का अंतिम बोझ उसी पर पड़े जिसने हानि की। विकल्प (b) में दोनों पक्षों का नाम इसीलिए है। वसूली का पहला हक़ बीमा कंपनी का है, उतनी सीमा तक जितना उसने चुकाया; और यदि वसूली उससे अधिक हो जाए, या हानि का कुछ हिस्सा बीमित ने स्वयं वहन किया हो, तो वह रकम बीमित को लौटती है। इसीलिए यह विकल्प 'रकम वापसी' कहता है और दोनों को गिनाता है। दो सीमाएँ याद रखिए। पहली, प्रत्यासन का अधिकार तभी जन्म लेता है जब बीमा कंपनी दावा चुका दे — भुगतान से पहले नहीं। दूसरी, यह केवल क्षतिपूर्ति वाले संविदाओं पर लागू होता है, अर्थात् अग्नि, समुद्री, मोटर और सामान्य बीमा पर; जीवन बीमा और व्यक्तिगत दुर्घटना बीमा पर नहीं, क्योंकि वे क्षतिपूर्ति के संविदा हैं ही नहीं।
- (a)पॉलिसी की राशि के निवेश की — पॉलिसी से जमा हुई राशि का निवेश बीमा कंपनी का कोष-प्रबंधन है, बीमा का कोई सिद्धांत नहीं। बीमा कंपनियाँ प्रीमियम से बना कोष इसलिए निवेश करती हैं कि भविष्य के दावे चुकाए जा सकें और देयताओं का समय-मिलान बना रहे; भारत में यह निवेश बीमा नियामक और विकास प्राधिकरण के निवेश-संबंधी नियमों से बँधा होता है, जो यह तय करते हैं कि कितना हिस्सा सरकारी प्रतिभूतियों में, कितना अवसंरचना में और कितना अन्य अनुमोदित माध्यमों में जाएगा। यह पूरा विषय प्रत्यासन से किसी बिंदु पर नहीं मिलता : प्रत्यासन दावा चुकाने के बाद तीसरे पक्ष से वसूली का प्रश्न है, निवेश दावा चुकाने से पहले कोष खड़ा करने का। इस विकल्प का काम यहाँ केवल इतना है कि जिसे सिद्धांत याद न हो, वह किसी परिचित-से सुनाई देने वाले वाक्यांश पर टिक जाए।
- (c)पॉलिसी का स्वतःनवीकरण — पॉलिसी का स्वतः नवीकरण एक संविदागत या प्रशासनिक सुविधा है — कुछ स्वास्थ्य और मोटर पॉलिसियों में नवीकरण की सुविधा या आजीवन नवीकरणीयता दी जाती है — पर यह बीमा का सिद्धांत नहीं है, और प्रत्यासन से इसका कोई संबंध नहीं। इस अवसर पर बीमा के सात सिद्धांत एक साथ दोहरा लीजिए, क्योंकि प्रश्न प्रायः इन्हीं में से किसी एक को दूसरे के स्थान पर रखकर पूछे जाते हैं : उत्तम सद्भावना, बीमा योग्य हित, क्षतिपूर्ति, प्रत्यासन, अंशदान, निकटतम कारण और हानि का न्यूनीकरण। इनमें से कोई भी नवीकरण के बारे में नहीं है। छपाई की एक छोटी बात भी नोट कर लीजिए : पुस्तिका 'स्वतःनवीकरण' को बिना अंतराल के एक ही शब्द की तरह छापती है, जबकि सामान्य लेखन में यह 'स्वतः नवीकरण' लिखा जाता है।
- (d)बीमादार का क्षतिपूरण — यही इस प्रश्न का असली जाल है, क्योंकि यह विकल्प सही बात कहता है — पर ग़लत सिद्धांत के नाम पर। बीमित की क्षतिपूर्ति करना क्षतिपूर्ति का सिद्धांत है, प्रत्यासन का नहीं। दोनों का संबंध क्रम का है : पहले क्षतिपूर्ति, फिर प्रत्यासन। बीमा कंपनी पहले बीमित की हानि की भरपाई करती है — यह क्षतिपूर्ति है — और उसके बाद उसे दोषी तीसरे पक्ष के विरुद्ध बीमित के अधिकार मिल जाते हैं — यह प्रत्यासन है। इसलिए यह कहना कि 'प्रत्यासन बीमित की क्षतिपूर्ति की अनुमति देता है' क्रम को उलट देना है : प्रत्यासन क्षतिपूर्ति की अनुमति नहीं देता, वह क्षतिपूर्ति हो जाने के बाद ही जन्म लेता है। यह भी याद रखिए कि प्रत्यासन क्षतिपूर्ति का सहायक सिद्धांत है और उसी की रक्षा के लिए बना है — ताकि बीमित एक ही हानि पर दुहरी वसूली न कर ले और क्षतिपूर्ति सचमुच केवल क्षतिपूर्ति बनी रहे, लाभ का साधन न बन जाए। शब्द पर भी ध्यान दीजिए : यहाँ 'क्षतिपूरण' छपा है, जबकि प्रचलित शब्द 'क्षतिपूर्ति' है।
बीमा के सात सिद्धांत परीक्षा में एक साथ याद रखने चाहिए। उत्तम सद्भावना — दोनों पक्षों को हर तात्त्विक तथ्य स्वयं प्रकट करना होगा। बीमा योग्य हित — बीमा कराने वाले का उस वस्तु या जीवन में वैध आर्थिक हित होना चाहिए, और यही बीमा को जुए से अलग करता है। क्षतिपूर्ति — बीमित को केवल वास्तविक हानि की भरपाई मिलेगी, उससे अधिक नहीं। प्रत्यासन — भरपाई कर देने के बाद बीमाकर्ता को दोषी तीसरे पक्ष के विरुद्ध बीमित के अधिकार मिल जाएँगे। अंशदान — यदि एक ही जोखिम का बीमा एक से अधिक कंपनियों से हो तो हानि उनके बीच अनुपात में बँटेगी। निकटतम कारण — दावा तभी देय है जब हानि का निकटतम और प्रभावी कारण बीमाकृत जोखिम हो। हानि का न्यूनीकरण — बीमित को हानि घटाने के उचित प्रयास करने होंगे, यह मानकर बैठ नहीं जाना चाहिए कि बीमा है ही। इनमें से क्षतिपूर्ति, प्रत्यासन और अंशदान — तीनों एक ही परिवार के हैं और तीनों का उद्देश्य एक है : बीमित बीमा से लाभ न कमाए।
प्रत्यासन का व्यावहारिक रूप रोज़ के मोटर और अग्नि दावों में दिखता है। बीमा कंपनी दावा चुकाते समय बीमित से प्रत्यासन-पत्र ले लेती है और फिर स्वयं दोषी पक्ष या उसकी बीमा कंपनी से वसूली का मुक़दमा चलाती है — इसलिए अदालत में मुक़दमा प्रायः बीमा कंपनी के नाम से या बीमित के नाम से उसकी ओर से चलता है। इसी कारण विकल्प (b) में 'बीमादार की बीमा कंपनी' का उल्लेख अर्थपूर्ण है। सीमा भी उतनी ही महत्त्वपूर्ण है : बीमाकर्ता उतना ही वसूल कर सकता है जितना उसने चुकाया है, इससे अधिक नहीं, क्योंकि प्रत्यासन उसे लाभ कमाने का साधन नहीं देता — वह भी क्षतिपूर्ति के अनुशासन में ही रहता है। और जीवन बीमा पर यह सिद्धांत लागू ही नहीं होता, क्योंकि जीवन का मूल्य आँका नहीं जा सकता और जीवन बीमा क्षतिपूर्ति का संविदा नहीं, एक निश्चित राशि का संविदा है; इसीलिए जीवन बीमा में मृत्यु किसी तीसरे की लापरवाही से हुई हो तब भी बीमा कंपनी उस तीसरे से वसूली नहीं करती और नामिती को बीमित राशि तथा हर्जाना दोनों मिल सकते हैं। भाषा की एक टिप्पणी : कुंजी वाला विकल्प 'रकम वापसी' जैसा ढीला वाक्यांश प्रयोग करता है, जबकि पाठ्यपुस्तक की भाषा में यही बात 'बीमाकर्ता का बीमित के अधिकारों में प्रतिस्थापन' कही जाती है — इसलिए विकल्प को शब्दशः नहीं, उसके आशय से पढ़िए।
- प्रत्यासन (subrogation) : बीमित को क्षतिपूर्ति कर देने के बाद बीमाकर्ता उसके स्थान पर आ जाता है और हानि के लिए उत्तरदायी तीसरे पक्ष के विरुद्ध उसके अधिकार तथा उपचार प्राप्त कर लेता है।
- इसके दो उद्देश्य हैं — बीमित एक ही हानि पर दुहरी वसूली न कर सके, और हानि का अंतिम बोझ दोषी पर पड़े।
- यह अधिकार दावा चुकाने के बाद ही जन्म लेता है, उससे पहले नहीं।
- बीमाकर्ता उतना ही वसूल कर सकता है जितना उसने चुकाया है; उससे अधिक वसूली या बीमित द्वारा स्वयं वहन किया गया हिस्सा बीमित को मिलता है।
- प्रत्यासन केवल क्षतिपूर्ति वाले संविदाओं पर लागू होता है — अग्नि, समुद्री, मोटर और सामान्य बीमा; जीवन बीमा तथा व्यक्तिगत दुर्घटना बीमा पर नहीं।
- प्रत्यासन क्षतिपूर्ति का सहायक सिद्धांत है — पहले क्षतिपूर्ति, फिर प्रत्यासन।
- बीमा के सात सिद्धांत : उत्तम सद्भावना, बीमा योग्य हित, क्षतिपूर्ति, प्रत्यासन, अंशदान, निकटतम कारण, हानि का न्यूनीकरण।
- शब्दावली : पुस्तिका का 'बीमादार' बीमित (insured) के लिए है, न कि बीमाकर्ता के लिए; 'क्षतिपूरण' का प्रचलित रूप क्षतिपूर्ति है; और 'स्वतःनवीकरण' बिना अंतराल के छपा है।
- 'बीमादार' को बीमा कंपनी समझ लेना; वह बीमित व्यक्ति है, और विकल्प (b) का 'बीमादार की बीमा कंपनी' स्वयं यह स्पष्ट कर देता है।
- प्रत्यासन और क्षतिपूर्ति को एक मान लेना; क्षतिपूर्ति पहले होती है और प्रत्यासन उसके बाद जन्म लेता है।
- प्रत्यासन को जीवन बीमा पर भी लागू मान लेना; वह केवल क्षतिपूर्ति वाले संविदाओं पर लगता है।
- यह मान लेना कि बीमाकर्ता तीसरे पक्ष से जितना चाहे वसूल सकता है; वसूली उसके द्वारा चुकाई गई राशि तक सीमित है।
- प्रत्यासन को अंशदान समझ लेना; अंशदान एक ही जोखिम के कई बीमाकर्ताओं के बीच हानि बाँटने का सिद्धांत है, तीसरे पक्ष से वसूली का नहीं।
बीमा के सिद्धांतों से प्रश्न तीन ढंग से आते हैं। पहला परिभाषा वाला है — सिद्धांत का नाम देकर पूछना कि वह क्या करता है, या कोई विवरण देकर उसका नाम पुछवाना; ऐसे प्रश्नों में विकल्प प्रायः पड़ोसी सिद्धांत के होते हैं, जैसे यहाँ क्षतिपूर्ति रखा गया है। दूसरा स्थिति वाला है — कोई छोटी घटना देकर पूछना कि यहाँ कौन-सा सिद्धांत लगेगा, जैसे 'एक ही घर का दो कंपनियों से बीमा' पर अंशदान, या 'तीसरे की लापरवाही से हुई हानि' पर प्रत्यासन। तीसरा अपवाद वाला है — यह पूछना कि कौन-सा सिद्धांत जीवन बीमा पर लागू नहीं होता, जहाँ उत्तर लगभग हमेशा क्षतिपूर्ति, प्रत्यासन या अंशदान में से कोई होता है। तीनों के लिए एक ही तैयारी काफ़ी है : सातों सिद्धांतों की एक तालिका बनाइए और हर पंक्ति में तीन चीज़ें लिखिए — सिद्धांत, एक वाक्य में उसका अर्थ, और एक ठोस उदाहरण।
इस प्रश्न से सीधे संबंधित कोई पूर्व PYQ उपलब्ध नहीं।
- practice — not a real PYQ
प्रत्यासन (सब्रोगेशन) का सिद्धांत निम्नलिखित में से किस बीमा पर लागू नहीं होता?
- (a)अग्नि बीमा
- (b)समुद्री बीमा
- (c)मोटर बीमा
- (d)जीवन बीमा
उत्तर(d) जीवन बीमा
- practice — not a real PYQ
एक ही संपत्ति का दो अलग-अलग बीमा कंपनियों से बीमा कराया गया है और हानि हो जाने पर दोनों कंपनियाँ उस हानि को आपस में अनुपात में बाँटती हैं। यह किस सिद्धांत के कारण होता है?
- (a)प्रत्यासन
- (b)अंशदान
- (c)निकटतम कारण
- (d)बीमा योग्य हित
उत्तर(b) अंशदान